[0:03]श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
[0:18]बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
[0:34]बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
[0:48]बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
[1:13]जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥1॥
[1:23]राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥2॥
[1:34]महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी ॥3॥
[1:45]कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुँचित केसा ॥4॥
[1:55]हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥5॥
[2:05]संकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जगवंदन ॥6॥
[2:16]विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर ॥7॥
[2:27]प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया ॥8॥
[2:38]सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥9॥
[2:49]भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे ॥10॥
[2:59]लाय सजीवन लखन जियाए। श्री रघुबीर हरषि उर लाए ॥11॥
[3:10]रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥12॥
[3:20]सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥13॥
[3:31]सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा ॥14॥
[3:42]जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥15॥
[3:53]तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥16॥
[4:03]तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना ॥17॥
[4:14]जुग सहस्र जोजन पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥18॥
[4:25]प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं ॥19॥
[4:36]दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥20॥
[4:46]राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥21॥
[4:56]सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना ॥22॥
[5:07]आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तै काँपै ॥23॥
[5:18]भूत पिशाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै ॥24॥
[5:28]नासै रोग हरे सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥25॥
[5:39]संकट तै हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥26॥
[5:50]सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काज सकल तुम साजा ॥27॥
[6:00]और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै ॥28॥
[6:11]चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा ॥29॥
[6:22]साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे ॥30॥
[6:32]अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता ॥31॥
[6:43]राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा ॥32॥
[6:54]तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै ॥33॥
[7:04]अंतकाल रघुबरपुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥34॥
[7:15]और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥35॥
[7:26]संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥36॥
[7:37]जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥37॥
[7:47]जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई ॥38॥
[8:20]पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
[8:38]राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥



