[0:00]प्यारी साध संगत जी राधा स्वामी जी, संगत जी आज 28 मार्च को ब्यास में सुबह बाबा जी ने ओपन कार दर्शन दिए जी। और शाम को 4 बजे बाबा जी ने संगत के साथ सवाल जवाब भी किए, इस दौरान हजूरी जी भी बाबा जी के साथ थे। आइए अब हम आपको आज के सवाल जवाब सुनाते हैं जी। और वीडियो के आखिर में एक बात भी बताएंगे जब बाबा जी की बाजू पकड़ने की कोशिश करती एक बीवी को सिक्योरिटी वालों ने दिल्ली में पकड़ा। यह घटना परसों की है जी। पहले हम सवाल जवाब सुनते हैं। सबसे पहले किसी ने पूछा कि बाबा जी हम पर दया करो। बाबा जी ने बहुत सुंदर उत्तर दिया कि बेटा, हम पर तो पहले से ही बहुत दया है, हमें दूसरों से दया मांगने की जरूरत नहीं, बल्कि हमें खुद पर दया करनी चाहिए। हमें अच्छा इंसान बनना है और प्रभु के हुक्म में रहना है, क्योंकि हिसाब तो हमें ही देना है, हम अपने मन के अधीन हैं, इसलिए हमें भाने में रहना सीखना चाहिए। फिर आगे इसी बहन ने कहा कि बाबा जी मैं हमेशा टेंशन में रहती हूं, भजन में मन नहीं लगता, बाबा जी ने समझाए, टेंशन हम खुद पैदा करते हैं, बोझ हम खुद उठाते हैं। जब भी तनाव आए, सिमरन करो। तो इस बहन ने कहा, सिमरन नहीं होता। तो बाबा जी ने कहा, मन हमारा ही है, वही हमें नचा रहा है, हमें देखना है कि हम मन के अधीन हैं या मन हमारे अधीन। हमें मन को अपने काबू में करना है। फिर आगे एक लड़के ने बाबा जी से सवाल किया। इस लड़के ने बाबा जी से पूछा कि बाबा जी बच्चे भजन सिमरन कैसे करें। बाबा जी ने फरमाते हुए समझाया कि बेटा, तुम अभी बच्चे हो, लेकिन असली उद्देश्य यह है कि हम मालिक का धन्यवाद करें। बाबा जी ने एक पंक्ति भी सुनाई, सब सुखदाता राम है, दूसरा ना ही कोई। बाबा जी ने फरमाते हुए समझाया, जब कोई हमारा काम करता है तो हम उसका धन्यवाद करते हैं, उसी तरह हमें मालिक का भी शुक्रिया अदा करना चाहिए। अगर हम पूरी जिंदगी भी धन्यवाद करते रहें, तब भी उसका हक अदा नहीं कर सकते। फिर आगे एक भाई ने बाबा जी से सवाल किया। इस भाई ने कहा, जब मैं भजन सिमरन करता हूं तो मुझे अंधेरे से डर लगता है। बाबा जी ने फरमाते हुए समझाया कि डर मन की चाल है। मन को ताकत हम देते हैं, वरना वह खुद कुछ नहीं कर सकता, जब हम उसके बहकावे में आ जाते हैं, तभी वह हमें डराने लगता है। फिर आगे एक भाई ने बाबा जी से सवाल किया। इस भाई ने कहा कि बाबा जी, मैं लायक नहीं था, फिर भी आपने कृपा की, 30 साल से भजन-सिमरन कर रहा हूं, लेकिन कुछ बना नहीं। बाबा जी ने कहा कि बेटा, यह कोई व्यापार नहीं है कि हम गिनती करने लगे कि इतने साल में हमें क्या मिला। बाबा जी ने आगे कहा, प्यार में गिनती नहीं होती, हम भजन-सिमरन अपनी जरूरत के लिए करते हैं, न कि हिसाब रखने के लिए, जब हम भजन सिमरन बिना गिनती के करेंगे, तो वह कृपा जरूर करेगा। फिर आगे किसी ने बाबा जी से सवाल किया। इसने पूछा कि बाबा जी आपसे क्या मांगे। बाबा जी ने कहा, हम मांगकर अपने दायरे को छोटा क्यों करें। फिर आगे एक भाई ने बाबा जी से सवाल किया। इस भाई ने कहा कि बाबा जी, मैंने आपकी दया मांगी और मेरा एक्सीडेंट हो गया। बाबा जी ने मुस्कुराकर कहा, यह भी दया ही है, हम दया इसलिए मांगते हैं कि हमारे कर्म कट जाएं। जब जन्म लिया है, तो कर्म भी खत्म करने होंगे, यही दया का असली अर्थ है, फिर वही व्यक्ति बोला, क्या हमारे इतने बुरे कर्म थे। बाबा जी बोले, तुमने ही तो दया मांगी थी, इस पर पूरी संगत हंसी से गूंज उठी, उसने फिर कहा, बाबा जी हुजूर जी तो बहुत सख्त हैं। यह सुनकर संगत और खुद हुजूर जी भी हंस पड़े। बाबा जी ने मजाक में कहा, हुजूर जी तो नए जमाने के बाबा है लेकिन यह पुराना जमाने वाला बाबा है, इसका मुंह कम चलता है। हाथ ज्यादा चलते हैं, और फिर से हंसी का माहौल बन गया, फिर किसी ने कहा, बाबा जी सिकंदरपुर में एक सत्संग कर दीजिए।
[4:33]बाबा जी बोले, पांच कर देंगे, लेकिन तुम अमल भी तो करो, तुम तो वही बात कर रहे हो की रोटी भी दे दो और उसको हमारे मुंह में डाल दो और फिर मुंह हिला भी दो जिससे रोटी चब जाए। फिर आगे एक बहन ने बाबा जी से सवाल किया। इस बहन ने पूछा कि बाबा जी हम गुरु के चरणों में पूरी तरह समर्पित कैसे हों। बाबा जी ने फरमाते हुए समझाया कि बेटा, हम किसी को कुछ नया नहीं दे सकते, हमारे पास जो है, वही दे सकते हैं। अगर मेरे पास 100 रुपये हैं, तो मैं 80-90 ही दे सकता हूं, असली बात यह है कि हमें अपने मन को काबू में करना है, हम सोचते बहुत हैं और करते कम है, हमें अपना मन मालिक को सौंप देना चाहिए। फिर उसी बहन ने शादी और पढ़ाई को लेकर सवाल किया, बाबा जी ने समझाया, जिम्मेदारी सिर्फ पैसा कमाना नहीं होती, हमें अपने परिवार की भी जिम्मेदारी निभानी है, उसका भी ध्यान रखना है। बाबा जी ने समझाते हुए कहा, बेटा, हम हर चीज को पैसों के तराजू में तोलने लग जाते हैं, पैसा जरूरी है, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन परिवार भी उतना ही अहम है। असली समझदारी इसी में है कि हम दोनों के बीच संतुलन बनाए रखें। फिर आगे एक लड़के ने बाबा जी से सवाल किया। इस लड़के ने कहा कि बाबा जी, मुझे अपने आप पर ही शक होने लगता है, सेल्फ-डाउट रहता है। बाबा जी मुस्कुराकर बोले, मुझे भी अपने ऊपर शक होता है कि जिन लोगों को मैंने नाम दिया है, मैंने सही किया या गलत, यह सुनकर सारी संगत हंस पड़ी थी। लड़के ने कहा, आपको तो सब पता होता है, आप तो बाबा जी हैं, इस पर बाबा जी बोले, अगर मैं बाबा हूं, तो क्या मेरी सारी बातें पूरी हो गई। फिर बाबा होने का क्या फायदा। यह सुनकर पूरी संगत हंसी से गूंज उठी। फिर किसी ने कहा, बाबा जी, मेरा दुकान पर मन नहीं लगता, मेरा मन करता है कि मैं रेस्टोरेंट खोलूं।
[6:46]बाबा जी ने पूछा, रेस्टोरेंट खोलकर कमाई पूरी करनी है, उसने कहा, नहीं बाबा जी, यह मेरा पैशन है। बाबा जी ने कहा, ठीक है, अपने परिवार से बात करो, वह बोला, आप कह देंगे तो हो जाएगा, बाबा जी ने हंसते हुए कहा, मैं तो बस यही कह सकता हूं, भजन-सिमरन करो। फिर एक भाई ने बोहोत लंबा सवाल किया, जिसमें एक मजेदार बात थी, उसने कहा, बाबा जी, आप पिछले साल फिरोजपुर आए थे, लेकिन हमारे 'गजनी वाला' सेंटर नहीं आए।
[7:26]बाबा जी बोले, तुमने अपने गांव का नाम ही 'गजनी वाला' रखा है, गजनी ने तो तबाही मचाई थी! यह सुनकर सब हंसने लगे, भाई ने कहा, बाबा जी, वह तो बस नाम है। बाबा जी ने फिर कहा, नाम तो गजनी ही है, और संगत फिर हंसी से गूंज उठी, फिर एक बहन ने पूछा, बाबा जी, क्या संत महात्मा मालिक के भेजे हुए विशेष आत्माएं होते हैं।
[7:56]बाबा जी ने बहुत सुंदर जवाब दिया, बेटा, मालिक कभी पक्षपात नहीं करता, उसके सामने सब एक जैसे हैं, सब कुछ हमारे कर्मों पर निर्भर करता है, मालिक के लिए सारी आत्माएं ही विशेष होती है। फिर बहन ने कहा, मैं सोचती थी कि मैं आपके लायक बन सकूं। बाबा जी ने मजाक में कहा, तुम्हारी नजर मेरी कुर्सी पर है। यह सुनकर संगत जोर से हंस पड़ी, और बहन थोड़ी उलझन में पड़ गई और बोली की बाबा जी क्या कर्मों का नियम अटल है। बाबा जी ने समझाया, बेटा, प्रकृति का नियम है, जैसा बीज बोओगे, वैसा ही फल मिलेगा, अच्छे कर्म करोगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरे करोगे तो बुरा ही मिलेगा। बहन ने फिर विनती की, बाबा जी, दया करो कि मैं आपका अच्छा बच्चा बन सकूं। बाबा जी ने हंसते हुए कहा, दया करना हमारी मजबूरी है। और ये सुन कर फिर संगत हंसी से भर गई, बाबा जी ने आगे समझाया, जब तुम इस जगह तक पहुंचोगी, यानी अपने अंदर अच्छाई लाओगी, तो खुद ही अच्छे इंसान बन जाओगी।
[9:10]और जब तुम सच में अच्छी बन जाओगी, तो तुम्हें खुद ही इस कुर्सी पर बैठा दिया जाएगा, फिर तुम बाबा से 'बाबी' बन जाओगी, यह सुनकर संगत फिर हंसी से गूंज उठी।
[9:27]इस पर बहन ने तुरंत कहा, नहीं बाबा जी, मुझे कुछ नहीं बनना, फिर से सब हंसने लगे। फिर एक भाई ने सवाल किया, बाबा जी, जब भगवान हम सबके अंदर ही मौजूद है, तो फिर हम मंदिर-मस्जिद जाकर क्यों माथा टेकते हैं।
[9:46]बाबा जी ने बहुत सरल शब्दों में समझाया, बेटा, इंसान की फितरत होती है कि वह सबसे आसान रास्ता ढूंढता है, हम झूठी तसल्ली में जीते रहते हैं, सच तो यह है कि सब कुछ कर्मों के अनुसार ही होता है, इसके बाहर कुछ भी नहीं।
[10:05]उन्होंने आगे कहा, जो लोग बाहर ढूंढते हैं, वे भ्रम में पड़े रहते हैं, मालिक तो हमारे बहुत करीब है, लेकिन हमने ही अपने और उसके बीच दूरियां बना ली हैं। अगर मालिक सर्वव्यापी है, तो क्या हम उसे चार दीवारों के अंदर कैद कर सकते हैं। बाबा जी ने फिर बहुत गहरी बात कही, वह मालिक हमारी हर सांस में शामिल है, उससे अलग कुछ भी नहीं है, बस हमें देखने वाली नजर नहीं है। फिर एक बहन ने पूछा, बाबा जी, नामदान कब लेना चाहिए, मतलब कब इंसान खुद को समझने की स्थिति में आता है। बाबा जी ने उत्तर दिया, बेटा, अगर किसी को सच में खुद का बोध यानी सेल्फ रिलाइजेशन हो जाए, तो फिर नामदान की जरूरत ही नहीं रहती। संगत जी ये थे आज 28 मार्च के सवाल जवाब जी। कल 27 मार्च वाले वीडियो में कुछ सवाल जवाब रह गए थे। वह आपको अब सुनाने जा रही हूं। फिर एक भाई ने हुजूर जी से प्रश्न किया। इस भाई ने कहा कि हुजूर जी, मैं अब शादी करने जा रहा हूं। हुजूर जी मुस्कुराए और बड़े हल्के-फुल्के मजाकिया अंदाज में बोले, बेटा, जब तेरी पत्नी आ जाएगी ना, फिर वो तुझे इतना भी समय नहीं देगी कि तू आराम से अपनी पगड़ी भी बांध सके, इसलिए पहले जल्दी-जल्दी पगड़ी बांधना सीख ले। यह सुनकर पूरी संगत हंस पड़ी। फिर एक बहन ने प्रश्न किया, हुजूर जी, मैं बी-फार्मेसी कर रही हूं, इस पढ़ाई में कई बार जीवों पर प्रयोग करने पड़ते हैं, जिससे उन्हें नुकसान भी होता है। इसका क्या हमारे कर्मों पर असर पड़ता है। हुजूर जी ने समझाते हुए कहा, हर कर्म का हिसाब बनता है, लेकिन अगर हम किसी ऐसे क्षेत्र में जाते हैं जहां हमें आगे चलकर लोगों की सेवा करनी है, उनकी मदद करनी है, तो हमें यह भी समझना होगा कि हमें इस काम से आगे निकलना है, और आगे चलकर लोगों की सेवा करनी है।
[12:21]फिर हुजूर जी ने समझाया कि अगर प्रयोग करते टाइम कभी किसी को नुकसान होता भी है, तो जब हम भविष्य में किसी का भला करते हैं, तो उन कर्मों का संतुलन अपने आप बन जाता है। फिर एक बहन ने पूछा, हुजूर जी, हम अपने प्रेम को कैसे बढ़ा सकते हैं। हुजूर जी बोले, सबसे सच्चा प्रेम वही है जो मालिक के साथ होता है, जब आत्मा उस परमात्मा से जुड़ती है, तब असली प्रेम उत्पन्न होता है।
[12:55]फिर इसी बहन ने कहा, हुजूर जी, हमें अभी नामदान नहीं मिला है, तो हम क्या करें। हुजूर जी ने बहुत सरलता से कहा, जब तक नामदान नहीं मिला, तब तक शांत होकर बैठो, अंदर से साइलेंट रहो, मन को स्थिर करना सीखो।
[13:14]फिर एक भाई ने कहा, हुजूर जी, मुझे नामदान तो मिल चुका है, लेकिन मैं खुद को समय नहीं दे पाता। हुजूर जी बोले, जरा सोच कर देखो इसमें नुकसान किसका हो रहा है, हमारा ही हो रहा है ना, जब हमें कोई परेशानी आती है, तो हम पहले भाई-बहन से बात करते हैं, फिर मां-बाप से बात करते हैं। लेकिन जब कहीं से समाधान नहीं मिलता, तब हम परमात्मा को याद करते हैं, हमने परमात्मा को लिस्ट के सबसे आखिरी नंबर पर रखा है।
[13:49]हुजूर ने आगे समझाया, असल में सहारा तो वही मालिक है, जीवन में जब उतार-चढ़ाव आते हैं, तब वही हमारा साथ देता है, हमें उसी से अपना रिश्ता मजबूत करना चाहिए। जब मालिक हमें हमारे कर्मों का फल देता है, तो साथ ही इतनी शक्ति भी देता है कि हम उसे सह सके, इसलिए हमें भजन-सिमरन करते रहना चाहिए और मालिक को याद रखना चाहिए। फिर एक बहन ने कहा, हुजूर जी, मेरी उम्र 24 साल है, मैं नौकरी करना चाहती हूं, लेकिन घर वाले शादी का दबाव डाल रहे हैं।
[14:32]हुजूर जी मुस्कुराकर बोले, फिर तो ऐसा जीवनसाथी ढूंढो जो तुम्हें नौकरी करने दे। यह सुनकर संगत हंस पड़ी। फिर एक भाई ने पूछा हुजूर जी, क्या इंटरकास्ट मैरिज ठीक है। हुजूर जी ने स्पष्ट कहा, बिल्कुल ठीक है, मैं जात-पात में विश्वास नहीं करता। यह देखना जरूरी नहीं कि कौन किस जाति से है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि इंसान कैसा है, उसके संस्कार और उसका चरित्र कैसा है।
[15:09]फिर एक बहन ने कहा, हुजूर जी, कभी-कभी मैं कुछ बोल देती हूं और सामने वाले को बुरा लग जाता है। हुजूर जी बोले, अगर किसी को बुरा लगे, तो तुरंत ‘सॉरी’ बोल देना चाहिए।
[15:26]सामने वाले का मन वहीं का वहीं शांत हो जाएगा। फिर एक बहन ने बताया, हुजूर जी, मैं पढ़ाई में तीसरे स्थान पर आई हूं। मेरे पिता ने बहुत संघर्ष किया है, मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं और सेवा करना चाहती हूं। हुजूर जी ने कहा, बहुत अच्छी बात है, मन लगाकर पढ़ाई करो और डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करो। फिर एक भाई ने पूछा, हुजूर जी, क्या किस्मत बदली जा सकती है, या फिर हमारे पुराने कर्म ही सब कुछ तय करते हैं।
[16:05]लोग मुझे कहते हैं कि गुरु चाहे तो किस्मत भी बदल सकते है हुजूर जी ने उत्तर दिया, किस्मत बदली जा सकती है, लेकिन संत महात्मा उदाहरण बनकर आते हैं, चमत्कार दिखाने के लिए नहीं। संत भी अपने कर्मों का फल भुगतते हैं, इतिहास में कई उदाहरण हैं, गुरुओं ने कष्ट सहे, महापुरुषों ने यातनाएं झेली, लेकिन उन्होंने चमत्कार नहीं दिखाए, बल्कि उदाहरण बनकर दिखाया कि कैसे सहन करना है। हुजूर जी ने कहा, अगर वे चमत्कार दिखाने लगे, तो हम उन्हें इंसान नहीं समझेंगे और यह सोचेंगे कि हम उनके जैसे बन ही नहीं सकते, इसलिए वे हमारे सामने उदाहरण बनकर आते हैं, ताकि हम उनसे सीख सकें।
[16:56]फिर एक बहन ने पूछा की हुजूर जी, कभी-कभी सत्संगी लोग भी गलत संगत में पड़ जाते हैं और सत्संग से दूर हो जाते हैं, ऐसा क्यों होता है। हुजूर जी ने कहा, हर व्यक्ति का रास्ता पहले से तय होता है, लेकिन अगर हमें सच्चा गुरु मिल जाए और सत्संग सुनने का अवसर मिले, तो यह बहुत बड़ी कृपा है, सत्संग में जो भी सिखाया जाता है, उसे अपने जीवन में उतारना जरूरी है, जब हम उस पर अमल करते हैं, तो हमारी सोच और नजरिया बदलने लगता है और हम गलत कदम उठाने से पहले 100 बार सोचते हैं। आगे हुजूर जी ने बड़ी सहजता से समझाया कि अगर हम अपने जीवन को सही दिशा में डाल लें, अच्छे विचारों और अच्छे आचरण के साथ जीना शुरू करें, तो हम उस मालिक से जुड़ सकते हैं। फिर एक भाई ने भावुक होकर कहा, हुजूर जी, हमें अपना चरण अमृत दे दीजिए। हुजूर जी ने मुस्कुराते हुए कहा, मैं समझा नहीं, आप क्या कहना चाहते हो।
[18:11]भाई ने कहा, जैसे संत रविदास जी ने चरण अमृत दिया था, इस पर हुजूर जी ने बड़े प्रेम से उत्तर दिया, मालिक ने जो हमें देना था, वह पहले ही दे दिया है, अब यह हमारी खुशकिस्मती है कि हमें ऐसा अवसर मिला है जिससे हम कर्मकाण्डों से बाहर निकल सकते हैं और अपने अंदर की शक्ति को अनुभव कर सकते हैं। हुजूर ने आगे कहा, सत्संग में जो समझाया जाता है, उसे जीवन में उतारना जरूरी है, उसी से हमें वास्तविक ताकत मिलती है। फिर एक भाई ने दुखी होकर कहा, हुजूर जी, मेरे जीवन में बहुत दुख आ रहे हैं, परिवार में भी परेशानियां हैं। हुजूर जी ने समझाया, मालिक हमें जितने दुख देता है, उतनी ही शक्ति भी देता है ताकि हम उन्हें सह सकें, इसलिए हमें भजन-सिमरन के माध्यम से उस मालिक से जुड़े रहना चाहिए।
[19:18]फिर किसी ने अंधविश्वास के बारे में पूछा, हुजूर जी, क्या अंधविश्वास करना सही है। हुजूर जी ने स्पष्ट कहा, अंधविश्वास का मतलब ही है बिना समझे यानि आंखे बंद करके विश्वास करना, हमें ऐसा क्यों करना चाहिए, अध्यात्म में हमें तर्क और समझ के साथ चलना चाहिए, हमें अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए। फिर एक बहन ने कहा, हुजूर जी, मेरा मन सेवा में तो लगता है, लेकिन घर के कामों में नहीं लगता। हुजूर जी ने बड़ी संतुलित बात कही, आगे चलकर हमें घर भी संभालना है, इसलिए सेवा और घर, दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, दोनों को समय देना जरूरी है, तभी हम जीवन में आगे बढ़ सकते हैं।
[20:13]और घर पर अगर कोई निष्काम भाव से काम कर रहा है तो वो भी एक सेवा ही है। फिर एक भाई ने कहा, हुजूर जी, हमें अंदर के दर्शन करवा दीजिए। हुजूर जी बोले, गुरु का काम होता है मार्ग दिखाना, अब अगर आप सच्चे दिल से उस मार्ग पर चलोगे मेहनत करोगे तो सब कुछ अंदर से अपने आप मिलने लगेगा। फिर एक भाई ने पूछा, हुजूर जी, मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता। हुजूर जी ने मुस्कुराकर कहा, असल सवाल यह नहीं की तुम्हारा मन पढ़ाई में नहीं लगता बल्कि असल सवाल तो ये है कि तुम्हारा मन लगता कहां है, मन कहीं न कहीं तो जरूर लगता है।
[21:02]हुजूर ने मजाकिया अंदाज में कहा, क्या इंस्टाग्राम पर लगता है, तो उसने कहा, नहीं हुजूर जी, मेरा घूमने-फिरने में मन लगता है, हुजूर जी बोले, अगर जिंदगी भर घूमते ही रहोगे, तो क्या जिंदगी बन जाएगी, आज मेहनत करोगे, अपने पैरों पर खड़े हो जाओगे, नहीं तो जिंदगी भर दूसरों के नीचे काम करना पड़ेगा। फिर एक बोहोत ही मजेदार पल आया, जब हुजूर जी समझा रहे थे, तो पूरी बात सुने बिना ही एक भाई “राधा स्वामी” बोलने लगा। हुजूर जी ने मजाक में कहा, मैंने भी तुम्हारी बात नहीं सुननी!” यह सुनकर पूरी संगत हंसी से गूंज उठी। फिर एक बहन ने कहा, “हुजूर जी, आज मैं सोचकर आई थी कि आप मेरी पर्ची निकालेंगे, और आपने निकाल दी, अब मेरे पैर भी कांप रहे हैं,” हुजूर जी ने हंसते हुए कहा, “थोड़ा-बहुत कांपना तो बनता है!” फिर एक भाई ने पूछा “हुजूर जी, कसम क्या होती है,” हुजूर जी बोले, “हम कसम तो कह देते हैं, लेकिन असल में उसका कोई महत्व नहीं होता, असली कसम वह होती है जो हम अपने कर्मों से निभाते हैं, न कि सिर्फ शब्दों से,” फिर इसी भाई ने पूछा की “हुजूर जी, क्या कसम खाने से कोई मर सकता है है,” हुजूर जी ने हंसते हुए कहा, “अरे बेटा, यह सब बातें सिर्फ कहने की होती हैं, कोई कसम खाने से नहीं मरता, ये सब सिर्फ कहानियां हैं”, मालिक की बनाई व्यवस्था को कोई नहीं बदल सकता, जिसने जब जाना है वो तभी जाएगा, किसी के कसम खा लेने से कोई अपने समय से पहले थोड़ी ना जा सकता है, इस बात पर पूरी संगत हंसी से भर गई, फिर एक बहन ने कहा, “हुजूर जी, आप बाबा जी को साथ क्यों नहीं लाए,” और संगत जी जैसा की कल वाले वीडियो में भी आपको बताया था की उसी टाइम बाबा जी का हेलीकाप्टर आसमान में पंडाल के ठीक ऊपर पहुंच गया और आवाज आने लगी तो हुजूर जी ने ऊपर की ओर इशारा करते हुए कहा, “वो देखो, बाबा जी आ गए, तुमने बाबा जी को याद किया और बाबा जी आ गए, जैसे ही यह हुआ, पूरी संगत तालियों से गूंज उठी और माहौल आनंदमय हो गया, बाबा जी के हेलीकॉप्टर ने जैसे ही चक्कर लगाया, पूरे पंडाल में खुशी की लहर दौड़ गई, कुछ ही पलों में वातावरण इतना सुंदर और उत्साह से भर गया कि हर कोई आनंदित हो उठा, हेलीकॉप्टर ने दो-तीन चक्कर लगाए और फिर एयरपोर्ट की ओर चला गया, आमतौर पर पहले कोठी पर उतरता है, लेकिन कल शाम 4 बज कर 45 मिनट के आस पास कुछ ही पलों में बाबा जी ने पूरे माहौल को बदल दिया, संगत जी ये थे कल 27 मार्च और आज 28 मार्च शाम 4 बजे के ब्यास के सवाल जवाब, संगत जी अब आगे की बात सुन कर आपको थोड़ा बुरा महसूस हो सकता है लेकिन ये वीडियो बनाना बोहोत जरूरी था, क्यूकी हम सत्संगी हो कर और बाबा जी के ना जाने कितने सत्संगों को सुन कर भी एक अच्छे सत्संगी होने का फर्ज नहीं निभा रहे, हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने हम सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है की हम kइस दिशा में जा रहे है, एक बीवी ने अचानक सिक्योरिटी के बीच में घुस कर बाबा जी की बाजू पकड़ने की कोशिश की, पूरी बात आपको इस वीडियो में बताएंगे और साथ ही 27 मार्च वाले वीडियो में हम कुछ सवाल जवाब नहीं डाल पाए थे इसलिए इस खबर के बाद आपको बाकी के सवाल जवाब भी इसी वीडियो में सुनाएंगे, संगत जी सबसे पहले ये जान लीजिए कि बाबा जी कल शाम को ही में दिल्ली से चंडीगढ़ होते हुए डेरा ब्यास पहुंचे, और आज पंडाल में बाबा जी ने संगत को दर्शन दिए, बच्चों की भीड़ इतनी अधिक थी कि पूरा पंडाल बच्चों से भरा हुआ नजर आ रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे हर तरफ सिर्फ बच्चे ही बच्चे हों, क्योंकि उनके एग्जाम खत्म हो चुके हैं और वे छुट्टियां मनाने अपने ननिहाल आए हुए हैं. आज सुबह ठीक 9 बजकर 25 मिनट पर बाबा जी पंडाल में पहुंचे, बाबा जी ने संगत पर दृष्टि डाली और इसके बाद लगभग 45 मिनट तक पाठी साहिब ने सत्संग किया, फिर बाबा जी ने खुली गाड़ी में बैठकर संगत को दर्शन दिए, जिससे हर कोई भाव-विभोर हो गया. आज पंडाल में 17वें पिलर तक संगत बैठी हुई थी और अनुमान के अनुसार करीब 2 से ढाई लाख लोग मौजूद थे. डेरे के अंदर बने सभी शेड पूरी तरह full हो चुके है, हालांकि, मौसम की कृपा रही, कल सुबह हल्की बारिश होने से वातावरण ठंडा हो गया था, रात का मौसम तो इतना सुहावना था कि कंबल की जरूरत महसूस हो रही थी, जबकि इन दिनों आमतौर पर गर्मी बहुत परेशान करती है. अब बात उस घटना की, जिसने सभी को चौंका दिया, एक वीडियो सामने आई, जिसमें देखा गया कि एक बीबी पहले सुरक्षा के किनारे खड़ी होती है, फिर अचानक धक्का देकर अंदर घुस जाती है और बाबा जी का हाथ पकड़ने की कोशिश करती है, यह घटना दिल्ली के रकाब गंज गुरुद्वारा की बताई जा रही है, जहां बाबा जी परसों एक अंतिम अरदास में पहुंचे थे, बाबा जी ने वहां गुरुद्वारा साहिब में माथा टेका और उसके बाद बाबा जी एक जगह पर बैठ गए, सुरक्षा व्यवस्था काफी मजबूत थी, लेकिन फिर भी वह बीबी किसी तरह अंदर पहुंच गई, और सिर्फ अंदर ही नहीं पहुंची बल्कि उसने सुरक्षा घेरे को तोड़ते हुए बाबा जी के करीब जा कर बाबा जी को पकड़ने की कोशिश की, बाबा जी ने खुद भी अपने सत्संगों में कई बार उदाहरण दिए हैं कि संत कभी नहीं चाहते कि कोई उन्हें शारीरिक रूप से छूए, सिक्योरिटी वालों ने उस बीबी को आगे बढ़ने से रोक दिया लेकिन वो लगभग बाबा जी के पास पहुंच गई थी, बाबा जी ने एक बार सवाल-जवाब के दौरान यह भी कहा था कि जब वे किसी शादी या भोग में जाते हैं, तो वहां असली रिश्तेदार कम और सत्संगी ज्यादा होते हैं, उन्होंने बहुत गहरी बात कही थी, “अगर मालिक देना ही न चाहे, तो हम उससे छीन नहीं सकते।” संगत जी से विनती है कमेंट में राधा स्वामी जरूर लिखिए और संगत के अपने इस चैनल रूहानी सफर को सब्सक्राइब करना मत भूलिए, गुरु प्यारी साध संगत जी राधा स्वामी।



