Thumbnail for 4 अप्रैल जम्मू सवाल जवाब | radha soami new question answer | भीड़ ने तोड़े रिकार्ड | by Ruhani Safar

4 अप्रैल जम्मू सवाल जवाब | radha soami new question answer | भीड़ ने तोड़े रिकार्ड |

Ruhani Safar

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[0:00]प्यारी साथ संगत जी राधा स्वामी जी, संगत जी आज 4 अप्रैल दिन शनिवार को जम्मू की संगत निहाल हो गई। आज सुबह सत्संग करता जी के सत्संग के बाद हुजूर जी ने संगत के साथ सवाल जवाब किए और उसके बाद ओपन कार दर्शन भी दिए जी। आज बाबा जी जम्मू में नहीं आए थे क्योंकि बाबा जी इस समय इंग्लैंड पहुंच चुके हैं और इंग्लैंड में भी आज हाईनेस पार्क में बाबा जी ने संगत के साथ सवाल जवाब किए हैं जी। इस वीडियो में हम आपके लिए जम्मू के सवाल जवाब ले कर आए हैं। आज जम्मू में इतनी ज्यादा संगत पहुंची थी की ऐसा महसूस हो रहा था जैसे जम्मू नहीं बल्कि ब्यास में भंडारा हो रहा है। बीती रात जम्मू में तेज बारिश हुई थी, इतनी ज्यादा बारिश हुई कि चारों ओर पानी ही पानी हो गया। पार्किंग एरिया की भी कई वीडियो सामने आई, जहां बसें खड़ी की जाती है, वहां का माहौल पानी पानी हो गया था जी। सवाल जवाब से पहले सत्संगकर्ता जी ने सत्संग सुनाया, जिसमें आज की बाणी पांचवें पातशाह की ली गई थी जी। इसके बाद दो शब्द पढ़े गए, और फिर हुजूर जी ने सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू कर दिया जी। सबसे पहले एक भाई ने हुजूर जी से सवाल किया। इस भाई ने पूछा कि हुजूर जी जो सच्चा गुरु का सेवक होता है, उसकी जीवनशैली और आचरण कैसा होना चाहिए। तो इस पर हुजूर जी ने फरमाया कि सबसे पहले हमें अच्छा इंसान बनना है, इसकी पहचान यही है कि हमारे अंदर इंसानियत होनी चाहिए। यह कोई कठिन बात नहीं है, हम सभी जानते हैं कि किसी को कष्ट नहीं देना, सात्विक भोजन करना, मालिक की रज़ा में रहना, और जो मार्गदर्शन दिया जाए उस पर चलना ही सही जीवन है। फिर इसी व्यक्ति ने आगे पूछा कि सेवक के जीवन में सत्संग का क्या महत्व है, इस पर हुजूर जी ने समझा या कि जैसे हम अपने घर के चारों ओर सुरक्षा के लिए बाड़ या दीवार बनाते हैं, वैसे ही सत्संग हमारे जीवन की रक्षा करता है। सत्संग हमें सोचने पर मजबूर करता है, हमारे जीवन का उद्देश्य बदल देता है, और हमें आध्यात्मिक मार्ग की ओर मोड़ता है। उन्होंने कहा कि भजन-सिमरन से पहले सत्संग अत्यंत आवश्यक है, यह हमें झकझोरता है, हमें सही रास्ते पर लाने के लिए एक चोट की तरह काम करता है। फिर आगे एक बहन ने हुजूर जी से प्रश्न किया। इस बहन ने पूछा कि उसे एक साल हो गया है और उसका कोई सहारा नहीं है, वह यहां सेवा कर रही है। इस पर हुजूर जी ने कहा कि बहन जी हमें दुनिया वालों से उम्मीद नहीं लगानी चाहिए, एक ही रिश्ता हमेशा रहेगा और वह है मालिक और हमारा रिश्ता, बाकी सब रिश्ते यहां एक दिन खत्म हो जाएंगे। आप सेवा और सिमरन जरूर करें, मालिक हमें शक्ति जरूर देता है, अगर हम जिम्मेदारियों से भागेंगे। इसके बाद एक भाई ने कहा कि हुजूर जी मैंने पहली बार आपके दर्शन किए हैं और मैं लंगर में सेवा करता हूं और मुझे सेवा करने में बोहोत अच्छा लगता है। हुजूर जी ने कहा कभी मैं भी लंगर की सेवा किया करता था और मुझे भी बोहोत अच्छा लगता था। फिर इस भाई ने कहा कि हुजूर जी अब मैं आपके साथ सेवा करना चाहता हूं। इस पर हुजूर जी ने कहा कि सब कुछ मालिक की मौज से होता है, मालिक ने जिसको जो सेवा देनी है उसको वह सेवा मिल जानी है। हमें जो भी सेवा मिली हुई है उसको पूरी ईमानदारी और निष्काम हो कर निभाना है। फिर किसी ने पूछा कि हुजूर जी हम इस दुनिया में मालिक से मिलने आए हैं, फिर इतना समय क्यों लगता है? इस पर हुजूर जी ने कहा कि वास्तव में इतना समय नहीं लगता, हम तो करोड़ों वर्षों से मालिक से बिछड़े हुए हैं, इस जीवन में 70-80 साल के भीतर ही हमें अवसर मिल जाता है, इससे छोटा रास्ता और क्या हो सकता है, हमें बस मेहनत करनी है और मालिक की रज़ा में रहना है। फिर इसी बहन ने पूछा हुजूर जी क्या इंसान का जन्म और उसकी मृत्यु भी उसके कर्मों का फल होता है। तो हुजूर जी ने समझाया कि यहां जो कुछ हो रहा है वह कर्मों के कारण ही है अगर कर्म ना होते तो मालिक हमें यहां इस संसार में किसलिए भेजता। मालिक ने अगर हमें मानव जन्म दिया है तो हमें सीखने के लिए दिया है और कर्मों को खत्म करने फिर से मालिक में मिल जाने के लिए दिया है।

[5:00]लेकिन हम यहां आ कर और कर्म बना कर बैठ जाते है, और फिर हमें बार बार आना जाना पड़ता है। आगे हुजूर जी ने समझाया कि इंसान के कर्म ही यह तय करते हैं कि उसका अगला जन्म कहां होगा, उन्होंने कहा कि हम किस प्रकार के कर्म करते हैं और मालिक के साथ हमारा जुड़ाव कितना गहरा है, उसी आधार पर आगे का रास्ता निर्धारित होता है। इसके बाद एक भाई ने अंधविश्वास के बारे में प्रश्न किया, उसने पूछा कि हुजूर जी जो लोग अंधविश्वास करते हैं, उस पर आप क्या कहना चाहोगे? इस पर हुजूर जी ने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि अक्सर हम अपनी कमजोरियों को छुपाने के लिए अंधविश्वास का सहारा लेते हैं, कई बार हम अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए भी ऐसे रास्ते चुन लेते हैं, लेकिन जब इंसान आध्यात्मिक मार्ग पर चलता है, तो वह तर्क और समझ के आधार पर चलता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे अध्यात्म में यह कहा जाता है कि नशा नहीं करना चाहिए, सात्विक भोजन करना चाहिए। तो इसके पीछे ठोस कारण और तर्क होते हैं, लेकिन जब किसी चीज़ के पीछे का कारण समझे बिना हम उसे करते रहते हैं, तो वह धीरे-धीरे केवल परंपरा बन जाती है, और फिर अंधविश्वास का रूप ले लेती है। हुजूर जी ने आगे फरमाते हुए समझाया कि हम तर्क को भूल जाते हैं और केवल वही करते रहते हैं जो हमारे माता-पिता करते आए थे, बिना यह समझे कि उसके पीछे का उद्देश्य क्या था। उन्होंने यह भी समझाया कि अगर हम किसी भी काम को बिना समझ और उद्देश्य के करेंगे, तो वह हमें अंधविश्वास की ओर ही ले जाएगा, समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं,

[7:07]हमारे माता-पिता का समय अलग था, हमारा समय अलग है, और आने वाली पीढ़ी का समय भी अलग होगा, लेकिन जो मूल सत्य हैं, वे कभी नहीं बदलते, हमें उन सत्यों के पीछे के तर्क को समझने की कोशिश करनी चाहिए। फिर एक भाई ने कहा कि हुजूर जी अगर सेवादार से कोई गलती हो जाए, तो क्या उसे पूरी जिंदगी उसका फल भुगतना पड़ता है।

[7:38]इस पर हुजूर जी ने समझा या कि यहां बैठी संगत में ऐसा कोई भी नहीं है जिसने कभी गलती न की हो, इंसान से गलतियां होना स्वाभाविक है, जरूरी यह है कि हम अपनी गलतियों से सीखें और आगे बढ़ें। हुजूर जी ने आगे फरमाते हुए समझाया कि अगर हम अपनी गलतियों से सीख लेते हैं, तो मालिक के दरबार में केवल कृपा ही कृपा मिलती है, उन्होंने यह भी कहा कि मालिक कभी किसी की परीक्षा नहीं लेता। अगर वह सच में परीक्षा लेने लगे, तो कोई भी उस पर खरा नहीं उतर पाएगा, इसलिए हमारा उद्देश्य यही होना चाहिए कि हम अपनी गलतियों को पहचाने, उनसे सीखें और जीवन में आगे बढ़ें। फिर आगे एक भाई ने पूछा - हुजूर जी, कभी-कभी लगता है कि हम मेहनत बहुत करते हैं लेकिन मेहनत के अनुसार हमें फल नहीं मिलता। तब मन में शिकायत भी आती है। इस स्थिति में क्या सोच रखनी चाहिए, हुजूर जी ने जवाब दिया - देखो भाई, हम सब कर्मों के हिसाब से इस दुनिया में आए हैं। जो हमें मिल रहा है, वह हमारे ही किए हुए कर्मों का फल है। मेहनत करना हमारा काम है, फल देना मालिक का काम है। अगर हम हर काम यह सोचकर करेंगे की बदले में मालिक हमें बोहोत कुछ दे देगा तो फिर हम इसी सोच में उलझ कर रह जाएंगे और काम पर फोकस नहीं कर पाएंगे। हमारा काम है मेहनत करना कोशिश करना, और उसका काम है मेहनत का फल देना, वो देर कर सकता है लेकिन उसके घर अंधेर कभी नहीं होती। इसलिए पूरी ईमानदारी से मेहनत करो आगे क्या मिलेगा क्या नहीं ये सब मालिक पर छोड़ दो। एक बहन ने पूछा हुजूर जी, घर में सब कहते हैं कि मैं बहुत गुस्सा करती हूं, पर मुझे तो लगता है कि मैं सही ही बोलती हूं।

[9:39]हुजूर जी ने मुस्कुराकर जवाब दिया - बहन जी, अगर सब लोग एक ही बात कह रहे हैं, तो इस पर आपको जरूर विचार करना चाहिए। हुजूर जी ने मजाकिया अंदाज में कहा तो संगत हसने लगी थी, आगे हुजूर ने समझाया की गुस्सा अक्सर तब आता है जब हम खुद को सही और दूसरों को गलत मान लेते हैं। हमें दूसरों की बात भी ध्यान से सुननी और समझनी चाहिए, अगर हम हमेशा खुद को ही सही साबित करने की कोशिश करेंगे तो माहौल बिगड़ जाएगा। आगे हुजूर बोले अगर हम एक पल रुककर सोचें - क्या मैं थोड़ा नरम बोल सकती हूं , तो आधी समस्या वहीं खत्म हो जाती है। मीठा बोलना भी सेवा है। कभी-कभी सही बात भी अगर गुस्से में कही जाए, तो उसका असर गलत हो जाता है। और कोई गुस्से वाली बात प्रेम से कही जाए तो सामने वाले के ऊपर उसका अलग ही प्रभाव पड़ता है। फिर आगे एक भाई ने हुजूर जी से प्रश्न किया। इस भाई ने पूछा - हुजूर जी, कुछ लोग कहते हैं जिंदगी को एंजॉय करो, जिंदगी बार बार नहीं मिलती। हुजूर जी ने जवाब दिया - बेटा इस दुनिया में हर तरह के लोग होते है किसी को बाहरी चीजों से इन्जॉय मिलता है और किसी को अंदर जा कर इन्जॉय मिलता है, ये बात बिल्कुल सही है की ये जीवन दोबारा इतनी आसानी से शायद नहीं मिलेगा लेकिन इसका मतलब ये नहीं की हम मौज मस्ती में ही इस जीवन को बर्बाद कर दे। हमें जीवन में एक बैलेंस बना कर चलना है, घूमना फिरना हसना खेलना सब करना है और ढाई घंटे मालिक को भी देने है, लेकिन कभी भी अपने असूलों से कभी समझौता नहीं करना, जो सत्संगों में समझाया जाता है उन बातों पर अमल करना है। फिर एक बहन ने पूछा - हुजूर जी, कभी-कभी हमें लगता है कि लोग हमारी कद्र नहीं करते, चाहे हम लोगों के लिए कितना भी अच्छा कर लें। लेकिन लोग फिर भी हमारी कदर नहीं करते, हुजूर जी ने जवाब दिया - बहन जी, अगर हम दूसरों की सेवा उनसे कद्र पाने के लिए करेंगे, तो दुख जरूर मिलेगा। लेकिन अगर हम ये सोच कर दूसरों की मदद दूसरों की सेवा बिना किसी उम्मीद के करने लगेंगे तो हम कभी दुखी नहीं होंगे, सेवा हम अपने खुद के लिए कर रहे है, इसलिए आप बस ईमानदारी और निष्काम हो कर करते जाओ, हमें दुनिया की खुशी नहीं मालिक की खुशी चाहिए। फिर एक भाई ने पूछा - हुजूर जी, क्या नामदान मिलने के बाद जीवन की सारी समस्याएं खत्म हो जाती हैं, हुजूर जी ने जवाब दिया - नहीं भाई, समस्याएं खत्म नहीं होती, लेकिन उन्हें देखने का हमारा नजरिया बदल जाता है।

[12:43]नामदान लेने का मतलब ये नहीं की हम कर्मों के हिसाब से बच गए है, बल्कि नामदान के बाद जब हम भजन सिमरन करने लगते है तो धीरे धीरे हमारे अंदर बदलाव होने लगते है, हमारा नजरिया बदल जाता है फिर हम समस्या को एक अलग नजरिए से देखते है और हमें बड़ी से बड़ी समस्या भी मालिक की मौज लगने लगती है और फिर हम दुखी होने की बजाय समस्या का समाधान ढूंढते है। आगे हुजूर बोले पहले हम हर मुश्किल को बोझ समझते थे, अब उस मुश्किल समय से सीख लेने लगते हैं। संगत जी ये थे आज के सवाल जवाब, अब वीडियो में आगे बढ़ते हुए आपको सुनाते है एक सच्ची घटना, ये घटना हमारी कमाई के दसवे हिस्से को ले कर इसलिए बड़े ही ध्यान से सुनने की कृपा करना जी। संगत जी बाबा जी के एक सत्संग घर में में एक ऐसी बहन आया करती थी, जो अपने घर-परिवार के साथ सामान्य जीवन जी रही थी। सब कुछ ठीक-ठाक था, लेकिन उसके मन में अपने गुरु, बाबा जी के प्रति बहुत गहरा प्रेम और श्रद्धा थी। जहां भी सत्संग होता, वह स्त्री हमेशा वहां पहुंचने की पूरी कोशिश करती। सत्संग सुनना, सेवा करना, यह सब उसके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था। लेकिन उसके मन में एक बात बार-बार उठती रहती थी। जब वह संगत को देखती, लोगों को अच्छे कपड़ों में, सुंदर गाड़ियों में आते हुए, तो उसके मन में एक सवाल उठता: बाबा जी की यह संगत कितनी प्यारी है, सब कितने खुश दिखते हैं, मालिक ने इन्हें कितना कुछ दिया है, यह सब भी तो बाबा जी को ही मानते हैं, लेकिन मैं भी तो इतने समय से डेरे आ रही हूं, सेवा कर रही हूं, सत्संग सुन रही हूं, फिर भी हमारे जीवन में कुछ खास बदलाव क्यों नहीं आता? वह मन ही मन सोचती रहती, हम जो भी काम शुरू करते है, वह आगे बढ़ता ही नहीं, शायद हमारे कर्मों का हिसाब ही ऐसा है, पता नहीं हमारे साथ ऐसा क्यों होता है। उसका भी मन करता था कि वह भी एक अच्छी गाड़ी में आए, अच्छे कपड़े पहने, और वैसी ही खुशहाल जिंदगी जिए जैसी वह दूसरों में देखती थी। समय यूं ही बीतता रहा, एक दिन बाबा जी का सत्संग था। वह बहन हमेशा की तरह वहां पहुंची और पूरी श्रद्धा से सत्संग सुनने बैठ गई। लेकिन उस दिन भी उसके मन में वही बातें चल रही थीं। उसने भीतर ही भीतर अपने गुरु से प्रार्थना की: बाबा जी, हम पर भी कृपा करो, हम पर भी दया करो, मेरे पति को कोई अच्छा काम मिल जाए, हमारी भी आमदनी ठीक हो जाए, हम भी अच्छी तरह से कमाने लगें। मैं वचन देती हूं कि आपकी बक्शी हुई कमाई में से मैं दसवा हिस्सा सेवा के लिए जरूर निकालूंगी। कुछ समय बीता, और फिर मालिक की कृपा से उसके पति का कारोबार बोहोत अच्छा चलने लगा जी। अब कारोबार इतना चल निकला की उस बहन को भी दुकान पर जा कर हाथ बंटा ना पड़ता था, अब वह बहन बहुत खुश थी। उसके मन में विश्वास और भी गहरा हो गया, मालिक ने मेरी सुन ली, मेरी अरदास कबूल हो गई, अब हमारे भी दिन बदलेंगे, धीरे-धीरे सब कुछ बेहतर होने लगा। जब पहली बार उसके पति को अच्छी सैलरी मिली, तो वह बहुत भावुक हो गई। उसने अपने पति से कहा: मैंने बाबा जी से वचन लिया था कि अगर हमारी आमदनी अच्छी हुई, तो हम दसवा हिस्सा जरूर निकालेंगे। उसके पति ने भी सहमति जताई और कहा, हां ये तो अच्छी बात है जिसने हमें इतना कुछ दिया है क्या हम सिर्फ 10% भी उसके लिए नहीं निकाल सकते। अब वो बहन हर महीने कमाई का दसवा हिस्सा निकालने लगी, समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा, महीने गुजरते गए, साल बीतते चले गए। जैसे-जैसे उनका काम बढ़ने लगा, वैसे-वैसे जिम्मेदारियां और खर्च भी बढ़ते गए। आमदनी बढ़ी तो खर्च भी उसी अनुपात में बढ़ गए। पहले ये लोग दसवा हिस्सा आसानी से निकाल लेते थे लेकिन अब हालात कुछ बदलने लगे थे। अब जब भी दसवा हिस्सा निकाल कर अलग करते तो महीने भर में फिर से कहीं पैसे की जरूरत पड़ जाती तो उसी दसवे हिस्से में से वापस निकाल कर अपने निजी कामों में लगा देते थे जी। हालांकि डेरे जाना छूट गया था, लेकिन उस बहन ने अपने भजन-सिमरन में कभी ढील नहीं दी। चाहे कुछ भी हो जाए, वह नियमित रूप से अपने भजन-सिमरन पर बैठती थी। यह उसका अटूट नियम था। एक दिन शाम के समय, वह हमेशा की तरह भजन-सिमरन करने बैठी। वातावरण शांत था, और वह पूरे ध्यान से अपने सिमरन में लीन थी। जब वह उठी, तो उसे महसूस हुआ कि काफी देर हो चुकी है। उसके मन में ख्याल आया ,अभी तक मेरे पति घर क्यों नहीं आए,,उसने तुरंत अपने पति को फोन किया, लेकिन उधर से किसी ने फोन नहीं उठाया, अब उसके मन में हल्की-सी चिंता घर करने लगी, और वो बैठ कर अपने पति का इंतजार करने लगी। कुछ ही देर में उसको नींद आने लगी और नींद में उसने एक आवाज सुनी, लेकिन उसी के साथ वह थोड़ा घबरा भी गई, और सोचने लगी ये कैसी आवाज थी,, पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ, उसने मन ही मन मालिक को याद किया ,और वह एकदम उठकर बैठ गई। थोड़ी ही देर बाद दरवाजा खुला और उसके पति घर लौट आए। लेकिन इस बार उनके चेहरे पर भी घबराहट साफ दिखाई दे रही थी। पत्नी ने तुरंत पूछा ,आज इतनी देर क्यों हो गई,,पति ने कहा मैं दुकान के पैसे ले कर वापस घर आ रहा था तो वो बैग कहीं रास्ते में गिर गया, मैंने बैग को काफी दूर तक ढूंढा, लेकिन पैसे से भरा बैग कहीं भी नहीं मिला। पत्नी ने कहा की लेकिन आप तो पैसे वाला बैग बोहोत संभाल कर रखते हो तो पति ने कहा की मुझे खुद नहीं पता की आज अचानक वो बैग कैसे गिर गया। तभी पति के मोबाइल पर अचानक एक फोन आया। दरअसल, जिस बैग के खोने की बात हो रही थी, उसमें सारे जरूरी कागज़ात और फोन नंबर भी मौजूद थे। उसी में से नंबर को देखकर एक व्यक्ति ने कॉल किया था। उस भाई ने कहा की भाई साहब, ये बैग मुझे सड़क पर मिला है और इसमें बोहोत सारे पैसे है, यह सुनते ही पति के चेहरे पर राहत आ गई। उसने खुश होकर कहा ,भाई, बहुत-बहुत धन्यवाद! आप जहां भी हों, कृपया मुझे बता दीजिए, मैं आकर अपना बैग ले लूंगा। फिर उस भाई ने कहा की भाई साहब आप आ तो जाइए लेकिन आपके पैसे में से मैंने 20 हजार रुपए निकाल लिए है, मेरी कुछ मजबूरी थी बाकी के सारे पैसे ऐसे के ऐसे ही रखे है। उसकी बात सुनकर पति कुछ पल के लिए चुप हो गया। फिर उसने शांत स्वर में कहा ,ठीक है भाई, कोई बात नहीं भाई आप इतने ईमानदार हो की आप मुझे मेरा बैग लौटा रहे हो तो बदले में कुछ पैसे आपने रख भी लिए तो कौन सी बड़ी बात हो गई, आप चाहते तो पूरा बैग भी रख सकते थे लेकिन आपने ऐसा नहीं किया, इसलिए आपका बोहोत बोहोत शुक्रिया। उसने पूरी बात अपनी पत्नी को बताई , बैग तो मिल गया है, लेकिन उसमें से 20 हजार रुपये उस व्यक्ति ने निकाल लिए, यह सुनते ही पत्नी हैरान रह गई और एक जगह पर बैठ गई तो पति ने चिंतित होकर पूछा क्या हुआ, तुम अचानक ऐसे क्यों बैठ गई। पत्नी ने धीमे स्वर में कहा, मैं तुम्हें क्या बताऊं, आज जब मैं भजन-सिमरन पर बैठी थी, उसके बाद मैं तुम्हारा इंतजार कर रही थी। तुम आए नहीं, मैंने तुम्हें फोन भी किया, लेकिन तुमने उठाया नहीं। फिर मैंने सोचा थोड़ा आराम कर लूं, जैसे ही मैं लेटी, मुझे एक अजीब-सी आवाज सुनाई दी। वह आवाज जैसे मुझसे कह रही थी ,'जो सेवा तुमने इतने समय से रोकी हुई है, वह अभी तक क्यों नहीं आई',यह सुनकर मैं एकदम घबरा गई। मुझे समझ नहीं आया कि यह कैसी आवाज थी, मैं तुरंत उठकर बैठ गई, कुछ पल रुककर उसने आगे कहा, अब मुझे समझ आ रहा है कि वह संकेत क्या था, तुम्हें याद है, हम पिछले कई महीनों से ठीक से दसवा हिस्सा नहीं निकाल पा रहे है, और निकालते भी थे तो उसमें से वापस ले कर अपने ऊपर खर्च कर देते थे। यह सुनकर पति चौंक गया। उसने आश्चर्य से कहा, यह बात तुमने मुझे कभी बताई ही नहीं, कि तुम दसवा हिस्सा निकालकर फिर उसे खर्च कर देती थी। फिर पत्नी ने कहा की जिस भी इंसान को वो बैग मिला है वो चाहता तो पूरे पैसे रख सकता था लेकिन उसने सिर्फ उतने ही पैसे अपने पास रखे जितने पैसे मैंने दसवे हिस्से में से खर्च किए थे, बाबा जी का शुक्र है जो इस तरीके से बाबा जी ने मेरी आंखे खोल दी, संगत जी फिर उस दिन के बाद से उस बहन ने ये गलती नहीं की।

[24:51]और चाहे कुछ भी हो जाता लेकिन बहन ने दसवे हिस्से में से कभी भी एक पैसा भी नहीं निकाला और जब भी भंडारा होता तो जितने भी पैसे दसवे हिस्से के नाम पर इकट्ठे हुए होते वो सारे पैसे सेवा में दे देती थी, संगत जी जरूरी नहीं की इस बहन ने दसवा हिस्सा निकाला तो सभी को दसवा हिस्सा निकालना चाहिए।

[25:29]ये पूरी तरह हमारे ऊपर निर्भर करता है की हम कितना निकाल सकते है, कुछ लोग मैंने ऐसे भी देखे है जो 50% सेवा में लगा देते है और कुछ लोग ऐसे भी है जो थोड़े बोहोत पैसे सेवा में देते है, मालिक को हमारे पैसे नहीं हमारे भाव से मतलब है, इसलिए सच्चे भाव से भले ही 500 रुपये निकालो लेकिन निकालो जरूर, संगत जी कमेन्ट में राधा स्वामी जरूर लिख दीजिए और संगत के अपने इस चैनल को सब्सक्राइब करना मत भूलिए, गुरु प्यारी साथ संगत जी, राधा स्वामी जी।

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