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Life in TRISTAN DA CUNHA | THE STRANGEST ISLAND WHERE VERY DARK THINGS HAPPEN

Discovery Destination Hindi

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[0:00]क्या आप जानते है, दक्षिण अटलांटिक महासागर में सबसे नजदीकी महाद्वीपीय जमीन से भी 2400 किलोमीटर दूर एक ऐसा द्वीप है जो दुनिया के सबसे अलग-थलग बसे हुए स्थानों में गिना जाता है. ट्रिस्टन डा कुन्हा यह छोटा सा ज्वालामुखी द्वीप एक दूर-दराज ब्रिटिश ओवरसीज टेरिटरी यानी कि ब्रिटेन का विदेशी क्षेत्र का हिस्सा है. और यहां एक छोटा लेकिन मजबूत समुदाय रहता है जिसे एडिनबर्ग ऑफ द सेवेन सीज कहा जाता है. यह द्वीप ऊंची-ऊंची खड़ी चट्टानों से घिरा है और इसके चारों ओर गरजता हुआ अटलांटिक महासागर है. इसी वजह से इसे अक्सर दुनिया के छोर पर बसा हुआ द्वीप कहा जाता है. इसका सबसे नजदीकी बसा हुआ पड़ोसी द्वीप सेंट हेलेना है जो 2200 किलोमीटर दूर है. यह दूरी ही दिखाती है कि ट्रिस्टन बाकी दुनिया से कितना दूर है. यह द्वीप असल में एक विशाल ज्वालामुखी की चोटी का ऊपरी हिस्सा है जिसे क्वीन मैरिज पीक कहा जाता है. जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से 2000 मीटर से भी ज्यादा है. इसकी तीखी शंकु जैसी ढलाने इसे लगभग पूरा दुर्गम बना देती है. सिर्फ उत्तर दिशा में एक पतली सी तटीय जमीन है जहां लोग रह सकते हैं. यहीं पर पूरा गांव बसा हुआ है, एडिनबर्ग ऑफ द सेवेन सीज जहां लगभग 250 लोग रहते हैं. यह समुदाय पिछले 200 साल से यहां तमाम मुश्किलों के बावजूद टिका हुआ है. ज्वालामुखीय विस्फोट, जहाजों की तबाही, दूर-दराज की स्थिति और अटलांटिक महासागर का बेरहम मौसम. ट्रिस्टन डा कुन्हा को पहली बार 1506 में एक पुर्तगाली खोजकर्ता ट्रिस्ताउ दा कुन्हा ने देखा था. लेकिन समंदर की तेज लहरों और खड़ी चट्टानों की वजह से वह द्वीप पर उतर नहीं सका. कई सदियों तक यह द्वीप वीरान ही रहा लेकिन बीच-बीच में गुजरते जहाज यहां से मीठा पानी या थोड़ी देर आराम के लिए रुकते थे. 1816 में ब्रिटेन ने या एक छोटा सैनिक अड्डा बनाया ताकि फ्रांसीसी लोग इसे नेपोलियन को सेंट हेलेना से छुड़ाने के लिए इस्तेमाल ना कर सके. जब बाद में सैनिक लौट गए तो एक स्कॉटिश सैनिक विलियम ग्लास और उसका परिवार यही बस गया. यहीं से इस द्वीप पर स्थाई बस्ती की शुरुआत हुई. आज के समय में लगभग सभी ट्रिस्टन निवासी सिर्फ सात परिवारों के वंशज है. ग्लास, ग्रीन, होगन, स्वेन, रोजर्स, रेपपेटो और रावरेलो. इस गहरे पारिवारिक संबंध ने ना सिर्फ यहां की आबादी के जीन यानी कि डीएनए को बल्कि सामाजिक संरचना को भी गहराई से प्रभावित किया है. ट्रिस्टन द कुन्हा में जिंदगी पूरी तरह से इसके अलगाव से जुड़ी हुई है. यहां कोई हवाई अड्डा नहीं है और जमीन की बनावट इतनी कठोर है कि शायद ही यहां कोई एयरपोर्ट बन पाएगा. यहां पहुंचने का एकमात्र तरीका है केप टाउन साउथ अफ्रीका से एक 6 दिन लंबी समुद्री यात्रा करना. ट्रिस्टन के आसपास कुछ छोटे-छोटे द्वीप है जो इसे और भी खास बनाते हैं. इन एक्सेसिबल आइलैंड्स लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर एक तीखा चट्टानी द्वीप है जहां उतरने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है. इसीलिए इसका नाम है इन एक्सेसिबल यानी कि यहां जाना या पहुंचना असंभव है. यह द्वीप आज भी इंसानी हस्तक्षेप से पूरी तरह बचा हुआ है और इसे यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित कर दिया है. इसके पास ही है नाइट एंगेल आइलैंड जो एक महत्वपूर्ण पक्षी अभयारण्य है जहां लाखों समुद्री पक्षी जैसे अल्बाट्रॉस और पेंग्विन अंडे देते हैं. इससे थोड़ी दूरी पर स्थित है गॉफ आइलैंड जो और भी दूर दराज है और ज्यादातर वीरान है. यहां एक मौसम विज्ञान स्टेशन है जिसमें कुछ लोग रहते हैं. इसकी खड़ी चट्टानें, गहरे से ढके पहाड़ और अछूते जंगल इसे समुद्री पक्षियों के संरक्षण का एक अहम केंद्र बनाते हैं. क्योंकि यहां की जमीन सामूहिक रूप से सबकी होती है.

[4:37]इसीलिए बाहर के लोगों के लिए यहां बसना लगभग नामुमकिन है. सिर्फ वही लोग यहां बस सकते हैं जो या तो यहीं पैदा हुए हो या फिर किसी स्थानीय परिवार में शादी करके आए हो. और वह भी तभी जब द्वीप की परिषद यानी कि आइलैंड काउंसिल मंजूरी दे. यह कड़ा नियंत्रण ट्रिस्टन की संस्कृति, भाषा और संसाधनों की रक्षा करता है. लेकिन साथ ही बाहरी विचारों और विचार को सीमित भी करता है. अक्टूबर 1961 में ट्रिस्टन द कुन्हा की जिंदगी अचानक बदल गई. कई सदियों तक शांत रहने के बाद द्वीप का सूप्त ज्वालामुखी क्वीन मैरिज पीक फट गया. लावा पहाड़ से बहता हुआ नीचे आया और द्वीप के क्रे फिश फैक्ट्री यानी कि झिंगा मछली प्रसंस्करण केंद्र को नष्ट कर दिया. जो स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा था. इससे द्वीप की इकलौती बस्ती एडिनबर्ग ऑफ द सेवेन सीज को भी गंभीर खतरा पैदा हो गया. उस समय करीब 264 लोग वहां रहते थे. सभी को नाव के जरिए केप टाउन यानी कि दक्षिण अफ्रीका की ओर फिर इंग्लैंड ले जाया गया. बहुत से लोगों के लिए यह पहली बार था जब वे अपने घर से बाहर निकले थे. उन्हें दक्षिणी इंग्लैंड में अस्थाई मकान दिए गए. लेकिन वहां का मौसम जीवन की गति और अजनबी संस्कृति ने उन्हें अकेला और असहज महसूस कराया. भले ही उन्हें वह भौतिक सुविधाएं ज्यादा मिली लेकिन ज्यादातर ट्रिस्टन निवासी उस जीवन में खुद को ढाल ही नहीं पाए. उन्हें अपना शांत सहयोग पूर्ण जीवन, खुला प्राकृतिक पर्यावरण और अपने छोटे समुदाय का अपनापन बहुत याद आया. 2 साल के भीतर जब ज्वालामुखी शांत हुआ और द्वीप को फिर से सुरक्षित माना गया तब सरकार ने चुनाव का विकल्प दिया और अधिकांश लोगों ने लौटने के पक्ष में वोट दिया. 1963 में अधिकतम लोग वापस लौटे और अपने घर और गांव को फिर से बसाया. यह एक शक्तिशाली उदाहरण था उस गहरे लगाव का जो ट्रिस्टन के लोग अपनी जमीन से रखते हैं. एक ऐसी जगह जो बाहर वालों को भले ही कठोर लगे लेकिन ट्रिस्टन वासियों के लिए अमूल्य और अपूर्णीय थी. आज भी ट्रिस्टन डा कुन्हा की जिंदगी दुनिया से बिल्कुल अलग है. एडिनबर्ग ऑफ द सेवेन सीज में अब लगभग 240 लोग रहते हैं. भले ही थोड़ी बहुत आधुनिकता यहां पहुंच गई है फिर भी जिंदगी अब भी सरलता, सहयोग और आत्मनिर्भरता पर टिकी हुई है. यहां एक स्कूल, एक छोटा अस्पताल, डाकघर, कैफे, ग्रॉसरी स्टोर और सामुदायिक हॉल है. ज्यादातर घर साधारण और मजबूत होते हैं ताकि मौसम की मार झेल सके. बिजली स्थानीय स्तर पर पैदा होती है और इंटरनेट भले ही सीमित हो लेकिन उपलब्ध है. सैटेलाइट टीवी और फोन के जरिए द्वीप की दुनिया से संपर्क बना रहता है. द्वीप की सबसे बड़ी आर्थिक आमदनी समुद्र से होती है. खासकर ट्रिस्टन रॉक लॉबस्टर जिसे क्रॉ फिश भी कहा जाता है. यह बहुत मांग वाली समुद्री चीज है जिसे सतत तरीकों से पकड़ा जाता है और यूरोप और एशिया में बेचा जाता है. यहां की फिशिंग कोऑपरेटिव यानी कि मछली पकड़ने वाला समूह कोटा और बिक्री को सावधानी से नियंत्रित करता है. ताकि प्राकृतिक संतुलन और आर्थिक स्थिरता बनी रहे. मछली पकड़ने के अलावा कुछ लोग प्रशासन, खेती, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में काम करते हैं. ट्रिस्टन पर सामूहिक जिम्मेदारी सिर्फ एक सांस्कृतिक पहलू नहीं है बल्कि जिंदा रहने के लिए जरूरी है. यहां हर व्यक्ति किसी ना किसी तरह से समुदाय की भलाई में योगदान देता है. चाहे वह खेती में मदद करना हो, सड़क या इमारतों की मरम्मत करना हो या किसी पड़ोसी की मदद करना हो. हालांकि ट्रिस्टन बहुत आकर्षक लगता है लेकिन बाहरी लोग यहां बस ही नहीं सकते. इस द्वीप में कोई इमीग्रेशन प्रोग्राम यानी कि प्रवासन योजना ही नहीं है. और स्थानीय लोग नए लोगों को बसाने की कोशिश भी नहीं करते. यहां की जमीन सामूहिक रूप से परिवारों में बांटी जाती है और पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हीं में रहती है. जो बाहरी लोग कभी-कभी ट्रिस्टन आते हैं वह आमतौर पर डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर या शोधकर्ता होते हैं. जिन्हें एक समय तक उनके खास काम करने के लिए वहां बुलाया जाता है. और फिर उन्हें वापस लौटना पड़ता है. ट्रिस्टन में बसने और प्रवासन को लेकर सख्त नियम बनाए गए हैं और इसके पीछे कई वाजिब कारण भी है. पहला है सीमित संसाधन द्वीप पर कृषि भूमि, पानी, रहने की जगह यह बहुत ही सीमित है. अगर आबादी तेजी से बढ़ेगी तो प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है. दूसरा है नाजुक सामाजिक ढांचा. यहां का समाज बहुत जुड़ा हुआ है और संतुलित भी है. अगर बाहर के लोगों को बिना सांस्कृतिक तालमेल के जोड़ा गया तो यह सामुदायिक एकता टूट सकती है. तीसरा है दूरी और जोखिम. ट्रिस्टन इतनी दूरी है कि यहां से रेस्क्यू सप्लाई और मेडिकल मदद मिलना बहुत ही मुश्किल है. इसलिए द्वीप अपनी क्षमता से ज्यादा जिम्मेदारी नहीं उठा सकता. और किसी ऐसे सिस्टम पर निर्भर नहीं रह सकता जो हमेशा उपलब्ध ना हो. इन सभी कारणों से ट्रिस्टन के लिए अलगाव कोई बोझ नहीं है. बल्कि यह उनकी ताकत है. यहां के लोग खुद को दुनिया से कटे हुए नहीं मानते. बल्कि वे अपने एक अलभ्य और कीमती जीवन शैली के रक्षक मानते हैं. उन्हें शांति, सादगी और साझा जिम्मेदारी का जीवन पसंद है. यहां की जिंदगी आसान नहीं है, तूफान अक्सर आते हैं, समुद्र खतरनाक है और जरूरी सामान की आपूर्ति महीनों देर से हो सकती है. लेकिन इसके बदले में यहां के लोग तनाव, प्रदूषण और बाहरी समाजों की समस्याओं से दूर रहते हैं. फिर भी भविष्य में चुनौतियां मौजूद है जैसे जलवायु परिवर्तन, समुद्री स्तर का बढ़ना और प्राकृतिक तंत्र यानी कि इकोसिस्टम पर दबाव. इसका अलगाव यह भी एक चुनौती है कि युवा पीढ़ी द्वीप पर रहने में कितनी रुचि बनाए रखता है. कई युवा पढ़ाई के लिए बाहर जाते हैं और कुछ वापस लौट आते हैं लेकिन कुछ वही बस जाते हैं. इसके बावजूद यह समुदाय बहुत मजबूत और लचीला है. उसने प्राकृतिक आपदाएं, आर्थिक बदलाव और दो विश्व युद्ध झेलकर भी खुद को कायम रखा है. अगर आज कोई ट्रिस्टन दा कुन्हा जाए तो उसे ऐसा लगेगा जैसे किसी और समय और दुनिया में कदम रख दिया हो. यह कोई म्यूजियम या टूरिस्ट स्पॉट्स यहां नहीं है. यह एक जीवित चलती फिरती इंसानी बस्ती जहां लोग भी हमारी तरह ही उम्मीदें, डर और सपने रखते हैं. लेकिन यहां का जुड़ाव जगह से एक दूसरे से और समुद्र जीवन से आधुनिक शहरों की जिंदगी से पूरी तरह अलग है. ट्रिस्टन द कुन्हा में अलगाव को अजीब या पिछड़ा हुआ नहीं मानते बल्कि इसे देखा जाता है एक मूल्यवान चीज की सुरक्षा के रूप में जैसे सहजता, धैर्य और शांति की संस्कृति. यह जिंदगी भले ही नाजुक हो और प्राकृतिक हालात कठोर लेकिन यहां के लोगों की आत्मा बेहद ही मजबूत है.

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