Thumbnail for पहली बार कॉमेडी तकरीर Maulana Azam Khan Noori New Bayan हंसी नहीं रुकेगी 🤣 किसी की new takrir MSK by MSK Ashrafi

पहली बार कॉमेडी तकरीर Maulana Azam Khan Noori New Bayan हंसी नहीं रुकेगी 🤣 किसी की new takrir MSK

MSK Ashrafi

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[0:00]Section 1

नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार? अपने नौकर अपनी तरफ का...

[20:47]Section 2

अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे ह...

[38:33]Section 3

नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल...

[58:21]Section 4

वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात स...

[1:18:16]Section 5

ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुल...

[1:37:08]Section 6

अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग...

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[0:00]नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?
[1:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना?
[1:21]लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है?
[10:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना?
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[0:00]नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार? अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[1:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[3:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे?

[4:56]ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[5:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[6:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[6:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[7:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[9:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[10:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[12:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[13:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[14:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[14:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[15:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[17:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[18:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[20:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[21:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[22:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[22:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[23:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[25:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[26:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[28:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[29:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[30:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[30:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[31:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[33:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[34:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[36:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[37:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[38:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[38:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[39:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[41:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[42:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[44:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[45:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[46:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[46:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[47:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[49:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[50:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[52:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[53:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[54:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[54:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[55:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[57:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[58:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[1:00:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[1:01:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[1:02:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[1:02:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[1:03:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[1:05:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[1:06:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[1:08:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[1:09:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[1:10:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[1:10:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[1:11:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[1:13:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशdaan से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[1:14:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[1:16:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[1:17:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[1:18:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[1:18:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[1:19:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[1:21:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[1:22:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[1:24:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[1:25:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[1:26:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[1:26:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[1:27:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[1:29:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[1:30:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[1:32:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[1:33:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[1:34:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[1:34:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिosalत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[1:35:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[1:37:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[1:38:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[1:40:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[1:41:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[1:42:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[1:42:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[1:43:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[1:45:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[1:46:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[1:48:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। पूरा मजमा दोनों हाथों को उठाकर कहे, लब्बैक या रसूल अल्लाह। और जिंदगी से लब्बैक या रसूल अल्लाह। अपने यहां यहां एक कहावत है कारी साहब। खीसियानी बिल्ली खंबा नोचे।

[1:49:43]अमेरिका का हाल वही है इस वक्त। जब आग के शोले उभरे, मुस्तफा के गुलामों ने कहा देख, अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब सुप्रीम पावर है। ए अमेरिका, तेरी तमाम तदबीरे फेल है, आग के शोले तेरे काबू में नहीं आ रहे हैं। तो अमेरिका ने मीडिया के जरिए बताया, कहा नहीं-नहीं, ये मुसलमान ऐसे ही कह रहे हैं। अरे हमने आग को काबू में कर लिया। फला इलाके में आग बुझ गई, इस इलाके में आग बुझ गई, उस इलाके में आग बुझ गई। हमने कहा, मियां, अब उंगली के पीछे सूरज को छुपाने की कोशिश ना करो।

[1:50:16]ये इतना आसान नहीं है। हमें क्या पता नहीं है आग कैसे बुझी है? कहा, मतलब? हमने कहा, आग, वही-वही बुझी है जहां-जहां अल्लाह हु अकबर की सदा बुलंद है।

[1:50:33]नारे-ए-रिसालत। नारे-ए-रिसालत या रसूल अल्लाह। अल्लामा आजम खान नूरी। जिंदाबाद। नारे-ए-तकबीर। नारे-ए-रिसालत। या रसूल अल्लाह। माशाल्लाह माशाल्लाह। ताहाफुजे ईमान कॉन्फ्रेंस में आए हुए जिंदा दिल इज्जतदार मुसलमानों। बहुत अच्छे। अगर अपनी नस्लों को बचाने का इरादा रखते हो, अगर अपने बेटियों की अजमतों को बचाना चाहते हो। तो आज इस जलसे से एक पैगाम लेकर के जाओ। तुम्हें अपनी औलादों के हाथों में बम बारूद भाला लाठी डंडा देने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपनी शहजादियों और अपने शहजादों के हाथों में सिर्फ कलम देने की जरूरत है। बहुत अच्छा पैगाम है। इसलिए कि तलवार से वार किया जाए वो जख्म तो भरा जा सकता है। लेकिन कलम से वार कर दिया जाए सदियां गुजर सकती हैं, जख्म पूरा नहीं हो सकता है। और ये हमारे ओलमा, मेंबरों से, मदरसों से, मस्जिदों से, तदरीज से, तस्नीफ से, तकरीर से।

[1:51:39]हर कदम-कदम पर कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरीके से उम्मत के मुस्तकबिल को संवारा जाए। लेकिन अफसोस, इन्हीं आलिमों के चेहरे ने उम्मते मुस्लिमा को डाकू नजर आया। जब तक मैंने अपने आलिमों के चेहरे में अपना कायद देखा था। जब तक हमने इन आलिमों के चेहरे में अपना रहनुमा देखा था। तारीख गवाह है, इतिहास के पन्ने पढ़ लो। हम कभी जूतों के नीचे नहीं आए हैं। ये आज जो बेटियों के टुकड़े फ्रीजों में हैं, ये आज जो शहजादों के लाशें कुएं में लटक रहे हैं। इसकी एक वजह यही है कि हमने अपने आलिमों को अपना कायद नहीं बनाया। तो आज के इस जलसे से पैगाम लेकर के जाओ। कि अपनी बेटियों के हाथों में तुम्हें मोबाइल का खिलौना नहीं बल्कि कुरान-ए-मुकद्दस देना है। बात समझ में आ रही है? अंग्रेजी में तो नहीं बोल रहा हूं? मैं बहुत आसान उर्दू में तकरीर करता हूं वरना हमारे कारी शमसुद्दीन साहब और राहत साहब बैठे हैं। अच्छी उर्दू बोलने पर आ जाए कि जुमला पंडाल से निकल जाएगा। हां। नवाब साहब से लखनऊ में एक कारी साहब। उनके यहां एक नौकर था, देहाती था अपने तरफ का रहा होगा। भैया क्या कर रहे हो यार?

[1:53:08]अपने नौकर अपनी तरफ का रहा होगा। तो नवाब साहब के यहां मेहमान आते तो कहता पनिया लई, खनवा लई। नवाब साहब को गिरा गुजरती थी कि यार बड़े-बड़े लोग आते हैं, देहाती बोल के माहौल चौपट कर देता है। बुलाया इधर आ। आज के बाद उर्दू बोलना है वरना पिटाई करके नौकरी से निकाल दूंगा। कहा, हुजूर का हुक्म सर आंखों पर। आज से उर्दू बोलेंगे। सुबह-सुबह का वक्त था। नवाब साहब हुक्का पी रहे थे। चिंगारी उड़ी आग की चिलम से वो जाकर के दाढ़ी में फंस गई। अब देहाती में कहना होता तो कह देता, नवाब साहब दरिया जरिया थे बचाओ। लेकिन अब उसको उर्दू बोलना था तो बांध के हाथ खड़ा हो गया। कहा, हुजूर ज़िल्ले इलाही आलमपनाह। मेरे आक़ा, मेरे मौला, मेरे मलजा। गुलशन-ए-आतिशदां से एक चिंगारी जफ्त करने के बाद आपके चेहरे-ए-मुक़द्दसा से मुत्तसिल एक दाढ़ी का पाकीजा आशियाना है। वो चिंगारी बड़ी देर से वहां आराम कर रही है। अगर बा-ए-खातिर हुक्म हो तो ये खाकसार खादिम अपनी जगह से उठने के बाद उस चिंगारी की बेजा हरकत पर उसको वहां से हटाने की कोशिश करे। वाह वाह वाह वाह वाह वाह। आह हा हा हा।

[1:54:21]वाह वाह। अब आप अंदाजा लगाएं तब तक दाढ़ी का क्या हाल हुआ होगा। हमारा तो तसव्वुर कहता है मुंह ही नहीं बचा होगा। सहेट-महेट हो गया होगा। बात समझ में आ रही है ना? लहक कर कहें या रसूलल्लाह। कि हम जिस मैदान में उतरे हैं, दुश्मन को घुटनों पर लाए हैं, हम खुद कभी घुटनों पर नहीं गए हैं। बोलो, सही है कि गलत है। अगर सही है तो ऊंचे आवाज में बोल के बताओ। सही है कि गलत है? और दुनिया देख ले, अगर मेरी बहादुरी देखना है, तो पढ़ लो इतिहास। पढ़ लो हिस्ट्री, पढ़ो तारीख। मैदान कोई भी हो, मगर फतह का झंडा ईमान वालों ने लहराया। वह चाहे बदर हो, हुनैं हो, खंदक हो, खैबर हो, करबो बला हो या मौजूदा दौर में फिलीस्तीन हो। क्या बात है। अब अगर अगर मेंबर शरीफ से दुआएं मिले तो मैं कुछ कह दूं। जरा लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह। इसका रिपीट थोड़ा कम कर दीजिए। रिपीट थोड़ा सा हल्का कम कर दीजिए। आप लोगों की बात समझ में आ रही है? समझ में आ रही है ना? तो जरा मचल कर कहिए या रसूल अल्लाह। चाहे मौजूदा वक्त में फिलीस्तीन हो। देख ले अपने माथों की निगाहों से। मुस्तफा के गुलामों को आबादियों को जब जमाने ने मैदान बनाने के लिए नापाक सही करना शुरू किया, कभी बम की पाप, कभी बमों की सप्लाई। कभी बारूद की सप्लाई, कभी गोला की सप्लाई और दुनिया ने कहा था जमाने वालों देख लो, मैं सुपर पावर हूं। ईमान वालों की एक आबादी को आग के सोलों के हवाले करके हमने इसे मैदान बना दिया। लेकिन तारीख गवाह है जब रब्बे काबा ने ईमान वालों पर करम किया है तो अमेरिका के शहर से जब आग के सोले उठे हैं तब मुस्तफा वालों ने कहा था, ए अमेरिका देख ले। एक सहेरे गजा को मैदान बनाने में तुझे तीन महीने लगे हैं। मेरे रब ने तेरे शहर को तीन दिन में बना दिया है। क्या बात है।

[1:56:47]अगर तू सुपर पावर है। तो मेरा रब, ऐसे सुनोगे? ऐसे सुनेंगे आप? सुनने के मूड में है तो हाथ छोड़े हटाएं। इतनी ठंडी नहीं है। जितना आप जता रहे हैं, ऐसी हल्की-फुल्की ठंडियां आती रहेंगी, जाती रहेंगी हमें हमारा कुछ नहीं कर सकती। इसलिए कि हमारी माओं ने हमारे बचपने में इतना सेवड़ा घोल के पिला दिया है। हां कि हजरत पांजर की शिकायत और हमें। माशाल्लाह। लहक कर कहिए या रसूल अल्लाह।

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