[0:00]आइए आज समझते हैं, समझने का प्रयास करते हैं। मैं आज के विषय को आपके सामने रखता हूं। हमारी प्राचीन दार्शनिक परंपरा में दो प्रकार की पढ़ने का जो क्रम होता है, वो दो प्रकार से होता है। पहला जो पढ़ने का क्रम है, उसमें पूर्व पक्ष होता है। पूर्व पक्ष में हम जो हमारे सामने प्रॉब्लम है, जो हमारे सामने समस्या है, उस समस्या पर चारों ओर से विचार करते हैं, हम सब लोग मिलकर विचार करते हैं। उस समस्या को जानने का समीचीन प्रयास करते हैं और सम्यक तरीके से जानने का प्रयास करते हैं कि वास्तव में प्रॉब्लम है क्या? इसके कितने एंगल हैं? कितने कोने हैं? कितनी कितनी तह, कितनी सतहें हैं? उन सतहों से उसे देखने की कोशिश करते हैं और जब वो सारी सतहें हमारे सामने खुल जाती हैं तब हम उसके समाधान पक्ष की ओर बढ़ते हैं वो भी हम सब लोग मिलकर करते हैं। और फिर बाद में देखते हैं कि यदि अब कोई गुंजाइश रह गई तो उसे ठीक करें जिसे हम प्रश्न काल में ठीक करते हैं। तो आइए मैं पूर्व पक्ष की ओर बढ़ता हूं आज का हमारा विषय है, ईश्वर है या नहीं है। सारे संसार में ईश्वर को लेकर जितना झगड़ा है, इतना संसार में किसी अन्य वस्तु को लेकर नहीं। संसार में झगड़े का सबसे बड़ा कारण अगर कोई है तो ये ईश्वर है। दुनिया में जितनी मारकाट हुई है उस मारकाट में सबसे ज्यादा खून ईश्वर के कारण बहा है। दुनिया के लोगों ने जिहाद किया है, क्रुसेड किए हैं, धर्म युद्ध किए हैं, कारण, कारण ईश्वर। मेरी तरह का ईश्वर मेरा ईश्वर है। मैं आपके ईश्वर को नहीं मानता। और अगर आप मेरी तरह के ईश्वर को नहीं मानेंगे तो मैं आपकी हत्या कर दूंगा। इसी ईश्वर के आधार पर बहुत सारे मत मजहब और मता तर खड़े हो गए, संप्रदाय खड़े हो गए। इन संप्रदायों, इन मत मजहबों ने इसी ईश्वर के नाम पर, इसी धर्म के नाम पर लाखों नहीं, करोड़ों लोगों का खून बहाया है। कभी ईश्वर को मानने वाले लोगों ने खून बहाया है और कभी नास्तिकों ने खून बनाया बहाया है ये कहकर कि भई मैं ईश्वर को नहीं मानता तो तू क्यों मानेगा नहीं मानेगा तो अगर तू मानेगा तो मैं तुझे मार डालूंगा। अकेले स्टालिन ने रशिया में डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोगों को फांसी दे दी, मार दिया, गोली से उड़ा दिया। अकेले स्टालिन ने, वो बहुत बड़ा विश्व युद्ध हुआ, उसमें लोग मारे गए। इन सबके सतही कारणों को छोड़कर अगर भीतर जाकर देखेंगे तो कारण ईश्वर है। अब प्रश्न हमारा आज का ये है ईश्वर है या नहीं है। बहुत सारे लोग ये मानते हैं कि ईश्वर है और बहुत सारे लोग ये मानते हैं कि ईश्वर नहीं है। दुनिया में साढ़े सात सौ करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। इनमें से कुछ लगभग मान के चलिए 55-60 परसेंट के आसपास ये मानते हैं कि ईश्वर है और बाकी 35-40 परसेंट ऐसे हैं जो ये मानते हैं कि ईश्वर नहीं है। लगभग-लगभग बराबरी संख्या है थोड़ी बहुत ही कम होगी। ईश्वर को न मानने वाले अपने तर्क देते हैं और ईश्वर को मानने वाले अपने तर्क देते हैं। जो ईश्वर को मानने वाले हैं वो न मानने वालों को झूठा कहते हैं और जो न मानने वाले हैं वो मानने वालों को झूठा कहते हैं। आखिर सच क्या है? ईश्वर है या नहीं है? ये प्रश्न साधारण प्रश्न नहीं है। ये जटिल प्रश्न है। हम लोग इसे बहुत साधारण प्रश्न समझ लेते हैं।
[3:18]और साधारण प्रश्न समझकर इसकी उपेक्षा कर देते हैं। जिसका परिणाम ये निकलता है कि जो सबसे मूल तत्व है जिसके संबंध में इतना खून बहा है उसके बारे में हम जान नहीं पाते। आइए आज जानने का प्रयास करते हैं ईश्वर है या नहीं है। मैं प्रार्थना करूंगा जो पुराने लोग हैं कक्षा में वो कृपया हाथ नहीं उठाएंगे। बिल्कुल हाथ नहीं उठाएंगे और किसी प्रश्न पर मैं आपका कोई उत्तर नहीं चाहता। कृपया सबके लिए माइक अन म्यूट करने का ऑप्शन खोल दीजिए और सब लोग हाथ उठा सकें ऐसी भी व्यवस्था कर दीजिए। और मैं एक-एक व्यक्ति से आप अपनी तरफ से नहीं आएंगे बीच में। मैं एक-एक व्यक्ति के पास आऊंगा और आपसे पूछूंगा उसके बारे में। आप मुझे बताएंगे। यहां एक बात समझ लीजिए। कुछ लोगों को ऐसा लगेगा जब आप कहेंगे कि ईश्वर नहीं है तो मैं उसका विरोध करूंगा तो कुछ लोगों को लगेगा ये तो अपना ही मत मान रहा है। तो मैं जब आपका विरोध करूंगा जब आप कहेंगे कि ईश्वर है और मैं विरोध करूंगा तो आप उसे विरोध नहीं मानिएगा। आप समझिएगा कि मैं दूसरी ओर के प्रश्न उठाने की बात कर रहा हूं। जब आप कहेंगे कि ईश्वर नहीं है तो भी मैं आपका विरोध करूंगा उसे विरोध नहीं मानिएगा। समझिएगा कि मैं दूसरी ओर के प्रश्न उठाने का प्रयास कर रहा हूं। हर्ष पटेल जी। हर्ष पटेल जी क्या आप पहले इस कक्षा से जुड़े हैं कभी? नहीं सर इसी बार पहली बार जुड़ रहा हूं आचार्य जी। बताइए ईश्वर को मानते हैं या नहीं मानते हैं? इस सर को मानता हूं आचार्य जी मैं। कहां मिला था आपसे? हमारे अंदर ही है परमात्मा आत्म तत्व तो उसी के थ्रू मैं मानता हूं। अच्छा आपके भीतर ईश्वर है? हां हां। अच्छा मेरे भीतर भी है क्या ईश्वर? हां हां सबके अंदर ही ईश्वर ये पक्का? हां हां श्यर। अच्छा ये बताओ जिसने बंगाल में उस लड़की का बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी उसका पैल्विक गर्डल तोड़ के उसके भीतर भी था ईश्वर? बड़ा खतरनाक ईश्वर है आपका तो रेप करता है। ईश्वर ईश्वर नहीं रेप करता है। फिर कौन करता है? जिसने जिसने शरीर को मतलब कि हमारे अंदर जो ईश्वर है, और हां अपने शरीर को मान लेते हैं कि हम मैं हूं। नहीं, आप आप बड़े आप ताकतवर के ईश्वर ताकतवर? ईश्वर ताकतवर है। तो ताकतवर ईश्वर आपको रोक क्यों नहीं पाता रेप करने से? वो हमें क्या नहीं बातें? चलिए, विचार करते रहिएगा। मैंने केवल प्रतिपक्ष के प्रश्न दिए हैं आपको। अनम्यूट आप अपना म्यूट कर लीजिए मैं आगे चलता हूं। विचार करते रहिएगा। मैं विरोध नहीं कर रहा हूं। मैं केवल दूसरी ओर के प्रश्न उठा रहा हूं जो आपके सामने समाज के बीच में जाने पर उठेंगे। कल्पना चौधरी जी। नमस्ते गुरु जी। नमस्ते। ईश्वर को मानती हैं या नहीं? हां जी। अगर आपके आसपास कोई टीवी चल रहा है या आपके आसपास शोर है तो कृपया वहां ना बैठे। कल्पना जी ईश्वर को ईश्वर को मानती हैं तो कैसे पता चला आपको ईश्वर है? ईश्वर अ कहीं ना कहीं मेरा धार्मिकता में नजर आता है कि मेरी धार्मिकता है, नम्रता है, जो सामने वाले का दुख में काम आता है और बदमाशों का ये करने बदमाश लोगों के लिए फाइट करने के लिए खड़ा रहता है वो वो ईश्वर है। अच्छा ठीक है। दुष्टों को दंड देता है और अच्छे लोगों को सज्जन लोगों को सुख देता है, यही कह रही हैं आप? हां जी। अच्छा मुझे ईमानदारी ईमानदारी से एक प्रश्न का उत्तर देंगी कल्पना जी। हां जी। क्या आपका ईश्वर संसार को देखिए। संसार में जो लोग घोटाले करते हैं, भ्रष्टाचार करते हैं, जो लोग फ्रॉड कर रहे हैं, वो तो खूब सुखी हैं, फल फूल रहे हैं, उन्नति कर रहे हैं। बड़े-बड़े हो गए उन्होंने बहुत बड़ी-बड़ी आर्मी बना लिए, लोगों की हत्याएं कर रहे हैं। और जो सुखी और सज्जन लोग हैं हम सामान्यता देखते हैं वो दुख पाते हैं। तो आपका ईश्वर क्या कर रहा है उस समय? वह प्रारब्ध का हिसाब से वो अपने को देता है ना प्रारब्ध। अच्छा अच्छा प्रारब्ध के हिसाब से देता है तो फिर ईश्वर का क्या लेना-देना। हम अपने कर्म से काम चला लेंगे। कर्म से हां जी। ईश्वर की क्या जरूरत है फिर? हां जी। विष्णु जी। विष्णु जी अनम्यूट कीजिए पहले। प्रणाम गुरु जी। जी नमस्ते। जी बड़ा सौभाग्य है कि इस क्लास में जुड़े हैं और आपकी बात सुनी है बड़ा संतुष्टि मिली है और अगर आपकी आज्ञा हो तो हम भी। ईश्वर को मानते हैं विष्णु जी? हां ईश्वर को मानते हैं। कैसे पता चला कि ईश्वर है? हम ईश्वर के अंश हैं। ईश्वर करता है और हमें बना दिया है। अब हम अपने अनुसार जो है सही गलत का निर्णय लेते हैं। और ध्यान के माध्यम से ईश्वर को जाना जा सकता है। वही विधि से हम जानने का प्रयत्न कर रहे हैं पिछले छह माह से। और लगभग-लगभग जो जो है।
[8:10]जी अच्छा विष्णु जी एक प्रश्न का उत्तर दीजिए मेरे। एक बड़ा कागज का टुकड़ा लीजिए। और उस कागज के टुकड़े में से छोटे-छोटे कागज तोड़ते रहिए। विष्णु जी अगर आपके आसपास शोर है तो कृपया शोर से दूर हो जाएं। जी शोर नहीं है सर। मैं अकेले हूं एकांत में हूं। ठीक है। अ एक बड़ा कागज का टुकड़ा लीजिए। और उस कागज के टुकड़े में से छोटे-छोटे उसमें से कागज के छोटे-छोटे टुकड़े अलग कीजिए। अगर कागज के छोटे-छोटे अंश करते चले जाएंगे तो एक समय क्या होगा पूरा का पूरा कागज? बोलिए पूरा का पूरा कागज क्या होगा विष्णु जी? टूट जाएगा सर। खत्म हो जाएगा ना? जी। अगर हम ईश्वर के अंश हैं तो ईश्वर में से अंश लेते-लेते-लेते ईश्वर खत्म क्यों नहीं हो जाता? ईश्वर सर वो परिभाषा से परे हैं। ये ये निर्जीव पदार्थों से हम उसका जो है तुलना नहीं कर सकते हैं। तो फिर क्या हम उसके बारे में क्या हम उसके बारे में चर्चा नहीं कर सकते, तर्क नहीं कर सकते? कर सकते हैं लेकिन वो निर्जीव नहीं है, वो सजीव हैं। वो करता है। अच्छा चलिए चलिए सजीव की चर्चा चलिए सजीव की चर्चा कर लेते हैं। मुझे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए विष्णु जी। आप आप क्या मानते हैं ईश्वर कैसा है? अल्प शक्तिमान है कि सर्वशक्तिमान है? सर्वशक्तिमान है सर। अच्छा एक बात बताओ अगर आप ईश्वर के ईश्वर के अंश हैं तो आप में भी तो ईश्वर वाला गुण होना चाहिए आप सर्वशक्तिमान क्यों नहीं? ईश्वर ईश्वर का जो अंश है हमारे अंदर इसलिए हमारे अंदर ईश्वरी गुण है लेकिन जो माया चक्र है उसके कारण हम जब अगर नकारात्मक विचारों से घिर जाते हैं क्योंकि अंश हैं तो नकारात्मकता बढ़ने के कारण हम उस चीज को पहचान नहीं पाते हैं। ध्यान के माध्यम से यह संभव किया जा सकता है। अंश क्यों नहीं पहचान पाएगा? अंश क्यों नहीं पहचान पाएगा? इसका क्या कारण है? इसका कारण वातावरण है सर। वातावरण में नकारात्मक इतना ज्यादा फैल गया है। यानी यानी ईश्वर इतना कमजोर है कि वातावरण से कमजोर रह जाता है। यही सर ईश्वर तो वो जब हम जो करेंगे उसका फल तो हमें मिलना ही मिलना है। सकारात्मक करेंगे तो सकारात्म। विष्णु जी विचार विचार जरूर करते रहिएगा। ठीक है, सुधांशु जी सुधांशु दत्ता जी। नमस्ते आचार्य जी। जी नमस्ते। मैं ईश्वर को। मानते हैं ईश्वर को? कैसे पता चला आपको कि ईश्वर है? एक्चुअल में मैं ईश्वर ईश्वर से ज्यादा उनके स्वरूप स्वरूप के बारे में आपको बताऊंगा। मेरा ये मानना है कोई प्रतीक चिन्ह नहीं ईश्वर जो होता है वो हमारे सांसों में जैसे हमारे में भगवान बोला जाता है ईश्वर को। तो भगवान को मैं इस रूप में देखता हूं। चाहे वो भूमि हो, या गगन हो, वायु हो, अग्नि हो या नीर हो।
[11:06]तो हमारे जो हमारे प्रकृति में जितना भी चीज है उसी में मैं ईश्वर को देखता हूं और उनका सेवा ही ईश्वर की सेवा मैं यही जानता हूं। मतलब आप प्रकृति को ईश्वर मानती हो? जी बिल्कुल। ठीक है। देखो जो प्रकृतिवादी होते आप माइक म्यूट कर लीजिए। जो प्रकृति को मानते हैं वो प्रकृति क्योंकि जड़ है, चेतन नहीं है। इसलिए वो लगभग लगभग नास्तिक होते हैं। लेकिन वो नास्तिकता में विश्वास नहीं करते, उन्हें ऐसा लगता है कि मैं नास्तिक नहीं हूं, मैं आस्तिक हूं। क्योंकि वो प्रकृति को ईश्वर मानकर उसकी उपासना करते हैं, लेकिन प्रकृति की उपासना करना नास्तिकता ही है, क्योंकि नास्तिक लोग क्या करते हैं, वो किसी चेतन की उपासना नहीं करते, अपितु जड़ की उपासना करते हैं। वायु है, जल है, अ जंगल है, जमीन है, इन सब का संरक्षण करना संसार को सुरक्षित रखने का तरीका है। इसके बिना संसार में जीवन सुरक्षित नहीं रहेगा। ये बिल्कुल सही बात है इनकी। ये तरीका सही है, लेकिन ये आस्तिकता तो नहीं है। आइए और समझने का प्रयास करते हैं ईश्वर के बारे में। गिरीश शर्मा जी। प्रणाम आचार्य जी। जी गिरीश जी। इसमें तो मुझे लगता है कि मता तर की भी गुंजाइश नहीं है कि ईश्वर नहीं है। और मेरा तो मेरा अपना ये मत है कि ईश्वर के ना होने के बारे में तो कोई सवाल उठता ही नहीं, क्योंकि प्रकृति भी और हमारी प्राणवायु भी और सब कुछ इस संसार में इस ब्रह्मांड में जो संचालित है। सूर्य का उगना, चंद्रमा का आना, फिर सब कुछ समय से निर्धारित है तो इसमें मेरा अपना जो मत है वो ये है कि ईश्वर ना होने की बात करना तो मुझे लगता नहीं कि इसमें कुछ सार है, तत्व है। गिरीश जी ये तो ये होता है कि मैं किसी चीज से बहुत ज्यादा सहमत हूं तो उसके विपरीत विचार मेरे मन में उठते ही नहीं है। जैसे मैं अपनी बेटी से बहुत प्रेम करता हूं तो मुझे ये लगता ही नहीं है कि मेरी बेटी से कोई द्वेष कर सकता है। इसी तरह से जब मैं ईश्वर को मानता हूं तो मुझे लगता ही नहीं है कि ईश्वर को न मानने का भी कोई कारण हो सकता है, लेकिन दुनिया में स्टीफन हॉकिंस भी तो एक साइंटिस्ट हुए हैं। बहुत विद्वान थे। आप और मुझसे कम बुद्धिमान नहीं थे। हम से बड़े बुद्धिमान होंगे, लेकिन वो ईश्वर को नहीं मानते थे। प्रकृति को इतनी बारीकी से उन्होंने देखा है। सूर्य का चलना, पृथ्वी की गति, पृथ्वी के वलय, उसके ऊपर उपग्रहों के वलय, पूरे ब्रह्मांड आकाशगंगाओं की प्रक्रिया, परमाणु से लेकर समय पर्यंत एक-एक चीज पर विचार करना। ठोस विचार करना, ठोस हाइपोथिसिस देना, उसके ऊपर प्रैक्टिकल करना और प्रिंसिपल सिद्धांतों तक पहुंचना, ये ऐसे वैज्ञानिकों का दिन-रात का काम है। लेकिन वो कहता है कि ईश्वर नहीं है। तो हम ये कैसे कह सकते हैं कि ये प्रश्न नहीं उठ सकता कि ईश्वर नहीं है? लेकिन लेकिन आचार्य जी क्षमा करना मुझे जो स्टीफन हॉकिंस ने क्वांटम फिजिक्स या सारे जो सिद्धांत दिए और सबकी बातें की। उसके पीछे कोई तो संचालक है। नहीं वो तो ठीक है कि आप मान रहे हैं कि उसके पीछे कोई न कोई संचालक है। लेकिन वो कहते हैं ऐसा कोई संचालक दिखाई नहीं देता ये विज्ञान है और विज्ञान का एक चक्र होता है। और उस चक्र में चीजें घूम जाती हैं। अब कोई ये कहे कि साइकिल के पहिए में पहला बिंदु कहां है तो जहां भी आप हाथ रखेंगे उसके पीछे भी एक बिंदु है, उसके पीछे भी एक बिंदु है, उसके पीछे भी एक बिंदु है। वो कहते हैं ये सारा साइंस इसी तरह घूम रहा है। हर चीज के पीछे कोई साइंस का कोई दूसरा कारण है, उसके पीछे कोई दूसरा कारण, उसके पीछे कोई दूसरा कारण, उसके पीछे कोई दूसरा कारण। और कोई भी ऐसा प्रारंभिक कारण नहीं है जहां से आप कहें कि यहां से विज्ञान की शुरुआत हुई। इसलिए ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है। वो अज्ञात शक्ति ही ईश्वर है एक्चुअली। अच्छा शक्ति तो है ही है नहीं, वो कह रहे हैं विज्ञान है विज्ञान के नियम काम कर रहे हैं अज्ञात तो नहीं है सब कुछ ज्ञात है। मेरा तो मानना है विज्ञान भी जहां तक पहुंचा है उसमें अभी बहुत अज्ञात है। नहीं ये ये सोचना ठीक है। सोचने में तो मैं आपसे सहमत हूं। लेकिन तर्क की बात हम करेंगे कि हमें कैसा पता चले, मान लीजिए मैं नास्तिक हूं तो आप मुझे कैसे समझाएंगे कि ईश्वर है? आचार्य जी हमें तो ऐसा लगता है कि वो इतनी जबरदस्त ड्राइविंग फोर्स है कि ये माना जाता है और मतलब इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि पत्ता तक भी नहीं हिल सकता। ये तो ये तो आपकी ये तो आपकी पवित्र निष्ठा और श्रद्धा है, लेकिन तर्क क्या है? चलिए। गिरीश जी ने बहुत अच्छा वार्तालाप किया और मैं आप लोगों से एक चीज कहना चाहता हूं कि वार्तालाप अच्छा ही करें। डरें हटे नहीं जो मैं कह रहा हूं मैं हर बात पर सही नहीं हूं, मैं बहुत सारी बातों पर गलत हो सकता हूं, मेरा विरोध करें। नरेश चौहान जी। मेरा सौभाग्य है। नरेश चौहान जी। नमस्ते गुरु जी। ईश्वर को मानते हैं नरेश जी? हां जी। कैसे पता चला कि ईश्वर है? आपसे कहां मिला था? बात हुई चिट्ठी-पत्री आई, टेलीफोन आया हो, कभी बताया हो कि मैं यहां हूं ऐसा हूं या किसी और व्यक्ति ने बताया हो। मतलब गुरुजी इस संसार में कोई कुछ भी अगर सृष्टि में अगर किसी का भी जन्म होना है तो उसके पीछे कुछ कोई तो शक्ति चाहिए। जन्म के पीछे माता-पिता हैं, माता-पिता का रे-टेस्ट शक्ति है। ठीक है मैं माता-पिता के ऊपर उनके दादा उनके माता-पिता दादा-दादी। तो उसके ऊपर लास्ट तक चले जाएंगे जब पृथ्वी पर पहला इंसान आया तो कुछ कोई तो शक्ति होगी। कोई भगवान। अब देखो विज्ञान के दो रूप हैं। एक रूप मानता है कि कोएसर्वेट से दुनिया उत्पन्न हुई है। दूसरा रूप ये मानता है कि दुनिया कभी उत्पन्न नहीं हुई, हमेशा से ऐसी चली आ रही है। इसलिए इसका कोई और छोर नहीं है। रवि जी। हां आचार्य जी कोई न कोई तो ऐसा होगा जिन्होंने मतलब इस संसार की उत्पत्ति रचना करी है। मतलब अगर कोई न कोई वाली बात है तब तो तुक्का है ना? तर्क क्या है? तर्क शायद हमारी इतनी बुद्धि का विकास नहीं हो पाया होगा कि हम उसको जान पाएं इतनी सरल भाषा में। क्यों नहीं हो पाया मनुष्य चांद तारों पर पहुंच गया है, मनुष्य ने इतने बड़े-बड़े प्रकाश वर्ष दूरियों को पार कर लिया है, मनुष्य ने इतने बड़े-बड़े परमाणु बम बना लिए हमारी इतनी भी बुद्धि नहीं कि हम ये जान सके कि किसी रचना के पीछे कुछ है कि नहीं है? चलिए, लेकिन आपका तर्क अच्छा है, आगे चलते हैं। राजू। गोपाल शर्मा जी अनम्यूट कीजिए। हेलो नमस्ते जी। जी नमस्ते। आचार्य जी ईश्वर है। कैसे कैसे पता चले कि ईश्वर है? ईश्वर कहते हैं ईश्वर है इसका पता चल सकता है कि कहते हैं जैसे आपने ब्रह्मांड की रचना ईश्वर ने करी है। हां। अच्छा ये ये कैसे पता है ये तो आपका तुक्का है। आपको आपको पूर्वजों ने ऐसा बताया, आपके आसपास का माहौल ऐसा बताता है कि ब्रह्मांड की रचना ईश्वर ने करी। ऐसा कैसे पता चला कि ईश्वर ने ब्रह्मांड की रचना की है तो विज्ञान से हुई बिग बैंग थ्योरी से हुई, जो का विस्फोट हुआ उससे बना। नहीं विज्ञान भी हमें समझ कृष्ण ने दी, ईश्वर ने दी। हम विज्ञान को समझ कैसे पाते कि अ ईश्वर न होता तो विज्ञान को हम कैसे समझ पाते? नहीं ईश्वर हमें थोड़ी विज्ञान समझा रहा है, अध्यापक समझाते हैं विज्ञान तो और हमारे समझने से मतलब नहीं है। विज्ञान संसार में मौजूद है मैं समझूं या ना समझूं, लेकिन विज्ञान ही संसार को बना रहा है। एक-दो प्रश्न मैं और ले लेता हूं उसके बाद मैं आगे बढूंगा। शशिकांत सूर्यवंशी जी। नमस्कार आचार्य जी। जी नमस्ते। सर मेरा ये प्रश्न था कि भगवान है तो है। लेकिन जिस प्रकार हमारा शरीर चल रहा है उसी प्रकार भगवान ने हमारी सृष्टि का निर्माण भी किया है। क्योंकि हमारा शरीर सुव्यवस्थित ढंग से अपने सभी कार्य करता है। सुव्यवस्थित कहां करता है? तो बीमार हो जाता है, कोरोना हो जाता है, कैंसर हो जाता है, हेपेटाइटिस हो जाता है, लोगों को दुखी करता है। शरीर के कारण संसार में जितने लोग दुखी हैं इतना तो किसी कारण से नहीं है। ठीक है?
[19:10]विचार करते रहिएगा, प्रश्न फिर से पूछ सकते हैं। गिरीश शर्मा जी। आचार्य जी मैं अभिभूत हूं। आपने तो सारे शंकाओं के अ एकदम निर्बाध रूप से वो किया। बस मुझे एक एक शंका है थोड़ी सी। मैं ये जानना चाह रहा हूं कि जैसे आप ने बताया कि सर्वशक्तिमान है चेतन है तो लेकिन और जड़ नहीं है। लेकिन जड़ और चेतन दोनों पदार्थों में है। वह कल बताऊंगा कल आएगा वह मतलब क्योंकि अभी आठ ही गुण सिद्ध हुए हैं अभी कुछ और भी सिद्ध होना बाकी है। ठीक है दूसरा एक और थोड़ा सा है शंका छोटी सी आपने एक उदाहरण दिया था कि एक पेशेंट है और वो सात आठ मशीनों से घिरा हुआ है जैसे-जैसे शक्ति आती जा रही है साधन वो हटते जा रहे हैं। तो इसका मतलब ये है कि सर्वशक्तिमान तो पूरा साधन संपन्न होना चाहिए। नहीं सर्वशक्तिमान साधन संपन्न नहीं होता। वो वो कल बताऊंगा कल आएगा वह मतलब क्योंकि अभी आठ ही गुण सिद्ध हुए हैं अभी कुछ और भी सिद्ध होना बाकी है। ठीक है दूसरा एक और थोड़ा सा है शंका छोटी सी आपने एक उदाहरण दिया था कि एक पेशेंट है और वो सात आठ मशीनों से घिरा हुआ है जैसे-जैसे शक्ति आती जा रही है साधन वो हटते जा रहे हैं। तो इसका मतलब ये है कि सर्वशक्तिमान तो पूरा साधन संपन्न होना चाहिए। नहीं सर्वशक्तिमान साधन संपन्न नहीं होता। वो वो कल बताऊंगा कल आएगा वो मतलब क्योंकि अभी आठ ही गुण सिद्ध हुए हैं अभी कुछ और भी सिद्ध होना बाकी है। ठीक है दूसरा एक और थोड़ा सा है शंका छोटी सी आपने एक उदाहरण दिया था कि एक पेशेंट है और वो सात आठ मशीनों से घिरा हुआ है जैसे-जैसे शक्ति आती जा रही है साधन वो हटते जा रहे हैं। तो इसका मतलब ये है कि सर्वशक्तिमान तो पूरा साधन संपन्न होना चाहिए। नहीं सर्वशक्तिमान साधन संपन्न नहीं होता।
[21:13]वो वो कल बताऊंगा कल आएगा वो मतलब क्योंकि अभी आठ ही गुण सिद्ध हुए हैं अभी कुछ और भी सिद्ध होना बाकी है। ठीक है दूसरा एक और थोड़ा सा है शंका छोटी सी आपने एक उदाहरण दिया था कि एक पेशेंट है और वो सात आठ मशीनों से घिरा हुआ है जैसे-जैसे शक्ति आती जा रही है साधन वो हटते जा रहे हैं। तो इसका मतलब ये है कि सर्वशक्तिमान तो पूरा साधन संपन्न होना चाहिए। नहीं सर्वशक्तिमान साधन संपन्न नहीं होता।
[21:47]वो वो कल बताऊंगा कल आएगा वो मतलब क्योंकि अभी आठ ही गुण सिद्ध हुए हैं अभी कुछ और भी सिद्ध होना बाकी है। ठीक है दूसरा एक और थोड़ा सा है शंका छोटी सी आपने एक उदाहरण दिया था कि एक पेशेंट है और वो सात आठ मशीनों से घिरा हुआ है जैसे-जैसे शक्ति आती जा रही है साधन वो हटते जा रहे हैं। तो इसका मतलब ये है कि सर्वशक्तिमान तो पूरा साधन संपन्न होना चाहिए। नहीं सर्वशक्तिमान साधन संपन्न नहीं होता।
[22:21]वो वो कल बताऊंगा कल आएगा वो मतलब क्योंकि अभी आठ ही गुण सिद्ध हुए हैं अभी कुछ और भी सिद्ध होना बाकी है। ठीक है दूसरा एक और थोड़ा सा है शंका छोटी सी आपने एक उदाहरण दिया था कि एक पेशेंट है और वो सात आठ मशीनों से घिरा हुआ है जैसे-जैसे शक्ति आती जा रही है साधन वो हटते जा रहे हैं। तो इसका मतलब ये है कि सर्वशक्तिमान तो पूरा साधन संपन्न होना चाहिए। नहीं सर्वशक्तिमान साधन संपन्न नहीं होता।
[22:56]वो वो कल बताऊंगा कल आएगा वो मतलब क्योंकि अभी आठ ही गुण सिद्ध हुए हैं अभी कुछ और भी सिद्ध होना बाकी है।



