[0:00]कल्पना कीजिए 60 वर्षों का भयंकर सूखा इंसान पानी की एक बूंद को तरस रहा था तब ब्रह्मा जी ने एक तपस्वी को राजा बनाया. उस राजा ने पृथ्वी को तो बचा लिया, लेकिन बदले में एक ऐसी शर्त रख दी जिसने स्वयं महादेव को बेघर कर दिया. महादेव को अपनी ही बसाई हुई नगरी काशी छोड़कर जाना पड़ा. आइए जानते हैं स्कंद पुराण की वह रहस्यमयी कथा. यह उस समय की बात है जब धरती पर मनुष्य अपने अहंकार में इतना चूर हो गए थे कि उन्होंने पूजा पाठ और यज्ञ करना पूरी तरह बंद कर दिया. इसका परिणाम यह हुआ कि देवताओं को यज्ञ से मिलने वाली ऊर्जा बंद हो गई. क्रोधित होकर भगवान इंद्र ने धरती पर बारिश रोक दी और पूरी प्राकृतिक व्यवस्था ही चरमरा आ गई. धरती पूरी तरह सूखने लगी और सृष्टि के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा. तब ब्रह्मा जी को भयंकर चिंता हुई. सृष्टि को बचाने के लिए उनकी नजर धरती पर मौजूद एक अत्यंत पवित्र तपस्वी रिपुंजय पर पड़ी. जो एक नदी के किनारे गहरी तपस्या में लीन थे. ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन दिए और पृथ्वी का शासन संभाल कर धर्म की स्थापना करने का निवेदन किया. रिपुंजय मान तो गए, लेकिन उन्होंने परमपिता ब्रह्मा के सामने एक बहुत ही कठोर शर्त रख दी. रिपुंजय ने कहा, मैं पृथ्वी का राजा तभी बनूंगा जब धरती पर अदृश्य रूप में मौजूद सभी देवी देवताओं को अपनी-अपनी लोक वापस जाना होगा. ताकि मेरे शासन में कोई ईश्वरीय दखल ना हो. पृथ्वी को बचाने के लिए ब्रह्मा जी को यह शर्त माननी पड़ी. इसी शर्त के कारण देवताओं के साथ-साथ भगवान शिव को भी अपने त्रिशूल पर बसाई अपनी प्रिय नगरी काशी को भारी मन से छोड़कर जाना पड़ा. रिपुंजय जो अब राजा दिवोदास बन चुके थे उनके अद्भुत शासन से धरती फिर से हरी भरी सुखद और मनमोहक हो गई. लेकिन उधर भगवान शिव को अपनी काशी की बहुत याद सताने लगी. राजा की एक शर्त यह भी थी कि अगर उनके राजपाट में कोई भी कमी या अधर्म पाया गया तो वे अपना पद त्याग देंगे. राजा की कमी ढूंढने के लिए महादेव ने पहले अपनी 64 योगिनियों को भेजा फिर अपने गणों को भेजा और यहां तक कि ब्रह्मा जी भी काशी आए. लेकिन किसी को राजा के शासन में कोई कमी नहीं मिली. उल्टा वे सभी काशी की सुंदरता देखकर वहीं बस गए. अंत में निराश महादेव भगवान विष्णु जी के पास गए. भगवान विष्णु ने महादेव को आश्वासन दिया कि वे उनकी काशी उन्हें वापस दिलाएंगे. भगवान विष्णु एक बौद्ध सन्यासी का रूप धारण करके काशी पहुंचे. उन्होंने राजा देवोदास से मिलकर उन्हें मोह माया और जीवन के सत्य का ऐसा ज्ञान दिया कि राजा के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया. राजा ने खुशी-खुशी अपना राजपाट त्याग दिया और मोक्ष की प्राप्ति के लिए चले गए. और इस तरह एक बार फिर भगवान शिव को उनकी प्रिय नगरी काशी वापस मिल गई. आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस जगह पर सन्यासी रूप में भगवान विष्णु ने काशी में सबसे पहले अपने कदम रखे थे. वहां आज भी गंगा और वरुणा नदी के संगम पर आदिकेशव मंदिर मौजूद है. यह काशी में भगवान विष्णु का सबसे पहला और प्राचीनतम मंदिर माना जाता है जो आज भी इस सत्य घटना की गवाही दे रहा है. अगर आपको यह अनसुनी कथा पसंद आई हो तो कमेंट्स में हर हर महादेव जरूर.

भगवान शिव को क्यों छोड़नी पड़ी अपनी ही काशी नगरी? 😱 | Untold Story of Kashi #facts
Priyansh Shukla
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[0:00]उस राजा ने पृथ्वी को तो बचा लिया, लेकिन बदले में एक ऐसी शर्त रख दी जिसने स्वयं महादेव को बेघर कर दिया.
[0:00]यह उस समय की बात है जब धरती पर मनुष्य अपने अहंकार में इतना चूर हो गए थे कि उन्होंने पूजा पाठ और यज्ञ करना पूरी तरह बंद कर दिया.
[0:00]क्रोधित होकर भगवान इंद्र ने धरती पर बारिश रोक दी और पूरी प्राकृतिक व्यवस्था ही चरमरा आ गई.
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