[0:00]साल था 1918 दुनिया एक भयावह महामारी से जूझ रही थी और मुंबई की गलियों में भी हलचल थी। इसी बीच एस एस देवरे नाम के एक मशहूर फोटोग्राफर अपने पुराने कैमरे के लेंस को ठीक कर रहे थे। तभी अचानक गलती से उनके कैमरे में एक ऐसी तस्वीर कैद हुई जो आज हजारों मंदिरों और लाखों घरों में पूजी जाती है। और वह तस्वीर थी शिर्डी के साईं बाबा की।
[0:28]लेकिन क्या आप जानते हैं कि साईं बाबा आखिर थे कौन और कहां से आए थे? क्या वे सच में भगवान थे या कोई सिद्ध फकीर? क्या वे हिंदू थे या मुसलमान? अगर वे मुसलमान थे तो क्यों एक नियम के पेड़ के नीचे बैठकर वैदिक भजन गाते थे? और अगर वे हिंदू थे तो क्यों जीवन भर एक मस्जिद में रहकर अल्लाह मालिक का जाप करते रहे? आखिर क्या रहस्य है उस पवित्र धनी का और क्या वाकई उनकी दी हुई उदी यानी कि राख में असाध्य रोगों को बिना औषधि के ठीक कर देने की जादुई ताकत थी? और क्या है उनके चमत्कारों का रहस्य? कैसे वे बिना तेल के दिए जला लेते थे? लोगों के मन पढ़ लेते थे और सबसे बड़ा रहस्य क्या सच में बाबा की जीवन शक्ति एक साधारण सी ईंट में समाई हुई थी? जिसके टूटते ही उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया। क्या उनके चमत्कार केवल भक्तों की कल्पनाओं की उड़ान है या इसके पीछे कोई गहरा विज्ञान और मनोविज्ञान छिपा है? तो चलिए आज के इस वीडियो में हम इतिहास विज्ञान और आस्था की परतों को खोलकर उस फकीर की सच्चाई जानने की कोशिश करेंगे। जिसे कुछ लोग भगवान कहते हैं और कुछ बंदा खुदा।
[2:03]19वीं सदी का मध्यकाल महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में बसा था एक छोटा सा धूल भरा और अनजान सा गांव शिर्डी। उस समय शिर्डी बहुत ही साधारण सा गांव था जहां मुश्किल से 450 परिवार ही रहते थे। तभी शिर्डी में कुछ ऐसा हुआ जिसने इस गांव की किस्मत हमेशा के लिए बदल दी। श्री गोविंद राव रघुनाथ दाभोलकर जिन्हें प्यार से हेमाड़पंत कहा जाता है। उनके द्वारा रचित प्रामाणिक ग्रंथ श्री साईं सचरित्र के अनुसार साल 1854 के आसपास शिर्डी में एक पुराने नियम के पेड़ के नीचे पहली बार उस 16 साल के तेजस्वी युवा को देखा गया जो उस पेड़ के नीचे गहरी ध्यान में मग्न थे। श्री साईं सत चरित्र में इस घटना का विस्तार से वर्णन मिलता है। जहां बताया गया है कि इस बालक को मौसम के किसी भी रूप की कोई परवाह नहीं थी। वह दिन रात बस उसी नियम के पेड़ के नीचे एक ही मुद्रा में बिना हिले डुले अडिग बैठा रहता था और लगातार ध्यान में लीन रहता था। गांव वाले इस युवा लड़के को इतना कठोर तप करते देखकर पूरी तरह हैरान थे। अप्पा जोगले, काशीनाथ और महालसापति जैसे गांव के कुछ लोगों की जिज्ञासा इस बालक ने खींच ली थी और वे नियमित रूप से उसे देखने आने लगे थे। लेकिन समाज में एक जैसे लोग कहां होते हैं? जहां कुछ लोग उस बालक को फकीर संत मानकर सम्मान दे रहे थे तो वहीं कुछ लोगों ने उन्हें पागल करार कर दिया। साथ ही उन्होंने उस पर पत्थर तक फेंके। हालांकि उस बालक को इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। परंतु कुछ दिनों बाद वह बालक अचानक गायब हो गया और फिर कभी दिखाई नहीं दिया। अब सवाल आता है कि आखिर वह बालक था कौन, कहां से आया था? वह उसी नियम पेड़ के नीचे क्यों बैठा और अचानक वह कहां चला गया? इन सवालों ने शिर्डी वालों को चौंका के रख दिया। लेकिन असली कहानी तो यहीं से शुरू होती है जिसने आगे चलकर एक बहुत बड़े चमत्कार की नींव रखी। लगभग 3 साल का लंबा समय बीत चुका था। फिर साल 1858 के आसपास धूपेड़ा गांव के मुस्लिम जागीरदार चांद पाशा पाटिल की साली के निकाह की एक बारात बैलगाड़ियों में शिर्डी पहुंची। इसी बारात के साथ वह रहस्यमय युवा वापस लौट आया। अब सवाल यह आता है शिर्डी ही क्यों? आखिर ऐसा क्या खास था उस भूले बिसरे गांव में? वैसे यह वापसी किसी साधारण युवा की नहीं बल्कि एक ऐसे संत की थी जिसे आगे चलकर पूरी दुनिया पूजने वाली थी। जब यह युवा फकीर शिर्डी पहुंचा तो वे सीधे खंडोबा मंदिर गए। वहां के पुजारी महालसा पति जो पेशे से सुनार थे जब उन्होंने उस युवा को अंदर आते देखा तो उन्होंने कहा या साईं यानी कि आओ साईं और बस यहीं से उन्हें हमेशा के लिए साईं बाबा पुकारा जाने लगा। इस साईं शब्द का मतलब बहुत ही गहरा और रहस्यमई है। इतिहासकारों के अनुसार साईं एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ सूफी संत या गरीब होता है। लेकिन संस्कृत और वैदिक परंपरा में साईं का अर्थ साक्षात ईश्वर या दैवीय तत्व से जोड़ा जाता है। वहीं बाबा शब्द एक पिता या पूजनीय व्यक्ति को दर्शाता है। एक ही नाम में हिंदू और मुस्लिम दोनों संस्कृतियों का ऐसा अद्भुत संगम इतिहास में शायद ही कहीं और देखने को मिलता है। नाम तो मिल गया था लेकिन अब भी सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर यह साईं बाबा थे कौन उनकी असली पहचान क्या थी? एक प्रमुख ऐतिहासिक मान्यता और शशिकांत शांताराम गडकरी द्वारा रचित पुस्तक सदगुरु साईं दर्शन के अनुसार बाबा का जन्म महाराष्ट्र के परभणी जिले के पाथरी गांव में हुआ था। दावा किया जाता है कि वे कश्यप गोत्र के एक यजुर्वेदी ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। जिनके पिता का नाम गंगा भाऊ या भगवंत राव था। वहीं उनकी माता का नाम देवकी गिरी अनुसूया अम्मा बताया जाता है। वहीं दूसरी ओर एक और बहुत ही मजबूत ऐतिहासिक थ्योरी यह कहती है कि वे मूल रूप से मुस्लिम थे या उनका लालन पालन एक मुस्लिम सूफी फकीर ने किया था। कहा जाता है कि बचपन में अनाथ होने के बाद वे अजमेर पहुंचे। जहां वे महान सूफी संत हजरत रोशन शाह के संपर्क में आए। रोशन शाह के शिष्य के रूप में उन्होंने महज 12 से 13 वर्ष की उम्र में ही कुरान शरीफ कंठस्थ कर लिया था। और इस्लामी शरीयत, हदीस और सूफी दर्शन का गहरा अध्ययन किया था। एंटोनियो रिकपोलोस जैसे लेखकों की रिसर्च और श्री साईं गुरु चरित्र जैसे ग्रंथों में भी उनके बचपन और उत्पत्ति को लेकर कई अलग-अलग और चौंकाने वाले दावे मिलते हैं। क्या वे जन्म से ब्राह्मण थे जिन्हें सूफी गुरु मिले? या वे मूल रूप से एक मुस्लिम फकीर थे जो बाद में नाथ संप्रदाय और वेदांत से गहरे प्रभावित हुए? वैसे मित्रों हम आगे इस वीडियो में ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ जानेंगे कि साईं बाबा हिंदू थे या मुसलमान। लेकिन उससे पहले हम उनके जीवन और शिर्डी के चमत्कारी दिनचर्याओ के बारे में थोड़ा जान लेते हैं। और अगर आपको वीडियो अच्छी लग रही है तो इसे एक लाइक जरूर करें और कमेंट में लिखें जय साई राम। शिर्डी लौटने के बाद साईं बाबा की दिनचर्या और उनका ठिकाना गांव वालों के लिए गहरी जिज्ञासा का विषय बन गया था। बाबा का सबसे प्रिय स्थान वही पुराना नियम का पेड़ था जहां वे पहली बार प्रकट हुए थे। वे दिनभर भिक्षा मांगते और रात को उसी पेड़ के नीचे सो जाते। जब गांव वालों ने हैरानी से पूछा कि वे हमेशा इसी पेड़ के नीचे क्यों रहते हैं तो बाबा ने बड़ी सरलता से उत्तर दिया कि यह उनके गुरु का स्थान है और इसीलिए वे यहीं विश्राम करते हैं। जब कुछ लोगों ने उनकी बात को मजाक समझा और अविश्वास जताया तो बाबा ने उन्हें उस स्थान की खुदाई करने की चुनौती दे डाली। जब ग्रामीणों ने सचमुच खुदाई की तो जमीन के नीचे से एक पत्थर की शिला निकली। उसे हटाते ही एक रहस्यमई गुफा का द्वार नजर आया और अंदर का नजारा देखकर लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई। उस गुफा के अंदर बिना तेल और बाती के चार दीपक रहस्यमई तरीके से जल रहे थे। वहां गौमुखी आकार की एक संरचना लकड़ी के तख्त और पुरानी आध्यात्मिक मालाएं भी मौजूद थी। बाबा ने बताया कि यह उनके गुरु वेनकुशा का समाधि और तपस्या स्थल है। यही पवित्र जगह आज शिर्डी में गुरुस्थान के नाम से जानी जाती है। इस स्थान का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि स्वाभाविक रूप से बेहद कड़वे होने वाले नीम के पत्ते बाबा के बैठने वाली जगह पर बिल्कुल मीठे लगते हैं। यह एक ऐसा अद्भुत रहस्य है जिसने आज तक दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों को चौंका रखा है। गुरुस्थान के बाद बाबा के जीवन का स्थाई निवास बना एक मस्जिद। दरअसल शुरुआत में बाबा ने गांव के खंडोबा मंदिर में रहने की इच्छा जताई थी। लेकिन मंदिर के पुजारी महालसापति को यह चिंता सताने लगी कि एक मुस्लिम फकीर की वेशभूषा वाला व्यक्ति कहीं मंदिर की मूर्तियों और पवित्रता को नुकसान ना पहुंचा दे। बाबा जो बिना कहे ही लोगों के मन की बात जान लेने की शक्ति रखते थे पुजारी की उलझन को तुरंत समझ गए। वे मुस्कुराए और बिना कोई शिकायत किए शांति से वहां से लौट आए। इसके बाद उनकी नजर शिर्डी की एक बेहद पुरानी, वीरान और खस्ताहाल मस्जिद पर पड़ी। यह मस्जिद कभी एक हिंदू ने मुसलमानों की इबादत के लिए बनवाई थी। लेकिन समय के साथ वह उजड़ गई थी और वहां लंबे समय से कोई नमाज भी नहीं पढ़ी गई थी। जहां आम लोगों को सिर्फ ईंट पत्थर का एक खंडहर दिखता है वहीं साईं बाबा ने एक अद्भुत आध्यात्मिक केंद्र की नींव रख दी। बाबा ने उस वीरान मस्जिद की साफ सफाई की और उसे हमेशा के लिए अपना घर बना लिया। और उस मुस्लिम इबादतगाह को बाबा ने एक हिंदू नाम दिया द्वारकामाई। भगवान श्री कृष्ण की पवित्र नगरी द्वारिका के नाम पर एक मस्जिद का नामकरण करना कोई साधारण घटना नहीं थी। द्वारकामाई में बसने के बाद साईं बाबा का दैनिक जीवन एक ऐसा गहरा रहस्य बन गया था जिसे समझना किसी आम इंसान के बस की बात नहीं थी। तो चलिए अब जानते हैं उनके रहस्यमई दिनचर्या के बारे में जो आपको चौंका कर रख देगा। साईं बाबा एक ऐसे फकीर थे जिनके पास कोई भौतिक संपत्ति नहीं थी। फिर भी उनके भीतर एक राजा जैसी बेपरवाही थी। उनका दिन भिक्षा मांगने से शुरू होता था। बाबा शिर्डी के कुछ गिने-चुने घरों जिनमें सखाराम पाटिल और वामन राव गड़कर के घर शामिल थे। के सामने जाकर भिक्षा मांगते थे। उनके कंधे पर एक झोली होती थी जिसमें वे चावल और दाल जमा करते थे और हाथ में एक टिन का बर्तन होता था जिसमें दूध छाछ और दही जैसी तरल चीजें लिया करते थे। कई बार बाबा खुद अपने हाथों से पूरे गांव के लिए भोजन पकाते और उसे प्रसाद के रूप में बांटते थे। जो भी भोजन बचता वे उसे अपने पीछे पीछे चलने वाले कुत्तों और जानवरों को बड़े प्रेम से खिला देते थे। द्वारकामाई के अंदर बाबा ने एक पवित्र अग्नि प्रज्वलित कर रखी थी जिसे धुनी कहा जाता था। साल 1903 में काशीनाथ घोड़े नाम के फोटोग्राफर द्वारा खींची गई एक ऐतिहासिक तस्वीर में भी बाबा को इसी धुनी माई के सामने बैठे देखा जा सकता है। यह कोई साधारण आग नहीं थी। यह एक ऐसा पवित्र स्थान था जहां हमेशा आग जलती रहती थी। लेकिन इस धुनी का सबसे बड़ा रहस्य वह राख थी जो इसके जलने के बाद बचती थी जिसे बाबा उदी कहते थे। जब भी कोई बीमार, लाचार या परेशान व्यक्ति उनके पास आता बाबा एक स्थानीय हकीम की तरह उसी उदी को उनके माथे पर लगाते या पानी में मिलाकर पीने को देते थे। विज्ञान आज भी हैरान है कि आखिर उस साधारण सी लकड़ी की राख में ऐसा क्या था जो गंभीर बीमारियों को भी ठीक कर देता था? उनकी इस रहस्यमय दिनचर्या का एक और सबसे दिलचस्प हिस्सा था छावड़ी। द्वारकामाई को अपना घर मानने के बावजूद बाबा हर दूसरी रात पास ही स्थित छावड़ी में जाकर सोते थे। जब वे द्वारकामाई से छावड़ी की ओर जाते तो यह कोई आम सफर नहीं होता था। यह एक भव्य जुलूस का रूप ले लेता था जहां भक्त भजन गाते, चिलम सुल्गाते और पूरी राजसी शानो शौकत के साथ उन्हें छावड़ी तक ले जाते थे। एक फकीर जो फटे पुराने और ढीले ढाले कपड़े पहनता था। उसका यह शाही अंदाज सबको हैरान कर देता था। उनका भिक्षा मांगना, धुनी रमांना, उदी बांटना और छावड़ी जाना। यह सब किसी रहस्य से कम नहीं था। लेकिन जिस रहस्य ने लोगों को हैरान कर रखा है वह यह है कि साईं बाबा हिंदू थे या मुस्लिम। तो चलिए अब ऐतिहासिक दावों और प्रमाणों से जानते हैं कि आखिर साईं बाबा थे कौन। लेकिन उससे पहले अगर आपको यह डॉक्यूमेंट्री पसंद आ रही है तो इसे लाइक करना बिल्कुल ना भूलें। यह आपके लिए तो फ्री है पर इससे हमारी काफी मदद हो जाती है।
[16:41]शिर्डी की उस छोटी सी द्वारकामाई मस्जिद में चमत्कार कोई कभी कभार होने वाली घटना नहीं थी। बल्कि वह लगभग रोज का ही सिलसिला बन चुका था। शुरुआत में गांव के कई लोग बाबा को एक पागल भिखारी समझते थे। बाबा हर शाम द्वारकामाई में दिए जलाने के लिए गांव के दुकानदारों से तेल मांगने जाया करते थे। एक दिन कुछ दुकानदारों ने उन्हें अपमानित करते हुए तेल देने से साफ मना कर दिया। बाबा शांत भाव से खाली बर्तन लेकर वापस लौट आए जिसके बाद बाबा ने तेल के बजाय दियों में पानी डाला और वह दिए और भी ऊर्जा से जल पड़े। यह वह पल था जब शिर्डी के लोगों को पहली बार एहसास हुआ कि नियम के पेड़ के नीचे बैठने वाला यह फकीर असल में कौन है? बाबा की शक्तियां सिर्फ द्वारकामाई या शिर्डी की सीमाओं तक ही सीमित नहीं थी। उनके बायलोकेशन यानी एक ही समय में दो जगहों पर मौजूद होने के बारे में भी बताया जाता है। इतिहास में ऐसे कई दर्ज मामले हैं जब बाबा शिर्डी से कोसों दूर बैठे अपने किसी संकट ग्रस्त भक्त के सामने अचानक प्रकट हो जाते थे। वे उन्हें आने वाले किसी बड़े खतरे से आगाह करते और सही समय पर बचा लेते थे। इससे भी ज्यादा रहस्यमई थी उनकी माइंड रीडिंग यानी मन पढ़ लेने की क्षमता। कोई भक्त शिर्डी क्यों आ रहा है उसके मन में क्या सवाल या परेशानी है? यह बाबा को उसके द्वारकामाई में कदम रखने से बहुत पहले ही पता चल जाता था। वे अपने पास बैठे लोगों को ठीक-ठीक बता देते थे कि कौन आ रहा है और किस मकसद से आ रहा है। कई बार तो वे उन लोगों के सपनों में जाकर उन्हें शिर्डी बुलाते थे जिन्होंने असल जिंदगी में कभी साईं बाबा का नाम तक नहीं सुना था। लेकिन बाबा का सबसे बड़ा चमत्कार था उनका हीलिंग का तरीका। वे बिना किसी जड़ी बूटी या औषधि के लोगों के असाध्य रोगों को चुटकियों में ठीक कर देते थे। इसका एक बेहद चौंकाने वाला प्रमाण तब मिला जब दूर बैठे एक भक्त का हाथ खोलते हुए तेल में जल गया। और उसी ठीक समय पर शिर्डी में बैठे बाबा के हाथ पर जलने के भयानक घाव उभर आए और वे उस दर्द से तड़पने लगे। इस प्रक्रिया में वह भक्त चमत्कारी रूप से पूरी तरह ठीक हो गया। साथ ही वे सूखी कोख को संतान का सुख दे देते थे और गिरती हुई छत को अपनी एक तेज आवाज से हवा में रोक देते थे। लेकिन अब सवाल यह आता है कि आखिर इन बातों में कितनी सच्चाई है? जब कहानियां चमत्कारों की हदें पार करने लगती हैं तो आधुनिक युग का तर्कशील दिमाग अक्सर सबूत मांगने लगता है। क्या पानी से दिए जलना या मन की बात पढ़ लेना महज भक्तों की अंधभक्ति और कल्पनाओं की उड़ान है? या फिर इन चमत्कारों के पीछे कोई ऐसा ठोस इतिहास है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता? तो चलिए अब साईं बाबा के जीवन के कुछ पुख्ता प्रमाणों के बारे में जानते हैं जिसने इतिहासकारों को तक हिलाकर रख दिया है। बाबा के जीवन की सबसे प्रामाणिक जानकारी हमें श्री साईं सतचरित्र से मिलती है जिसे श्री गोविंद राव रघुनाथ दाभोलकर ने लिखा था। यह कोई सुनी सुनाई बातों का संकलन नहीं था। दाभोलकर जी ने इस महान ग्रंथ को लिखने की शुरुआत साल 1910 में ही कर दी थी। जब बाबा जीवित थे और उनके सामने द्वारकामाई में बैठे होते थे। मूल रूप से मराठी भाषा में रचित और 53 अध्यायों में बटे इस ऐतिहासिक ग्रंथ का लेखन कार्य बाबा के महासमाधि लेने यानी 1918 तक चलता रहा। यही वह ऑनफिशियल रिकॉर्ड है जो बाबा के चमत्कारों उनकी दिनचर्या और उनकी शिक्षाओं को एक ऐतिहासिक सत्य के रूप में दुनिया के सामने मजबूती से रखता है। लिखित दस्तावेजों से भी बड़ा सबूत होता है आंखों देखा प्रमाण और सौभाग्य से साईं बाबा के अस्तित्व को साबित करने के लिए उस दौर की कुछ बेहद दुर्लभ तस्वीरें आज भी सुरक्षित हैं। यह वह ऐतिहासिक तस्वीरें हैं जो साल 1900 से 1918 के बीच खींची गई थी। जब कैमरे का चलन भारत में बहुत नया था। इन्हीं तस्वीरों के जरिए हम बाबा का प्रामाणिक इतिहास अपनी आंखों से देख पाते हैं। इनमें से एक बेहद मशहूर तस्वीर साल 1903 की है जिसे पुणे के फोटोग्राफर काशीनाथ घोड़े ने खींचा था। इस तस्वीर में बाबा अपनी पवित्र धुनी माई के ठीक सामने बैठे नजर आ रहे हैं। एक और ऐतिहासिक तस्वीर साल 1906 की है जिसे भी काशीनाथ घोड़े ने ही कैमरे में कैद किया था। इसमें बाबा द्वारकामाई की दीवार से टेक लगाए खड़े हैं और उनके साथ उनके दो प्रमुख भक्त दाईं ओर नाना साहेब निमोनकर और बाईं ओर गोपाल राव मुकुंद राव बूटी खड़े हैं। यह तस्वीर तब ली गई थी जब बाबा लैंडी बाग की ओर जा रहे थे। इसके अलावा 1915 में द्वारकामाई की सीढ़ियों पर खींची गई एक और तस्वीर है जिसमें बाबा अपने सबसे वफादार और करीबी अनुयायियों अब्दुल तात्या कोटे पाटिल और नानावली के साथ दिखाई देते हैं। शिर्डी में साईं बाबा का जीवन सिर्फ एक फकीर की कहानी नहीं थी बल्कि यह एक ऐसी अलौकिक यात्रा थी जिसका एक ना एक दिन भौतिक अंत होना ही था।
[22:45]कहा जाता है कि इस ब्रह्मांड में जो भी ऊर्जा शरीर धारण करके आती है उसे एक दिन वापस उसी अनंत में विलीन होना पड़ता है। और उसी तरह साईं बाबा भी एक दिन इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए पर उनकी मृत्यु का कारण जो बताया जाता है वह आज भी चौंकाने वाला है। और वह कारण था सिर्फ एक ईंट।



