[0:02]हरियापुर गांव के एक कोने में रघुवीर लोहार का एक छोटा सा घर था। उस दिन सुबह सवेरे रघुवीर लोहार अपने औजार लेकर काम पर निकल रहा था। कब तक ऐसा चलेगा रघु? हर रोज सुबह कुछ आस लेकर जाते हो और शाम को निराश होकर लौटते हो। क्या तुम्हें नहीं दिखता कि पूरे गांव में सबसे बुरी हालत हमारी है? क्या करूं राधा, तू ही बता। मेरी किस्मत ही फूटी हुई है, तो मैं क्या कर सकता हूं? जब भी हालात सुधरने लगते है, कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि फिर से सब कुछ बिगड़ जाता है। अब देख, पहली बार जैसे-तैसे कुछ जमा किया, तू बीमार पड़ गई, सब खर्च हो गया। फिर रतन के पैर में वह गहरी चोट, पूरा इलाज करवाने में फिर से सब कुछ खत्म हो गया। तभी 10 साल का रतन दौड़ता हुआ आया और उसकी मासूम आंखों में भूख थी पर मन में कुछ कहने की हिम्मत भी। पिताजी, मेरे मन में कई दिनों से अच्छा खाना खाने की इच्छा हो रही है। हमारे घर में दूसरों की तरह पकवान क्यों नहीं बनते? रघुवीर की आंखें नम हो गई। तू चिंता मत कर बेटा। हमारे दिन भी जरूर बदलेंगे। एक वक्त आएगा जब हम लोग दूसरों से भी अच्छे पकवान बनाएंगे, फिर तेरा जो दिल करेगा, वही खाएंगे। लेकिन पिताजी, एक बात बोलूं, जब पड़ोस की ताई अम्मा के घर से पकवानों की खुशबू आती है ना, तो मैं तो खिंचा चला जाता हूं। एक दिन चला भी गया था, लेकिन उन्होंने मुझे देखते ही खाना छुपा लिया और कहा, यहां मत आ, भाग जा यहां से। तो मैं वापस आ गया। राधा की आंखों से आंसू बहने लगे। उसका दिल जैसे किसी ने मसल कर रख दिया हो। रघुवीर कुछ नहीं बोला, चुपचाप अपने औजार उठाए और लोहार की दुकान की ओर चल पड़ा। रघुवीर की लोहार की दुकान गांव के चौराहे पर थी। उस दिन जैसे ही उसने भट्टी सुलगई और हथौड़ा उठाया, उसे लगा कि उसके बाजुओं में अब पहले जैसी ताकत नहीं रही। उसके हाथों की चोटें भी जैसे थक चुकी थी। हे भगवान, और कितनी परीक्षाएं लोगे, आज एक भी ग्राहक नहीं आया और ऊपर से घर की हालत, रत्न की मासूम बातें। सब कुछ तोड़कर रख देती है। तभी गांव का मुखिया दुकान पर आ पहुंचा, उसके चेहरे पर एक औपचारिक मुस्कान थी। हां रघुवीर, क्या हुआ? आज तुम्हारे हाथों में पहले जैसा जोर नहीं दिख रहा, क्या बात है? मन कुछ बोझिल लग रहा है, क्यों? हां मुखिया जी, अब आप तो सब जानते हैं फिर भी पूछते हैं। मेरा परिवार बहुत बड़ी आर्थिक तंगी में है। मेहनत तो बहुत करता हूं, लेकिन हाथों में किस्मत नहीं है। मुखिया चुप रहा, लेकिन तभी बगल से बाली आ गया। गांव का वह आदमी जिसे दूसरों के दुख में भी मजा आता था। मुखिया जी, मैं तो कहता हूं कि इस रघुवीर को गांव से निकाल देना चाहिए। उसकी मनहूस छाया धीरे-धीरे पूरे गांव में फैल रही है। कहते हैं, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन पर काल की छाया होती है और जो पूरे गांव को बर्बाद कर सकते हैं। मुखिया पहले चौंका, फिर हंसने लगा, बाली भी हंसने लगा। अरे बाली, तू भी ना, चल छोड़ इसे, चल यहां से।
[3:26]दोनों रघुवीर की हालत पर हंसे और चले गए। रघुवीर वहीं बैठा रहा, आंखें आसमान की ओर उठाए। हे भगवान, क्या मैंने अपनी तकदीर खुद लिखी थी? क्या मैंने किसी का बुरा किया है? कभी चोरी कभी बेईमानी। मैंने कुछ बुरा नहीं किया, फिर मेरे ऊपर यह दुख क्यों आया है? क्यों? मेरे सपनों के दिए बुझ गए, मेरी उम्मीदों के चिराग बुझ गए। धुंध में खो गया हूं, कहीं से रास्ता नजर नहीं आता। यह तन्हाई कब खत्म होगी? उसकी हथेली से हथौड़ा नीचे गिर गया। उसका हौसला उस दिन भट्टी से पहले ही बुझ गया था। मैं आज भी खाली हाथ जाऊंगा। राधा उम्मीद लगाए बैठी होगी। मेरा तो घर जाने का भी मन नहीं कर रहा। मैं क्या करूं? मेरा बेटा भूखा होगा। शाम को रघुवीर थका हारा अपने घर पहुंचा। उसका चेहरा उदास था। जैसे ही उसने घर में कदम रखा, राधा ने उसे देख लिया। अरे क्या हुआ रघु? आज तुम्हारा चेहरा इतना उदास क्यों है? अरे, कुछ तो कहो। रघुवीर की आंखें भर आईं, उसने धीरे से राधा की ओर देखा। अब तो सारे गांव वाले भी मेरी बुरी किस्मत का मजाक उड़ाने लगे हैं राधा। और क्या कहूं, आज तो दुकान पर एक भी ग्राहक नहीं आया। हां, और ऊपर से मुखिया और बाली। वह दोनों मेरी किस्मत पर हंसते हुए चले गए। मैं तुम्हारे लिए खाने के लिए भी कुछ नहीं ला सका। राधा चुप हो गई, उसकी आंखें भर आईं। सुबह जब तुम दुकान जा रहे थे, तब मैं भी तुम्हें बोल रही थी। इसमें गलती मेरी भी है, मैं भी कभी तुम्हारे दुख को पूरी तरह समझ नहीं पाई। फिक्र मत करो, भगवान सब ठीक करेगा। रघुवीर कुछ नहीं बोला, वह चुपचाप चारपाई पर लेट गया। उसके हाथ कांप रहे थे लेकिन आवाज नहीं निकली।
[5:24]अगले दिन सुबह होते ही राधा ने रघु से कहा, रघु, खाने के लिए कोई चीज उधार ही ले आओ। हमारे गांव की दुकान हो सकता है तुम्हें कुछ सामान उधार दे दे। नहीं राधा, मैं कल भी गया था उसके पास, वह पहले अपना पिछला उधार मांग रहा है। अब मुझे उसकी दुकान पर जाते हुए शर्म आती है। मुझे नहीं लगता कि हमारे हालात कभी भी ठीक हो सकेंगे। ऐसा ही चलता रहा तो हमें यह गांव छोड़कर जाना पड़ेगा। गांव में दो-तीन लोगों से पहले ही मैं उधार ले चुका हूं। अब मेरे अंदर इतनी हिम्मत नहीं कि किसी और से उधार मांग लूं। सबको पता है कि मैं उधार लेकर वापस नहीं करता। वापस करूं भी तो कहां से? हमारे पास इतने पैसे होते ही नहीं जो आते हैं वो लग जाते हैं। हां रघु, यह तो है। भगवान पता नहीं किस बात की सजा दे रहा है हमें। लेकिन हमें उम्मीद रखनी चाहिए, हमारे भी दिन एक दिन जरूर बदल जाएंगे। यह बात तो मुझे तुमसे सुनते 10 साल हो गए हैं, आज तक ऐसा दिन नहीं आया। वह चुपचाप घर से निकल पड़ा और सीधा जंगल की ओर चल दिया। उसका दिल बहुत भारी था, आंखों में उदासी थी और कदम जैसे बेजान थे। दिमाग में बार-बार एक ही ख्याल आ रहा था, क्या जिंदगी का यही अंत है? क्या मैं अपनी तकलीफों से हमेशा के लिए मुक्त हो जाऊं? रघुवीर आत्महत्या के विचारों में डूबा हुआ गांव की सीमा तक पहुंच चुका था। तभी सामने से मुखिया आता हुआ दिखाई दिया।
[7:01]अरे रघुवीर, आज दुकान नहीं खोली क्या? तुम तो सीधे जंगल की ओर निकल पड़े हो। क्या बात है? अब लोहार से लकड़हारा बनने का इरादा है क्या? रघु चुप रहा, वह पहले से ही उदास था। उसके पास मुखिया को जवाब देने के लिए कोई भी शब्द नहीं थे। चलो, अच्छा है, लकड़हारे भी बुरे नहीं होते, कम से कम जंगल में कोई तुम्हारी किस्मत का मजाक तो नहीं उड़ाएगा ना? मुखिया हंसता रहा और चला गया। रघुवीर बिना कुछ बोले जंगल की गहराई की ओर बढ़ गया। रघुवीर अब थक चुका था, उसके पैर जवाब दे चुके थे। वह एक घने वृक्ष की छाया में बैठ गया और आसमान की ओर देखने लगा। मैं मर्द हूं ना, इसीलिए किसी के सामने रो नहीं सकता। अगर राधा और रतन मुझे रोते हुए देख लेते तो उनका मनोबल टूट जाता। इसीलिए मुझे जंगल आना पड़ा। भगवान, तू मेरी कितनी परीक्षा लेगा? रघु उदास होकर आसमान की तरफ देखते हुए बातें कर रहा था कि अचानक उसके कानों में किसी के चीखने की आवाज आई। कोई है तो मेरी मदद करो। वह उठा और इधर-उधर देखने लगा। अचानक उसकी नजर एक साधु पर पड़ी जो जमीन पर गिरे हुए थे। रघुवीर तुरंत उनके पास गया। साधु महाराज, आपको क्या हुआ? आप ऐसे क्यों पड़े हैं? बेटा, मैं राज की ओर जा रहा था कि रास्ते में मेरे पैर में जोर की मोच आ गई। मैं गिर पड़ा और तभी से इस सुनसान जंगल में पड़ा हूं। यह जंगल इतना वीरान है कि यहां कोई आता ही नहीं। कई दिन हो गए, कोई इंसान नहीं दिखा, मुझे बहुत प्यास लगी है, मेरा गला सूख रहा है। अगर जल्दी पानी नहीं मिला तो शायद मैं बच ना सकूं। रघुवीर घबरा गया और तुरंत इधर-उधर देखने लगा, शायद कहीं से पानी या कोई मदद मिल जाए। परंतु यहां तो दूर-दूर तक कोई तालाब दिखाई नहीं दे रहा है महाराज। बताइए साधु महाराज, अगर आपको पता हो कि पानी कहां मिल सकता है तो मैं अभी ले आता हूं। यहां से लगभग 2 मील दूर एक तालाब है। तुम मेरे लिए वहां से पानी ले आओ बेटा। इतना कहकर साधु ने अपना कमंडल रघुवीर के हवाले कर दिया। थका हुआ रघुवीर बिना देर किए उस दिशा में चल पड़ा जहां उसे अपनी आखिरी उम्मीद नजर आ रही थी। जंगल की खामोशी के बीच वह अपनी थकी हुई टांगों के बावजूद तालाब तक पहुंच गया। जब उसने कमंडल पानी में डाला अचानक तालाब से धुआं उठने लगा। धुआं धीरे-धीरे एक भयानक औरत की शक्ल लेने लगा। यह दृश्य देखकर रघुवीर के दिल में डर और हैरानी की लहर दौड़ गई। तेरी हिम्मत कैसे हुई उस तालाब का पानी लेने की? क्या तुझे नहीं पता कि उस तालाब से कोई जल नहीं ले सकता? देखो, मुझे सच में नहीं पता था कि यह तालाब तुम्हारा है। मुझे माफ करो, मैंने ऐसा कोई अपमान नहीं किया। मैं एक डायन हूं, अगर तुझे यह जल चाहिए, तो मेरी एक पहेली का उत्तर देना होगा। अगर उत्तर गलत दिया, तो इसी तालाब में डुबोकर मैं तुझे मार दूंगी। लेकिन हां, एक और रास्ता है जिससे तू बच सकता है। तू बिना जल लिए यहां से चला जा, ना पहेली ना मौत। रघुवीर गहरी सोच में डूब गया। एक और साधु की प्यास और दूसरी ओर मृत्यु का भय। मैं यहां से जल लिए बिना बिल्कुल नहीं जाऊंगा। मैंने किसी से जल लाने का वचन दिया है और मैं अपना वचन नहीं तोडूंगा। तू मेरी यह पहेली सुन, एक घर ऐसा जो हर दिशा में खुला हो, जिसके अंदर उजाला हो। पर ना कोई खिड़की हो, ना कोई दरवाजा, ना कोई दीवार हो और ना ही कोई जमीन। फिर भी सब कुछ उसमें समाया हो, बता कौन है वो? रघुवीर ने कुछ क्षणों के लिए अपनी आंखें मूंद ली, उसकी सांसें तेज और बेकाबू थी। मानो दिल के भीतर एक तूफान चल रहा हो, लेकिन उसके चेहरे पर एक अनोखा सा सुकून था। एक गहराई से भरा शांत भाव, जैसे वो अपने भीतर की रोशनी से सच्चाई को खोजने की कोशिश कर रहा हो। अंदर से बेचैनी के बावजूद उसके माथे पर एक दृढ़ संकल्प की रेखा साफ नजर आ रही थी। जो यह बता रही थी कि वह हार मानने वाला नहीं है। वो है, मनुष्य का मन, जो हर दिशा में खुला होता है, जिसमें उजाला भी होता है और अंधकार भी। ना कोई दीवार, ना कोई दरवाजा, फिर भी उसमें पूरा संसार समा जाता है। डायन कुछ पल चुप रही, जैसे रघुवीर के उत्तर पर हैरान हो गई हो। फिर अचानक वह जोर से हंसने लगी, एक ऐसी हंसी जिसमें हैरानी, गुस्सा और शायद थोड़ी सी खुशी भी छुपी हुई थी। तू पहला योगी है जिसने मेरी पहेली का सही उत्तर दिया है। जा, जितना जल चाहिए ले जा, आज तुझसे मिलकर मुझे प्रसन्नता हुई। रघुवीर ने अपने कमंडल को ठंडे और साफ जल से भर लिया। उसकी आंखों में एक चमक थी, सफलता और संतोष की। फिर वह तेजी से लौट पड़ा, कदमों में जल्दी थी लेकिन दिल में शांति। वह सीधे उसी स्थान पर पहुंचा जहां साधु महाराज निर्जीव से पड़े थे। जैसे उनके जीवन की आखिरी उम्मीद सिर्फ रघुवीर की वापसी से जुड़ी हो। लीजिए महाराज, मैं जल ले आया हूं। साधु ने जल पीते ही रघुवीर को गहराई से देखा। उनकी आंखों में हैरानी और आश्चर्य साफ झलक रहा था। बेटा, क्या सच में तुमने इसी तालाब से जल लिया है? हां महाराज, आपने कहा था और मैंने निभाया। मुझे लगा था कि तुम जल नहीं ला पाओगे, क्योंकि मैं जानता था कि उस तालाब में एक डायन का वास है। जब भी कोई मनुष्य जंगल में आता है, मैं हमेशा उसकी ऐसी ही परीक्षा लेता हूं। अक्सर मैंने देखा है कि वह मनुष्य डायन के डर से भाग जाता है। लेकिन तुम पहले मनुष्य हो जिसने उस डायन की पहेली को हल किया और मेरे लिए जल लेकर आए हो। इतना कहकर साधु ने अपनी आंखें बंद की और कुछ मंत्र पढ़ने लगे। तभी वहां रंग-बिरंगी किरणों के साथ एक सुंदर हिरण प्रकट हो गया। तूने मेरी मदद की है, इसीलिए मैं तुझे यह भेंट देना चाहता हूं। साधु महाराज, इतना तो मुझे पता चल गया है कि आप कोई चमत्कारी साधु है। परंतु मैं इस हिरण का क्या करूंगा महाराज? इसे अपने घर ले जा और अपनी बेटी की तरह पाल इसे। और याद रख, यह हिरण तेरी किस्मत बदल देगा। मैं जानता हूं कि तू सबसे ज्यादा अपनी किस्मत की वजह से परेशान है। वरना तेरे अंदर कोई बुराई नहीं है। तू मेहनती लोहार है, तेरे मन में कोई लालच नहीं है और तू दूसरों की मदद करने वाला भी है। इतना कहकर साधु वहां से चले गए। रघुवीर ने उस हिरण को सावधानी से उठाया और अपने घर ले आया। हिरण की सुंदरता और चमक देखकर रघुवीर के दिल में नई उम्मीद जगी और उसने था ना कि उसकी रक्षा करेगा और अपनी किस्मत बदलने की कोशिश करेगा। अरे, यह हिरण आपको कहां से मिला? रघुवीर ने सारी कहानी राधा को सुनाई। हमारे घर तो वैसे ही खाने के लाले पड़े हैं। साधु महाराज को अगर देना ही होता तो धन देते। इस हिरण को क्यों पकड़वाया? हां, अब साधु महाराज ने कुछ सोच समझकर ही दिया होगा। उन्हें भी तो हमारी इस हालत के बारे में अच्छी तरह पता था। तभी वहां रतन आ गया। पिताजी, यह हिरण वाकई बहुत अच्छा है। मेरे साथ तो अब गांव का कोई भी बच्चा नहीं खेलता, क्योंकि हम गरीब हैं ना। लेकिन अब मैं इस हिरण के साथ खेलूंगा। इतना कहकर रतन हिरण को लेकर घर से बाहर चला गया और खेलने लगा। हिरण इतना सुंदर था कि जिस किसी की भी नजर उस पर पड़ती, उसका मन मोह जाता।
[15:06]अगले दिन जब रघुवीर अपने दुकान पर जाने की तैयारी कर रहा था, तभी गांव का जमींदार उसके घर आ पहुंचा। आप तो जमींदार हैं, मेरे घर पर क्या करने आए हैं? इससे पहले तो आप कभी नहीं आए, भला मुझ जैसे गरीब के घर में आपका क्या काम है? हां, बात तो तू सही कह रहा है रघुवीर, लेकिन बात यह है कि आज मैंने तेरे बेटे यानी रतन को एक हिरण के साथ खेलते देखा है। वह हिरण, वाह वाह वाह, बहुत ही सुंदर था और तू जानता है कि मुझे जानवरों को पिंजरे में रखने का कितना शौक है। तो मैं वह हिरण खरीदना चाहता हूं। राधा यहां सुनकर चौकस हो गई, वह कुछ कहने ही वाली थी कि माफ कीजिए, मैं वह हिरण आपको नहीं बेच सकता। अरे भाई, मैं तुम्हें इसकी अच्छी कीमत दूंगा। आप मुझे चाहे उसकी कितनी भी कीमत दे, माफ कीजिएगा, मैं उस हिरण को नहीं बेचूंगा। जमींदार क्रोधित होकर वहां से चला गया। आपने यह क्या किया? जमींदार हमें इसकी अच्छी कीमत दे सकता था। हमारी हालत कुछ बेहतर हो सकती थी। मैं यह हिरण नहीं बेचूंगा राधा, क्योंकि यह हिरण मुझे साधु महाराज ने भेंट किया है। और भेंट की हुई वस्तुओं को कभी बेचा नहीं जाता। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। रघुवीर और उसका परिवार हिरण से इतना जुड़ गया था कि उसे छोड़ने का ख्याल भी नहीं आता था। फिर कुछ दिनों बाद एक व्यापारी वहां आ पहुंचा। अरे भाई, मुझे तुम्हारा यह हिरण बहुत पसंद आया है, मैं तुम्हें इसकी मांगी हुई कीमत दूंगा। यह हिरण मुझे बेच दो। तुम चाहे मुझे कितना भी धन क्यों ना दो, मैं इसे नहीं बेचूंगा। अरे, तुम गरीब के गरीब ही रहोगे, तुम सामान्य लोहार हो, समझते ही नहीं कुछ। व्यापारी वहां से चला गया, राधा रघुवीर पर गुस्सा हो गई। जब से यह हिरण आया है तब से हमारा खर्चा और बढ़ गया है। पहले जमींदार को लौटा दिया और अब व्यापारी को भी मना कर दिया। क्यों नहीं बेचा इसे? राधा, ना जाने क्यों, मुझे इस हिरण से अब एक खास लगाव हो गया है। और वैसे भी, साधु महाराज ने कहा था कि इसे अपनी बेटी की तरह पालना। अब यह मेरी बेटी जैसा है और भला कोई अपनी बेटी को मांगी हुई कीमत पर बेचता है क्या? खुद सोचो ना। राधा यह सुनकर चुप हो गई और नम आंखों से मुस्कुराने लगी। धीरे-धीरे वह हिरण उनके परिवार का हिस्सा बन गया। वहीं किशोर नगर के राज महल में उदासी छाई हुई थी। राजा विक्रम अपनी 20 वर्षीय पुत्री चंद्रलिका को देख रहे थे जो बेहोशी की स्थिति में थी। उनके बगल में राजगुरु थे। राजगुरु, क्या मेरी पुत्री ठीक हो पाएगी? मैंने राज्य के बड़े-बड़े वैद्यों को दिखाया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। महाराज, आपकी पुत्री को एक विचित्र बीमारी है। इसका इलाज शंभू है, लेकिन वह अत्यंत दुर्लभ है। तो फिर जल्दी से बताइए ना गुरु जी, इलाज क्या है? ध्यान से सुनिए, एक मायावी हिरण का आंसू और एक गरीब मनुष्य का आंसू। जब यह दोनों एक साथ मिलेंगे तो वे एक दिव्य पुष्प में बदल जाएंगे। उस पुष्प को राजकुमारी के शरीर पर स्पर्श कराना होगा, तभी वे स्वस्थ हो पाएंगी। तो फिर बताइए, वह मायावी हिरण कहां मिलेगा? मैं उसे किसी भी कीमत पर ढूंढ लाऊंगा और गरीब की बात तो कीजिए ही मत। हमारे राज्य में गरीबों की कोई कमी नहीं है। आपने पूरी बात सुनी नहीं महाराज, अगर किसी गरीब को जबरदस्ती रुलाया गया तो वह आंसू व्यर्थ होगा। दोनों को अपने आप दिल से रोना होगा तभी वह पुष्प प्रकट होगा। तो फिर क्या, तुम्हें पता है राजगुरु की वह हिरण इस समय किसके पास है? हां महाराज, मैंने साधना के दौरान यह देखा है। वह मायावी हिरण हरियाबुर गांव के एक लोहार के पास है। राजा विक्रम अपने मंत्री जगन्नाथ और दो सिपाहियों के साथ हरियाबुर की ओर रवाना हुए। कुछ ही देर में वे हरियाबुर पहुंचे, वहां गांव का मुखिया दौड़ता हुआ आया। हमारे तो भाग्य ही खुल गए, राजा विक्रम पधारे हैं। मुझे तुम्हारी बातें सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। बस, इतना बताओ, क्या इस गांव में कोई लोहार रहता है जिसके पास एक हिरण है? हां महाराज, रघुवीर लोहार है। पूरे गांव को पता है कि उसके पास एक हिरण है और वह हिरण किसी को देता भी नहीं है, क्योंकि वह अत्यंत सुंदर है। मुखिया राजा विक्रम को लेकर रघुवीर के घर की ओर चल पड़ा। मंत्री, दो सिपाही और स्वयं राजा को देखकर रघुवीर चौक गया। क्यों, क्या तुम्हारे पास कोई हिरण है और क्या वह मायावी भी है? प्रणाम महाराज, प्रणाम। हां महाराज, मेरे पास एक हिरण है। लेकिन मुझे नहीं पता कि वह मायावी है या साधारण। मेरे लिए तो वह मेरे बेटे जैसा है। वह हिरण तुम्हें कहां से मिला? एक साधु महाराज ने मुझे यह हिरण भेंट किया था महाराज। समझ गया, उस साधु ने तुम्हें एक मायावी हिरण दिया है। चलो, मैं उसे खरीदना चाहता हूं। क्षमा कीजिए महाराज, मैं इसे बेचना नहीं चाहता और बेच भी नहीं सकता। महाराज, यह इतना ही मूर्ख है कि जमींदार ने भी इसे खरीदने की कोशिश की, मगर उसने नहीं बेचा। हमारे गांव का सबसे बड़ा व्यापारी महंगी कीमत देने आया, लेकिन फिर भी वह नहीं बिका। और अब उसने आपको भी मना कर दिया है, उसकी हिम्मत तो देखिए। देखो लोहार, मुझे उस हिरण की बहुत जरूरत है, मैं तुम्हें उसकी महंगी कीमत दूंगा, समझ रहे हो ना? महाराज, मैं नहीं दूंगा, क्षमा करें। मैं तुम्हें आधा राज्य सौंप दूंगा। बस मुझे वह हिरण दे दो। नहीं महाराज, अगर आप मुझे पूरा राज भी दे दे तब भी मैं उसे आपको नहीं दूंगा। क्षमा करें। सिपाहियों, इस लोहार को बंदी बना दो और उस हिरण को पकड़कर महल में ले आओ, चलो। सिपाहियों ने रघुवीर और हिरण दोनों को पकड़कर महाराज के सामने पेश किया। कैसा लग रहा है अब मूर्ख? मैं तुम्हें आधा राज्य देने को तैयार था और तुमने इंकार कर दिया। अब मैं तुम्हें उस हिरण को बिल्कुल नहीं दूंगा। आखिरी बार देख ले इसे मूर्ख कहीं के। महाराज, मैं जानता हूं कि आप जो निर्णय लेते हैं उस पर अडिग रहते हैं। बस आपसे मेरी एक विनती है, मैं अपने इस हिरण को एक बार गले लगाना चाहता हूं। मैंने इसे अपने बेटे जैसा चाहा है। जा, तुम्हें इतनी मोहब्बत है तो जा गले लगा ले इसे। रघुवीर ने दौड़कर उस हिरण को गले लगा लिया और जैसे ही वे आंसू धरती पर गिरे वहां एक नीला फूल खिल गया। महाराज, यही वह फूल है जो आपकी पुत्री को ठीक कर सकता है। राजा विक्रम दौड़कर फूल लेकर अपनी पुत्री के कमरे में गए। फूल जैसे ही पुत्री के शरीर को छुआ, वह होश में आ गई। राजा विक्रम खुशी से राज दरबार वापस आ गए। मुझे माफ कर दो रघुवीर, मैंने अपनी पुत्री के प्यार में अंधा होकर तुम्हारे साथ अन्याय किया। तुम्हारे आंसू सच्चे थे। अब मैं समझ गया कि तुम कितना सत्य बोल रहे थे। तभी वहां साधु महाराज प्रकट हो गए। महाराज, यह गरीब लोहार किस्मत का मारा है। उस हिरण को मैंने ही उसे भेंट किया था और मैंने कहा था कि यह उसकी किस्मत बदलेगा।
[23:15]अब समय आ गया है। रघुवीर, हम तुम्हें बहुत सा सोना देते हैं, तुम्हारी वजह से हमारी पुत्री ठीक हो गई है। हम तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलेंगे। महाराज, आपकी मेहरबानी है लेकिन कृपया करके मुझे यह ना दे। नहीं नहीं नहीं रघुवीर, यह भेंट है और भेंट को कभी ठुकराते नहीं। आज से तुम मेरे राज महल में मेरे सलाहकार बनकर रहोगे और मेरे खजाने की रिक्शा का काम तुम्हारे कंधों पर होगा। तुम सच्चे इंसान हो और हां, जिस गांव में तुम रहते हो आज से तुम उस गांव के जमींदार हो। वह पूरा गांव अब तुम्हारा होगा। रघुवीर पूरी दौलत लेकर अपने घर वापसी की राह पर निकला। जो उसकी मेहनत, ईमानदारी और सच्चाई का अनमोल इनाम था। इस तरह एक सामान्य लोहार अपनी मेहनत और प्यार की वजह से अपनी किस्मत बदलने में कामयाब हो गया। उसका जीवन अब पहले से कहीं ज्यादा खुशहाल और सफल था और वह अपने गांव के लिए एक मिसाल बन गया।



