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Rawalpindi Express की पूरी कहानी । Flat Feet से 161.3 KMPH तक । Shoaib Akhtar । Shubhankar Mishra

CricketBook By Shubhankar

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[0:00]यह कहानी रावलपिंडी एक्सप्रेस की है। यह कहानी क्रिकेट की दुनिया के सबसे मैड मैड मैड मैन की है। उस गेंदबाज की है जिसके रनअप को देखते हुए लोगों की धड़कन बढ़ती थी। जब वो 30 गज की दूरी पर चलता था, तो ऐसा लगता था यार कोई सिनेमा आ रहा है। कोई कट नहीं, कोई स्लो मोशन नहीं। वह लंबे बाल जब हवा में लहराते थे तो उस दृश्य को देखकर बल्लेबाजों की टांगे थर-थर थर-थर कांपने लगती थी। जब वह गेंद छोड़ता था तो स्टंप से ज्यादा पसलियां दांव पर थी। न जाने कितने बल्लेबाजों की उसने पसलियां तोड़ी न जाने कितने बल्लेबाज ऐसे थे जिनकी हड्डियां तो नहीं टूटी लेकिन हिम्मत तोड़ दी। अंपायर जिसको देखकर सहम गया यह कहानी है दुनिया के सबसे तेज गेंदबाज शोएब अख्तर की। वो अख्तर जो पाकिस्तान के रावलपिंडी की धूल भरी गलियों से निकला जिसे कभी डॉक्टर ने कहा था कि शायद ठीक से चल भी नहीं पाएगा लेकिन जिसने दुनिया को यह बताया कि अगर दिल में आग हो तो चला नहीं दौड़ा जाता है। यह कहानी शोएब अख्तर की ही यह कहानी उस शोएब अख्तर की जिसने इडन गार्डन के 1 लाख लोगों को खामोश कर दिया था। जिसने जब 161.3 किलोमीटर की रफ्तार से गेंद फेंकी तो इंसान को मशीन से तेज साबित कर दिया। जिसने ब्रायन लारा से लेकर रिकी पोंटिंग तक दुनिया के बड़े सूरमाओं के दिलों में यह डर बैठाया कि अगली गेंद विकेट पर नहीं जिस पर लेगी। जिसने सौरव गांगुली के छाती पर इतनी गेंद मारी जिसने जस्टिन लैंगर को घुटनों पर लाकर पटक दिया। वह रावलपिंडी वो अख्तर जिसे देखकर विराट ने कहा था कि मैंने उसे अपने करियर की शुरुआत और उससे करियर के एंड में देखा। पर देखकर यह एहसास हुआ कि भाई यह कितना तेज है और जब यह पीक में रहा होगा तो क्या खौफ रहा होगा। विराट कोहली ने कहा कि यह अख्तर है जिससे अंपायर डरते थे और बल्लेबाजों को इससे मत भिड़ना यह कहते थे। आज भी जब कोई गेंदबाज पूरी जान लगाकर गेंद फेंकता है और 150 के आंकड़े को पार करता है तो दुनिया एक साथ यह सवाल पूछती है क्या यह नेक्स्ट शोएब अख्तर बनेगा। आज के दौर में जब 150 प्लस फेंकना खबर बनती है तब कहानी उस शोएब अख्तर की जो कंसिस्टेंसी से 150, 155, 157, 158 लगातार फेंकता था। आज के गेंदबाज तेज फेंकते हैं वह आफत था, सिनेमा था, खौफ था। इसलिए आज ये कहानी सिर्फ एक इंसान की नहीं उस रफ्तार की भी है जिस दुनिया डर से नहीं नाम से जानती है रावलपिंडी एक्सप्रेस। वह शोएब अख्तर जो आया लड़ा, गिरा लेकिन झुका नहीं। शोएब अख्तर की कहानी शुरू करें उससे पहले हमारी आपसे गुजारिश है कि हमारे क्रिकेट बुक चैनल से आप जुड़िए। आप हमें हिम्मत देंगे तो ऐसी और कहानियां हम आपके लिए लाते रहेंगे। अब शुरू से शुरू करते हैं। शोएब अख्तर का जन्म 13 अगस्त 1975 को पाकिस्तान के रावलपिंडी में हुआ। लेकिन उनकी कहानी उनके जन्म से पहले एक दर्दनाक हादसे से जुड़ी है। उनसे ठीक पहले उनकी मां हमीदा ने अपने एक बेटे को खो दिया था जिसका नाम भी शोएब था। हम नियति खेल देखी जब दूसरा बेटा पैदा हुआ तो दूसरे बेटे का भी नाम स्वयं ही रखा गया। लेकिन शुरुआत किसी फिल्मी हीरो जैसी नहीं थी। शोएब अख्तर दिव्यांगता के साथ पैदा हुए थे। जिसे मेडिकल भाषा में फ्लैट फीट कहते हैं। उनके पैर के तलवे पूरी तरह से समान थे। शरीर का संतुलन बनाना मुश्किल था। चार-पांच साल की उम्र तक शोएब सही से खड़े भी नहीं हो पाते थे। वह चलते कम गिरते ज्यादा थे। डॉक्टर ने शोएब की मां से कहा था कि बीवी शुक्र मनाइए अगर यह बच्चा बड़े होकर नॉर्मल बन गया। खेल खिलाड़ी तो बहुत दूर की बात है। घर के हालात भी बहुत खास नहीं थे। पिता एक मामूली सरकारी नौकरी करते थे। आमदनी सीमित थी। शोएब के पास ना तो अच्छे जूते थे ना खेलने के लिए खिलौने बस जिद थी। वह अपनी मां से बहुत प्यार करते देखते उसके सेहत को लेकर फिक्रमंद रहते और मन ही मन तय करते कि इस कमजोरी को हराना है। 9 साल की उम्र आते-आते कुदरत ने चमत्कार दिखाया जो पैर जमीन पर नहीं टिक रहे थे वह अचानक हवा से बातें करने लगे। शोएब ने दौड़ना शुरू किया और फिर वह कभी नहीं रुके। अपनी कमजोरी को ताकत बनाया। रावलपिंडी की उबड़ खाबड़ सड़कों पर पत्थरों और कंकड़ों के बीच में शोएब ने रफ्तार को पाया। शोएब शीशे के सामने खड़े होकर घंटों वकार यूनुस, इमरान खान वसीम अकरम की नकल करते लेकिन गुस्सा उनके अंदर अलग था। हालांकि वह वकार यूनुस से हाइली इंस्पायर्ड थे। फिर आया साल 1997। 1997 शोएब ने डेब्यू किया लेकिन दुनिया ने असली शोएब अख्तर जो है वह पहचाना साल 1999 में। यह साल था एशियन टेस्ट चैंपियनशिप का और मैदान था क्रिकेट का मक्का कोलकाता का इडन गार्डन। सामने भारत की वह बैटिंग लाइनअप थी जिसमें द वॉल और द गॉड दोनों थे। 1 लाख भारतीय दर्शक स्टेडियम मौजूद थे। शोहरतनाथ के आसपास बैठे इंसान को आवाज नहीं। द्रवण क्रीज पर थे। शोएब उस समय अपने मशहूर लंबे और डरावने रनअप दौड़ कर आए। गेंद हाथ से छूटी लेजर बीम की तरह निकली और इससे पहले कि दीवाल का बल्ला सामने आता दीवार दरक गई थी। राहुल द्रविड़ क्लीन बोल्ड में थे। स्टेडियम में हल्की खामोशी हुई लेकिन अगले ही पल शोर दुगना हो गया। क्योंकि अब क्रीस पर तेंदुलकर आ रहे थे। पूरा भारत उम्मीद लगाए बैठा था। शोएब फिर दौड़े। बाल हवा में लहरा रहे थे। किसी सिनेमा की तरह वह सीन था। शोएब अख्तर का रनअप एक्चुअली सिनेमा था। बहुत खिलाड़ी आए बहुत गेंदबाज आए लेकिन वह जो दौड़ शोएब अख्तर की थी वह किसी में नहीं थी। आंखों में खून लग रहा था और फिर एक और यकर और सचिन का भी मिडल स्टंप हो गया।

[6:08]एक पल में 1 लाख लोगों का शोर सन्नाटे में बदल गया। वह सन्नाटा शोएब अख्तर करियर का सबसे बड़ा शोर। लगातार दो गेंद पर भारत के दो सबसे बड़े दिग्गजों को बोल्ड करना कोई तुक्का नहीं था। यह ऐलान था कि क्रिकेट की दुनिया में एक डॉन आ गया है। उस दिन के बाद शोएब अख्तर सिर्फ एक गेंदबाज नहीं दहशत बन गया। हालांकि शोएब अख्तर की जिंदगी का सबसे बड़ा लम्हा आया था साल 2003 में। वर्ल्ड कप चल रहा था केप टाउन में। क्रिकेट पंडित और वैज्ञानिक कहते हैं कि इंसान ने कंधे और शरीर की बनावट ऐसी नहीं है कि वह 100 मील प्रति घंटा की रफ्तार से गेंद फेंक सके। यह बायो मैकेनिक्स के खिलाफ है। लेकिन शोएब को नियमों की परवाह नहीं। 22 फरवरी 2003 को इंग्लैंड के खिलाफ शोएब अख्तर का पागलपन सातवें आसमान पर था। वह पहले ही 158 159 की रफ्तार छू चुके थे। फिर वह दौड़ कर आए और वह गेंद फेंकी जिसने इतिहास बदल दिया। सामने बल्लेबाज सैनिक नाइट। बॉल गई 161.3 किलोमीटर प्रति। 100.2 माइल पर आर। स्टेडियम के बड़े स्क्रीन पर यह आंकड़ा फ्लैश हुआ। सारी दुनिया हैरान हो गई और यह आधिकारिक तौर पर क्रिकेट इतिहास की सबसे तेज गेंद थी। शोएब अख्तर ने साबित कर दिया कि जब जुनून हद से गुजर जाता है तो नियम कायदे कानून छोटे पड़ जाते हैं। और आज भी इससे तेज गेंद जो है वह क्रिकेट की दुनिया में नहीं फेकी गई है। शोएब अख्तर का खौफ सिर्फ रफ्तार का नहीं था उनकी पर्सनालिटी का था और मेरा फेवरेट जो शोएब अख्तर का मूवमेंट है वह है जस्टिन लैंगर के साथ। जस्टिन लैंगर दुनिया के क्रिकेट में सख्त जान वाले खिलाड़ियों में थे टफ गाय बॉक्सर की तरह। जो बॉल खाने के बाद मुस्कुराते थे डराते थे सामने। लेकिन शोएब अख्तर ने उनके साथ भी खेल किया। बड़ा इंटरेस्टिंग मैच था वो शोएब अख्तर गेंद फेंकते हैं लैंगर शॉट मारते हैं बॉल पकड़ ली जाती है। अख्तर सामने आते हैं आंखों में घूरते हैं कुछ कहते हैं लैंगर जवाब दे देते हैं। शोएब अख्तर जाते हैं अगली गेंद बाउंसर पुल करने की कोशिश लेकिन बॉल इतनी तेज लगती है थक से आवाज आती है। आमगार्ड लैंगर पहनते नहीं थे। शोएब अख्तर फिर सामने आते हैं मुस्कुराते हैं। लैंगर उस टाइम तो रिएक्ट नहीं करते हैं लेकिन फिर वह दर्द उनको महसूस होता है। हेलमेट निकालते हैं गिरते पड़ते हैं। फिर शोएब अख्तर रनअप पे आते हैं। और फिर ऐसे-ऐसे इशारा करते हैं। मानो डराने की कोशिश थी। कुछ गेंद शोएब अख्तर ने मारी थी। पर तक की आवाज आई थी वह बल्ले से लगने की नहीं थी वह हड्डी और अंदर के सख्त लर की टकराव थी। उस दिन लैंगर ने बल्ला छोड़ दिया था। बाद में लैंगर ने माना कि मैंने बहुत सारे गेंदबाजों को खेला है लेकिन अख्तर अलग थे। यह वह बॉल लगी तो लगा कि बाजू अलग हो गई है। वह इंसान गेंदबाजी नहीं कर रहा था। गेंद नहीं फेंका रहा था गोली चला रहा था और शोएब अख्तर जिसको मैंने कहा मैड मैन में हमदर्दी दिखाने नहीं गए उसे घूरने गए। कि अभी और दूंगा। इंतजार करो। टीवी पर अख्तर के स्टाइल और रफ्तार दिखती थी। हालांकि रफ्तार और स्टाइल के बीच वह अपने शरीर से कीमत चुका रहे थे। फ्लैट फीट होने की वजह से जब वो दौड़ते तो घुटने पर समान इंसान से कई गुना ज्यादा दबाव पड़ता। उनका करियर घुटनों को दर्द टूटी हुई कार्टिलेज और अनगिनत इंजेक्शनों की कहानी है। शोएब अख्तर ने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है। कई बार मैच से पहले घुटनों के सिरिंज के जरिए पानी को निकालते ताकि दौड़ सके। डॉक्टर उन्हें चेतावनी देते कि अगर तुम ऐसे दौड़ोगे तो बुढ़ापे में व्हील चेयर पर आ जाओगे। लेकिन अख्तर का जवाब था व्हील चेयर पर बैठने के लिए पूरी जिंदगी है। अभी खेलना है। वह पेन किलर खाकर सोते और सुबह फिर पागलपन से गेंदबाजी करते।

[11:06]14 साल तक ऐसे उन्होंने खेला। साइंस के हिसाब से उनका करियर चार-पांच साल से अधिक नहीं चलना चाहिए था।

[11:25]हालांकि शोएब अख्तर का करियर जितना शानदार रहा उतना विवादित भी उन्हें वर्ल्ड क्रिकेट ने बैड बॉय के तौर पर भी देखा गया। शोएब का मानना था कि वह एक आजाद पंछी है जिसे पिंजरे में कैद नहीं कर सकते। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और शोएब अख्तर के बीच हमेशा तनाव रहे। कभी अनुशासनहीनता के लिए जुर्माना लगा। कभी बिना बताए कैंप छोड़ने के लिए वकार और इंजमाम जैसे कप्तानों के साथ उनके मतभेद रहे। शोएब को लगता था कि सिस्टम उनके टैलेंट को समझने के बजाय उन पर कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है। 2006 में उन पर डोपिंग का आरोप लगा। बैन झेलना पड़ा। 2007 के टी-20 वर्ल्ड कप से ठीक पहले ड्रेसिंग रूम में मोहम्मद आसिफ को बैट मारने की वजह से टीम से निकाल दिया गया। मीडिया ने विलन बनाया। आलोचकों ने कहा शोएब खत्म हो गए लेकिन शोएब राख से फिनिक्स पक्षी की तरह उठते थे। वह कहते थे मैं बुरा हो सकता हूं लेकिन नकली नहीं हूं। 2008 में जब दुनिया को लगा कि शोएब का करियर ढलान पर है तब वह आईपीएल में आए। केकेआर से खेला। सौरव गांगुली कहने पर इडन गार्डन में आए दिल्ली डेयरडेविल के खिलाफ उस मैच में शोएब ने जो किया वह आज भी आईपीएल में लोग याद है। सहवाग गंभीर मनोज तिवारी एबी डिविलियर्स को इतनी मासूमियत से आउट कर दिया कि हर कोई हैरान था। वह स्पल इतना खतरनाक था कि केकेआर ने हारा हुआ मैच जीत लिया। स्टेडियम में शाहरुख खान खुशी के मारे पागल थे। शोएब अख्तर पर बाहें फैलाए बादशाहत का जश्न मना रहे थे। 2011 के वर्ल्ड कप में सन्यास लिया। हालांकि आखिरी मैच में उनको अफसोस रहा होगा कि उन्हें इंडिया के खिलाफ खेलने का मौका नहीं मिला और जिसको लेकर वह कहते हैं अगर खेलने का मौका मिला होता तो शायद फर्क डाल देते। ऑस्ट्रेलिया न्यूज़ से पहले न्यूजीलैंड वाले मैच में काफी पिटाई कर दी थी। इसी वजह से नहीं मिला था। बट शोएब बीइंग शोएब। क्रिकेट सन्यास के बाद शोएब गायब नहीं हुए। खुद को गढ़ा सोशल मीडिया यूट्यूब को हथियार बनाया है। जिसे लोग गुस्सैल समझ रहे थे। अब वह एक समझदार मजाकिया और एक ऑनेस्ट विश्लेषक है। आज शोएब अख्तर इंडिया पाकिस्तान दोनों में प्रिय है। वह पाकिस्तान टीम की भी आलोचना करते हैं। इंडिया की भी तारीफ करते हैं और इसी वजह से शायद उनको लोग पसंद करते हैं। शोएब अख्तर सच कह देते हैं।

[14:12]अख्तर की कहानी हमें क्या सिखाती है? क्रिकेट के बारे में नहीं यह कहानी उस जिद की है जो नामुमकिन को मुमकिन बनाती है। एक दिव्यांग बच्चा जो दुनिया का सबसे तेज गेंदबाज बना। गरीब लड़का जो दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेटर बना। एक विद्रोही जिसने सिस्टम से लड़ाई लड़ी। आज के दौर में गेंदबाज अपनी फिटनेस बचाने के लिए स्पीड कम करते हैं। लाइन लिंग पर फोकस करते हैं। लेकिन शोएब ने बताया कि पेस जो है वह मसल से नहीं जिगरे से आती है और जिगरा तो सिर्फ रावलपिंडी एक्सप्रेस में था। क्रिकेट ने बहुत सारे बॉलर आए गए पर कोई शोएब नहीं बना। क्योंकि ट्रेनें बहुत आती है लेकिन पटरी से उतार देने वाली आंधी सिर्फ एक बार आती है। रावलपिंडी एक्सप्रेस हुई थी। अख्तर की कहानी अधूरी हो सकती है, विवादित हो सकती है लेकिन बोरिंग नहीं है। खुली किताब है जिसका हर पन्ना खून पसीने आंसू से लिखा गया है। शोएब अख्तर आए, दहाड़े, जख्मी हुए पर चुके नहीं। चलते रहे। कहानी शोएब अख्तर की थी कहानी कैसी लगी शोएब अख्तर की जिंदगी किसी खास हिस्से को आप सुनना अलग से चाहते हो तो आप कमेंट करके बता सकते हो।

[15:52]बाकी आप बताओ व्हाट्स योर फेवरेट शोएब अख्तर मूवमेंट। मेरा कोलकाता टेस्ट और जस्टिन लैंगर वाला। लारा वाला भी चलो। आप बताओ।

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