[0:00]कभी-कभी मोक्ष का द्वार वहां से खुलता है, जहां से पतन की कोई सीमा नहीं होती। एक भाई जो ऋषि तुल्य था, दूसरा भाई जो राक्षस से भी गया बीता था। एक ने वेद पढ़े, तीर्थ किए, जीवन भर धर्म का पालन किया। दूसरे ने चोरी की, हत्या की, पांच वेश्याओं के हाथों तड़प-तड़पकर मरा। और फिर भी सात दिन में, केवल सात दिन में वह पापात्मा प्रेत योनि से सीधे भगवान के दिव्य विमान में जा बैठा। यह कैसे संभव हुआ? यही है आज की कथा। धुंधकारी और गोकर्ण। श्रीमद भागवत का वह अध्याय जो सिद्ध करता है कि भगवान की कथा के सामने पाप का कोई भार नहीं टिकता। पूर्व काल की बात है, तुंगभद्रा नदी के पावन तट पर एक अनुपम नगर बसा हुआ था। वह केवल मकानों और बाजारों का समूह नहीं था। वह धर्म की जीती-जागती प्रयोगशाला था। और जीवन को एक पवित्र यात्रा की तरह जीते थे। उस नगर में रहते थे एक महान ब्राह्मण आत्मदेव। समस्त वेदों के ज्ञाता, श्रुति और स्मृति कर्मों में पारंगत। उनका तेज ऐसा था, मानो दूसरे सूर्यनारायण भी धरती पर उतर आए हों। उनके दरवाजे से कोई भिक्षुक कभी रिक्त हस्त नहीं लौटा। लेकिन विधाता ने उनके जीवन में एक ऐसी पहेली रख दी थी जो उनके सारे पुण्यों पर भारी पड़ती थी। उनकी पत्नी का नाम था धुंधली। सुंदर थी, कुलीन थी, गृहकार्य में चतुर थी। लेकिन स्वभाव, स्वभाव ऐसा था जैसे घर में हर पल आंधी का बसेरा हो। पड़ोसियों से भिड़ जाना, जरा सी बात पर कलह खड़ी कर देना। आत्मदेव वेद के ज्ञाता थे। इसलिए शांत रहते थे। घर के भीतर तो वे झगड़ा नहीं होने देते थे परंतु धुंधली बाहर जाकर पड़ोसियों से भिड़ जाती थी। भोग विलास की कोई कमी नहीं थी। धन संपत्ति भरपूर थी। घर सुंदर था। लेकिन सुख, सुख उस घर की देहरी पर कभी पैर नहीं धरता था। क्योंकि जहां कलह हो, जहां मन ना मिलते हो। वह घर चाहे सोने का हो, नरक से कम नहीं होता। और इन सबसे भी बड़ा दुख था, कोई संतान नहीं।
[2:23]बड़े-बड़े पुण्य कर्म किए, व्रत किए, दान दिए। पूजा-पाठ में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन पुत्र का मुख देखने का सौभाग्य नहीं मिला। ब्राह्मण के मन में यह चिंता गहरी होती गई। पिंडदान कौन करेगा? कुल की परंपरा कौन आगे बढ़ाएगा? धीरे-धीरे वे निराशा की गहरी खाई में उतरते चले गए। और एक दिन उनके मन में वह भयावह विचार जन्मा। जीवन में सब कुछ है। फिर भी कुछ नहीं है। तो इस जीवन का अर्थ ही क्या है? वे जंगल की ओर चल पड़े अपने प्राण त्यागने के संकल्प के साथ। जब कोई सच्चा धर्मात्मा पुरुष विपत्ति में पड़ता है तो भगवान अव्यक्त रूप से उसे संतों से मिलवा देते हैं। उस निर्जन वन में एक सरोवर के तट पर एक महान सन्यासी जल पी रहे थे। आत्मदेव की दृष्टि उन पर पड़ी। वे दौड़ कर गए, साष्टांग दंडवत किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। संत ने पूछा तुम तेजस्वी ब्राह्मण दिखते हो, फिर यह लंबी-लंबी सांसे क्यों? यह उदासी किस लिए? आत्मदेव ने अपना सारा दुख उढ़ेल दिया। महाराज मैं संतान के बिना व्याकुल हूं। हर उपाय करके हार चुका हूं। जो गाय मैं पालता हूं वह भी बछड़ा नहीं देती। जो पेड़ लगाता हूं उनमें भी फूल फल नहीं आते। मैं ऐसा अभागा हूं। बस अब जीने की इच्छा नहीं। और वे फूट-फूट कर रो पड़े। संत का हृदय करुणा से भीग गया। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से उनकी जन्मपत्री देखी। जो दिखा वह चौंकाने वाला था। आत्मदेव पुत्र का मोह छोड़ो। मैं तुम्हारी रेखा देख रहा हूं। एक नहीं, सात जन्म तक पुत्र का योग नहीं है। भजन करो। राजा सगर को स्मरण करो। महाराज अंग को याद करो। बड़े-बड़े राजाओं ने संतान में अपार दुख भोगे हैं। तुम विवेक का आश्रय लो। लेकिन आत्मदेव नहीं माने। महाराज मुझे उपदेश नहीं चाहिए। सब शास्त्र पढ़ा हूं। मुझे बस पुत्र चाहिए। यदि नहीं मिला तो अभी इसी क्षण आपके सामने प्राण त्यागता हूं। संत ने देखा यह मानने वाले नहीं हैं। तब उन्होंने अपने तपोबल से एक दिव्य फल प्रकट किया। लो, यह फल अपनी पत्नी को खिला देना। एक नियम है, एक वर्ष तक वह सत्य, शौच, दया, दान और ब्रह्मचर्य का पालन करें। एक बार अन्न खाए। तब एक ऐसा महापुरुष जन्म लेगा जो तुम्हारा भी कल्याण करेगा और तुम्हारे पितरों का भी उद्धार करेगा। आत्मदेव फल लेकर घर की ओर चल पड़े। घर आकर आत्मदेव ने पत्नी को वह फल दिया और संत का सारा संदेश सुनाया। धुंधली में फल हाथ में लिया। ऊपर से सुनती रही भीतर से हिसाब लगाती रही। जैसे ही आत्मदेव बाहर गए धुंधली ने अपनी बहन को बुला लिया और मन का सारा भार उसके सामने रख दिया। बहन इस फल से एक समय खाना खाना होगा, यह हमसे नहीं होगा। तीन बार का अच्छा भोजन छोड़ें। और ऊपर से प्रसव की पीड़ा, गर्भ का भार, बहन यह सब हमसे नहीं होगा। बहन ने मुस्कुराते हुए कहा चिंता क्यों करती हो। इत्तेफाक से इसी महीने मेरे भी गर्भ के लक्षण हैं। तुम गर्भवती होने का नाटक करो। जब मेरा बालक होगा मैं रात को तुम्हारे यहां पहुंचा दूंगी। तुम शोर मचा देना। पति को पहले से धन दे देना कोई क्या जानेगा।
[5:48]बुरी बुद्धि को बुरा साथी जल्दी मिल जाता है। धुंधली ने वह दिव्य फल अपनी गाय को खिला दिया। और स्वयं कपड़ा लपेट कर गर्भवती का नाटक करने लगी। वह फल गाय ने खाया। परिणाम अद्भुत हुआ। तीन महीने बाद उस गाय ने एक ऐसे बछड़े को जन्म दिया जो पूर्णतः मनुष्य आकार का था। केवल कान गाय के सर्वांग सुंदर दिव्य तेजोमय स्वर्ण सी कांति। इधर बहन का बालक रात को आ गया। धुंधली ने घर में शोर मचाया। आत्मदेव को क्या पता था कि उनके साथ क्या छल हुआ है। वे तो आनंद से झूम उठे। घर में भी पुत्र हुआ, गाय के भी एक अद्भुत बछड़े ने जन्म लिया। उत्सव मना, दान पुण्य हुआ, मांगलिक कर्म हुए। गाय के उस अद्भुत पुत्र का नाम रखा गया, गोकर्ण। और धुंधली के उस बालक का नाम धुंधकारी। समय बीतता गया। दोनों बालक बड़े होने लगे। गोकर्ण जैसे-जैसे बड़े हुए उनमें वेद का ज्ञान, धर्म की निष्ठा और वैराग्य का तेज प्रकट होता गया। वे बोलते तो लगता मानो शास्त्र स्वयं बोल रहे हो। धुंधकारी उसमें मानो समस्त दुर्गुणों ने एक साथ वास कर लिया हो। शौच आचार का तो नाम भी नहीं था। खान-पान पशुओं जैसा। क्रोध नाक पर चढ़ा। गंदी संगत से प्रेम। दूसरों की खेती में आग लगाना, गौशाला में आग लगाना। खेलते बालकों को उठाकर कुएं में फेंक देना। यह उसका चलन था। अंधे अपाहिज को रास्ता बताने के बहाने ले जाकर कुएं में धकेल देता था। गवार मांस भक्षण और अंततः व्यभिचार। पांच वेश्याओं को अपने पास रखा। उनके लिए घर की सारी संपत्ति लुटाता रहा। एक दिन आत्मदेव ने बेटे को समझाने की कोशिश की। तुम्हारे आचरण आसुरी है। हमें लगता है तुम हमारा सर्वनाश करने के लिए ही जन्मे हो। धुंधकारी ने उत्तर में लाठी उठाई और अपने पिता को खूब मारा। जब धुंधली बचाने गई तो उन्हें भी पीटा। घर के सारे जेवर बर्तन उठाकर बेच दिए। आत्मदेव बैठकर रो रहे थे। उस समय गोकर्ण आए। पिताजी आप जैसे विद्वान पुरुष को ऐसा शोक उचित नहीं। शरीर किसका? धन किसका? संतान किसकी? यह मोह अज्ञानियों का लक्षण है। पिताजी जिसके उद्योग को नियति कुचल देती है वह सफल नहीं होता। आज से घर छोड़ दीजिए, वन में जाइए। भगवान का चिंतन कीजिए। संत समागम कीजिए। नाम जप कीजिए। लीला कथा सुनिए। इसी से भगवत प्राप्ति होगी। पुत्र के मुंह से यह वचन सुनकर आत्मदेव को वे संत याद आए जिन्होंने कहा था भजन करो। संतान का मोह छोड़ो। सात वर्ष की आयु में आत्मदेव ने घर त्यागा और वन की राली। वन में जाकर उन्होंने अपनी बुद्धि को संसार से समेटा। रात दिन भगवान के चिंतन में लगा दिया। और इस तपस्या के प्रभाव से आत्मदेव को श्री कृष्ण चंद्र की प्राप्ति हुई। जब पिता बन गए तो धुंधकारी को और छूट मिल गई। धुंधली पर अत्याचार बढ़ता गया। एक दिन जलती लुकाठी से धुंधली को इतना सताया कि वह किसी तरह छूट कर भागी और कुएं में गिरकर अपना शरीर त्याग दिया। उसकी दुर्गति हुई। इधर धुंधकारी ने पांच वेश्याओं को और पक्का आश्रय दे दिया। उनके यह चोरी करना, लूटना, हत्या करना, सब साधारण बात हो गई। एक दिन उन वेश्याओं ने कहा हमें सुंदर हार चाहिए। धुंधकारी निकल पड़ा। जो मिला लूटा मारा और पांचों के लिए आभूषण ले आया। लेकिन उन वेश्याओं ने मन में विचार किया यह नित्य नई चोरी करता है। एक दिन पकड़ा जाएगा राजा फांसी देगा तब हम भी पकड़ी जाएंगी। इससे अच्छा है हम ही इसे समाप्त कर दें। पांचों ने उसके हाथ-पांव रस्सी से बांध दिए। गले में फंदा डाला। तड़पाया और जब वह मरने का नाम नहीं ले रहा था तो रसोई से दहकते अंगारे उठाकर उसके मुंह में ठूंस दिए। तड़पा-तड़पा कर मार डाला। घर में ही एक गड्ढा खोदकर उसे गाड़ दिया। सारा माल मत्ता उठाया और पांचों रात के अंधेरे में गायब हो गई। जैसे कर्म वैसा फल। धुंधकारी की आत्मा को मिली भयंकर प्रेत योनि। वह बवंडर का रूप धारण करके दसों दिशाओं में भटकता रहा। ना पानी पी सकता, ना खाना खा सकता, ना कहीं विश्राम कर सकता। केवल हाहाकार करता रोता और भटकता रहा। गोकर्ण ने देखा कि घर का वातावरण अब पूर्णतः नष्ट हो चुका है। वे उदासीन भाव से तीर्थ यात्रा पर निकल गए। जब वे तीर्थाटन करके लौटे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि धुंधकारी का अंत हो चुका है। करुणावश वे गया गए। वहां धुंधकारी के निमित्त श्राद्ध किया, तीर्थों में अनुष्ठान किए। फिर वे अपने पिता के घर लौटे। रात्रि हुई। गोकर्ण शयन कर रहे थे। तभी कुछ विचित्र हुआ। दरवाजा बंद था। लेकिन भीतर एक भेड़ प्रकट हुई। बड़ी असामान्य भेड़। गोकर्ण ने देखा यह यहां कैसे आई। तभी वह भेड़ भैंसा बन गई। फिर विकट इंद्र का रूप। फिर और भयावह रूप। गोकर्ण घबराए नहीं। ज्ञानी और सच्चे महात्मा के लिए प्रेत का भय नहीं होता। उन्होंने कहा, कौन है तू? प्रेत है? पिशाच है? यह विचित्र रूप क्यों दिखा रहा है? वह प्राणी केवल रोता रहा। बोल नहीं पाया। गोकर्ण समझ गए। अधिक पाप के कारण वाणी नहीं निकल रही। तब उन्होंने अंजलि में जल लिया। मंत्रों का जाप किया और उस पर छिड़क दिया। तब वह बोल पाया, भैया, मैं धुंधकारी हूं। आपका भाई। मुझे बचाओ। उन कुलटा वेश्याओं ने मुझे तड़पा-तड़पा कर मारा। अब मैं इस प्रेत योनि में भटक रहा हूं। ना खा सकता ना पी सकता, ना विश्राम कर सकता। बस वायु से जीवित हूं। भैया, आप दयासागर हो। मेरा उद्धार करो। गोकर्ण बोले मैंने तुम्हारे निमित्त गया में श्राद्ध किया। तीर्थों में अनुष्ठान किए। उद्धार क्यों नहीं हुआ? धुंधकारी बोला भैया मेरे पाप इतने विशाल हैं कि सैकड़ों गया श्राद्ध से भी मेरी मुक्ति नहीं होगी। कोई दूसरा उपाय खोजो। गोकर्ण ने कहा ठीक है। तुम इस घर से बाहर जाओ। जब बुलाऊंगा आ जाना। गोकर्ण की आज्ञा पाकर धुंधकारी बाहर चला गया। और गोकर्ण रात भर विचार करते रहे। प्रातः काल हुआ। गोकर्ण ने स्नान किया। अर्घ्य देते समय उन्होंने सीधे सूर्य नारायण से प्रश्न किया। हे जगत के साक्षी, हे सर्वज्ञ भगवान, सूर्य देव, धुंधकारी की मुक्ति कैसे होगी? कृपा करके मार्ग दिखाएं। सूर्य देव ने उत्तर दिया, गोकर्ण श्रीमद् भागवत महापुराण का सप्ताह परायण करो। सात दिन में श्लोक सहित विधि पूर्वक भागवत की कथा सुनाओ। धुंधकारी को भी सुनाओ। उसकी अवश्य मुक्ति होगी। सरल उपाय लेकिन अचूक। गोकर्ण ने निश्चय किया मैं स्वयं यह कथा सुनाऊंगा। कथा का दिन और स्थान निश्चित हुआ। जब लोगों को ज्ञात हुआ कि गोकर्ण जी भागवत कथा सुनाएंगे जो समस्त पापों का नाश करती है। तो दूर-दूर से लोग आने लगे। पापी भी आए, पुण्यात्मा भी आए। सब के बैठने की व्यवस्था हुई। गोकर्ण ने धुंधकारी को बुलाया। भाई तुम भी यह कथा सुनो। बैठने की समस्या है तो इस बात पर बैठो। धुंधकारी की प्रेत आत्मा उस बांस के छिद्र में वायु रूप होकर प्रवेश कर गई। क्योंकि प्रेत कहीं स्थिर नहीं रह सकता उसे आश्रय चाहिए था। और फिर गोकर्ण ने एक वैष्णव भक्त को मुख्य श्रोता बनाया। प्रथम स्कंध से भागवत कथा आरंभ हुई। पहला दिन बीता। सायंकाल जब कथा का विश्राम हुआ, सभासदों के देखते-देखते उस बांस में तड़-तड़ की आवाज हुई और एक गांठ फट गई। सब चकित सब स्तब्ध। दूसरा दिन बीता दूसरी गांठ फटी। तीसरा दिन तीसरी गांठ, चौथा, पांचवा, छठवां। हर दिन एक-एक गांठ टूटती गई। जैसे-जैसे भगवान की कथा का प्रकाश बढ़ता गया प्रेत योनि का अंधेरा घटता गया। और सातवें दिन सातो गांठें फट गई। उस बांस में से एक दिव्य तेज प्रकट हुआ। और उसमें से निकले धुंधकारी। लेकिन यह वही धुंधकारी नहीं था जो कल था। श्याम वर्ण, पीतांबर धारण किए हुए, गले में तुलसी की माला, सिर पर मनोहर मुकुट, कानों में कमनीय कुंडल। समस्त अंगों में दिव्य तेज। भागवत पार्सल धुंधकारी ने गोकर्ण के चरणों में प्रणाम किया। भैया, मैं भगवत पार्षद बन गया। वह प्रेत योनि जिसमें मैं असह्य पीड़ा भोग रहा था, उससे मुक्त हो गया। सात दिन की भागवत कथा से यह संभव हुआ। भैया, मैं निंदनीय से निंदनीय पाप कर्म करने वाला था। और आज यह उज्जवल स्वरूप मिला। जो लोग मोहवश इस नाशवान शरीर को हृष्ट-पुष्ट करते हैं। भोगों की कामना में डूबे रहते हैं और भगवान का नाम नहीं लेते उनका जीवन उस बुदबुद के समान है जो पल भर में नष्ट हो जाता है। और जो बांस में बैठकर मैंने भागवत सुनी उसकी गांठे फट गई। तो क्या भगवान की कथा सुनने से हृदय की गांठे नहीं टूटेंगी? एन कोट। उसी क्षण आकाश में एक दिव्य विमान प्रकट हुआ। मंडलाकार तेजोमय भगवान बैकुंठन के पार्षदों से बना हुआ।
[15:36]धुंधकारी आओ। धुंधकारी विमान पर चढ़ने लगे। तभी गोकर्ण ने उन्हें रोका। रुको कथा तो इन सभी श्रोताओं ने भी सुनी। इनके लिए भी विमान क्यों नहीं। भगवत पार्षदों ने कहा गोकर्ण जी सुनाने में कोई भेद नहीं था। लेकिन सुनने में भेद हो गया। धुंधकारी ने सात दिन निराहार रहकर रात भर उसी कथा का मनन करते हुए केवल भगवान की लीला में चित्त लगाया। इसलिए वह भगवत पार्षद बने। बाकी श्रोताओं ने कथा सुनी लेकिन मनन विषयों का होता रहा। श्रवण और मनन में यही अंतर है। जो मनहीन है जिसे गुरु वचनों पर पूर्ण विश्वास नहीं जिसकी कथा में एकाग्रता नहीं। वह एक बार में परम पद का अधिकारी नहीं होता। और गोकर्ण जी आपको लेने स्वयं गोलोक बिहारी पधारेंगे। विमान अंतर्ध्यान हो गया। गोकर्ण जी का हृदय भराया। उन्होंने समस्त श्रोताओं से कहा जब तक तुम सबको विमान में बैठाकर नहीं ले जाऊंगा मुझे चैन नहीं। सावन के महीने में हम पुनः अनुष्ठान करेंगे। सब उपवास करो। अल्पाहार करो। कथा सुनो और उसका मनन करो। सब लोगों ने स्वीकार किया। दूसरा सप्ताह परायण हुआ। इस बार सब श्रोताओं ने उपवास किए। अल्पाहार किया। दिन में कथा सुनी और रात भर उसी का मनन किया। सात दिन बाद जब कथा समाप्त हुई आकाश में अनेक दिव्य विमान प्रकट हुए। जितने कथा सुनने वाले थे सब परमधाम को गए। और जो कुत्ते कथा के आसपास बैठे रहे थे गोकर्ण जी की करुणा दृष्टि पड़ने पर वे भी विमान पर बैठकर भगवत धाम गए।
[17:37]भक्त वत्सल भगवान जिनके महात्मा पर प्रसन्न होते हैं उनके सानिध्य में रहने वाले पशु-पक्षी भी तर जाते हैं। और गोकर्ण जी उन्हें लेने स्वयं गोलोक बिहारी श्री कृष्ण पधारे। उन्हें हृदय से लगाया। और गोकर्ण जी भगवत स्वरूप हो गए। धुंधकारी और गोकर्ण।



