[0:55]पिछले तीन दिनों से आप म्लेक्षराज श्रृंखला के चलचित्रों को देख रहे हैं और मुझे आप सबों की प्रतिक्रिया के बाद यह अनुभव हो रहा है कि किन लोगों के पास हम यह सब बता रहे हैं। आधे से अधिक लोग डरपोक हैं। कह रहे हैं रात को नींद नहीं आ रही। कह रहे हैं इंटरनेट नहीं चल रहा। यह सब होंगे होते रहेंगे। जिस प्रकार की मानसिकता जिस व्यक्ति की होती है, उसी प्रकार का अनुभव उसकी चित्तवृत्ति को प्रभावित करता है। जिस प्रकार की भावना जिस प्रकार की तपश्चर्या जिस प्रकार का सदाझरण आपके जीवन में होगा उसी प्रकार के अनुभव भी आपको प्राप्त होंगे। लेकिन एक बात है कि चलचित्रों को देखने वाले 80% लोगों ने नकारात्मकता का प्रत्यक्ष अनुभव किया है। एक कोई सज्जन कह रहे थे कि मैं बड़े हॉरर पॉडकास्ट इत्यादि देखता हूं, बड़े मैं वो हॉरर मूवीज देखता हूं। जिसमें बड़े खतरनाक बैकग्राउंड म्यूजिक और यह एडिटिंग वगैरह होती है, लेकिन वैसी नकारात्मकता का अनुभव नहीं हुआ उनमें जैसी नकारात्मकता का अनुभव हमको इस श्रृंखला में हो रहा है। कुछ लोग यह कह रहे हैं कि तुम कहां वेद पुराण शास्त्रों को छोड़कर ये बाइबल इत्यादि के चक्कर में पड़े हो। देखो भाई, मैं बाइबल की जेनेसिस को प्रमाणित करने के लिए चलचित्र नहीं बना रहा हूं। दूसरी बात यह है, मैंने बाइबल के जॉन का संदर्भ केवल ईसा को कोट करने के लिए दिया था। अब ईसा की कोई बात है, पैगंबर की कोई बात है तो उसके लिए बाइबल और कुरान को कोट करना पड़ेगा ना, रेफरेंस देना पड़ेगा ना वहां से कि उसने क्या कहा था? और कुछ लोग तो इतने होशियार हैं कि कह दिया कि ईसा नाम का कोई व्यक्ति नहीं हुआ था। यह भी एक अतिवादिता है इतिहासकारों की जिसमें सीधे-सीधे कह देते हैं कि ईसा नाम का कोई व्यक्ति ही नहीं हुआ था। यह तो कॉन्टेस्ट ईसा के मरने के 300 साल के बाद एक फर्जी काल्पनिक चरित्र गढ़ दिया। देखो, ईसा के नाम पर बहुत कुछ काल्पनिक चल रहा है, लेकिन ईसा नाम का एक वास्तविक व्यक्तित्व भी म्लेच्छों के यहां विद्यमान था, यह एक ऐतिहासिक सत्य है जिसको झुठलाया नहीं जा सकता है। बुक ऑफ इनोक में और बुक ऑफ सोरा में जिसके अंतर्गत 24 प्रकार की पुस्तकें भी सम्मिलित हो जाती हैं। यही सब पश्चिमा मानियाक के अंतर्गत आने वाले बहुत से भूत प्रेत वेताल इत्यादि की सिद्धि का और उनके स्वरूप का उनकी उपासना पद्धति का वर्णन मिलता है। अब अगर हमको उनके बारे में बताना होगा तो हम कहां से वेद पुराण शास्त्रों से बताएंगे? यही कामाख्या क्षेत्र में कितने सावर मंत्र सिद्ध किए जाते हैं? लोना चमारी इत्यादि के विषय में आप जानते ही होंगे। नाम सुने ही होंगे कभी इन शक्तियों का, तो हम कहां से अब किस पुराण और किस स्मृति में इनका नाम दिखाएं आपको? तो इसीलिए ये समझना चाहिए कि जिस प्रकार के शब्द का हम प्रयोग कर रहे हैं, जिस प्रकार के तत्व का हम वर्णन कर रहे हैं, उस प्रकार के तत्वों का जिस सभ्यता में जिस भाषा में जिस प्रकार के लोगों के बीच में व्यवहार होता आया है वहीं से उसका संदर्भ और वहीं से उसका प्रमाण दिया जाता है। तुमको क्या लगता है? बिना पैशाचिक शक्ति के ही पांच-पांच अरब म्लेच्छ पूरे विश्व में घूम रहे हैं? छह अरब म्लेच्छ घूम रहे हैं और तुम्हारे अंतःचेतना पर इतना प्रभाव डाल चुके हैं कि फोर-पॉइंट शर्ट पहन के खड़े-खड़े मूत रहे हो और स्त्रियां जो है शादी से पहले गर्भपात कराएं घूम रही हैं। बिना पैशाचिक शक्ति के तुमको लग रहा है। अब इससे ज्यादा क्या प्रमाण दे दे तुमको? कि गली-गली में रील बना कर लड़कियां जो है सो नाच रही हैं और व्यभिचार फैला रही हैं। इतनी अमद की मानसिकता तक प्रभाव पड़ जा रहा है। क्यों पड़ रहा है बिना किसी पैशाचिक शक्ति के? तो जिस पैशाचिक शक्ति के माध्यम से ऐसा हो रहा है, उसका जहां-जहां संदर्भ जिस प्रकार से प्राप्त होगा चाहे अधीत परंपरा से चाहे अनुभूत परंपरा से हम उसका वर्णन करेंगे। अगर तुमको इसमें प्रमाण नहीं मानना है तो अपने कंबल तानो और सो जाओ। तुम्हारे लिए हम थोड़े बना रहे हैं यह सब बातें। कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि तुम यह क्या हॉलीवुड की कहानी लेकर बैठ गए हो? देखो भाई हॉलीवुड की कहानी से प्रेरित होकर मैं म्लेक्षराज श्रृंखला को नहीं बना रहा हूं। म्लेक्षराज से प्रभावित होकर हॉलीवुड की फिल्में बनती हैं। दोनों बातों को समझो और कुछ लोग यह भी कह रहे थे कि पैराग मम नाम का एक वास्तविक शहर तो ग्रीस में है। और हमने बताया कि पैराग मम कोई वास्तविक स्थान अलग से नहीं है, तो फिर दोनों बातों की संगति कैसे भीड़ेगी? बात ऐसी है कि देवराज इंद्र की नगरी का नाम अमरावती है। देवराज इंद्र के नगरी के नाम से मिलता-जुलता एक नगर भारत के तेलंगाना में भी है। तो अमरावती शब्द आ जाने मात्र से हम यह नहीं कह सकते कि देवराज इंद्र तेलंगाना में रह रहे हैं। तो पैराग मैम नाम का एक वास्तविक शहर भी है ग्रीस में, लेकिन यह वह पैराग मैम नहीं है जहां कि मैं बात कह रहा हूं। इसकी एक उपाधि है जो म्लेक्षराज है उसके तख्त की उसके सिंहासन की उपाधि है उसके हेडक्वार्टर की उपाधि है पैरागमैम। अब कुछ लोग यह कह रहे हैं कि प्रमाण दो, अपनी बात का प्रमाण दो तो क्या करें हम म्लेक्षराज की गर्दन पकड़ के लाएं और सेल्फी खींच कर डाल दें रे तुम लोग के चक्कर में हम? तब प्रमाण जानोगे यहां जो रिपोर्टर अभी एनडीटीवी का मरा कोई चंद्राकर करके था जिसको मार दिया गया एक पंचायत स्तर के घोटाले को उजागर करने के कारण उसको मृत्यु का सामना करना पड़ा। वहां तो सबूत मिटाए और छिपाए जा रहे हैं तुमको चाहिए कि नहीं निग्रहाचार्य जब यूट्यूब पर वीडियो डालें तो म्लेक्षराज का फोटो और उसके साथ सेल्फी खींच कर डाल दें तब लोगों को पता चलेगा कि यहां सही बात है। कैसी नालायकी बुद्धि है और सुनो यह कोई हम पैसा कमाने के लिए और सेंसेशन क्रिएट करने के लिए नहीं बना रहे हैं। कोई भी अगर तुम मुझे कंटेंट क्रिएटर ही मानकर चलते हो उसी रूप में देखना चाहते हो, तो कोई भी कंटेंट क्रिएटर अपने वीडियो को डालने के बाद तुरंत यह नहीं कहता है कि इसको पहले डाउनलोड करके रीअपलोड करो। कोई नहीं कहता है, जबकि आप दूसरे की कंटेंट को अगर रीअपलोड करेंगे तो कॉपीराइट भी लगाते हैं लोग, चैनल उड़ाते हैं। तो तुमको अभी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं यह काम क्यों कर रहा हूं। मैंने जितने संदर्भ दिए लोग कह रहे हैं कि बाइबल से क्यों बता रहे हो, कुरान से क्यों बता रहे हो, यह हुदियों से क्यों बता रहे हो तो फारसियों से क्यों बता रहे हो? देखो, यह एक बात एक बहुत ही कटु सत्य है कि भारत में पिछले हजार वर्षों से इन्हीं पुस्तकों के अनुयायियों ने शासन बहुत प्रभावी रूप से किया है और हमारी संस्कृति को अपूर्णीय क्षति पहुंचाई है। तुम उनकी सत्ता और उनकी शक्ति की अपेक्षा आंख मूंद कर नहीं रख सकते हो, कि हम आंख बंद कर दिए तो यह सब सब समस्याएं टल जाएंगी। बिना किसी विशेष शक्ति के सहयोग के, बिना किसी बड़ी ताकत के सहयोग के, क्या लगता है तुमको कि हजार-हजार साल यह लोग शासन कर जाएंगे? इतने गहराई से न्यायपालिका में, अर्थव्यवस्था में, व्यापार में, संस्कृति में, शिक्षा में घुसपैठ कर लेंगे। वह शक्ति जो इन सब को नियंत्रित कर रही है, वह म्लेक्षों की शक्ति जहां-जहां वर्णित होगी जिस-जिस रूप में वर्णित होगी वहां-वहां से ही उसका संदर्भ दिया जाएगा ना भाई? अब रही बात कि बहुत से सभ्यताओं ने इसको बहुत से नामों से पुकारा। यह बात सत्य है मैंने इसके कई नाम बताएं। कुछ लोग कहते हैं कि शैतान शब्द का तुम प्रयोग करते हो, यह तो इस्लामी शब्द है और तुम सनातन धर्म के ग्रंथों में शैतान शब्द जब नहीं मिलता तो कैसे शैतान शब्द का प्रयोग कर रहे हो? अरे बहरों शैतान शब्द का प्रयोग हमने प्रचलित भाषा में किया है। लेकिन उसी वक्तव्य में हमने कई बार तो आसुरी संपदा शब्द का भी प्रयोग किया है वह क्यों नहीं देखते हो? लोग समझ जाएं। अब फिर लोग पूछेंगे महाराज जी आसुरी संपदा क्या होती है? तो अलग-अलग स्तर के व्यक्ति अलग-अलग प्रश्न करेंगे। अगर हम कह दें शैतान तो दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं आएंगी। एक व्यक्ति समझ जाएगा मैं क्या कहना चाह रहा हूं। दूसरा व्यक्ति कहेगा कि शैतान शब्द तो संस्कृत का नहीं है। तुम कैसे बोल रहे हो? अब अगर मैं कह दूं आसुरी संपदा तो भी दो प्रकार के लोग आ जाएंगे। एक जो इसका अर्थ समझ लेंगे वो और दूसरे वो व्यक्ति जो कहेंगे महाराज जी आसुरी संपदा का क्या अर्थ होता है? तो इसीलिए एक-एक व्यक्ति की निजी मानसिक स्थिति और स्तर के आधार पर हम वक्तव्य नहीं दे रहे हैं। हमको जो कहना है वह हम कहेंगे और जो कह रहे हैं बिल्कुल अनुभव अध्ययन के साथ कह रहे हैं। यह नहीं कि कोई काल्पनिक फेंटेसी और कोई ये पॉडकास्ट देखकर और किसी वेब सीरीज की नकल करके कह रहे हैं ऐसा नहीं है। अभी हमारे कक्ष में अगर हम वीडियो दिखा दें तो सैकड़ों ग्रंथ पड़े हुए हैं। सैकड़ों पुस्तकें सैकड़ों देशी-विदेशी लेखकों की सारी बातें पड़ी हुई हैं। कहां पर क्या है और उनमें से बहुत कुछ बातें तो काल्पनिक हैं बिल्कुल हैं, लेकिन बहुत कुछ बातें सत्य भी हैं। जैसे कि बहुत से लोग कड़ी स्वयं जोड़ रहे हैं। एक मैं उदाहरण दूं। कुछ लोग हस्तर का नाम सुनकर कह रहे थे एक व्यक्ति ने कमेंट किया था कि हस्तर की जो कहानी है वह किसी मराठी लेखक नारायण नाम के मराठी लेखक से ली गई है। और उस मराठी लेखक ने भी किसी अंग्रेजी लेखक के उपन्यास से उसको ग्रहण किया था उस भावना को। तो कुल मिला के ये कड़ियां वापस म्लेक्षराज तक ही जाकर जुटती हैं। अब कुछ लोग बता रहे थे कि मैंने जो कहा था जॉन का रेफरेंस देते हुए कि जीसस पर म्लेक्षराज प्रभाव डालने आया था। उस समय तात्कालिक रूप से नहीं डाल पाया था उतना प्रभावी रूप से, तो इसका कारण यह है कि इस्लाम के प्रवर्तक के जीवन में जितना खून खराबा और बलात्कार और इस प्रकार के आतंक की बाहुल्यता देखने को मिली है। उतने आतंक की बाहुल्यता ईसा के निजी जीवन में नहीं थी। इसीलिए ईसा जो है वह म्लेच्छ होने के बाद भी पैगंबर की तुलना में सौम्यतर म्लेच्छ था। इसीलिए उसकी मानसिकता का भेदन करने में म्लेक्षराज उतने प्रभावी रूप से तात्कालिक दृष्टि से सफल नहीं हुआ। जितने कि उससे अपेक्षा थी इसीलिए तो 300 साल अपनी शक्ति को जगाता रहा। और यह चिंतनीय यह भी है कि एक और कोई हमको बता रहे थे कि इन्होंने लिखा है कि आपने जो जीसस पर प्रभाव डालने की बात कही उसका वर्णन एक चलचित्र नेफेरियस में भी मिलता है।
[10:09]देखो मैंने नेफेरियस देखी नहीं है और उम्मीद कम है कि मैं देखूंगा। वह चलचित्र एक वार्तालाप है एक ऐसे व्यक्ति जिसको एक डीमन ने अपने उसके शरीर को अपना घर बनाया हुआ है। और एक मनोवैज्ञानिक है तो वह डीमन बताता है कि उसके मालिक ने डीमन बताता है कि उसके मालिक ने जीसस को एक ऑफर दिया था। अपने प्रभाव में लाने का प्रयास किया था पर जीसस ने मना कर दिया था। देखो मैंने यह फिल्म नहीं देखी है इसलिए मुझे नहीं पता इसमें क्या कहानी है लेकिन बहुत सी बातें दर्शक पाठक हमारे जो हैं। वो स्वयं भी गूगल पर सर्च करके जान सकते हैं कि मेरे द्वारा कहे गए शब्दों का क्या संकेत है, बताए गए स्थानों का दिखाए गए चित्रों का उन विजुअल्स का क्या संकेत है तो आप लोग स्वयं भी अपने जीवन में थोड़ा शोध कर सकते हैं। सामने-सामने परोस कर खिलाएंगे नहीं और सुनो, ये चलचित्र हम बहुत से लोगों को जगाने के लिए नहीं बना रहे हैं। क्योंकि तुम लोग जागोगे भी नहीं। जगाया उसको जाता है जो सोया हुआ हो, मुर्दों को नहीं जगाया जाता। मुर्दों को दफनाया जाता है और मुर्दे के ऊपर जैसे एक मन मिट्टी वैसे सबा मन मिट्टी। उसको ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। इसीलिए तुम्हारे लिए नहीं, केवल उन अनुयायियों के लिए, उन सहृदय लोगों के लिए हम यह चलचित्र बना रहे हैं जो कुछ वास्तव में जानना चाहते हैं, सतर्क होना चाहते हैं उनके लिए। अब म्लेक्षराज ने बहुत सी सभ्यताओं से लड़ाई की है। बहुत सी सभ्यताओं से इसने युद्ध किया है। इसकी युद्ध नीति पर भी हम बाद में आएंगे लेकिन अभी तुम्हारी मानसिक स्थिति उन विषयों को समझने लायक नहीं है। इसीलिए पहले आज हम सनातनी धर्म ग्रंथों से ही संदर्भ देकर तुमको समझाने का प्रयास करेंगे। ताकि तुमको पता चले कि मैं कितनी गंभीरता से क्या कहना चाहता हूं। एक व्यक्ति तो यह भी कह रहा था कि यह तो श्रीमद् भागवत कथा कहते थे अब म्लेक्षराज कथा कैसे कहने लगे? अरे भैया, सनातन धर्म के ग्रंथों में कलयुग का वर्णन नहीं है क्या? कलयुग के शासकों का वर्णन नहीं है क्या? कलयुग के माध्यम से हमारे जीवन में जो दुष्प्रभाव पड़ता है इसका वर्णन नहीं है क्या? तो क्या उससे हम कलयुग का महिमा मंडन कर रहे हैं? अधर्म को प्रोत्साहित कर रहे हैं कि उससे बचाने के लिए तुमको सतर्क कर रहे हैं? उसके विषय में जो षड्यंत्र है उसको पर्दाफाश करके उसका उद्भेदन करके तुमको बचाने का प्रयास कर रहे हैं। तुम म्लेक्षराज अलग-अलग सभ्यताओं से टकराया और अलग-अलग सभ्यताओं को जब उसने अपने वश में करना प्रारंभ किया। वहां अलग-अलग भाषाओं को बोलने वाले लोग रहते थे। उसने उसके लिए अलग-अलग शब्दों का प्रयोग किया। तो कहीं फारसी सभ्यता ने कुछ कहा, कहीं यहूदियों ने कुछ कहा, कहीं मुसलमानों ने कुछ कहा, कहीं ईसाइयों ने कुछ कहा, कहीं बौद्धों ने कुछ कहा। तो अलग-अलग सभ्यता के भाषाई लोगों ने अलग-अलग नामों से उसको पुकारा है। और एक बात जान लो म्लेक्षराज एक पद है। म्लेक्षराज कोई वैयक्तिक संज्ञा नहीं है। वह तो हमने आपको कह दिया म्लेक्षराज, लेकिन म्लेक्षराज एक वैयक्तिक संज्ञा नहीं है, म्लेक्षराज एक पद है। और अभी जो म्लेक्षराज है उसका नाम हम बता चुके हैं आपको आर्द्र म्लेच्छ और इसके शरीर में एक शक्ति रहती है जिसको कहते हैं अनाम म्लेच्छ। अब अनाम म्लेच्छ और आर्द्र म्लेच्छ के विषय में यदि आपको थोड़ा सा भी संज्ञान हो तो एक बार गूगल भी सर्च कर सकते हैं। क्योंकि मुझे इसका बोध नहीं था पहले लेकिन बहुत से हमारे दर्शकों पाठकों ने भी यह बताया। तो कि इसके विषय में और भी कुछ संदर्भ मिलते हैं। मैंने तो जो बताया वह अपने अध्ययन और साधना से बताया लेकिन बहुत से लोगों ने इसके विषय में कुछ बातें और भी अनुभव की हैं।
[13:49]ए एन एम एम एल ई सी एच या इसी प्रकार की कोई स्पेलिंग आप टाइप करेंगे अनाम ए एन एम और म्लेच्छ। इसमें म्लेच्छ जो है वह हमारा वाला म्लेच्छ नहीं है मेलेज मेलेज शब्द जैसा है एम ई एल ई सी एच इस प्रकार से तो ए एन एम एम ई एल ई सी एच इस प्रकार से अनाम म्लेच्छ का आजकल लोग कुछ सांकेतिक वर्णन कर रहे हैं। तो आर्द्र म्लेच्छ और अनाम म्लेच्छ जो हैं वह एक ही शरीर में रहने वाली दो एंटिटीज हैं। इनमें अन्योन्याश्रय संबंध है। जैसे आज व्याकरण पर कुछ चिंतन बन रहा था हम लोगों का तो आदंत न सहता और हतम पर कुछ चिंतन हुआ। तो आदंत ने सहता में सिद्ध करने के लिए हतम चाहिए और हतम को सिद्ध करने हेतु हल प्रत्याहार की सिद्धि आदंत ने सहता से करनी पड़ेगी। तो वैसे ही अन्योन्याश्रय संबंध है आर्द्र म्लेच्छ और अनाम म्लेच्छ के मध्य। अनाम म्लेच्छ को आर्द्र म्लेच्छ का शरीर चाहिए अपने क्रियाकलापों को प्रभावी करने के लिए और आर्द्र म्लेच्छ को अनाम म्लेच्छ की शक्तियां चाहिए संसार में अपने प्रभुत्व को स्थापित बनाए रखने के लिए। इसीलिए इन दोनों के मध्य जो है अन्योन्याश्रय संबंध है। एक शरीर है, एक हार्डवेयर है, एक सॉफ्टवेयर है। ऐसे तुम लोग इसको समझ सकते हो। तो जो पिशाच हैं वह मरुस्थल निवासी होते हैं। वहां पर कहते हैं मनुस्मृति की टीका में पिशाचतेभ्य उपकृष्टा अशुचि मरूदेस निवासिनः आज हमने पूरा अध्ययन करके बहुत से प्रमाणों को यहां पर एकत्र करके रखा है जिसको हम आप सबों के समक्ष व्यक्त करेंगे। तो यहां पर कहते हैं कि पिशाचतेभ्य उपकृष्टा अशुचि मरूदेस निवासिनः पिशाच कौन है? देवताओं से, राक्षसों से, गुहकों से कुछ नीचे श्रेणी के हैं और मरूदेस में निवास करते हैं। ऐसे प्रजाति विशेष पिशाच कहलाते हैं और यह सब जो अब्राहमिक मत है वह भी पैशाच धर्म के ही अंतर्गत आते हैं। पैशाच मत के ही अंतर्गत आते हैं यहां धर्म का अर्थ सदाचरण नहीं है, धर्म का अर्थ है धारणीय लक्षण उनको हमने यहां पर धर्म शब्द से कहा है क्योंकि धर्म एक व्यापक शब्द है। अब कुछ लोग यहां पर अलग-अलग बातें कहने लगे हैं ज्ञान देने आ जाते हैं। देखो ज्ञान देने मताओ हमारे वीडियो में ज्ञान लेना है तो आओ नहीं तो निकलते बनो। क्योंकि जिस विषय पर तुम हमको सलाह और उपदेश देने आए हो ना तुम्हारी अपेक्षा अधिक गंभीर चिंतन हम कर चुके हैं और अधिक निकटता से उस तत्व को जान चुके हैं। शुक्राचार्य के विषय में लोग कहते हैं कि यह तो शुक्राचार्य के चेले हैं। शुक्राचार्य ही म्लेक्षराज है। आता जाता तुमको कुछ नहीं है। आरोप पहले अपने ही देवताओं पर लगा दो कि शुक्राचार्य म्लेक्षराज है। देखो भगवान शुक्राचार्य भृगुवंशी महर्षि हैं बहुत श्रेष्ठ आचरणवान है, नीतिज्ञ हैं, मंत्र विशारद हैं। और राक्षसों के गुरु भले हैं, लेकिन शुक्राचार्य जी ने कभी भी राक्षसों को यह नहीं कहा कि तुम यज्ञ का विध्वंस करो। तुम गौओं को जाकर मारो। तुम वर्णाश्रम का विरोध कर दो। यह नहीं कहा। शुक्राचार्य जी का काम बस इतना है कि जब देवता राक्षसों पर आक्रमण करें तो मंत्र शक्ति से राक्षसों की रक्षा करें। जब देवताओं का पक्ष कमजोर पड़े तो राक्षसों को नीति सिखा कर योजना बता कर देवताओं पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रेरित करें। अथवा किसी मंत्र की दीक्षा इत्यादि देकर विशेष शक्ति साधना यज्ञ इत्यादि के माध्यम से उनको उत्कृष्ट बना दे। इतना ही उनका काम है, लेकिन शुक्राचार्य जी ने कभी भी राक्षसों की उन्नति के लिए उनको यह नहीं कहा कि तुम वर्णाश्रम का विरोध करो। तुम गौओं को मारो। तुम स्त्रियों से बलात्कार करो। ये ऐसा शुक्राचार्य जी ने नहीं कहा है। अपितु राजा बलि के प्रकरण में आप देखें तो शुक्राचार्य जी ने तो स्वयं राजा बलि के माध्यम से कितने दिव्य यज्ञों को करवाया है। दान धर्म इत्यादि करवाया है और शास्त्रों में तो यह भी वर्णन आता है कि एक ही गुरुत्व दैत्यों के लिए और देवताओं के लिए दो अलग-अलग स्वरूप धारण करके प्रवृत्तित होता है। वह गुरु तत्व अंगिरा के माध्यम से बृहस्पति के रूप में प्रकट होता है, दिव्य संपदा के पोषण के लिए और वही गुरुत्व भृगु के माध्यम से उषना अर्थात शुक्राचार्य के रूप में प्रकट होता है दैत्यों के उत्कृष्ट के लिए। यह बात है शुक्राचार्य जी की जो आंख फूट गई थी, राजा बलि जब वामन भगवान को तीन पग भूमि का दान कर रहे थे, तो शुक्राचार्य जी के नेत्र जो वहां पर विदीर्ण हुए हैं। वह एक आंख का आश्रय लेकर लोग इलुमिनाती को घुसा रहा है। ऐसी बात नहीं है। शुक्राचार्य जी की वह नेत्र भगवान की कृपा से फिर ठीक भी हो गए थे, ऐसा नृसिंह पुराण में वर्णन है। तो शुक्राचार्य जी को म्लेक्षराज मत बताओ। तुम कुछ जानते नहीं हो इस विषय में। आप शुक्र नीति पढ़ेंगे, शुक्र नीति सार पढ़ेंगे, तो वहीं से आपको हम बता देते हैं शुक्राचार्य जी का क्या मत है म्लेक्षों के विषय में? स्वधर्म आचरणा निर्घृण पर पीडका चंडास च हिंसा का नित्यम लक्षस च अविवेक न जो अपने आचरण को अपने धर्म अपने स्वधर्म मतलब अपने जातिगत, कुलगत, वर्णगत धर्म का परित्याग करके निर्दयता पूर्वक दूसरे व्यक्ति को पीड़ा देते हैं। जो अत्यंत प्रचंड स्वभाव वाले हैं, हिंसक हैं और जो सदैव दूसरे को कष्ट देते रहते हैं ऐसे अविवेकी व्यक्ति को म्लेच्छ कहते हैं। अर्थात शुक्राचार्य जी की दृष्टि में म्लेच्छ कोई बहुत सम्माननीय और श्रेष्ठ तत्व नहीं है। अविवेकी लोगों को ही शुक्राचार्य जी ने म्लेच्छ माना है। और जैसा कि हमने आपको बताया था कि अनाम म्लेच्छ की ज्योति, म्लेच्छराज की ज्योति अपने हृदय में स्थापित करने के साथ ही उसकी चाकरी शुरू होती है। तो भारत में भी एक संस्था कार्य कर रही है जो शरीर के अंदर एक दिव्य ज्योति की स्थापना करवा रही है। उस संस्था का नाम जानते हैं? प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी कभी सर्च करना। या बहुत से लोगों के वीडियो भी हैं उसके छल से जो बच-बच के भाग के बाहर निकले ना उसके चंगुल से। प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी वाले क्या कर रहे हैं हृदय में ज्योति की स्थापना करवा रहे हैं? किसकी ज्योति है जरा पता करना वो।
[21:14]अब आगे तुम लोग को भी होमवर्क देंगे। सब हम ही बताएंगे तो सबूत मांगने आओगे। और सबूत देने के लिए तुम अच्छा तुम लोग हो कौन जो हम तुमको सबूत देने जाएं? तुम पर हमारा एहसान है कि कृपा करके इतना बता दे रहे हैं ताकि कुछ लोग अगर 1 लाख व्यक्ति भी वीडियो देख रहे हैं उसमें एक व्यक्ति भी अगर सतर्क होता है सुधरता है तो हमारे बल को बढ़ाएगा। बस हमारा यही लोभ है, हमारा यही स्वार्थ है। अब हम दक्ष प्रजापति के विषय पर भी चिंतन कर देते हैं कि बकरे का माथा देखकर लोग दक्ष प्रजापति लुसिफर है, दक्ष प्रजापति में फोमेट है यह सब कहने लग जाते हैं ऐसी बात नहीं है। दक्ष प्रजापति देवराज इंद्र अग्निदेव इत्यादि से भी श्रेष्ठ स्तर के प्रजापति हैं, वो देवता हैं जहां अग्नि का ब्रह्म रूप में वर्णन है वहां के अतिरिक्त हम कह रहे हैं। जो वसु मंडल में अग्नि है आदित्य मंडल में इंद्र है, वहां से आदित्य मंडल वसु मंडल के देवताओं से उत्कृष्ट स्थान दक्ष प्रजापति का है। और दक्ष प्रजापति भगवान महादेव के बड़े सुंदर भक्त रहे हैं एक समय में। वो तो भगवती के रोष के कारण भगवती के निर्माल्य के तिरस्कार के कारण उनको शिवद्रोह वाली मति आ रही इसीलिए भगवान महादेव ने थोड़ा उनको अनुशासित कर दिया। बस इतनी सी बात है और बकरे का माथा उनके माथे में लगा दिया। लेकिन वह बकरे का माथा भी पुनः ठीक हो गया था जब प्रचेता के पुत्रों के रूप में दक्ष प्रजापति ने अपना पुनर्जन्म लिया है और दक्ष प्रजापति स्मृतिकार भी हैं। दक्ष स्मृति है उनकी स्मृतिकार मतलब भारतीय जो मानवीय सभ्यता है म्लेच्छों पर तो हम विवेक का विश्वास नहीं कर सकते, लेकिन जो भारत भूमि की पवित्र भारतीय प्रजा है। जो हमारे सनातन धर्मावलंबी हैं उन लोगों के लिए धर्म का क्या अनुशासन है इसको व्यक्त करते हुए जो स्मृतियों की बात आती है सनातन धर्म में उन स्मृतियों में से एक स्मृति भगवान दक्ष की भी है। इसीलिए दक्ष प्रजापति म्लेक्षराज नहीं है इलुमिनाती नहीं है। यह सब जो दिव्य शक्तियां हैं इनको तुम केवल आजकल के पॉडकास्ट वाले कांस्पीरेसी थ्योरिस्ट के साथ जोड़कर भ्रमित मत हो जाओ।
[23:46]कुछ लोग कह रहे थे कि म्लेच्छराज तो तुम्हारी कल्पना है। सुनो बड़ी गंभीरता से समझा रहा हूं। म्लेच्छराज भी यही चाहता है कि तुम उसे काल्पनिक समझो। क्योंकि जब तक तुम उसे काल्पनिक समझोगे तब तक उसका बल बहुत निर्बाध और निष्कंटक रूप से अभिवृद्धि को प्राप्त होता रहेगा। अब हम युग पुराण की चर्चा कर रहे थे। युग पुराण पर हम बताते हैं। उस समय एक म्लेच्छराज का यहां पर वर्णन मिलता है। जिसका नाम था आमरा और उसकी आंखें बड़ी लाल थी। इसलिए उसको लोहिताक्ष भी कहते थे। तो ततोर्धनु मूलों भविष्यति महाबला आमराटो लोहिताक्षेति पुष्पनाम गमिष्यति सर्वे ते नगरम गत्वा शून्यम आसाद्य पर्वतो और अर्थ लुब्धसते सर्वे भविष्यति महाबला। जितने भी लोग उस समय होंगे वह अर्थ लोलुप होंगे। क्योंकि म्लेच्छराज पैसा बहुत दे देता है तो लोग अर्थ लोलुप हो जाते हैं। ततो स म्लेच्छ आमराटो रक्ताक्षो रक्तवस्त्र भृत लाल रंग का कपड़ा पहने हुए लाल रंग की आंखों वाला वह म्लेच्छराज, म्लेच्छ राजा व नृप म्लेच्छ नृप आमराट जन्मादाय विवसम परमत् सादशति। लोगों को बलपूर्वक अपना गुलाम बनाकर बहुत कष्ट देगा और वह क्या करता है? ततो वर्णांस्तु चतुरः सनृपो नाशयति। चारों वर्णों को वह व्यक्ति नष्ट करने के लिए तत्पर रहेगा। कौन? म्लेच्छ नृप। कौन सा म्लेच्छराज जिसका नाम आमराट है, जो लाल रंग की आंखों वाला है और जो लाल रंग के कपड़े पहनता है। वर्णां व्यवस्थित सर्वान कृत्वा पूर्वा व्यवस्थिता आमराटो लोहिताक्ष विपति सबांधव। लेकिन वह आमराट भी अपने पूरे खानदान के साथ मरेगा और उस समय उसको मारने वाले राजा का नाम होगा गोपाल वर्मा। ततो भविष्यति राजा गोपालो नाम नामतः, लेकिन समस्या क्या होगी कि गोपाल वर्मा जब टकराएगा म्लेच्छराज से तो उस समय का जो आमराट म्लेच्छराज होगा वह तो मर जाएगा। ये गर्ग मुनि भविष्यवाणी कर रहे हैं, लेकिन राजा गोपाल भी उससे जो युद्ध होगा उसमें इतनी नकारात्मकता झेलेंगे कि वो भी बच नहीं पाएंगे। साल भर के अंदर वो भी मर जाएंगे, मतलब टकरा तो गए बहुत जोर से मार भी दिया उसको, लेकिन उसके टकराने से जितनी शक्तियां इसके साथ आकर भिड़ी। वह जो नकारात्मकता इनके अंदर घुसी उसने इनको भी मार दिया।
[26:05]तो गोपालस्तु ततो राज्यं भुक्त समवत्सरम निपह पुष्पक चाभ संयुत ततो निधनमेश्यति और राजा पुष्पक गोपाल जब मर जाएंगे। उसके बाद फिर एक दूसरा राजा होगा। ततो धर्म परो राजा पुष्पक नाम नामतः।
[26:27]जब राजा गोपाल मरेंगे तो गोपाल वर्मा अपने उत्तराधिकारी के रूप में पुष्पक नामक राजा का अभिषेक करके जाएंगी, लेकिन यह नकारात्मकता उनकी पीढ़ी पर भी असर करेगी। राजा पुष्पक भी ज्यादा बच नहीं पाएंगे, वो भी साल भर के अंदर ही मर जाएंगे। मतलब तीसरी पीढ़ी के जो राजा होंगे वह तीन साल के अंदर मर जाएंगे, मतलब कुल मिलाकर म्लेच्छराज को जो मारेगा उसके खानदान पर भी उसकी जो सिद्ध की हुई शक्तियां वह भी बहुत बुरा असर डालती हैं। तो यह बहुत बड़ा बलिदान होता है म्लेच्छराज से भिड़ना। यहां तक कि म्लेच्छराज को सीधे-सीधे कलयुग का बल प्राप्त होता है।
[27:24]इसलिए भगवान कृष्ण ने भी जब कालवन से युद्ध किया है ऐसे सीधे तो युद्ध नहीं किया है तो भगवान भी कहते हैं कि म्लेच्छराज भयत्रस्तो ततो द्वारवती पुन। आपको यह देवी भागवत के चौथे स्कंद के 25वें अध्याय में वर्णन मिलेगा। जहां भगवान कृष्ण भगवान महादेव जी से संवाद कर रहे हैं वहां पर कहते हैं कि म्लेक्षराज के भय से हम भी द्वारका भाग गए थे। ऐसे भगवान की ये विनम्रता है शिव जी के सामने ऐसे भगवान के सामने म्लेक्षराज क्या करेगा जी? भगवान तो अखिल कोटि ब्रह्मांड नियामक हैं। अनंत कोटि ब्रह्मांड नियामक हैं। म्लेच्छराज जैसे छोटी-मोटी शक्तियां भगवान के सामने कुछ नहीं है, लेकिन फिर भी उसका प्रभाव कितना है, यह दिखाने के लिए भगवान यह लीला करते हैं कि देखो कालयवन का जब आक्रमण हुआ। जरासण से 17 बार लड़ गए, लेकिन म्लेच्छराज कालयवन जब आया था तो भगवान भी द्वारका चले गए। लोगों को उसकी नकारात्मकता से प्रभावित नहीं होने दिए क्योंकि म्लेच्छराज बाहर से कम लड़ता है, मानसिकता से ज्यादा लड़ता है।
[28:42]वह आंतरिक चेतना को वशीभूत कर लेता है। दुर्योधन को कैसे वशीभूत कर लिया? सोचो कि अपने बाप-दादा के सामने अपनी सगी भाभी को मतलब घर की कुलवधू को जो नंगे करने के लिए तैयार हो जाए उसकी मानसिकता पर कितना गलत असर होगा आसुरी संपदा का? कितना बड़ा नियंत्रण होगा सोच लो, तो इसीलिए भगवान ने कालयवन के सामने अपनी प्रजा को आने ही नहीं दिया उसको उधर ही उधर निपटा दिया।
[29:17]और म्लेच्छराज भयत्रस्तो ततो द्वारवती पुन: भगवान ऐसा कहते हैं, ऐसे भगवान भय त्रस्त क्या होंगे? वो तो भगवान परब्रह्म हैं। वह तो सबको बनाने-मिटाने वाली इच्छा मात्र से विलास करने वाले परमात्मा है, लेकिन एक लोक मर्यादा को दिखाने के लिए भगवान ने ऐसा वचन कहा है। तो गोपाल राजा गोपाल वर्मा के माध्यम से आमराट लोहिताक्ष लाल आंखों वाले आमराट म्लेच्छराज का विनाश किया जाएगा। वह गोपाल मर जाएंगे उनके बाद पुष्पक आएगा। वह भी एक साल में मर जाएगा। फिर अनरणी आएंगे वह भी एक साल में मर जाएंगे। इसके बाद ब्राह्मण जो है वह राजा की गद्दी को अपने अधीन ले लेंगे। बोले कि ये राजा तो क्षत्रिय तो सह नहीं पा रहे। इसके तेज को ब्राह्मण अपने तपबल से कुछ शासन करें तो विकुयशा नाम का एक ब्राह्मण जो है वह बड़ा प्रसिद्ध था। तो ततो विकुयशा कचित ब्राह्मणो लोक विश्रुत तस्यापित्रिणी वर्षाणे राज्यं हृष्टम भविष्यति। वह तीन वर्ष तक राज्य करेंगे वह ब्राह्मण विकुयशा नाम के ब्राह्मण और उनके राज्य में फिर जाकर यह नकारात्मकता समाप्त होगी। तब पूरी प्रजा को फिर से हर्ष होगा। यह वृद्ध गर्ग मुनि ने जो ज्योतिष के बड़े आचार्य गर्गाचार्य जी जो कालयवन के भी पिता रह चुके हैं। और जो मुचकुंद को कहे थे तुमको भगवान का दर्शन होगा। इनको पता था ना कि म्लेच्छराज के आगे कौन-कौन से क्या होने वाले हैं। तो यह जो मुचकुंद राजा के गुरु तुल्य थे और कालयवन के पिता थे ऐसे गर्ग मुनि ने जो युग पुराण लिखी है उसमें इस घटना का उन्होंने वर्णन किया है।
[31:16]यह सब सनातनी शास्त्रों से हम बता रहे हैं कोई बाइबल और जेनेसिस और हदीस से नहीं बता रहे हैं। इसीलिए जो कहता हूं उसको कई बार श्रद्धा पूर्वक सुनना सीखो केवल निजी द्वेष में कि निग्रहाचार्य का विरोध करना है। इसके चक्कर में जो वास्तविक सत्य है जो वास्तविक संकट है सनातन के ऊपर उसके उपेक्षा मत करो क्योंकि हम नहीं बताएंगे तो अब बताने वाले बचे नहीं है अधिक लोग। अब देखो हम तुमको और भी कुछ प्रमाण देते हैं। अच्छा एक प्रश्न बड़ा सुंदर लोगों ने पूछा था जो युग पुराण के श्लोक से हमको स्मरण आ गया। वह भी हम तुमको बता देते हैं। क्या है वो विषय? जब आर्द्र म्लेच्छ इबिसिन के विद्रोह इबिसिन के सेना से बचकर या निकल कर भाग रहा था। और जब वह रेगिस्तान में गया वहां पर उसको 15 लोग मिले थे, ऐसा हमने बताया था। वह 15 लोग कौन है? इसका अर्थ है कि वह 15 लोग तो म्लेच्छराज से भी पुराने हैं। वर्तमान म्लेच्छराज से ज्यादा पुराने हैं। तो लोग पूछते थे वो 15 लोग कौन हैं? यह 15 लोग कौन है? इसके विषय में पूरी शंकराचार्य जी ने लिखा है। संकेत में लिखा है, लेकिन उसको डीकोड नहीं किया है। हो सकता है उस दृष्टिकोण से नहीं लिखा हो, लेकिन अर्थ उसका वही है। जब हम युग पुराण का प्रमाण आपको दे रहे थे, इसमें इस प्रसंग के प्रारंभ में एक वचन आया है। अर्थ लुब्धासते सर्वे भविष्यति महाबला कि म्लेच्छराज का प्रभाव विशेष करके उन लोगों पर पड़ता है जो अर्थ के लोभी हैं, पैसे पर जिनकी नजर रहती है।
[33:04]और दूसरी बात यह है कि जो हमने आपको बृहद पराशर होरा शास्त्र से वचन दिया वहां भी वर्णन है म्लेक्ष क्षमापति लब्ध भाग्य कवन प्रारंभ शत्रु क्षयान।
[33:43]म्लेच्छराज की कृपा से उस व्यक्ति को बहुत पैसा मिलता है और उसको क्रूर क्रियार्थागम क्रूर क्रिया से पैसा बहुत मिलता है। तो जो व्यक्ति अर्थ लोलुप है, पैसे के प्रति लोभी है उसको म्लेच्छराज बहुत जल्दी अपना गुलाम बना लेता है। उसकी उस कमजोरी को पकड़ के, तो ये 15 जो लोग उसको मिले थे, यह कलयुग के अलग-अलग सत्ताओं के 15 प्रतिनिधि हैं। यह 15 कौन है? यह भी अब मैं आपको बता देता हूं। इसमें कहते हैं पूरी शंकराचार्य जी ने एक ग्रंथ लिखा था।
[34:25]रथारूढ़ श्री जगन्नाथ आदि के दर्शन तथा स्पर्श आदि की अधिकार मीमांसा करपात्री स्वामी जी ने भी इस विषय में बहुत कुछ लिखा है। तो श्रीमद् भागवत महापुराण के 11वें स्कंध के 23वें अध्याय से बता रहे हैं भगवान श्री कृष्ण उद्धव जी को। वहीं से आप देखिए स्तेयं हिंसा नृतम दंभ कामः क्रोधः स्मयो मदः भेदः वैरं अविश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च। एते पंचदशानर्था हर्थ मूला मतानृणाम तस्मा धनर्थमर्थाक्षेयोरथे दूरस्तजेत।
[35:10]एक 15 में से एक क्या है? चोरी का अधिष्ठाता है। आपके मन में चोरी करने का भाव डालेगा। दूसरा वह है, वह शक्ति है दूसरी शक्ति जो आपके मन में हिंसा करने की प्रेरणा देगी। तीसरी शक्ति आपके मन में झूठ बोलने की प्रेरणा देती है। चौथी शक्ति आपके मन में दंभ का विस्तार करती है। पांचवीं शक्ति आपके मन में काम की वासना को बहुत बढ़ा देती है। छठी शक्ति आपके मन में क्रोध को बहुत बढ़ा देती है। सातवीं शक्ति आपके मन में गर्व को बहुत बढ़ा देती है। आठवीं शक्ति आपके मन में मद एकदम अह मतलब क्या मतवालापन अपने आ किसी को नहीं समझना उसको बढ़ा देती है।
[36:15]उसके बाद भेद मतलब फूट डालने वाला एक तत्व है। उसके बाद बैर करवाने वाला एक तत्व है। दूसरे सहजन के प्रति शास्त्रों के प्रति देवताओं के प्रति धर्म के प्रति अविश्वास बढ़ाने वाला एक तत्व है। दूसरे की उन्नति से संतुष्ट और प्रसन्न होने का अपेक्षा स्पर्धा रखने में जो दुर्भाव है उसकी उत्प्रेरिका एक शक्ति है। स्त्रियों के प्रति अनावश्यक जो एडिक्शन होता है, स्त्रियों के प्रति जो आकर्षण हो जाता है वो भी व्यभिचारगत दृष्टि से। वो लंपटता बढ़ाने वाली जो है वो 13वीं शक्ति है। जुआ, सट्टेबाजी ये सब करवाने वाली 14वीं शक्ति है। और शराब, मदिरा, ड्रग इत्यादि की प्रति प्रेरित करने वाली 15वीं शक्ति है। यह भागवत महापुराण में 15 प्रकार के अनर्थ बताए गए हैं जिनसे कलयुग बहुत अधिक बढ़ता है और ये 15 अनर्थ रहते कहां हैं?
[37:25]तो एते पंचदशानर्था हर्थ मूला मतानृणाम ये 15 जो अनर्थ हैं वो अर्थ में वास करते हैं।
[37:41]इसलिए अर्थ में 15 प्रकार के अनर्थ बताए गए हैं। यही 15 प्रकार के अनर्थ की जो शक्तियां हैं वहीं साकार विग्रह धारण करके आर्द्र म्लेच्छ को बचाती हैं और उसको इतना श्रेष्ठ। वह श्रेष्ठ मतलब पैशाचों की दृष्टि में श्रेष्ठ नायक के रूप में स्थापित करती हैं और उन्हीं 15 शक्तियों के अंश से निकला हुआ जो अनाम म्लेच्छ है वही उसके अंदर घुसकर उसके हार्डवेयर का उसके शरीर का प्रयोग करके अपना सारा काम करवाता है। ऐसा नहीं है कि यह म्लेच्छराज भारत पर आक्रमण नहीं किया है। ये म्लेच्छराज ने जिस समय चाणक्य ने महापद्मनंद का तख्ता पलट करवाया था उस समय भी इसने भारत पर आक्रमण किया था। और भारत पर आक्रमण करने के लिए इसने पांच राजाओं का आश्रय लिया था।
[38:37]अब ये जो महापद्मनंद है वह था कौन? उसने कलयुग को आगे बढ़ाने के लिए बहुत सहयोग दिया था। अब श्रीमद् भागवत में आप देखिए जहां सुखदेव जी ने कलयुग के भविष्य गत राजाओं का वर्णन किया है। महापद्मपति कश्छ नद छत्र विनाशक ततो नृपा भविष्यति शूद्रप्रायस्तु धार्मिक। स एक छत्राम पृथ्वी अनुत शासन शास्यति महापद्मो द्वितीय इव भार्गव। तत शास्तो भविष्यति सुमाल्य प्रमुख सुता य इमाम भोक्ष्य महिमा राजन सतम समाहा नव नंदा द्विजा कश्चित प्रपनान उद्धरति तेषम भावे जगतिम औरया भोष्यति वैलो स एवा चंद्रगुप्तं वे द्विजो राज्य अभिषेक्षति चतुर्विं शत् समा राजा चंद्रगुप्तो भविष्यति। भविता भद्रसारस्तु पंचविंशत् समा नृपः सण विं शत् समा राजा यह शोको भविता नृसु ये सब बात है।
[40:15]तो भारत में म्लेच्छराज को लेकर बहुत कुछ संकेत मिलता है। राजतरंगिणी देखो वहां भी मिलेगा बहुत कुछ स्थानों पर मिलेगा। तो यह जो म्लेच्छराज है वह चंद्रगुप्त के समय आक्रमण करना चाहता था। क्यों करना चाहता था क्योंकि चाणक्य ने अर्थ के बल से जो अनर्थ का विस्तार कर रहा था म्लेच्छराज का जो एजेंट था महापद्मनंद यहां पर। उस म्लेच्छराज के अभियान को चंद्रगुप्त के माध्यम से चाणक्य ने रोक दिया और चाणक्य ने जब तख्ता पलट कर दिया सत्ता परिवर्तन कर दिया तो म्लेच्छराज का तो काम अटक गया। तो जो महापद्मनंद था उसके पुत्र ने म्लेच्छराज से संपर्क किया और वहां से उसको कहा कि महाराज अब आप आके यहां पर हमारी रक्षा कीजिए। तो महाकवि विशाख दत्त ने मुद्रा राक्षस नाटकम में इसका संकेत किया है। यदि आपको थोड़ा सा साहित्य से रुचि होती तो आप इस विषय को जानते।
[41:28]उपलब्धवान स्मि प्रणभ यथा तस्य म्लेच्छराज बलस्य मध्या प्रधान तमा पंच राजान परया सुतिया राक्षस मनो वर्तते। कि मैं यहां पर आकर बता रहा हूं हे आचार्य चाणक्य क्या कि म्लेच्छराज की सेना में पांच राजा प्रधानता से उसके काम को देख रहे हैं।
[42:25]बड़े सुहित बनकर उसमें कौन-कौन हैं? कोलु तस त्रिवर्मा मलय नरपते सिंहनादो नृसिंह काश्मीरह पुस्कराक्षह शत्रु माहिमाम स धव सिंधु सेनह मेघाक्ष पंचमो स्मिन पृथु तुर्ग बल पारसिकाधिराजो नाम्या मिलिगाम ध्रुवह मधुना चित्रगुप्ता प्रमार्ष। कौलूत देश के राजा चित्र वर्मा मलय के राजा जो सिंह के समान गर्जना करते हैं वह नृसिंह वर्मा, कश्मीर का राजा पुष्कुराक्ष जिसने अपने पराक्रम से अपने शत्रुओं की महिमा को नष्ट कर दिया है।
[44:56]सिंधु का राजा सिंधु सेन और पांचवा जिसके घोड़ों की सेना बड़ी तगड़ी ईरानी घोड़े जिसके पास हैं ऐसा पारस देश का राजा फारस का राजा मेघ नाम का मेखा कहते हैं उसको। इन पांचों का नाम हम अपनी सूची में लिखते हैं ताकि चित्रगुप्त इनके नाम को देखकर यह समझ जाए कि पहले यही पांचों को निपटाना है। इन्हीं का नाम मिटाना है इस इतिहास से यह चाणक्य के समक्ष जाकर सूचना दी है शिष्वत जो गुप्तचर हैं उनके उन्होंने। तो म्लेच्छराज उस समय आ रहा था, लेकिन भगवत कृपा से चाणक्य ने अपनी नीति कुशलता और तपबल से म्लेच्छराज को भारत में आने नहीं दिया। तब पुनः म्लेच्छराज ने विक्रमादित्य के समय आक्रमण किया है और विक्रमादित्य के जन्म से ठीक कुछ समय के पहले ही या उस समय जब वह बच्चे थे तो कालकाचार्य जो है वो म्लेच्छराज को लेकर आए थे। और फिर विक्रमादित्य ने वेताल सिद्ध इत्यादि के आश्रय से फिर बहुत दिव्य महाविद्या साधना इत्यादि भी करके और शिवास थे भी शिवमुख गुह के अवतार थे भी वो। तो इसीलिए अपने दिव्य पराक्रम से महाराज विक्रमादित्य ने म्लेच्छराज को पराजित किया और वह एक प्रकार से उसका वध ही कर दिया था म्लेच्छराज का। लेकिन चूंकि हमने बताया वह कई बार अपने शरीर को बदलता है और पुनः जीवित होता है। वो ऐसे म्लेच्छ फिर से करता है तो वह बच गया। और वह म्लेच्छराज अब भविष्य में आगे कहां पर आएगा? किसके साथ क्या करेगा? इसके विषय में हम आपको आगे बताएंगे। अभी आपको ज्यादा बता देंगे तो आप फिर उन विषयों को भूलने लगिएगा जो हमने कहा है। इसीलिए हम कहते हैं इन चलचित्रों को ध्यान से देखिएगा। यह मजाक नहीं है। सत्य घटनाओं पर आधारित बिल्कुल प्रामाणिक बात है। आप हमारी कही बातों को क्रॉस वेरीफाई करने के लिए गूगल में सर्च कर सकते हैं किसी ने लिखा होगा तो कुछ मिल ही जाएगा आपको। लेकिन अगर नहीं मिलेगा तो हम आपको प्रमाण देने के लिए बाध्य नहीं है क्योंकि जिस विषय को 10-10 साल पढ़ के जप के चिंतन करके हमने समझा है, सीखा है, जाना है। उसको एक कमेंट बॉक्स में हम आपको प्रमाणित नहीं कर सकते हैं क्योंकि आप उस स्तर पर अभी नहीं पहुंचे हैं। इसीलिए या तो विश्वास करें या तो चैनल से बाहर चले जाएं।



