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[0:10]प्राचीन जंगल थे कर्नाटक तट के पास कराड़ी गाँव में। जहाँ शूट हुए सुपरहिट फिल्म कंतारा के सबसे रोमांचक और शानदार पंजूरली देव के सीन। वाहहहह...! ये जगह खासतौर पर एक्टर डायरेक्टर ऋषभ शेट्टी ने चुना था, जब आधी रात को जोश में अपने डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी अरविंद कश्यप को वीडियो कॉल करके बताया। ये ये लाइटिंग देखो। यही चाहिए मुझे। मस्त लग रहा है ऋषभ। इतना गहरा था ऋषभ शेट्टी का जुनून की फिल्म के हर छोटे चीज पर वो खुद गौर करते थे। मैं चाहता था कि कंतारा की दुनिया उसकी चाँदनी कुछ गज़ब सी दिखे। यह विषय ऋषभ के दिल के बहुत करीब था, क्योंकि वो बचपन से हर साल देवी आत्माओं का ‘भूता कोला’ पूजा त्यौहार देखते आए थे। जहाँ माना जाता है कि जो कलाकार इस प्रथा को निभाएगा, वो कुछ समय के लिए खुद भगवान बनकर लोगों की समस्याओं का समाधान करेगा। फिल्म में ऋषभ शिवा बार-बार एक जंगली सूअर के डरावने सपने देखते थे, जो असल में पंजूरली देवता का एक प्रतीक था और जो उसे अपने किरदार बदलने का प्रोत्साहन के लिए जगा रहा था। इस रिवाज का आदर करने के लिए और अपनी श्रद्धा जताने के लिए, ऋषभ ने भूता कोला डांस सीन्स की शूटिंग से एक महीने पहले नॉन-वेज खाना छोड़ दिया। और कॉस्ट्यूम पहनने के बाद जब तक शूट पूरा नहीं हुआ, तब तक वो सिर्फ नारियल पानी के अलावा और कुछ नहीं लिया, चाहे कितने भी रीटेक लगे। रियलिस्टिक होने की ज़िद इतनी थी कि नशा चढ़ने वाले सीन को शेट्टी ने एक हाथ में गिम्बल पकड़े हुए शूट किया। ताकि दर्शकों को भी वैसे ही चढ़ने की फील आए। यहाँ तक कि बैकग्राउंड म्यूजिक भी कंप्यूटर के सहारे से नहीं, बल्कि देसी दक्षिण कन्नड़ा यंत्र, जैसे कोरागर डालो, ता से डमरु, गगरा आदि और कुछ पश्चिमी यंत्रों को मिलाकर बनाया। वो इन यंत्र से वाकिफ थे, क्योंकि जवानी में ऋषभ पूरे मेकअप और कॉस्ट्यूम पहनकर दक्षिण कन्नड़ का यक्षगना नाटक काल का अभिनय किया था। आखरी एक्शन सीन, जहाँ उसके अंदर देवता के रखवाले गुलिगा की आत्मा आई, जिसके ताकत से उन्होंने ज़मींदार और उसके गुर्गों को मार गिराया। बिना प्लानिंग से हुआ, समझो आत्मा ने उसे खुद राह दिखाई। ये सब स्क्रिप्ट में नहीं था। मैंने बस परफॉर्म किया और सेट पर सभी के रोंगटे खड़े होने लगे। जैसे मेरे ऊपर दैवी ऊर्जा का आशीर्वाद था। अपने किरदार की तैयारी के लिए, शेट्टी 6 महीने की जी तोड़ मेहनत की। मार्शल आर्ट्स की प्रैक्टिस, बैल की दौड़ में कई बार मेले हुए और 50 किलो कॉस्ट्यूम पहनकर डांस प्रैक्टिस की। एक सीन में जहाँ गुंडों ने उन्हें आग से लिपटी लाठियों से मारा, उनके शरीर पर हर जगह छाले पड़ गए। फिर भी रियलिस्टिक पिक्चर बनाने का खुमार ऐसा था, कि उन्होंने VFX या बॉडी डबल का इस्तेमाल नहीं किया। एक एक्शन सीन में ऋषभ का कंधा अपने ढाँचे से निकल गया। कट! लेकिन वो सिर्फ पेन रिलीफ जेल लगाकर फिर से लड़ाई के सीन शूट करने लगे। एक आवारा से विद्रोही बनने में वो इतना डूब गए, समझो एक्टर ऋषभ के किरदार में कोई एंग्री यंग मैन घुस गया हो। हालांकि उनका गुस्सा पिघला होगा जब सिर्फ 16 करोड़ के मामूली बजट का यह फिल्म 25 गुना कमाई किया, 400 करोड़ से भी ज्यादा। और कोई नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के भगवान रजनीकांत उनसे मिलकर पिक्चर की तारीफ की। फिल्म मेरे लिए एक रूहानी यात्रा थी। आपने बहुत अच्छी तरह से दिखाया कि अनजान शक्ति की ताकत इंसान अभी तक समझ नहीं सकता। स्थानीय रीति-रिवाज और धर्म का यह रस देश के विभिन्न संस्कृति के दर्शकों ने मजे से चखा। जितनी ज्यादा एक कहानी हमारी जड़ों से जुड़ी हो, उतनी ही वह कहानी अनोखी होगी और हर कोई उसे पसंद करेगा। लोगों के तार इससे इसीलिए भी जुड़े, क्योंकि भारत के हर कोने में कई लोकल देवता मौजूद है। उत्तर हिमालय से लेकर दक्षिण केरल और पूर्व बंगाल से पश्चिम गोवा तक, जहाँ पूरा कस्बा एक साथ आकर कुदरत और भगवान की पूजा करते आए हैं। ज़रा सी मार्केटिंग बजट के साथ ये फैन्स का वर्ड ऑफ माउथ ही था, जिसने कंतारा को 2022 की टॉप 5 गूगल फिल्मों में शामिल होने की मदद की। भले इसमें KGF जैसे एक्शन और स्पेशल इफेक्ट्स नहीं थे और ना ही RRR की हाई बजट सिनेमेटोग्राफी या स्टार कास्ट। जहाँ तक स्क्रीनप्ले की बात है, पहले दो घंटे में फिल्म धीरे-धीरे बढ़ती है। फिर अचानक आखिरी आधे घंटे में रोमांचक बन जाती है। शिवा जैसे धीरे-धीरे बदलाव और किसी किरदार में दिखाई नहीं देता, यहाँ तक कि लीला में भी नहीं। बावजूद इसके कि वो गाँव की पहली शिक्षित महिला होकर जंगल रक्षक अधिकारी बनी। जैसे उसे सिर्फ शिवा से इश्क़ लड़ाने के लिए ही रखा हो। बाकी दो भी रोबोट जैसे बिना दुविधा के किरदार थे। फॉरेस्ट पुलिस वाला ज्यादातर फिल्म में शिवा के पीछे पड़ा रहता है, फिर अचानक उसका साथ देने लगता है। वहीं जमींदार ने उल्टा किया दोस्त से अचानक दुश्मन बना। ये देखते हुए कि उन्होंने पिक्चर की स्क्रिप्ट पर आठ महीने लगाए, तो इन सबको बेहतर तरीके से दिखाने की गुंजाइश तो की जा सकती। हालांकि ये सबसे हिंदी पट्टी में कोई फर्क नहीं पड़ा, जहां कंतारा हिंदी ने 70 करोड़ रुपये से ज्यादा कमाई की, KGF 1 हिंदी के 44 करोड़ से ज्यादा। जनता को वराह रूपम गीत ने मंत्रमुग्ध किया, जो पंजूरली देवता को भगवान विष्णु का अवतार बताता है। यहां तक कि भूताकोला पर हुए विवाद भी लोगों का जोश नहीं हिला सका। यह आदिवासी रिवाज है, हिन्दुओं का नहीं। भूताकोला बस पूर्वजों की पूजा है। एक प्रथा जो दुनिया भर में आम है, लेकिन खासकर कर्नाटक तटीय इलाके में बेहद लोकप्रिय। जहाँ अनुमान है कि हजार स्थानीय देवता सदियों से पूजे जाते हैं। चौंकाने वाली बात है कि इनमें से 20 से ज्यादा मुस्लिम कस्बों के देवता है, जिनमें बबर्या और अली भूता जाने माने हैं। हालांकि फिल्म का सबसे ज़रूरी मुद्दा ज़मीन और जंगल की रक्षा है, जो गाँव वाले और पुलिस को एक साथ लाते हैं, मतलबी ज़मींदार से लड़ने के लिए। पंजाब में किसानों का विरोध, मल्टीनेशनल कंपनियों से अपनी खेती बचाने के लिए, छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य, माइनिंग के लिए कट रहे पेड़ बचाने का आंदोलन और ओडिशा के डोंगड़िया कोंध समुदाय, जो वेदांता की बॉक्साइट माइन से नियामगिरि पहाड़ियों की रक्षा का आंदोलन था, ऐसी बहुत सारी कहानियाँ देश में भरी है। जबकि फिल्म 1990 के दशक में दिखाई गई, 2006 का जंगल अधिकार कानून अब आदिवासियों को वहां रहने का, उपज इकट्ठा, शिकार और खेती करने जैसे अधिकार देता है। हालांकि कुछ बुराइयाँ जो फिल्म में दिखाई गई, जैसे अनपढ़ लोगों को शराब और कर्ज देकर जमीन हथियाने के लिए फंसाना आज भी देश में कई जगह होते हैं। भेदभाव जो दिखाया गया वो भी आज तक कायम है, जैसे दिल दहला देने वाला वह सीन, जब ज़मींदार शिवा को छूने के बाद हाथ धोता है। जहां गाँव वालों को ज़मींदार की हवेली में घुसने तक की इजाजत नहीं थी, और अगर कोई ऐसा करने की हिम्मत किया, तो गुंडे नौकर उसकी धुलाई करते। पर शिवा को जब ज़मींदार की असलियत पता चलती है, तब वो उसकी घर की लक्ष्मण रेखा लांघने का साहस दिखाता है। कलयुग है साहब, अब अंदर आ सकते हैं हम। यह है फिल्म का सबसे दमदार सीन, जब वो उसके साथ खाने के टेबल पर बैठकर खाना खाता है। शुद्ध हो गया हूं, टाइम हमारा है अब। कमज़ोर की लड़ाई और जीत की कहानी किसी भाषा की मोहताज नहीं। इसीलिए इसने हर क्षेत्र और समुदाय के लोगों का दिल छुआ। ऐसी फिल्मों के ज़रिए 2022 में कन्नड़ सिनेमा ने जोरदार वापसी की। KGF 2 ने हजार करोड़ से ज्यादा का छप्पड़ फाड़ा। विक्रांत रोना, किच्चा संदीप की एक्शन थ्रिलर ने भी धमाल मचाया। फिल्म डोलू डोलू कुनेता के पारंपरिक कला को दर्शाया। गंधारा गुड्डी, कर्नाटक की कीमती कुदरती विरासत को 777 चार्ली, एक आदमी और उसके पालतू कुत्ते के बीच रिश्ते की दिल छू लेने वाली अनोखी कहानी और गुरु शिष्यारू कम जाने जाते खेल खोखो पर ड्रामा। 2023 में बाहुबली के हीरो प्रभास की सालार कन्नड़ और तेलुगु दोनों में ज़ोर-शोर से रिलीज होगी, जिसे हर चार स्क्रीनों में से कम से कम तीन में दिखाने का लक्ष्य रखा गया है। KGF और कंतारा के प्रोडक्शन हाउस होनबोले फिल्म्स द्वारा, जो सभी दक्षिण भारतीय भाषाओं में अपना दबदबा बढ़ाएंगे, अगले 5 सालों में 3 हजार करोड़ का निवेश करके। ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या सालार शाहरुख खान की पठान को हरा पाएगी, जिसकी दुनिया भर में हुई कमाई पहले महीने में ही 1 हजार करोड़ के आंकड़े पार कर गई। कन्नड़ सिनेमा का सुनहरा युग तीन दशकों बाद लौटा है, जब डॉक्टर राजकुमार, रविचंद्रन और शंकर नाग जैसे एक्टर 1980 दशक के अंत और 90 की शुरुआत में बढ़िया अदायगी की। तीन शेट्टी मस्त कलंदर, एक नया RRR, ऋषभ राज और रक्षित का बड़ा हाथ है पिछले कुछ सालों में कन्नड़ सिनेमा का चेहरा बदलने का। भाइयों जैसे पर अलग मां से। ऋषभ अपने गांव केराड़ी में पले-बढ़े और एक्टर बनने से पहले असिस्टेंट डायरेक्टर का काम किया। रक्षित पहले बेंगलुरु में आईटी इंजीनियर का काम करते थे। और राज, जो पहले सोशल वर्क की पढ़ाई करी, और फिर खुद की स्क्रिप्ट लिखनी शुरू की। 2012 की फिल्म तुगलक में जहाँ ऋषभ और रक्षित एक साथ एक्टिंग की, वो तो फ्लॉप हुई, पर इससे उनकी दोस्ती मजबूत हुई। दोनों ने कुछ सालों में नई ऊंचाई छुई इन फिल्मों के साथ। 2014 में उलीदावरु कंडानते में मंगलूरू का कल्चर दिखाया, जिसे अक्सर कन्नड़ सिनेमा में नज़रअंदाज़ किया जाता है। 2016 की किरिक पार्टी ने 250 दिनों तक 15 से ज्यादा थिएटरों में लगातार प्रदर्शन करके सफलता हासिल की और 2022 में 777 चार्ली, हट के कहानी होने के बावजूद 100 करोड़ क्लब में घुसी। ऋषभ 2018 में सरकारी हरिया प्राथमिक शाले के लिए बेस्ट चाइल्ड फिल्म का नेशनल अवार्ड जीता। तीनों 2021 में क्राइम ड्रामा गरुड़ा गमन ऋषभ वाहन के लिए एक साथ आए, जिसे Z5 पर रिलीज होने के 3 दिनों के अंदर ही 8 करोड़ मिनट तक देखा गया। और राज ने ऋषभ को कंतारा के क्लाइमेक्स, भूताकोला सीन्स को कोरियोग्राफ करने में भी मदद की। जबकि कंतारा, 1990 के दशक में धर्म, जमीन और सामाजिक असमानता की मिक्सचर स्टोरी थी। कंतारा 2 गाँव वालों, देवता और परेशान राजा के बीच टेंशन की 100 साल से ज्यादा पुरानी कहानी पर प्रीक्वल होगी, क्या इसमें भी उतना ही मजा आएगा? आपको क्या लगता है? बिस्बो की शायरी। पूर्वजों की पूजा हर इंसान का धर्म। कंतारा फिल्म ने किया यह मामला गरम। कैसी बचपन की एक याद, बनी कन्नड़ सिनेमा की पूर्व जन्म की बुनियाद। हमारे वीडियो कंटेंट की सोर्सेस आपको डिस्क्रिप्शन में मिलेंगे।



