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"हर स्त्री की अकड़ तोड़ने का एक ही तरीका है - OSHO"

The Stoic Mind

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[0:00]सुनो, अगर तुमने अब तक यही मान रखा था कि किसी औरत की अकड़ तोड़ना मुमकिन नहीं तो आज की यह बात तुम्हारी सोच को झकझोर कर रख देगी। क्योंकि अब वक्त आ गया है उस जंजीर को तोड़ने का जो तुम्हें एक झूठे भ्रम में बांधे हुए थी और जब भ्रम टूटता है तो वास्तविकता दिखाई देती है। और वास्तविकता हमेशा कठोर होती है लेकिन मुक्त भी करती है। आज मैं तुम्हारे साथ वह आठ अनसुने आजमाए हुए हथियार साझा करने जा रहा हूं जो हर उस मर्द को मजबूती देंगे। जो किसी की बेरुखी, मूड स्विंग या घमंड के सामने ना झुकता है ना बिखरता है। क्योंकि जब एक मर्द टूटता है तो वह किसी औरत से नहीं, खुद से हारता है। कुछ औरतें समझती हैं कि उनका रवैया, उनका मूड, उनकी दूरी किसी मर्द की जिंदगी को हिला सकती है। और शायद आज तक ऐसा हुआ भी होगा लेकिन असली खेल तब बदलता है जब मर्द खुद को समझने लगता है। अपनी मौजूदगी, अपनी सोच और अपनी खामोशी की ताकत पहचान लेता है और तब उसे कहना नहीं पड़ता, समझाना नहीं पड़ता, मनवाना नहीं पड़ता। क्योंकि उसकी ऊर्जा ही उत्तर बन जाती है। जब ऐसा मर्द खड़ा होता है तो उसे ना बोलना पड़ता है ना बहस करनी पड़ती है। उसकी खामोशी ही सामने वाले की अकड़ को जड़ से हिला देती है। और आज जो मैं तुम्हें बताने वाला हूं वह सिर्फ किसी औरत के अहंकार को नहीं बल्कि तुम्हारे आत्मा बल और चेतना को एक नए स्तर पर उठा देगा। क्योंकि मुद्दा औरत नहीं, मुद्दा तुम हो। अगर तुम जाग गए तो कोई तुम्हें हिला नहीं सकता और अगर तुम सोए हुए हो तो छोटी सी बात भी तुम्हें भीतर तक तोड़ देगी। अगर तुम अब सहने के लिए नहीं समझदारी से जीने के लिए तैयार हो तो यह बातें सिर्फ तुम्हारे लिए हैं। क्योंकि एक समय आता है जब पुरुष बहस नहीं करता, सफाई नहीं देता, मांगता नहीं, रोकता नहीं, वह बस मौन हो जाता है और उसी मौन में उसकी ताकत जन्म लेती है। वीडियो को अभी एक लाइक दीजिए। क्योंकि जो बातें तुम जानने वाले हो, वे ना किताबों में मिलती हैं ना कोचिंग में। यह बातें जीवन के मैदान में गिरकर, उठकर, टूटकर और फिर खड़े होकर सीखी जाती हैं। अब शुरू करते हैं। पहला सिद्धांत खुद को साबित मत करो, खुद को संभालो क्योंकि औरत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसे मालूम है। मर्द खुद को साबित करने के चक्कर में खुद को खो बैठता है। वह बस बैठकर देखती है कि तुम कब उसके खेल में फंसते हो और जैसे ही तुम यह दिखाने लगते हो कि देखो मैं क्या कर सकता हूं। उसी पल तुमने अपनी ताकत, अपनी चाबी, अपनी दिशा उसके हाथों में दे दी। मगर असली मर्द ऐसा नहीं करता, वह अपनी ही दुनिया में मशगूल होता है। खुद पर काम करता है, अपनी ग्रोथ में डूबा रहता है और सबसे बड़ी बात वह शांत होता है। इतना शांत कि औरत के मन में सवाल उगने लगते हैं। यह मुझसे बात क्यों नहीं कर रहा? यह मुझे नोटिस क्यों नहीं कर रहा? यह इतना स्थिर कैसे है? और वहीं से पहली दरार उसके घमंड में पड़ती है। जो मर्द खुद को जताता है वह उसके इशारों पर चलने लगता है। और जो मर्द खुद को थामे रहता है उसकी खामोशी ही औरत की नींद उड़ा देती है। दूसरा सिद्धांत उसके रिएक्शन से ऊपर उठो, उसकी भावनाओं से बड़ा बनो। क्योंकि जिस दिन तुमने यह समझ लिया कि किसी औरत के व्यवहार, मूड या उसके तानों को अपनी भावनाओं का बटन बनाना बंद कर देना है। उसी दिन उसकी तुम पर पकड़ ढीली पड़ जाएगी। तब तुम प्रतिक्रिया से नहीं, दिशा से जीना शुरू कर दोगे। औरत की अकड़ तब तक जिंदा रहती है जब तक तुम उसकी ठंडी बातों देर से आने वाले रिप्लाई और बेपरवाह बर्ताव पर टूटते रहते हो। वह तुम्हें इग्नोर करे और तुम बेचैन हो जाओ, वह मिलने से मना करे और तुम सोच में पड़ जाओ। वह रूखी बात करे और तुम सफाई देने लगो, यही तुम्हारी हार है। क्योंकि तुम्हारी प्रतिक्रिया ही उसकी ताकत बन जाती है लेकिन खेल तब पलटता है। जब तुम अपने भीतर शांति ले आते हो। कोई लड़की तानों की बौछार कर दे, रूखा व्यवहार करे, सवाल जवाब से दूर रहे और तुम फिर भी स्थिर बने रहो। तो वहीं से मर्दानगी उसकी चालों पर भारी पड़ना शुरू हो जाती है। क्योंकि औरत सबसे ज्यादा डरती है उस मर्द से जिस पर उसके मूड स्विंग्स, रवैया और इमोशनल नाटक का कोई असर ना हो। जब उसकी हर कोशिश नाकाम होने लगे और तुम कह दो मैं तेरे मूड का नहीं, अपने मिशन का आदमी हूं। तो उसके पास अब कोई चाल नहीं बचती, उसकी सबसे मजबूत दीवार उसी क्षण गिरने लगती है। और ऐसा मर्द डरावना नहीं, सम्मान योग्य बन जाता है। क्योंकि एक महिला चाहकर भी ऐसे पुरुष को हल्के में नहीं ले सकती। तीसरा सिद्धांत जब दूरी बनाओ तो ड्रामा मत करो, दिल से बनाओ। क्योंकि औरत तब तक अकड़ में रहती है जब तक उसे यकीन हो कि तुम हर बार लौट कर आओगे। कई मर्द कहते हैं मैंने दूरी बना ली है लेकिन असल में सिर्फ बातों से दूरी होती है। दिल अब भी वहीं फंसा होता है, तुम स्टेटस चेक करते रहते हो, उसकी प्रोफाइल देखते हो। मन में प्रार्थना करते हो कि बस एक मैसेज आ जाए और यही तुम्हारी हार की शुरुआत होती है। क्योंकि औरत सब महसूस करती है, उसे पता चल जाता है कि यह मर्द अब भी मेरी पकड़ में है। मगर जब तुम सच में दिल से दूरी बना लेते हो, उसके चेहरे को उसकी चैट को उसकी मौजूदगी को अपने मन से हटा देते हो। तब उसकी अकड़ का किला डरना शुरू हो जाता है। क्योंकि महिला को सबसे ज्यादा डर उसी पुरुष से होता है जो एक बार चला जाए और कभी मुड़कर ना देखे। तुम यह मत सोचो कि तुम्हारी खामोशी बेअसर है, वह भीतर ही भीतर बेचैन होती है, बस वह दिखा नहीं सकती। जब तुम नो रिएक्शन, नो कांटेक्ट, नो इमोशन की स्थिति तक पहुंच जाते हो। तो उसके मन में सवाल उठने लगते हैं। क्या वह अब मुझे भूल रहा है? क्या मैं अब उसकी जरूरत नहीं रही? क्या कोई और उसकी जिंदगी में आ गया है? और यही सवाल उसका सुकून उसकी नींद और उसकी अकड़ तीनों को जला देते हैं। इसलिए दूरी बनाओ तो आदमी बनकर बनाओ, ड्रामा करके नहीं। दूरी का असर तभी होता है जब तुम्हारे अंदर कोई बेचैनी ना बचे। जब तुम उसके बिना भी शांत, फोकस्ड और मजबूत दिखो। चौथा सिद्धांत उसे खास मत बनाओ, खुद को रेयर बना दो। और यह बात सिर्फ शब्द नहीं एक अवस्था है। क्योंकि औरत की अकड़ तब तक जिंदा रहती है जब तक तुम उसे अपनी दुनिया का ताज बनाकर रखते हो। जैसे ही तुम उसे जरूरत से ज्यादा अहमियत देने लगते हो हर बात में उसे शामिल करने लगते हो। हर निर्णय में उसे प्राथमिकता देने लगते हो, वह समझ जाती है कि अब तुम उसके इर्द-गिर्द घूम रहे हो। और जब कोई इंसान खुद को केंद्र समझ लेता है तब उसका घमंड आदत नहीं सांस बन जाता है। और तभी शुरू होता है खेल जहां वह रिप्लाई में देर करती है। कभी-कभी जानबूझकर तुम्हें इग्नोर करती है क्योंकि उसे लगता है अब तुम उसके हाथ में हो। लेकिन खेल तब पलटता है जब तुम खुद को उस स्तर पर ले आते हो जहां तुम खुद रेयर हो। और उसे एहसास होने लगता है कि तुम्हारी दुनिया में होना एक अधिकार नहीं, बल्कि एक अवसर है। क्योंकि अधिकार कभी सम्मान नहीं देता, अवसर हमेशा मूल्य मांगता है। याद रखो, एक महिला तब अकड़ दिखाती है जब उसे लगता है कि तुम उसे खोने से डरते हो। लेकिन जब वह पहली बार महसूस करती है कि तुम उसे खोने से नहीं बल्कि खुद को खोने से डरते हो। तब वह शांत होने लगती है क्योंकि वह समझने लगती है कि अब वह तुम्हारी प्राथमिकता नहीं तुम्हारी पसंद है। और पसंद कभी भी खुद को भगवान नहीं बना सकती। जब कोई महिला तुम्हारी कॉल इग्नोर करती है, तुम्हारे प्यार को हल्के में लेने लगती है। तब असल में वह गलती नहीं करती, वह तुम्हारी गलती को उजागर करती है। क्योंकि तुमने उसे वह जगह दे दी जो पहले तुम्हें खुद को देनी थी और इस जीवन में सबसे बड़ी मूर्खता यही है। कि तुम किसी और को वह जगह दे दो जहां तुम्हारा आत्म सम्मान होना चाहिए। जब तुम खुद को रेयर बना लेते हो, तो तुम्हारी मौजूदगी एक चुनौती बन जाती है। और याद रखो महिलाएं चुनौतियों को कभी हल्के में नहीं लेती। क्योंकि उन्हें पता है कि जो रेयर है वह हर किसी को नहीं मिलता और जो हर किसी को नहीं मिलता, वही आकर्षक होता है। वही मूल्यवान होता है, वही सम्मान योग्य होता है। एक ऐसा पुरुष जो किसी के मूड का गुलाम नहीं होता, वह एक लिमिटेड एडिशन होता है और जब तुम इस अवस्था में पहुंचते हो। तो वह खुद को भाग्यशाली समझने लगती है कि तुम उसके जीवन में हो और वहीं से उसकी अकड़ टूटने नहीं पिघलने लगती है। याद रखना, जिस दिन तुमने उसे खास समझना बंद किया उसी दिन वह पहली बार डरना शुरू करती है। क्योंकि उसे एहसास होता है कि अब उसका जादू नहीं उसकी ऊर्जा की सच्चाई दिखने लगी है और सच्चाई हमेशा अकड़ को भुला देती है। पांचवा सिद्धांत उसकी सुंदरता से प्रभावित मत हो, उसके चरित्र से प्रभावित हो। क्योंकि हर औरत जानती है कि उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी खूबसूरती है। उसकी मुस्कुराहट, उसकी आंखें, उसका आकर्षण और वह इसे इस्तेमाल करेगी। क्योंकि आकर्षण हमेशा मन को हिलाता है लेकिन जब कोई पुरुष उसकी सुंदरता को देखे और जरा भी विचलित ना हो। बल्कि उसकी सोच, उसके शब्द, उसके व्यवहार, उसके सम्मान देने की आदत को देखे तो वहीं से उसका नियंत्रण टूटता है। क्योंकि तब वह समझती है कि यह पुरुष मुझे देखने नहीं, समझने आया है। और समझा जाना किसी भी इंसान की सबसे गहरी कमजोरी है। जब तुम उसकी खूबसूरती में नहीं बल्कि उसकी चेतना में रुचि लेने लगते हो तब उसका चेहरा नहीं उसकी सच्चाई सामने आती है। और बहुत सी औरतें इसी जगह डर जाती हैं क्योंकि अब उनका चेहरा नहीं उनकी आत्मा मूल्य बनती है। और आत्मा को सजाया नहीं जा सकता। अब उसकी अदाएं नहीं चलती, अब उसका नखरा नहीं चलता, अब उसकी सुंदरता जादू नहीं, पर्दा बन जाती है। अब वह उसे हटाना चाहती है क्योंकि वह पहली बार चाहती है कि तुम उसे देखो, सच में देखो। और यही पल उसकी अकड़ की रीढ़ तोड़ देता है। छठा सिद्धांत जब वह तुम्हें इग्नोर करे तो उसे एहसास भी मत होने दो कि तुम्हें फर्क पड़ा है। क्योंकि औरत की अकड़ तब तक जिंदा रहती है जब तक तुम्हारी बेचैनी जिंदा रहती है। वह देर से जवाब दे और तुम तुरंत रिप्लाई कर दो। वह फोन उठाए ना उठाए और तुम चिंता में पड़ जाओ, वह अनदेखा करे और तुम सवाल करने लगो। तभी वह समझ जाती है कि वह तुम्हारी भावनाओं की मालिक बन चुकी है। लेकिन एक असली पुरुष क्या करता है जब उसे इग्नोर किया जाता है? वह अपनी रफ्तार धीमी नहीं करता। वह अपनी रफ्तार दोगुनी कर देता है। जिम में ज्यादा समय, लक्ष्यों पर फोकस, काम पर ऊर्जा, आदतों में अनुशासन और बिना कुछ कहे। उसके मन में एक झटका उतरता है क्योंकि वह सोचती है। क्या उसे एहसास भी नहीं हुआ कि मैंने उसे इग्नोर किया? और वहीं से शुरू होता है नो रिएक्शन अटैक। एक ऐसा युद्ध जिसमें आवाज नहीं होती लेकिन प्रभाव धरती तक हिलाता है। क्योंकि औरत को सबसे ज्यादा बेचैनी तब होती है जब वह चोट पहुंचाए। लेकिन सामने वाले पर कोई असर ना हो, उसी क्षण मौन शब्दों से ऊंचा हो जाता है। और तुम्हारी स्थिरता तुम्हारी ताकत बन जाती है जो धीरे-धीरे उसकी अकड़ को भीतर से घोल देती है। सातवां सिद्धांत उसे वही चीज दो जिससे वह सबसे ज्यादा डरती है। अनदेखा, क्योंकि जब वह अटेंशन मांगती है और तुम उसे तवज्जो देना बंद कर देते हो। तो खेल बदल जाता है। औरत जानती है कि एक स्टोरी, एक फोटो, एक प्यारी बात या एक भावनात्मक लाइन पर मर्द टूट जाते हैं। लेकिन जब तुम इस खेल को समझ लेते हो और उसकी हर अटेंशन सीकिंग चाल को पूरी शांति से नजरअंदाज कर देते हो। तो उसका घमंड टूटता नहीं, घुलता है। वह चाहे कितनी भी प्यारी फोटो लगाए, कितनी भी भावनात्मक बात डाले या तीन दिन बाद अचानक संदेश भेज दे। कैसे हो और तुम्हारा जवाब हो छोटा, शांत, सीमित। तो उसके भीतर कुछ बिखरता नहीं, कुछ जागता है एक सवाल। मैं अब उसके लिए क्यों मायने नहीं रखती? और जब तुम यह जोड़ दो कि अब जीवन पहले से बेहतर है तो यह शब्द वार नहीं, दर्पण बन जाते हैं। और उसमें उसकी अकड़ नहीं, उसकी असुरक्षा दिखाई देती है। और वह महिला जो खुद को तुम्हारी दुनिया का केंद्र समझती थी अचानक महसूस करती है कि अब वह परिधि पर है। क्यों? क्योंकि जब एक महिला अटेंशन मांगती है और पुरुष उसे वह भी नहीं देता। तो यह सिर्फ उसका घमंड नहीं तोड़ता, यह उसके दिमाग में एक डर छोड़ता है। डर यह है कि अब तुम उसके नहीं अपनी दुनिया के आदमी बन चुके हो। और वहीं उसकी अकड़ आखिरी सांस लेती है। आठवां सिद्धांत खुद को उसकी जिंदगी से ऐसे हटा दो जैसे तुम कभी उसमें थे ही नहीं। क्योंकि असली बदला कभी टकराव से नहीं लिया जाता, हवा से लिया जाता है, दूरी से लिया जाता है, मौन से लिया जाता है। और जब कोई औरत तुम्हारी इज्जत छीनने लगे, तुम्हारी मौजूदगी को हल्का समझने लगे, तुम्हारे शब्दों को महत्वहीन बनाने लगे। तुम्हारे सच्चे इमोशंस को मजाक समझने लगे, तब लड़ो मत, समझाओ मत, साबित मत करो। बस अपने कदम वापस खींच लो। क्योंकि पुरुष की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं कि वह रुक सकता है, बल्कि यह कि वह जा सकता है। और जाकर कभी पीछे नहीं देखता। जब तुम बिना बहस, बिना शिकायत, बिना आंसुओं के उसकी जिंदगी में मौजूद रहना बंद कर देते हो। तब तुम्हारा मौन शब्द बन जाता है, तुम्हारा दूर रहना संदेश बन जाता है। और तुम्हारी गैर मौजूदगी उसकी सबसे गहरी सजा बन जाती है। क्योंकि जब तक तुम वहां थे उसे तुम्हारा मूल्य महसूस नहीं हुआ। लेकिन जब तुम पूरी तरह गायब हो जाते हो तब वह अपने ही मन से लड़ने लगती है। वह खुद से सवाल पूछती है। अब मैं किस पर रब जमाऊंगी? किसके इमोशन से खेलूंगी? किसे इग्नोर करके खुद को बड़ा महसूस करूंगी? और जब वह देखती है कि तुम ना कॉल करते हो, ना मैसेज, ना स्टोरी देखते हो, ना उसका कोई सिग्नल पढ़ते हो। तब पहली बार उसे महसूस होता है कि तुम उसकी दुनिया का हिस्सा नहीं रहे। अब तुम उसकी कहानी नहीं उसकी याद बन चुके हो और यादें हमेशा घमंड से ज्यादा गहरी छोड़ देती हैं। क्योंकि उन्हें मिटाया नहीं जा सकता। जब तुम उसकी दुनिया से ऐसे हट जाते हो जैसे तुम वहां कभी थे ही नहीं। तो उसकी आत्मा के भीतर खालीपन गूंजता है और यह वही खालीपन है जो उसकी अकड़ को राख में बदल देता है। क्योंकि घमंड तभी तक जिंदा रहता है जब उसे दर्शक मिलते हैं। जैसे ही मंच खाली होता है, नाटक खुद गिर जाता है। वह महिला जो खुद को शक्तिशाली समझ रही थी, अब समझने लगती है कि शक्ति तुम्हारी उपस्थिति में थी। वह महिला जो सोचती थी तुम उसके बिना बिखर जाओगे, अब देखती है कि तुम उसके बिना और बेहतर खेल रहे हो। और वहीं उसके अंदर एक चुप्पा दर्द जन्म लेता है। वह कहती नहीं लेकिन उसके भीतर एक तूफान उठता है, एक सवाल उसे चैन से नहीं रहने देता। क्या मैंने उस पुरुष को सच में खो दिया और जब यह सवाल जन्म लेता है समझ लो उसकी अकड़ मिट चुकी है। क्योंकि कोई भी महिला उस पुरुष को खोना नहीं चाहती जिसे वह नियंत्रित नहीं कर सकती और जिसे वह समझ नहीं सकती। लेकिन जिसकी मौजूदगी उसे भीतर से हिला देती है। अब सवाल यह नहीं कि तुम किसी औरत की अकड़ तोड़ सकते हो या नहीं असली सवाल यह है। क्या तुम खुद को इतना ऊंचा उठा सकते हो कि किसी भी औरत का रवैया तुम्हारी अंदरूनी शांति को छू भी ना सके? क्या तुम इतनी जागरूकता ला सकते हो कि उसकी दूरी तुम्हारे मूल्य को ना छुए? उसका भ्रम तुम्हें ना उजागर करे, क्या तुम इतने शांत हो सकते हो कि उसका अहंकार तुम्हारे मौन के सामने खुद ही झुक जाए? क्योंकि सच्चा पुरुष वह नहीं जो औरतों से प्यार करना जानता है। सच्चा पुरुष वह है जो स्वयं पर इतना प्रभुत्व रखता है कि किसी भी औरत का रवैया उसके आत्मसम्मान को हिला नहीं सकता। सच्चा पुरुष वह है जो प्रशंसा से नहीं आदर से जीता है जो इंतजार से नहीं, दिशा से जीता है जो प्रतिक्रिया से नहीं, मौन से उत्तर देता है। और अंत में याद रखना, महिला की अकड़ को हराने का तरीका लड़ाई नहीं है, नियंत्रण नहीं है, बहस नहीं है, सबक नहीं है। तरीका सिर्फ एक है खुद को इतना दुर्लभ, मूल्यवान और स्थिर बना दो कि वह चाहे तो भी तुम्हें हल्के में ना ले सके। क्योंकि शक्ति वहां जन्म नहीं लेती जहां इच्छा हो, शक्ति वहां जन्म लेती है जहां तुम चाहकर भी किसी के लिए खुद को छोटा करना बंद कर देते हो और उस दिन से जीवन तुम्हारा खेल नहीं तुम्हारी साधना बन जाता है।

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