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"मछुआरा और जलपरी | एक अमर प्रेम कहानी जो आत्मा तक बदल गई" #viral #story

Story Tak

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[0:00]सदियों पुरानी बात है। जब समुद्र की दुनिया के लोग धरती लोक पर आया करते थे। उसी द्वार में जन्मी एक ऐसी प्रेम कहानी, जिसे केवल सपनों में ही सोचा जा सकता था। एक मछुआरा था जिसने प्रेम के लिए अपनी किस्मत, अपना दिल और अपनी आत्मा तीनों बदल डाली। और यह कहानी शुरू हुई उस युवा मछुआरे से। हर सुबह वह समुद्र में जाकर जाल फेंकता था। जो मछलियां जाल में फंसती उन्हें बेचकर वह अपना घर परिवार चलाता था। एक शाम उसका जाल असामान्य रूप से भारी हो गया। वह मुस्कुराया। आज जरूर कोई बड़ा जीव फंसा है। उसने पूरी ताकत लगाकर रस्सियां खींची। पर जब जाल ऊपर आया तो उसमें ना मछली थी ना कोई जीव बल्कि एक जलपरी थी, जो गहरी नींद में सो रही थी। उसके बाल सोने के धागों जैसे चमक रहे थे। शरीर हाथी दांत सा उजला था और पूंछ चांदी सी दमक रही थी। मछुआरा उसे देखकर मंत्रमुग्ध रह गया। उसने कांपते हाथों से उसे बाहों में उठा लिया। छूते ही मत्स्य कन्या चीख पड़ी और खुद को छुड़ाने लगी। वह बोली, मुझे छोड़ दो, मैं समुद्र राजा की बेटी हूं। मेरे पिता अकेले हैं। मछुआरे ने कहा, मैं तुम्हें तभी छोडूंगा जब तुम मुझसे वादा करो कि जब भी मैं पुकारूं तुम समुद्र से बाहर आकर मेरे लिए गाऊंगी। ताकि मछलियां मेरे जाल में आएं। मत्स्य कन्या ने जल जीवों की शपथ लेकर वादा किया। तब मछुआरे ने उसे मुक्त कर दिया। फिर वह लहरों में समा गई और समुद्र की गहराइयों में लौट गई। उस दिन के बाद हर शाम मछुआरा समुद्र किनारे जाकर मत्स्य कन्या को पुकारता। वह पानी से ऊपर आकर उसके लिए गाती, उसका गीत अद्भुत होता। वह समुद्र के जीवों, गुफाओं और मोती चांदी से बने महलों का गान करती। वह हरे दाढ़ी वाले ट्राइटनों का गीत गाती जो राजा के आगमन पर शंख बजाते थे। जब वह गाती तो बड़ी-बड़ी मछलियां ऊपर आ जातीं और मछुआरा उन्हें जाल में फंसा लेता। मत्स्य कन्या मुस्कुराकर फिर गहराई में लौट जाती। दिन-ब-दिन उसकी आवाज मछुआरे के लिए और भी मधुर होती गई। धीरे-धीरे वह मछलियां पकड़ना भूल गया। अब वह खाली नाव में बैठा रहता और मत्स्य कन्या का गाना सुनता रहता। एक शाम उसने कहा, राजकुमारी मत्स्य कन्या, मैं तुमसे प्रेम करता हूं। मुझे अपना साथी बना लो। मत्स्य कन्या ने सिर हिलाया। यह संभव नहीं, तुम्हारे पास इंसान की आत्मा है। अगर तुम उसे बेच आओ तभी मैं तुम्हें प्रेम कर सकती हूं। मछुआरे ने सोचा मेरी आत्मा मेरे किस काम की ना मैं उसे देख सकता हूं ना छू सकता हूं। इसलिए मैं इसे अपने से अलग कर दूंगा और यहीं से शुरू होती है उसकी नियति को बदल देने वाली यात्रा। अब आगे की कहानी जानने के लिए देखिए अगला भाग।

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