Thumbnail for Bakri (बकरी-नाटक) ll Sarveshwar dayal saxena ll समीक्षा ll कथावस्तु ll विशेषता ll भाषा-शैली ll पात्र by Sahitya Ganga (साहित्य गंगा)

Bakri (बकरी-नाटक) ll Sarveshwar dayal saxena ll समीक्षा ll कथावस्तु ll विशेषता ll भाषा-शैली ll पात्र

Sahitya Ganga (साहित्य गंगा)

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[0:04]नमस्कार! साहित्य गंगा चैनल में मैं कुंदन आप सभी का पुनः एक बार स्वागत करता हूं. आज हम प्रस्तुत हुए हैं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी का बहुचर्चित नाटक बकरी लेकर के. इस नाटक का समीक्षा के अंतर्गत हम लोग इसके महत्वपूर्ण बिंदु, पात्र परिचय, कथा वस्तु, भाषा शैली को देखेंगे. उससे पहले सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी का एक संक्षिप्त परिचय एक मिनट का देखते हैं. क्योंकि इसकी आगे हमें जरूरत पड़ेगी. तो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 'नई कविता' के चर्चित कवि हैं और ये मूलतः कवि ही हैं. इसके साथ ही ये कहानीकार और नाटककार भी हैं. सक्सेना जी का व्यक्तित्व बहुमुखी है. और सक्सेना जी की पढ़ाई हाई स्कूल बस्ती से (1942) में इन्होंने किया है और यही उनका मूल जिला है. इंटर क्वीन्स कॉलेज बनारस (1944) में किया और 1949 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (M.A.) की परीक्षा उत्तीर्ण किया. सुप्रसिद्ध कवि विजय नारायण शाही इलाहाबाद में इनके सहपाठी रहे हैं. सक्सेना जी की रचनाओं के बारे में अगर बात किया जाए तो सक्सेना जी के काव्य संग्रह कुछ इस प्रकार है. काठ की घंटियां (1949-57), बांस का पुल (1957-63), एक सूनी नाव (1963-1966), गर्म हवाएं (1966-69), कुआनो नदी, जंगल का दर्द, खूंटियों पर टंगे लोग (1976-1981) I और उपन्यास की अगर बात किया जाए तो उड़े हुए रंग। लघु उपन्यास : सोया हुआ जल, पागल कुत्तों का मसीहा। कहानी संग्रह : अंधेरे पर अंधेरा। नाटक : लड़ाई, बकरी, अब गरीबी हटाओ। एकांकी : कल भात आएगा, हवालात। बाल नाटक : भों-भों, खों-खों। लाख की नाक, हाथी की पूं, अनाप-शनाप लिखा है। इसके अलावा इन्होंने बाल कविताएं भी लिखी हैं, जैसे बतूता का जूता, मंहगू की टाई। यात्रा वृतांत : कुछ रंग - कुछ गंध। संपादन : "शमशेर" की कविताएं। नेपाली कविताएं। इन्होंने संपादन का भी काम किया है. शमशेर की कविताएं, नेपाली कविताएं, यह इनका संपादन है. अब आइए हम लोग बकरी नाटक की तरफ चलते हैं. यह नाटक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का लिखा हुआ पहला नाटक है, जबकि प्रकाशन के हिसाब से यह दूसरा नाटक है. प्रकाशन के क्रम में पहला नाटक 'लड़ाई' है. 'बकरी' नाटक का प्रकाशन वर्ष 1974 है. इस नाटक की प्रथम प्रस्तुति 'जन नाट्य मंच' द्वारा 13 जुलाई, 1974 को त्रिवेणी कला संगम, नई दिल्ली की उद्यान रंगशाला में हुआ. इस नाटक को लेकर के सक्सेना जी कहते हैं कि यह नाटक जितना ही गांव, कस्बों, मजदूर बस्तियों और स्कूलों कॉलेजों में खेला जाएगा, उतना ही इसका उद्देश्य पूरा होगा. गांधी और लोहिया के नाम पर राजनीति करने वालों पर यह नाटक व्यंग का आरोपण करता है. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने इस नाटक के माध्यम से आम आदमी के शोषण कथा को बड़े साहस के साथ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया है. इस नाटक की कथावस्तु 2 अंकों में विभाजित है तथा प्रत्येक अंक में तीन-तीन दृश्य हैं. प्रत्येक दृश्य के बाद नट गायन की योजना है, जिसके माध्यम से आसन्नस्थिति का विश्लेषण किया गया है. गांव वासियों की दयनीय स्थिति और उनकी मजबूरी का राजनेता किस प्रकार खुला दुरुपयोग कर रहे हैं - इस नाटक की केंद्रीय व्यंजना है. सक्सेना जी को बस्ती, इलाहाबाद, बनारस में बोली जाने वाली बोलियों का अच्छा ज्ञान था. क्योंकि इन्होंने यहां से शिक्षा ग्रहण किया है, जिसके कारण वह गांव के बात-विचार को भी समझते हैं और वहां की लोकल भाषा को भी समझते हैं. और उन्होंने उस भाषा को, उस बोली को अपने इस नाटक में प्रयोग किया है. हमने शुरू में ही बोला कि सक्सेना जी मूलतः एक कवि हैं और नाटककार बाद में हैं. इसलिए इस नाटक में भी कई जगहों पर उनका कवित्व का गुण दिखता है. और यह नट-नटी पद्य शैली में अपनी बातों को ज्यादा रखते हैं. आइए इस नाटक के कथा वस्तु को देखते हैं, उसके बाद हम लोग पात्रों के चरित्र चित्रण, भाषा शैली और विशेष बिंदुओं पर भी प्रकाश डालेंगे. आइए बकरी नाटक के कथा वस्तु को देखते हैं, लेकिन उससे पहले हम नाटक के पात्रों की चर्चा कर लेते हैं. तो इस नाटक में कुल 15 पात्र हैं. पहला नट-नटी हैं जो शुरू में आते हैं और अपनी नौटंकी शैली में गाते हैं और गाने के बाद फिर नाटक की शुरुआत होती है. तीसरा पात्र है भिश्ती जो फूलों को पानी देता है या सड़क के किनारे लगे हुए पौधों को पानी देता है. इसके अलावा इसमें तीन डकैत हैं - एक दुर्जन सिंह, दूसरा कर्मवीर, तीसरा सत्यवीर. फिर एक सिपाही है और विपत्ति नाम की एक महिला है जो गरीब ग्रामीण है. एक पात्र युवक है. इसके अलावा ग्रामीण है. उनमें काका, काकी, चाचा, राम, एक ग्रामीण, दूसरा ग्रामीण हैं. यह कुल 15 पात्र हैं. आइए अब कथा वस्तु को देखते हैं, तो इस नाटक की जो शुरुआत होती है वह नौटंकी गायन शैली में होती है. नटी दोहा पढ़ती है और कहती है, सदा भवानी दाहिने सम्मुख रहे गणेश. पांच देव रक्षा करें ब्रह्मा विष्णु महेश. नट बोलता है पांच देव सम पांच दल. लगी ढोंग की रेस जिनके कारण हो गया देश आज परदेश. कुछ इस तरीके से यह शुरू होता है और इनकी वार्तालाप होती रहती है, नट-नटी का आपस में वार्तालाप होता रहता है. फिर पहला अंक शुरू होता है और इस पहले अंक में एक भिश्ती मशक लादे सड़क सिसता गा रहा है. मशक क्या होता है, मशक एक चमड़े का थैला होता है. और यहां पर भिश्ती मशक लादे सड़क को सींच रहा है. और गा रहा है, क्या गा रहा है, उसको भी जरा एक बार देखते हैं. बकरी को क्या पता था, मशक बनके रहेगी, पानी भरेंगे लोग और वह कुछ ना कहेगी. जा जा के सींच आएगी हर एक की क्यारी, मर कर के भी बुझाएगी वह प्यास तुम्हारी. सक्सेना जी ने इस तरह के कई जगहों पर अपनी बातों को रखने के लिए पात्रों के माध्यम से कविता के पदों को रखा है. और जो शब्द हैं वह क्षेत्रीय शब्द बनारस, इलाहाबाद और बस्ती के क्षेत्रों में जो प्रयोग होते हैं बोली, उनका उन्होंने लिया है. इसीलिए हमने आपको यहां पर पथ सुनाया. अब इसी पद के बाद यहां पर तीनों डकैतों का आगमन होता है. और वह तीनों डकैत इसको सुनकर के खुश हो जाते हैं और वह गाने लगते हैं, मुझे मिल गई, मिल गई, मिल गई रे, मुझे मिल गई, मिल गई, मिल गई रे. यह मिल गई, मिल गई रे क्या है, यह सिपाही सुनकर के वहां पर उपस्थित डकैतों से पूछता है, क्या मिल गया ठाकुर. फिर भी वह तीनों गाते रहते हैं. सिपाही कहता है, ताज्जुब है अरे कोई नया डाका डाला है. तो दुर्जन सिंह कहता है, होश में बात करो दीवान जी अब हम डाकू नहीं शरीफ आदमी हैं. सिपाही बोलता है फिर शरीफ आदमी? रोने लगता है, हाय अब मेरा क्या होगा. मेरा क्या होगा दुर्जन सिंह. फिर तीनों गाते हैं, कुर्सी भी मिल गई, सेवा भी मिल गई, माधव भी मिल गए, मेवा भी मिल गई, मिल गई, मिल गई, मिल गई रे, मुझे मिल गई, मिल गई, मिल गई रे. सिपाही रोता रहता है कहता है मेरा क्या होगा. हाय मेरा क्या होगा दुर्जन सिंह. दुर्जन फिर बोलता है वही जो हमारा होगा, मजे. इस कथा वस्तु को हमने यहां तक इसलिए आपको बताया. क्योंकि वास्तव में यह नाटक बहुत ही रोचक नाटक है और अगर मौका मिले तो आप अवश्य एक बार पढ़िए. और यहां पर उत्सुकता इंसान के अंदर पैदा होने लगती है कि आखिरकार क्या मिला. तो पूरी कथा वस्तु में इन तीनों डकैतों को एक विचार मिलता है कि उन्हें एक बकरी है. और वह जिंदा रहने पर दूध देती है और बकरी के मरने पर उसका लोग मांस खाते हैं और मरने के बाद उसके चमड़े का थैला प्रयोग में लाते हैं. कुछ इसी तरीके की विचारों को अपने दिमाग में रख कर के वह सब एक आईडिया पर पहुंचते हैं कि हम लोग इस बकरी के द्वारा ही सारा काम करेंगे. और यह बकरी ही सारी महत्वाकांक्षाओं को हमारे पूरा कराएगी और वह सिपाही को बोलते हैं कि जाओ एक बकरी लेकर के आओ. सिपाही गांव में जाता है और विपत्ति महिला के यहां से बकरी को उठाकर ले आता है. उन डकैतों को बकरी दे देता है. अब वह आगे सिपाही के साथ मिलकर के तीन के बजाय यह चार हो चुके हैं. तीन डकैत और एक सिपाही, यह सभी आपस में विचार करते हैं कि हमें इस बकरी को ही अब बताना है कि यह बकरी गांधी की है. और गांधी की बकरी के नाम पर वह ग्रामीणों को लूटने की बात सोचते हैं, मूर्ख बनाने की बात सोचते हैं. फिर यह लोग एक सेवा सदन के बोर्ड को प्रयोग करते हैं और वहां पर बकरी को रख देते हैं और बताते हैं कि यह बकरी एक देवी है. जो गांधी जी की बकरी है, यह बोलती नहीं है और इसकी कृपा से सारे काम अच्छे होते हैं. इसलिए सभी लोग आएं, इसका दर्शन करें और इसको चढ़ावा दें. ग्रामीणों में यह बात फैलाते हैं. इसी बीच विपत्ति भी आती है और रोती है कि यह मेरी बकरी है. यह बकरी दे दो बाबू, लेकिन वह लोग डांट कर उसे भगा देते हैं. और नहीं जब जाती है तो उस पर भारत सुरक्षा कानून के तहत विपत्ति को जेल भेज देते हैं. फिर गांव वाले आते हैं. गांव वालों को समझाते हैं कि जितनी भी बीमारी परेशानी है वह सारी या बकरी ले लेगी. यही देवी है, इसकी पूजा करो, इसका दर्शन करो और साथ में चढ़ावा दो. फिर इस कहानी में युवक आता है और युवक इन सारी चीजों को देखकर के उग्र होता है. ग्रामीणों को मना करता है. ग्रामीण कहते हैं कि हम पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन तुमसे उम्र में बड़े हैं. और तजुर्बा हम लोगों के पास ज्यादा है. यदि वह सब हमें, वे सब यानी लूटने वाले लोग - तीनों डकैत और सिपाही - वे सब हमें बेवकूफ भी बना रहे हैं तो कोई बात नहीं, हम लोगों के पास कोई विकल्प भी नहीं है. और हम लोग इस पर विश्वास करते हैं. युवक बहुत तरह की बातें कहता है. फिर ग्रामीण उनकी बातों को काटते हैं कि नहीं ऐसा नहीं है. और वह बकरी के पास अक्सर जाते रहते हैं. जो भी रहता है वह सब चढ़ावा देकर के चले आते हैं. इसके बाद कहानी में वह तीनों मिलकर के प्लान बनाते हैं कि हमें चुनाव लड़ना है. और चुनाव जितना भी है और यह चुनाव जीतने में जो उनकी मदद करेंगे वह यही ग्रामीण करेंगे. और यहां पर कर्मवीर चुनाव लड़ता है. सारे ग्रामीणों को यह लोग हर तरीके का हथकंडा अपना कर के उनसे वोट कर्मवीर की तरफ करवाते हैं. चुनाव जीतने के बाद दुर्जन सिंह कहता है, एक दावत बकरी सेवा संघ की ओर से होगी. और इसमें बहुत सारे अधिकारी मंत्री आएंगे. आखिर कर्मवीर के साथी होंगे. इनमें कौन ऐसा है जो बकरी भक्त ना हो. बकरी का नाम लेकर बना हर विधान है, बकरी के नाम पर चला सारा जहान है. और इस तरीके से घुमा फिरा कर के वह बकरी को काट करके खाने की ही बात कर रहे हैं. दुर्जन फिर कहता है, शाकाहारी दावत कही जाएगी. गांधी जी की नेक पवित्र बकरी निरामिश ही मानी जाएगी. मिमियाने में जिसके है देवत्व की वाणी, उसकी रगों में होगा ही अमृत्व का पानी. सहने को जोर-जुल्म जिसे राजी जानिए वह गोश्त भला कैसे उसे भाजी मानिए. दीवान जी, बकरी अहिंसावादी होती है. चूरा भी फिरवा लेगी. गोश्त तो जंगली सूअर का होता है. चपेटे में आ गए तो स्वर्ग दिखा दे हम सब शाकाहारी हैं, बकरी शरणम् गच्छामि. सिपाही बकरी को खोल कर के लेकर के कसाई के पास चल देता है. इस तरीके से कहानी आगे बढ़ती है. फिर युवक आता है और फिर उन्हीं ग्रामीणों के बीच में बैठता है, उनसे कुछ बातें करता है. और इसी बीच में विपत्ति आती है और रोते हुए चिल्लाते हुए कहती है, खा गए हाय उसे खा गए. और वह युवक को देखकर के रोते हुए फिर कहती है, अबहिने हम देखा सिपाही ओहका कसाई जस शहर लिए जात रहा उ चिल्लात रही. एक ग्रामीण बोलता है, उ आश्रम में हुई. युवक बोलता है, अब न वह होगी और ना आश्रम होगा. अब आश्रम की उन्हें क्या जरूरत, जो पाना था पा गए. फिर नाटक में एक भोज का दृश्य आता है. शेरवानी में एक गुलाब लगाए एक बड़े नेता और उनके साथ एक नेत्री आती है. सब खड़े हो जाते हैं बाहर दो पुलिस के आदमी लिए हुए हैं. और दुर्जन कहता है, बहुत कम लोग यह जानते हैं आज हम जो हैं वह किसकी बदौलत. किसने हमें जन सेवा की ओर लगाया, हमारी आंखें खोली, हमें सही रास्ता दिखाया. किससे हमने हमेशा प्रेरणा ली, अपना कर्तव्य किया और आगे बढ़े. हमने खून-पसीने से इस धरती को इस देश की धरती को सींचा है और ऐसी घास उगाई है जो हमेशा हरी-हरी रहेगी और युगों तक चरे जाने पर भी खत्म नहीं होगी. सभी लोग ताली बजाते हैं. फिर दुर्जन कहता है, आज ऐसे मौके पर जब हमारे सपने कुछ साकार हुए हैं, तो हम उसे सम्मानित करना नहीं भूल सकते जिसकी बदौलत हम यहां हैं. फिर सिपाही भिश्ती को लेकर के आता है. घुटने तक तहमत बांधे सिर पर गांधी टोपी लगाए पीठ पर मशक कुछ-कुछ झलक गांधी जी जैसी. और ये सब भिश्ती को कहते हैं कि भिश्ती कुछ गाओ. फिर भिश्ती गाता है कि बकरी को क्या पता था, मशक बनके रहेगी, अपने खिलाए फूलों से भी कुछ न कहेगी. उसके ही खू के रंग से इतराएगा गुलाब. दे उसकी मौत जाएगी हर दिल अजीज ख्वाब. चाहे वह ढोल किया हो, मदारी हो या किराएदार. चमका के चली जाएगी हर एक का रोजगार. सिपाही एक लात मारता है और उसको कहता है जा भाग यहां से बना फिरता है, चोबदार. भिश्ती खाल लेकर के जाने के लिए मुड़ता है. फिर दुर्जन उससे कहता है, कुछ और गाओ भिश्ती. क्या वही पुराना राग अलापते हो. तो भिश्ती कहता है, हमें तो यही आता है सरकार, लड़का हमारा जरूर कुछ नया सीखे हैं. फिर वह लड़का आता है. सब लोग खाना शुरू करते हैं और दुर्जन कहता है, यही तुम्हारा लड़का है भिश्ती. भिश्ती कहता है जी हजूर. दुर्जन कहता है, गाओ लड़के कुछ फड़कता हुआ गाना. फिर लड़का गाता है, कि बकरी हमको बना दिया बकरी की मेमे ने. सब कुछ सहना सिखला दिया बकरी की मेमे ने. छोटी से छोटी रस्सी से भी हर खूंटे के साथ बधकर रहना सिखला दिया बकरी की मेमे ने. कांटों में लगी पत्तियां भी खाने के लिए दर-दर फिरना सिखला दिया बकरी की मेमे ने. इस टहनी के इशारे पर हर कसाई के साथ चुपचाप जाना सिखला दिया बकरी की मेमे ने. सिंगे भी हैं चलने वाली छुरे के वास्ते यह तक हमको भुलवा दिया बकरी की मेमे ने. लाला जी और नेता जी सबके ऐसो जश्न में बोटी बोटी कटवा दिया बकरी की मेमे ने. हर ढोल बज रहे हैं हमारी ही खाल के फिर भी यह सुर मिलवा दिया बकरी की मेमे ने. फिर दुर्जन कहता है यह क्या मेमे लगा रखा है. युवक गरज कर बोलता है, अब यह मेमे नहीं होगी बांधो इन लुटेरों को, इंकलाब जिंदाबाद. सभी उन सभी को घेर लेते हैं और रस्सी से बांधते हैं. फिर नट-नटी आते हैं और गाते हैं, दिन में दो रोटी के हो जब देश में लाले पड़े. हो सभी खामोश सबकी जमा पर ताले पड़े, दिल दिमाग और आत्मा पर इस कदर जाले पड़े. सूखे की शतरंज नेता खेले दिल काले पड़े, तोद अड़ियल पिचके पेटों पर चलाएं गोलियां. हर तरफ फिर न निकले क्रांतिकारी टोलियां फिर बताओ किस तरह खामोश बैठा जाए है. अब तो खोल खून रहा रह-रह कर जवाब पर आए हैं. बहुत हो चुका अब हमारी है बारी, बदल के रखेंगे यह दुनिया तुम्हारी. नाटक यहीं पर समाप्त हो जाता है. यही नाटक की कथावस्तु है. अब आइए हम लोग इस नाटक के विशेषता और समीक्षा पर प्रकाश डालते हैं, फिर हम लोग एक बार भाषा शैली को देखेंगे. इस नाटक में हमें छद्म गांधीवाद का चित्रण दिखाई देता है. किस प्रकार से लोग गांधी जी के सिद्धांतों के आड़ में अपनी-अपनी रोटियां सेकते हैं. इसके अलावा जो राजनीति की स्थिति है वह भी इस नाटक में दिखाया गया है. और हमने इसका नाम दिया है राजनीतिक विडंबनाओं का चित्रण. इसके अलावा समाज की दयनीय स्थिति, विवशता एवं शोषण का भी चित्रण सक्सेना जी ने यहां पर बखूबी किया है. लोकतांत्रिक देश होते हुए भी अलोकतांत्रिक और जनविरोधी व्यवस्था का चित्रण सक्सेना जी ने यहां पर किया है. कि किस प्रकार से नेता और अधिकारी मिलकर के समाज को गुमराह करते हैं और उनका शोषण करते हैं. अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए स्वार्थ पूर्ण सेवा भावी संस्थाओं का भी यहां पे चित्रण सक्सेना जी ने किया है.

[21:40]और उसको भी यहां पे दिखाया है जैसे सेवा सदन और भारत सुरक्षा कानून की यहां पे सक्सेना जी ने चर्चा किया है. इससे यह ही दिखता है कि अपने स्वार्थ के पूर्ति के लिए नेता और प्रशासन के लोग संस्थाओं का सहारा लेते हैं. इस नाटक में जो युवक है वह कहीं न कहीं कर्मशील, स्वाभिमान और ईमानदार है. और यह युवक आज के समाज के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है. यह युवक कर्मशील, स्वाभिमान, ईमानदार बनने की हम सभी को प्रेरणा देता है और यह भी एक नाटक की विशेषता में आएगा. अब आइए बकरी नाटक के भाषा शैली को देखा जाए. तो इस नाटक में सक्सेना जी ने तद्भव और देसी शब्दों का भी प्रयोग किया है. और यहां पर लोक भाषा तथा लोक शैलियों का समावेश सक्सेना जी ने किया है. यहां पर जो लोक भाषा के शब्द हैं वह आपको उन्हीं क्षेत्रों से लिए गए हैं जहां पर सक्सेना जी ने पढ़ाई किए हुए हैं. और सक्सेना जी उन्हीं क्षेत्रों से आने वाली बोलियों के शब्दों को भी यहां पर रखे हैं और उसी के अनुसार वह कविता भी, कविता में भी लिखते हैं. हमने शुरू में बोला कि सक्सेना जी मूलता कवि हैं और पूरे नाटक में अगर ध्यान से देखा जाए तो कहीं न कहीं एक बड़ा भाग कविता का भी है. और इस नाटक में भी सक्सेना जी का कवि रूप दिखाई देता है. कई जगहों पर मुहावरेदार भाषा का भी प्रयोग है. इसके अलावा उर्दू मिश्रित भाषा का भी सक्सेना जी ने यहां पर प्रयोग किया है. इसके अलावा इस नाटक में नट-नटी के द्वारा जो गायन शैली में प्रस्तुत किया गया है. नौटंकी उसमें दोहा, चौबोला, दौड़, बहरे तबील, वंदना, युगल गीत का प्रयोग हुआ है. तो इस प्रकार से दोस्तों सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी के नाटक बकरी का. समीक्षा समाप्त हुआ, जिसके अंतर्गत हम लोगों ने महत्वपूर्ण बिंदु, विशेषता, कथावस्तु, नाटक के पात्र आदि को देखा. यदि आपको यह वीडियो पसंद आया हो तो आप इसे लाइक करना ना भूलें. और साथ में अगर कोई आपका सुझाव हो तो आप हमें कमेंट करके भी बता सकते हैं. हमारा आपसे एक आग्रह होगा कि यदि आपको यह वीडियो पसंद आया हो तो और अपने साथियों से भी इसे शेयर करें. यदि आपने चैनल अभी तक सब्सक्राइब नहीं किया है तो आप चैनल को सब्सक्राइब कर लें. जिससे कि हमारे तरफ से अपलोड होने वाली वीडियो की सूचना ससमय आपको मिल सके. इन्हीं बातों के साथ हम फिर मिलेंगे किसी नए बिंदु पर, नए तत्वों के साथ. तब तक के लिए जय हिंदी, जय भारत.

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