[0:03]मांगी हुई खुशियों से किसका भला होता है जितना अपनी तकदीर में लिखा है वह जरूर अदा होता है। नमस्कार प्यारे साथियों स्टोरियन सफर YouTube चैनल में आपका फिर एक बार स्नेह पूर्वक दिल से स्वागत है। दोस्तों आज की कहानी एक राजकुमारी की है जिसे अपनी खूबसूरती का बेहद घमंड था। लेकिन वक्त की चमक ने उसके काया के घमंड को मिट्टी में मिला दिया। मित्रों कहानी बहुत ही रोचक और प्रेरणादायक है। इसलिए आप सभी कहानी के अंत तक हमारे साथ बने रहें। तो साथियों प्राचीन समय की बात है द्रविड़ देश में माधवगढ़ नामक एक सुंदर नगर बसा हुआ था। उस नगर में विजय सिंह नाम का एक राजा रहता था उस राजा की एक बहुत ही सुंदर कन्या थी जिसका नाम मालिनी था। वह दिखने में बेहद खूबसूरत थी इसीलिए उसे अपने रूप पर बहुत घमंड था। वह राजा विजय सिंह की अकेली संतान थी इसलिए माता-पिता की वह शुरू से ही लाडली बेटी थी। उसे कभी किसी भी चीज के लिए रोका टोका नहीं गया वह स्वतंत्रता के साथ खेली कूदी और बड़ी हुई। उसे इस बात का भी अभिमान था कि वह एक राजकुमारी है। वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझती थी वह महल में आए हुए लोगों का अपमान करती रहती थी। राजा विजय सिंह की कन्या मालिनी के लिए कोई भी रिश्ता आता तो वह अपने दुष्ट स्वभाव के चलते उन रिश्तों का अपमान करके उन्हें लौटा देती थी। उसके विवाह के लिए विभिन्न राज्यों से न जाने कितने रिश्ते आए और उसने सबको अपमानित करके उनका हंसी मजाक उड़ाते हुए वहां से वापस कर दिया। राजा विजय सिंह बेटी की इन हरकतों से बहुत परेशान और चिंतित हो चुके थे। उनका राज्य कार्य में मन नहीं लगता था। एक दिन उसने अपने वफादार मंत्री की सलाह से बेटी मालिनी के लिए अपने राज्य में एक स्वयंवर का आयोजन किया। इस स्वयंवर में कई राज्यों के राजकुमार राजा महाराजा भाग लेने के लिए आए उन सभी का स्वागत किया गया और उसके बाद उन्हें आदर सहित यथोचित स्थान पर बैठाया गया। थोड़ी देर बाद राजकुमारी मालिनी हाथ में पुष्पों की माला लेकर अपनी सहेलियों के साथ राज दरबार में आई। मालिनी अपनी सुंदरता के घमंड में भरी हुई थी। वह सभी राजकुमारों को गौर से देखती हुई धीरे-धीरे आगे को बढ़ने लगी। वह जिस भी राजकुमार के सामने पहुंचती थी उसी का किसी न किसी बात पर मजाक उड़ाने लगती। सभा के बीच राजकुमारी की बातों से अपमानित होकर अपमानित राजकुमार गुस्से में उठकर स्वयंवर से बाहर चले जाते। राजकुमारी का यह बर्ताव दरबार में उपस्थित किसी को भी अच्छा नहीं लगता। थोड़ी देर बाद राजकुमारी एक मोटे से राजकुमार के सामने पहुंची। वह उस मोटे राजकुमार की हंसी उड़ाते हुए अपनी सहेलियों से बोली हे सखी देखो तो इन महाशय को इनका शरीर जैसे किसी मोटे सांड के जैसा है और यह स्वयंवर में भाग लेने आए हैं। उस राजकुमार के शरीर की बनावट पर वह काफी देर तक हंसी उड़ाती रही। वह राजकुमार राजकुमारी की बातों से अपमानित होकर दरबार से चुपचाप चला गया। इसी तरह राजकुमारी फिर अगले राजकुमार के पास पहुंच गई। वह राजकुमार देखने में कुछ लंबा था। राजकुमारी मालिनी ने अपने कटु शब्दों से उसे भी खूब अपमानित किया और कहने लगी देखो सखी यह तो कोई विशाल वृक्ष की भांति मालूम पड़ता है। इतना कहकर वह जोर-जोर से ठहाके मारने लगी। राजकुमारी के शब्दों से पीड़ित होकर वह राजकुमार भी चुपचाप मुंह बनाता हुआ वहां से चला गया। इसी तरह एक-एक करते हुए वह सभी राजकुमारों और राजाओं का अपमान करती रही। किंतु उनमें से एक राजकुमार ने राजकुमारी के लज्जित करने पर तनिक भी बुरा नहीं माना। क्योंकि वह राजकुमारी को मन ही मन अपना दिल दे बैठा था। किंतु राजकुमारी मालिनी ने उसे भी नापसंद कर दिया। वह राजकुमार भी दरबार से उठकर चला गया। साथियों अब तो एक-एक करके राजकुमारी ने सारे राजकुमारों को बेइज्जत करके नापसंद कर दिया। यह बात राजा विजय सिंह को बहुत बुरी लगी। राजा चिंतित हो उठे और मन ही मन सोचने लगे इस लड़की ने तो हमारे दरबार में आए हुए सभी अतिथियों को बेइज्जत किया है। राजा विजय सिंह ने सभी अतिथियों से राजकुमारी की ऐसी हरकत के लिए क्षमा मांगी। फिर राजा ने कहा किंतु इस लड़की को इसकी दुष्टता का दंड अवश्य मिलेगा। गुस्से में राजा ने भरे दरबार में यह घोषणा कर दी मैं अब राजकुमारी मालिनी का विवाह किसी राजकुमार से ना करके किसी भिखारी के साथ करूंगा जो प्रतिदिन भीख मांगकर ही अपना पेट भरता होगा। और उसके साथ रहकर यह भी भीख मांगकर खाएगी तो इसे अपनी करनी पर पछतावा जरूर होगा। राजा की ऐसी घोषणा सुनकर दरबार में बैठे सभी राजकुमार और राजा अचंभित होकर राजा विजय सिंह की तरफ देखने लगे। और मन ही मन प्रसन्न होकर कहने लगे ऐसी असभ्य और दुष्ट लड़की के साथ ऐसा ही होना चाहिए। इतना कहकर वे सब राजकुमार राजा के दरबार से चले गए। तभी महल के बाहर से भीख मांगते हुए एक भिखारी गुजरा। भिखारी की आवाज सुनकर राजा ने अपने नौकर को आदेश दिया कि जाओ उस भिखारी को दरबार में लेकर आओ। भिखारी की बहुत ही दयनीय दशा थी। वह फटे पुराने वस्त्र पहने था उसके हाथ में एक कटोरा था गंदे-गंदे बाल और लंबी सी दाढ़ी थी। भिखारी राजा के सामने जाकर खड़ा हो गया और डरते हुए कहने लगा महाराज मैंने कोई जुर्म नहीं किया। मुझे यहां क्यों लाया गया है। तब राजा विजय सिंह ने कहा तुमने कोई गलत कार्य नहीं किया है। इसीलिए हम तुम्हें इनाम में बेटी दे रहे हैं। राजा ने दोनों का विवाह कर दिया और कहा आज से यह तुम्हारी पत्नी है। तुम इसे अपने साथ ले जाओ और जैसे भी तुमसे बन पड़े रखना। जो भी रूखा सूखा बन पड़े स्वयं खाना और इसको भी खिलाना। राजकुमारी मालिनी अपने पिता राजा विजय सिंह का ऐसा कठोर निर्णय सुनकर बहुत दुखी हुई और जोर-जोर से रोने लगी। वह कहने लगी पिता श्री आपने मेरे साथ यह क्या कर दिया मैं इस भिखारी से शादी नहीं करूंगी। पहले तो उसने भिखारी के साथ जाने से साफ इनकार किया। पर राजा ने उसका विवाह भिखारी के साथ कर दिया था और राजा का आदेश भी था। इसीलिए उसे विवश होकर भिखारी के साथ जाना पड़ा। राजा विजय सिंह ने कहा तुमने किसी राजघराने में जाने का अधिकार पूरी तरह से खो दिया है। इसलिए अब से यह भिखारी ही तुम्हारा पति है। इसी के साथ तुम्हें अपना जीवन बिताना पड़ेगा। अगर तुमने इसे धोखा दिया या इसका साथ छोड़ा तो तुम्हें मृत्युदंड भी दिया जा सकता है। इतना कहने के बाद राजा विजय सिंह ने मालिनी को महल से विदा कर दिया। मालिनी रोती चिल्लाती हाथ पैर पीटती हुई भिखारी के साथ चली गई। भिखारी राजकुमारी को साथ लेकर एक जंगल में गया। उस जंगल में भिखारी ने एक कुटिया बना रखी थी। कुटिया के पास तरह-तरह के फूल पौधे थे भिखारी ने कुटिया के पास में एक सेब का पेड़ लगाया था। उस पेड़ में बहुत सारे पके हुए सेब लगे थे। भिखारी ने उस पेड़ से कुछ फल तोड़े और राजकुमारी मालिनी को दिए। राजकुमारी ने पहले तो सेब खाने से मना किया लेकिन उसे भूख भी लग रही थी। कुछ देर आनाकानी करने के बाद राजकुमारी ने सेब खाए और कुछ देर विश्राम किया। थोड़ी देर बाद राजकुमारी ने बाहर जाकर देखा तो एक बहुत बड़ा और सुंदर खेत था। उस खेत में फसल लहरा रही थी। राजकुमारी मालिनी ने उस भिखारी से पूछा यह इतना विशाल और सुंदर खेत किसका है। तो भिखारी ने जवाब दिया हे राजकुमारी मैंने ऐसा सुना है कि आपने राज दरबार में किसी मोटे राजकुमार का मजाक उड़ाया था। उस राजकुमार की आपने मोटे सांड से तुलना करके अपमानित किया था यह उसी राजकुमार का खेत है। इतना कहने के बाद वह कहता है आप अपना दुर्भाग्य देखिए। बदकिस्मती से मैं आपको मिला जो उस राजकुमार से भी ज्यादा खराब हूं। अगर तुम उस मोटे राजकुमार से विवाह कर लेती तो आज इस विशाल खेत की तुम स्वयं मालकिन होती। पर अब पछताने से कोई फायदा नहीं है। अब तो तुम्हें मुझ जैसे भिखारी के साथ ही जिंदगी भर रहना है। फिर वे दोनों आपस में बातें करते हुए आगे चल दिए। कुछ दूर आगे चलने पर राजकुमारी मालिनी को फल फूलों से लदा हुआ एक सुंदर बगीचा दिखा जिसमें विभिन्न प्रकार के फल फूल के पेड़ लगे थे। देखने में बहुत ही मनमोहक लग रहा था। वे दोनों चलते-चलते काफी दूर आ गए थे और थकान भी लगने लगी थी। राजकुमारी ने कहा थोड़ी देर इस बाग में रुककर विश्राम कर लेते हैं। यह सुंदर बगीचा किसका है देखने में बड़ा ही मनमोहक लग रहा है। भिखारी ने उत्तर दिया राजकुमारी यह बगीचा भी उस मोटे सांड जैसे दिखने वाले राजकुमार का है जिसका तुमने भरी सभा में अपमान किया था। इसलिए बगीचे में विश्राम करके यहां से अति शीघ्र निकल चलो वरना उस राजकुमार को पता चल गया कि उसके बगीचे में राजकुमारी विश्राम कर रही है तो वह हम दोनों को अपमानित करके भगा देगा। फिर वह भिखारी कहता है राजकुमारी सोचो अगर तुम उससे विवाह कर लेती तो यह सुंदर बाग भी तुम्हारा होता और मुझ भिखारी के साथ तुम्हें इस तरह पैदल नहीं चलना पड़ता। पर तुम्हारा घमंड ही तुम्हें महल से मेरी झोपड़ी तक ले आया है। दोस्तों वे दोनों इस प्रकार से आपस में बातें करते हुए आगे को बढ़ते चले जा रहे थे। कुछ दूर आगे जाने पर राजकुमारी ने एक अत्यंत सुंदर नगर देखा। उस नगर को देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह सुंदर नगर किसी राजा की राजधानी हो। राजकुमारी मालिनी से रहा ना गया उसने अपने भिखारी पति से पूछा यह सुंदर नगर किस राजा का है। भिखारी ने उत्तर दिया हे राजकुमारी यह नगर मेरी नजर से तो एक राजा का है परंतु आपकी नजर से तो यह मोटे सांड जैसे दिखने वाले राजकुमार का है जिसे तुमने भरी सभा में बेइज्जत किया था। सोचो अगर तुमने उस समय उस राजकुमार से विवाह कर लिया होता तो आज तुम इस नगर की रानी होती। सैकड़ों दास दासियां तुम्हारी सेवा करती। जो तुम कहती दासियां करती पर तुमने अपने रूप के घमंड में आकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली और मुझ जैसे गरीब भिखारी के साथ विवाह करके तुमने अपनी जिंदगी को नर्क में धकेल दिया है। पर अब कुछ नहीं हो सकता। जो आपके भाग्य में लिखा था वह तो हो गया। भिखारी की बातें राजकुमारी को कांटे की तरह चुभ रही थी परंतु भिखारी की बातों में सच्चाई भी थी। उसकी बातें सुनकर राजकुमारी मालिनी को बड़ा पछतावा होने लगा। कहने लगी काश मैंने उसके साथ विवाह कर लिया होता। इतना सुनते ही भिखारी गुस्से से बोला राजकुमारी खबरदार जो अब तुमने मेरे अलावा किसी अन्य पुरुष के बारे में सोचा तो अच्छा नहीं होगा। अब तुम मेरी पत्नी हो और मैं ही तुम्हारा पति हूं। और अब राजमहल के सपने देखना छोड़कर तुम्हें मेरे साथ मेरी झोपड़ी में रहना पड़ेगा। इतना कहने के बाद भिखारी ने कहा सूरज ढलने लगा है अब हमें अपनी झोपड़ी में वापस चलना चाहिए। इतना कहकर भिखारी राजकुमारी मालिनी के साथ अपनी झोपड़ी में आ गया जो राजा के नगर से कुछ दूर एक तालाब के किनारे बनी हुई थी। राजकुमारी मालिनी झोपड़ी के पास आकर जैसे ही झोपड़ी के अंदर देखती है तो उसे फटे पुराने कपड़े धूल मिट्टी नजर आती है। यह सब देखकर वह क्रोधित होकर कहने लगी यह कितनी बेकार सी झोपड़ी है मैं इसमें कैसे रह पाऊंगी। इसमें तो मेरे दास-दासियां भी रहना पसंद ना करें मैं राजमहल में रहने वाली राजकुमारी हूं इस छोटी सी झोपड़ी में मेरा गुजारा कैसे होगा। भिखारी बोला राजकुमारी अब आज से यही झोपड़ी तुम्हारा नया घर है और इसी में तुम्हें रहना पड़ेगा। राजकुमारी ने पूछा यहां पर तुम्हारा कोई नौकर चाकर नहीं दिखाई दे रहा है झोपड़ी की साफ सफाई कौन करेगा। भिखारी ने हंसते हुए कहा राजकुमारी यह कोई महल नहीं है और ना ही मैं कोई राजा हूं मैं खुद एक भिखारी हूं मैं तो नौकरों से भी बहुत गया गुजरा हूं। झोपड़ी का सारा काम अब तुम्हें और मुझे ही करना है। इतना कहने के बाद भिखारी ने राजकुमारी मालिनी से कहा चलो अब तुम पहले इस झोपड़ी की साफ-सफाई करो उसके बाद मेरे लिए खाना बनाओ मुझे बहुत भूख लगी है आज चलते-चलते मैं थक गया हूं। मित्रों राजकुमारी मालिनी को भोजन बनाना तो आता नहीं था क्योंकि उसने कभी राजमहल में भोजन तो बनाया नहीं था। इसीलिए भिखारी और राजकुमारी ने मिलजुलकर कच्चा पक्का भोजन बनाया और खाकर दोनों सो गए। इसी तरह भिखारी प्रतिदिन जो मांग कर लाता वे दोनों उसे बनाकर खाते और सो जाते। इसी तरह कुछ दिन तक चलता रहा। एक दिन भिखारी की तबीयत बिगड़ गई और वह अब मांगने नहीं जाता था। एक दो दिन इसी तरह बीत गए। घर में जो कुछ खाने को था वह भी खत्म हो गया। फिर भिखारी बोला अब खाने को तो कुछ बचा भी नहीं जो कुछ रखा था वह सब खत्म हो चुका है। आगे की जीविका चलाने के लिए हमें कुछ काम करना पड़ेगा। भिखारी ने कहा एक काम करो मैं तुम्हें इस सेब के पेड़ से सेब तोड़कर टोकरी में भर कर दे दूंगा। तुम इन सेबों को नगर में बेचकर कुछ खाने के लिए ले आना। राजकुमारी ने गुस्से से कहा मैं सेब बेचने नगर में नहीं जाऊंगी। अगर किसी ने नगर में मुझे सेब बेचते देख लिया और पहचान गया तो वह मेरी बहुत हंसी उड़ाएगा। इतना सुनते ही भिखारी बोला काहे की शर्म अब तो तुम ना किसी राजमहल में रहती हो और ना ही कोई राजकुमारी हो। अब तो बस तुम एक भिखारी की पत्नी हो शर्म तो तुम्हें तब लगती जब तुम कोई राजा की पत्नी होती और वह तुमसे नगर में सेब बेचने को कहता। इतना कहने के बाद भिखारी बोला अगर शर्म ही आती है तो फिर भूखा ही मरो। साथियों मजबूर होकर राजकुमारी सेब बेचने नगर में जाने लगी। सारा दिन वह नगर में सेब बेचती और शाम को लौटते समय उधर से कुछ खाने के लिए लेकर आती और दोनों खाना खाकर सो जाते। अब तो यह उनके प्रतिदिन की दिनचर्या बन गई किंतु धीरे-धीरे उसके सेब खूब बिकने लगे। एक दिन की बात है जब राजकुमारी मालिनी नगर में सेब बेच रही थी तभी वहां पर एक राजा का दुष्ट मंत्री आता है और मालिनी से मुफ्त में फल मांगता है। मालिनी फल देने से मना कर देती है उसके मना करने से मंत्री गुस्से में उसकी टोकरी पर लात मार देता है और उसके सारे सेब इधर-उधर फैला देता है और बोलता है खबरदार जो इस नगर में दोबारा आई तो ठीक नहीं होगा। राजकुमारी मालिनी के बहुत सारे सेब फूट गए थे और उसका बहुत नुकसान हो गया था। राजकुमारी को बड़ा दुख हुआ उसने सारी बात झोपड़ी में आकर अपने भिखारी पति को बताई कि आज एक राजा के मंत्री ने उसके सेब से भरी टोकरी पर लात मारकर सारे सेब फोड़ डाले। भिखारी ने कहा तुम बिल्कुल पागल हो अगर उस मंत्री ने मुफ्त में सेब मांगा था तो दे देना चाहिए था। अब तुमसे यह भी काम ठीक से नहीं हो पा रहा तुम्हारे लिए कोई दूसरा काम खोजना पड़ेगा। इतना कहकर भिखारी काम की तलाश में झोपड़ी से निकल पड़ा और राजा के एक बड़े अधिकारी के यहां काम तलाश आया और आकर राजकुमारी मालिनी से कहा मैंने तुम्हारे काम की व्यवस्था कर दी है। कल से तुम महाराज उद्यम सिंह की राजकीय रसोई में जाया करोगी और वहां के रसोई के साथ मिलकर खाना बनाना है। वहां से हम दोनों को खाने के लिए अच्छा-अच्छा भोजन भी मिलता रहेगा। इस प्रकार वह राजकुमारी रसोईए की मददगार बनकर काम करने लगी। वह सारा दिन रसोइयों के साथ मिलकर काम करती और रात को बचा हुआ खाना अपने घर ले आती। इस तरह दोनों की जिंदगी अब कुछ सुकून से कटने लगी। एक दिन राजकुमारी मालिनी रसोई घर में काम कर रही थी तभी उसने रसोई घर से बाहर निकल के देखा तो पूरा राजमहल सजा हुआ था। नगर में कुछ उत्सव होने वाला था राजमहल में मेहमान आ रहे थे उनका भव्य स्वागत किया जा रहा था। राजकुमारी यह दृश्य देखकर अपनी किस्मत को कोस रही थी अपनी किस्मत पर आंसू बहा रही थी और सोच रही थी कि काश मैं इतनी घमंडी नहीं होती तो मुझे आज यह दिन देखने को नहीं मिलता। राजकुमारी मालिनी इतना सोचकर फफक-फफक कर रोने लगी। थोड़ी देर बाद वहां रानी की दासियां आती हैं उसे अपने साथ महल में ले जाती हैं और उसे महल दिखाती हैं। महल देखने के बाद वह अपने रसोई घर में वापस आती है और बचा हुआ खाना लेकर अपनी झोपड़ी के लिए जैसे ही वह बाहर निकलती है तभी सामने से एक राजसी परिधान पहने हुए एक पुरुष ने उसे ऊंचे स्वर में आवाज दी रुको कहां जा रही हो। इतना सुनते ही मालिनी रुक गई। राजकुमारी ने जब उस पुरुष के चेहरे को देखा तो वह डर के मारे कांपने लगी। क्योंकि वह सांड जैसे दिखने वाला वही राजकुमार था जिसको मालिनी ने अपने महल में अपमानित किया था। उस राजकुमार ने राजकुमारी से कुछ नहीं कहा बल्कि वह उसे अपने साथ राज दरबार में चलने का आदेश देता है। मालिनी उस राजकुमार के साथ चल देती है। दरबार में पहुंचकर उसने देखा दरबार में मेहमान बैठे हुए थे वह दरबार की भव्यता को देखकर घबरा गई। राजकुमारी के डर के मारे हाथ पैर कांपने लगे उसके हाथ से खाने की टोकरी छूट कर जमीन पर गिर पड़ी। टोकरी में रखा हुआ खाना जमीन पर गिरकर बिखर गया। राजकुमारी बहुत डर गई दरबार में बैठे हुए मेहमान यह देखकर जोर-जोर से मालिनी के ऊपर हंसने लगे। सबको हंसता देखकर वह शर्म से मरी जा रही थी वह सोच रही थी भगवान अभी धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं। सबको हंसते देख जब वह दरबार से जैसे ही जाने लगी राजकुमार ने कहा रुको राजकुमारी घबराओ मत। तुम्हारे साथ कोई अभद्रता का व्यवहार नहीं करेगा बल्कि तुम्हें मैं यहां यह बताने के लिए लाया हूं मैं वही तुम्हारा भिखारी पति हूं जो तुम्हारे साथ झोपड़ी में रहता था। और मैं वही मंत्री हूं जिसने तुम्हारे सेब से भरी टोकरी पर लात मारी थी और मैं ही यहां के राजा उद्यम सिंह का पुत्र और इस राज्य का राजकुमार हूं। जब तुमने मुझे अपमानित किया था तो मैं दरबार के बाहर खड़ा होकर सब देख रहा था जैसे ही राजा विजय सिंह ने तुम्हारी शादी भिखारी से कराने की प्रतिज्ञा ली। मैंने तुरंत भिखारी की वेशभूषा धारण कर ली और तुमसे विवाह कर लिया अब तुम्हारा घमंड भी टूट चुका है। इतने सारे मेहमान हम दोनों के विवाह के लिए एकत्रित हुए हैं अब तुमसे राजसी सम्मान के साथ विवाह करूंगा। यह सब देखकर राजकुमारी को बड़ी प्रसन्नता हुई। खुशी के मारे उसकी आंखें आंसुओं से भर गई। राजा ने दरबार में मालिनी के माता-पिता को भी आमंत्रित किया था वे भी मौजूद थे। सबने राजकुमारी को खूब आशीर्वाद दिया अब राजकुमारी का सारा घमंड चूर हो चुका था। वह पूरी तरह से बदल चुकी थी। उसने जिंदगी को अब नए तरीके से जीना सीख लिया था।
[19:46]साथियों अत्यंत सुख सुविधा मनुष्य के लिए कष्टदायक होती है। मनुष्य ज्यादा सुख सुविधा में पलकर अपने अनुभवों तथा संस्कारों से परिचित नहीं रह पाता जो उसके जीवन में आगे बहुत कष्टदायक साबित होते हैं। इसलिए मनुष्य को कभी भी किसी बात का घमंड नहीं करना चाहिए। ईश्वर जब तुम्हें किसी एक गुण से सुसज्जित बनाता है तो अन्य कई गुणों से तुम्हें वंचित रखता है ताकि तुम्हें जब भी कभी जीवन में अभिमान हो तो तुम्हें उसका सबक मिल सके। इस तरह राजकुमारी को अपनी करनी पर बहुत दुख हुआ। उसकी आंखें ग्लानि के आंसुओं से भर गई। उसने अपनी गलती स्वीकार की और अपने पति के साथ बड़े आनंद से रानी की तरह जीवन व्यतीत करने लगी। दोस्तों जो औलाद अपने माता-पिता की बात नहीं मानती मनमानी करती है तथा अपने माता-पिता का अपमान करती है उन्हें सबके सामने नीचा दिखाती है। ऐसी संतान मुसीबत से सदैव घिरे रहते हैं। माता-पिता का भी अपने बच्चों के प्रति एक कर्तव्य बनता है कि वे अपनी संतान को बचपन से ही अच्छे गुण सिखाएं और उन्हें बुरी संगत से बचा कर रखें। मित्रों कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनका अगर ठीक से अनुसरण किया जाए तो वह जीवन के मार्गदर्शन में बहुत काम आती है। संतान को अनुशासित और संस्कारित बनाना हर माता-पिता की प्राथमिक जिम्मेदारी है। बेटा हो या बेटी उन्हें जरूरत से ज्यादा स्वतंत्रता देना बुद्धिमानी नहीं है। जरूरत से ज्यादा छूट अक्सर अनुशासन हीनता को जन्म देती है और इसका सबसे बड़ा कारण स्वयं माता-पिता होते हैं। यदि बच्चे मनमानी करने लगे अनुचित व्यवहार करने लगे तो माता-पिता को अंधे प्रेम में उनकी तरफदारी नहीं करनी चाहिए। बच्चों की गलतियों पर उन्हें पहले प्यार से समझाएं और यदि आवश्यक हो तो डांट फटकार से भी संकोच ना करें। बच्चों में संस्कार तभी आते हैं जब उन्हें बचपन से ही सही गलत की पहचान कराई जाए और समय-समय पर उन्हें उचित मार्गदर्शन दिया जाए। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को बचपन से अनुशासन और नैतिकता का पाठ पढ़ाया होता है वही संतान बड़े होकर माता-पिता की बात मानती है। यह हर माता-पिता का कर्तव्य है कि वे अपनी संतान को अच्छे संस्कार दें उन्हें सामाजिक जीवन के नियमों और व्यवहारों की समझ दें। बच्चों की परवरिश प्रेम के साथ-साथ अनुशासन और मर्यादा के संतुलन से होनी चाहिए। साथियों उम्मीद करता हूं कहानी पसंद आई होगी और आपको इससे कुछ सीखने को मिला होगा।
[23:25]कहानी अच्छी लगी हो तो वीडियो को लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब कर लेना साथ में बैल आइकन भी दबा देना। मिलता हूं आपको एक और शिक्षाप्रद कहानी के साथ। धन्यवाद जय श्री कृष्णा।



