[0:17]नमस्कार प्रिय दर्शकों आज जो मैं वीडियो बनाने जा रहा हूं इस वीडियो में मैं आपको संध्या के सारे मंत्र कवच गायत्री हृदय
[0:27]अर्क्य, तर्पण एवं यहां तक पूरे मंत्र मैं आपको बताने वाला हूं अगर आपके पास संध्या पुस्तक नहीं है तो आप कमेंट में अपना पूरा एड्रेस लिख सकते हैं और लॉकडाउन के बाद में आपको वो संध्या की पुस्तक आपको भेज दी जाएगी
[0:41]तो दोस्तों मैं शुरू करता हूं संध्या वंदन प्रत्येक ब्राह्मण को त्रिकाल संध्या करनी चाहिए त्रिकाल संध्या की मैं मंत्र आपको बताने वाला हूं
[0:51]तो दर्शकों अगर आपने हमारी यूट्यूब चैनल को अभी तक सब्सक्राइब नहीं किया है तो आप हमारी यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए साथ में घंटी के निशान को भी दबा दीजिए
[1:00]क्योंकि हम लाने वाले हैं बहुत अच्छी-अच्छी वीडियो और हमारे चैनल में बहुत सारी ऐसी वीडियो जो आपके लिए बहुत उपयोगी है उन पर जाकर आप वो देख सकते हैं
[1:09]तो मैं यह संध्या की पुस्तक है मेरे पास इस संध्या की पुस्तक से आपको सारे मंत्र मैं पढ़ाऊंगा वीडियो लंबी होगी लेकिन आप ध्यान से मंत्रों को सुनिएगा आप संध्या कीजिएगा
[1:21]सबसे पहले गुरु भगवान का ध्यान किया जाता है आपके पास आसन हो पंच पात्र में जल लेकर के शुद्ध जल लेकर के आप बैठ जाएं प्रात काल पूर्व दिशा की ओर मुख करे
[1:34]मध्याह्न काल में उत्तर दिशा की ओर मुख करें और सायंकाल में पश्चिम दिशा की ओर मुख करें तो स्नान इत्यादि करके सोच आदिक्रिया से विमुक्त होकर के संध्या करने बैठे
[1:47]तो सबसे पहले गुरु भगवान का ध्यान ओम गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः
[2:05]इसके बाद तीन बार आचमन करेंगे आचमन करना है बाएं बाएं हाथ से दाएं हाथ में जल लेकर के
[2:15]आचमन से नहीं जल लेना है हाथ में जल लेकर के और ब्रह्मतीर्थ से आपको जल ग्रहण करना है ब्रह्मतीर्थ क्या यह फोटो मैं आपको मैं दिखा रहा हूं इसी ब्रह्मतीर्थ से आपको जल पीना है
[2:24]तीन बार भगवान का नाम लेकर के ओम केशवाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम माधवाय नमः
[2:33]हस्तो प्रक्षाल्या ऋषि केशवाय नमः गोविंदाय नमः फिर हाथ धोना है आपको इसके बाद अपने आप को पवित्र करना है पहले पवित्र करने का विनियोग है
[2:44]ओम अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः विष्णुर्देवता गायत्री छंदः हृदि पवित्रकरणे विनियोगः जल छोड़ दें
[2:57]इसके बाद बाएं हाथ में जल लेकर के दाएं हाथ से अपने ऊपर डाल डालना है ओम अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोपि वा यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः
[3:10]इस प्रकार अपने आप को शुद्ध करके फिर आसन को शुद्ध करना है पहले विनियोग करना है विनियोग का मतलब आपको जल पहले आचमन लेकर के जल तामणी में डालना होता है जो आपके पास कटोरी है उसमें डालना होता है
[3:23]ओम पृथ्वीति मंत्रस्य मेरुपुष्ठ ऋषिः सुतलं छंदः कूर्मो देवता आसने विनियोगः
[3:32]विनियोग छोड़ने के बाद आसन के चारों ओर आसन के ऊपर जहां तक हो सके जल छिड़कना चाहिए ओम पृथ्वी त्वया धृता लोका देवी त्वं विष्णुना धृता त्वं च धारय मां देवी पवित्रं कुरु चासनम्
[3:51]इस प्रकार करके फिर संकल्प करना चाहिए दाएं हाथ में जल लेकर के इस प्रकार संकल्प बढ़े ओम विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णुराज्या प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीय प्रहरार्धे श्री श्वेत वाराह कल्पे सप्तमे वैवस्वत् मन्वन्तरे अष्टाविंशतिमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे जम्बू द्वीपे भरत खंडे भारत वर्षे
[4:19]बोद्धावतारे आर्यावर्तक देशांतर्गते अमुक देशे पुण्य क्षेत्रे खंड भारत वर्षे बौद्ध अवतारे आर्यावर्तक देशांतर्गते अमुक देशे पुण्य क्षेत्रे
[4:29]अमुक नामक अंतर्गत जिस आपका जो मंडल है उसका नाम लेना है अमुक अमुक ग्रामवा जिस ग्राम में जिस स्थान पर हो उसका आपको नाम लेना है
[4:40]अमुक नामिनी संवत्सरे जो संवत्सर चल रहा है जैसे अप्रमादी संवत्सर चल रहा है तो प्रमादी नामनी संवत्सरे अमुक ऐने दक्षिणायन है या उत्तरायण है वह लेना है अमुक ऋतु अमुक मासे अमुक पक्षे
[4:52]अमुक तिथे अमुक वासरे अमुक नक्षत्रे अमुक गोत्रोत्तपनः अमुक नामाहं जो आपकी गोत्र है वह गोत्र लेनी है जैसे मैं कौशिश गोत्र है तो कौशिश गोत्र उत्पन्नो अहं अमुक नामाहं जो आपका नाम है वह आपको नाम लेना है
[5:08]फिर देखिए संध्या के अंदर ज्यादा विस्तार से संकल्प नहीं करना चाहिए संध्या केवल अपने कल्याण के लिए होता है तो मम कायिक वाचिक मानसिक ज्ञाता ज्ञात सकल दोष परिहारार्थं श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्त्यर्थं
[5:25]ममोपात्तदुरितक्षयपूर्वकं श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं प्रातः मध्याहं सायं संध्योपासनं कर्म अहं करिष्ये
[5:30]अगर मध्यान्ह काल है तो मध्यान्ह काले संध्योपासनं कर्म अहं करिष्ये अगर सायंकाल है तो सायंकाले संध्योपासनं कर्म अहं करिष्ये
[5:43]इस प्रकार संकल्प छोड़ देना है फिर आचमन करना होता है ओम ऋतं चेत्यघमर्षण सूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप्छंदो भाववृत्तो देवता आचमने विनियोगः
[5:57]फिर इसके बाद जल को लेकर के जल पीना होता है ओम ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः समुद्रादर्णवा दधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथ्वीं चान्तरिक्षमथो स्वः।
[6:22]इस प्रकार जल पी लेना है उसके बाद प्राणायाम चार प्राणायाम के विनियोग है चार प्राणायाम के विनियोग करने के बाद में प्राणायाम करना होता है
[6:29]पहला विनियोग ओम कार्यस्य ब्रह्मा ऋषिरग्निगायत्री छंदः अग्निदेवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः (जल छोड़ें) ओम सप्ताव्याहृतीनां विश्वामित्रजमदग्निभरद्वाजगोतमात्रि-वसिष्ठ-कश्यपा ऋषयो गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती-पङ्क्तिस्त्रिष्टुब्जगत्यश्छन्दांस्यग्निवाय्वादित्यबृहस्पतिवरुणेन्द्रा-विश्वेदेवादेवता अनादिष्टप्रायश्चित्ते प्राणायामे विनियोगः।
[7:03]तीसरा विनियोग करें ओम गायत्र्या विश्वामित्र ऋषिरग्निगायत्री छंदः सविता देवताग्नि मुखोपनयने प्राणायामे विनियोगः। ओम शिरसः प्रजापतिर्ऋषिरुष्णिगनुष्टुब्छन्दो ब्रह्माग्निवायूसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः। फिर आपको प्राणायाम करना है प्राणायाम करें तो श्वास खींचे तब गायत्री मंत्र बोलना है श्वास को रोक के तब गायत्री मंत्र बोलना है श्वास को छोड़ते टाइम भी आप गायत्री मंत्र का उच्चारण करना है
[7:38]इसके बाद अपामुपस्पर्शन्म् हाथ धोने के बाद में प्रात काल का जो अपामुपस्पर्शन्म् है वह आपको मैं बताने जा रहा हूं विनियोग करना है पहले ओम सूर्यश्च मेति नारायण ऋषिरग्नि प्रकृतिश्छन्दः सूर्यो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः।
[7:54]इसके बाद आचमन करना ओम सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुंपतु। यत्किञ्चिद्दुरितं मयि इदं महमपोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा॥
[8:19]जल पी लेना है अब मैंने ये बताया आपको प्रातः काल का अगर मध्याह्न काल में संध्या कर रहे हैं तो मध्याह्न काल का मंत्र इस प्रकार है
[8:26]ओम आपः पुनन्तु पृथ्वी पृथ्वी पूता पुनातु मा पुनातु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्म पूता पुनातु मा यदुच्छिष्टमभोज्यं च यद्वा दुश्चरितं मम। सर्वं पुनन्तु मामापो सतां च प्रतिग्रहः स्वाहा॥ विनियोग ओम अग्निश्चमेति रुद्र ऋषिः प्रकृतिश्छन्दोऽग्निर्देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः
[9:16]आचमन करना है ओम अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यद्दहा पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्त दवलुंपतु यत्किञ्चिद्दुरितं मयि इदं महमपोऽमृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा॥ यह हो गया मध्याह्न काल का अगर आप सायंकाल की संध्या कर रहे हैं तो सायंकाल में आपको यह मंत्र बोलना है ओम अग्निश्चमेति पहले विनियोग ओम अग्निश्चमेति रुद्र ऋषिः प्रकृतिश्छन्दोऽग्निर्देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः अगर ये सायंकाल का है
[9:16]और सायंकाल का आचमन कैसे करना है ओम अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। इधन्ना पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्त दवलुंपतु यत्किञ्चिद्दुरितं मयि इदं महमपोऽमृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा॥
[9:37]इस प्रकार आपको सायंकाल का अपामुपस्पर्शन्म् है वह करना है इसके बाद मार्जन तो मार्जन पहले विनियोग करना है ओम आपोहिष्ठादि
[9:47]त्र्यचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिरग्निगायत्री छंदः आपो देवता मार्जने विनियोगः फिर बाएं हाथ में जल लेकर के दाएं दाएं हाथ से अपने ऊपर छोड़ते हुए जाना है
[9:59]ओम आपोहिष्ठामयोभुवः ओम तान ऊर्जे दधातन ओम महेरणाय चक्षसे ओम योवः शिवतमो रसः ओम तस्य भाजायते हनः ओम उशतीरिव मातरह ओम तस्मादरङ्गमा मव अब आपको जल नीचे छोड़ना है
[10:17]ओम यस्य क्षयाय जिन्वथ ओम आपो जनयथा चनः इसके बाद आपको एक विनियोग और आचमन है वह करना है
[10:29]ओम दुद्रुपदा दिवेति कोकिलो राजपुत्र ऋषिरनुष्टुप्छंदः आपो देवता सोत्रामण्यवभृते विनियोगः यह विनियोग छोड़ना है फिर आपको आचमन करना है
[10:41]ओम दुद्रुपदादि मुमुचानः स्वेनः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥ आपको आचमन करना है इसके बाद आपको अगमर्षण है
[10:56]अगमर्षण का मंत्र पहले विनियोग उसके बाद मंत्र ओम अघमर्षण सूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुप्छंदो भाववृत्तो देवता अश्वमेधावभृते विनियोगः
[11:11]विनियोग छोड़ने के बाद में मंत्र इस प्रकार है अगमर्षण में आपको दाएं हाथ में जल लेकर के नासिका के पास में
[11:18]बाएं नासिका से श्वास लेना है और दाहिने नासिका से श्वास को छोड़ना है मन में कामना करनी है भगवान मेरे जो पाप हैं सारे दूर हो जाएं इस प्रकार ओम ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः समुद्रादर्णवा दधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथ्वीं चान्तरिक्षमथो स्वः।
[11:51]फिर आपको जल पीछे की ओर फेंक देना है हाथ धोकर के फिर आपको आचमन करना है ओम पहले विनियोग ओम अन्तश्चरसीति तिरश्चीन ऋषिरनुष्टुप्छन्दः आपो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः
[12:03]फिर आपको आचमन करना है आचमन का मंत्र इस प्रकार है ओम अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योति रसोऽमृतम्।
[12:16]फिर आपको जल पी लेना है इसके बाद आपको करना है सूर्य भगवान के लिए अर्घ अर्घ से पहले मंत्र है विनियोग है वह विनियोग आपको करना है
[12:25]ओम कार्यस्य ब्रह्मा ऋषिरग्निगायत्री छंदः परमात्मा देवता विनियोग छोड़ना है दूसरा विनियोग ओम भूर्भुवः स्वः इति महाव्याहृतीनां परमेष्ठी प्रजापति ऋषिरग्निवायूसूर्यदेवताः गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहतीच्छंदांसि।
[12:41]तीसरा विनियोग ओम तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्र ऋषिः सविता देवता गायत्रीच्छन्दः सूर्यार्घदाने विनियोगः। विनियोग आपको छोड़ देना है फिर आपको गायत्री मंत्र से भगवान सूर्य को अर्घ देना है
[12:55]फिर इस मंत्र से भी आप आगे देना है ओम आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥ इस प्रकार आपको अर्घ देना है
[13:10]फिर इसके बाद सूर्य उपस्थान का मंत्र चार विनियोग है वह आप विनियोग करना है सूर्य उपस्थान के पहले ओम उद्वयमिति यस्य हिरण्यस्तूप ऋषिरनुष्टुप्छन्दः सूर्यो देवता।
[13:20]विनियोग छोड़ना है दूसरा विनियोग ओम उदुत्यमिति प्रस्कण्व ऋषिरग्निगायत्री छंदः सूर्यो देवता। फिर तीसरा विनियोग ओम चित्रमिति यस्य कौत्स ऋषित्रिष्टुप्छन्दः सूर्यो देवता। फिर चौथा विनियोग ओम तच्चक्षुरिति दध्यङ्गाथर्वण ऋषिरतिशक्वरी वा अतिशक्वारी छंदः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।
[13:46]इसके बाद आपको सूर्य उपस्थान के मंत्र है वह आपको करने हैं ओम उद्वयंतमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवन्देवरत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥
[14:00]ओम उदुत्यं जातकर्म वेदसं देवं वहन्ति केतवः दृशे विश्वाय सूर्यम्। ओम चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।
[14:13]आप्राद्यावापृथिवी अन्तरिक्षं स्वः सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥ ओम तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतञ्जीवेम शरदः शतंशृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शत मदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥
[14:39]ओम हृदयाय नमः ओम भूर शिरसे स्वाहा ओम भुवः शिखायै वषट् ओम स्वः कवचाय हुम् ओम भूर्भुवः स्वः नेत्राभ्यां वषट् ओम भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्
[14:57]फिर आपको ध्यान करना है हाथ जोड़कर के ओम तत्पदं पातु मे पादौ जंघे मे सवितुः पदम्। वरेण्यं कटिदेशन्तु नाभिं भर्गस्तथैव च। वरेण्यं मे तु हृदयं धीमहीति गलं तथा। धियो मे पातु जिह्वायाम् तत्पदं पातु लोचने। ललाटे नः पदं पातु मूर्धनानं मे प्रचोदयात्॥
[15:23]अब गायत्री जप विधान है पहले आपको विनियोग करना है ओम कार्यस्य ब्रह्मा ऋषिरग्निगायत्री छंदोग्निदेवता ओम त्रिव्याहृतीनां प्रजापतिर्ऋषिरग्निगायत्र्युष्णिगनुष्टुब्भरच्छंदांस्यग्निवाय्वादित्या देवताः।
[15:41]फिर आपको विनियोग छोड़ना है ओम गायत्र्या विश्वामित्र ऋषिरग्निगायत्री छंदः सविता देवता जपे विनियोगः फिर आपको योनि मुद्रा बना करके गायत्री माता का ध्यान करना है
[15:53]ओम श्वेत वर्णां समुदिष्टां कोशेयवसनां तथा, श्वेतैर्विलेपनैः पुष्पैरलङ्कारैश्च भूषिताम्। आदित्यमण्डलस्थां च ब्रह्मलोकगतां ध्रुवा, अक्षसूत्रधरां देवीं पद्मासनगतां शुभाम्॥ इस प्रकार ध्यान करके फिर गायत्री माता का आह्वान करना है पहले विनियोग लेना है
[16:16]ओम तेजोसीति देवा ऋषयः शुक्रं दैवतं गायत्री छंदो गायत्र्यावाहने विनियोगः फिर आपको मंत्र बोलना है ओम तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि धामनामासि प्रियं देवानामनधृष्टं देवयजनमसि
[16:34]आह्वान करने के बाद गायत्री उपस्थान होता है उसका पहले आपको विनियोग करना है ओम तुरीयस्य विमलऋषिः परमात्मा देवता गायत्री छंदः गायत्र्युपस्थाने विनियोगः। फिर आपको मंत्र बोलना है
[16:49]ओम गायत्र्यै एकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्युपदसि। न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापत्॥ इसके बाद गायत्री गायत्री शापित है तो गायत्री को तीनों शाप हैं
[17:13]ब्रह्म शाप मोचन वशिष्ठ शाप मोचन विश्वामित्र शाप मोचन यह मैं आपको बताने जा रहा हूं सबसे पहले ब्रह्म शाप मोचन उसका पहले भी आपको विनियोग करना है ओम अस्य श्रीब्रह्मशापविमोचनमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः भुक्तिमुक्तिप्रदा ब्रह्मशापविमोचनी गायत्री शक्तिदेवता गायत्री छन्दः ब्रह्मशापविमोचने विनियोगः।
[17:37]इसके बाद गायत्री मंत्र ओम गायत्र्या ब्रह्मयेत्युपासित यद्रूपं ब्रह्मविदो विदुः। तां पश्यन्ति धीराः सुमनसो वाचामग्रतः। ओम वेदान्तनाधाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्। ओम देवि! गायत्रि! त्वं ब्रह्मशापाद्विमुक्ता भव।
[18:03]इसके बाद आपको वशिष्ठ शाप मोचन करना है ओम अस्य श्रीवसिष्ठशापविमोचनमन्त्रस्य निग्रहानुग्रहकर्त्ता वसिष्ठ ऋषिरवसिष्ठानुगृहीता गायत्री शक्तिदेवता विश्वोद्भवा गायत्री छन्दः वसिष्ठशापविमोचनार्थे जपे विनियोगः। विनियोग करने के बाद में जल को पीना है
[18:28]ओम सोऽहमर्कमयञ्ज्योतिरात्मज्योतिरहं शिवः। आत्मज्योतिरहं शुक्रः सर्वज्योतीरसोऽस्म्यहम्॥ जल पी करके योनि मुद्रा बना करके तीन बार गायत्री मंत्र पढ़ना है उसके बाद ओम देवि! गायत्रि! त्वं वसिष्ठशापाद्विमुक्ता भव।
[18:46]इसके बाद विश्वामित्र शाप मोचन ओम अस्य श्रीविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य नूतनसृष्टिकर्त्ता विश्वामित्र ऋषिरविश्वामित्रानुगृहीता गायत्री शक्तिदेवता वाग्देहा गायत्री छन्दः विश्वामित्रशापविमोचनार्थं जपे विनियोगः। इसके बाद मंत्र है
[19:08]ओम गायत्रीं भजाम्यग्निमुखीं विश्वगर्भां यदुद्भवाः। देवाश्चक्रिरे विश्वसृष्टिं तां कल्याणीं मिष्टकरीं प्रपद्ये यत्सुखानि। सूतोऽखिलवेदगर्भः॥ शापयुक्ता तु गायत्री सफला न कदाचन। शापादित्युक्तारिता सा तु भुक्तिमुक्तिफलप्रदा
[19:24]ओम देवि! गायत्रि! त्वं विश्वामित्रशापाद्विमुक्ता भव। फिर प्रार्थना करनी है हाथ जोड़कर के ओम अहो देवि! महादेवि! सन्ध्ये! विद्ये! सरस्वति! अजरे! अमरे! चैव ब्रह्मयोनिर्नमोऽस्तु ते॥ ओम देवि! गायत्रि! त्वं ब्रह्मशापाद्विमुक्ता भव, वसिष्ठशापाद्विमुक्ता भव, विश्वामित्र- शापाद्विमुक्ता भव।
[19:53]फिर आपको गायत्री जी का ध्यान करना है तो प्रातः काल का ध्यान अलग है मध्य मध्य काल का ध्यान अलग है सायंकाल का ध्यान अलग है तो सबसे पहले प्रातः काल का ओम बालां विद्मां तु गायत्रीं लोहितां चतुरांनाम्। रक्ताम्बरद्वयोपेतां मक्षसूत्रकरां तथा। कमण्डलुधरां देवीं हंसवाहनसंस्थिताम्। ब्रह्माणीं ब्रह्मदैवत्यां ब्रह्मलोकनिवासिनीम्।
[20:18]मन्त्रेणावाहयेद्देवीं मायान्तीं सूर्यमण्डलात्। यह प्रातः काल का था अब मध्यान्ह काल का ओम मध्याह्ने विष्णुुरूपां च ताक्ष्यस्थां पीतवाससाम्। युवतीं च यजुर्वेदां सूर्यमण्डलसंस्थिताम्॥ अब सायंकाल का ध्यान प्रातः काले गायत्री ब्रह्म रूपा है मध्याह्न काल में विष्णु रूपा है और सायंकाल में शिव रूपा है
[20:42]ओम साय हने शिवरूपां च वृद्धां वृषभवाहिनीम्। सूर्यमण्डलमध्यस्थां सामवेदसमायुताम्॥ इस प्रकार ध्यान करके फिर गायत्री हृदय है उसका पाठ करना चाहिए तो गायत्री हृदय इस प्रकार है
[20:58]ओम अस्य श्री पहले विनियोग लेना है आपको ओम अस्य श्रीगायत्रीहृदयस्य नारायण ऋषिरग्निगायत्री छन्दः परमेश्वरी गायत्री देवता गायत्रीहृदयजपे विनियोगः। अथाङ्गन्यासः॥ विनियोग छोड़कर के अथ अङ्गन्यासः इस प्रकार गायत्री मंत्र है
[21:16]गायत्री हृदय है ओम ध्रुवोर्मूर्धनि दैवतम्। दन्तपङ्कावक्षिणौ। उभे सन्ध्ये चोष्ठौ। मुखमग्निः। जिह्वा सरस्वती। ग्रीवायां तु बृहस्पतिः। स्तनयोर्वसवोऽष्टौ। बाहोर्मरुतः। हृदये पर्जन्यः। आकाशमुदरम्। नाभावन्तरिक्षम्। कट्योरिन्द्राग्नी। जगने विज्ञानघनः प्रजापतिः। कैलाश्मलयो उरौ। विश्वेदेवा जान्वोः। जङ्घयोः कौशिकः। गुह्यमयेन ऊरू पितरः।
[21:50]पादौ पृथिवी। वनस्पतिषोडशोषिषु च। रोमाणि। नखानो मुहुर्तानि। अस्थिषु ग्रहाः। अष्टौ मासं ऋतवः। संवत्सरा वै निमिषम्। अहोरात्रावादित्यश्चन्द्रमाः। प्रवरां दिव्यां गायत्रीं सहस्रनेत्रां शरणमहं प्रपद्ये। ओम तत्सवितुरेण्यय नमः। ओम तत्पूर्वा जयै नमः।
[22:11]ओम तत्प्रातरादित्याय नमः। ओम तत्प्रातरादित्य प्रधिष्ठायै नमः। ओम प्रातराधियानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायं धियानो दिवस्कृतं पापं नाशयति। सायं प्रातरधियानोपापो भवति। सर्वतीर्थेषु स्नातो भवति। सर्ववेदज्ञो भवति।
[22:31]अवाच्यवचनात्पूतो भवति। अभक्ष्यभक्षणात्पूतो भवति। अभोऽज्यभोजनात्पूतो भवति। अचोष्यचोषणात्पूतो भवति। असाध्यसाधनात्पूतो भवति। दुष्प्रतिग्रहशतसहस्रात्पूतो भवति। सर्वप्रतिग्रहात्पूतो भवति। पङ्क्तिदूषणात्पूतो भवति। अनुतवचनात्पूतो भवति।
[22:42]अथाऽब्रह्मचारी ब्रह्मचारी भवति। अनेन हृदयेनाधीतेन क्रतुसहस्रेणेष्टं भवति। षष्टिशतसहस्रगायत्र्या जपान्नफलानि भवन्ति। अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयेत्। तस्य सिद्धेर्भवति। य इदं नित्यमधीयानो ब्राह्मणः प्रातः शुचिः सर्वपापैः प्रमुच्येत इति॥ ब्रह्मलोके महीयते॥ इत्याह भगवान् श्रीनारायणः॥ श्री मद देवी भाग। जप के पूर्व की 24 मुद्राएं
[23:32]सुमुखं संपुटं चैव विततं विस्तृतं तथा। द्विमुखं त्रिमुखं चैव चतुष्पञ्चमुखं तथा॥ षण्मुखोऽधोमुखं चैव व्यापकाञ्जलिकं तथा। शकटं यमपाशं च ग्रन्थितं चोन्मुखोन्मुखम्॥ प्रलम्बं मुष्टिकं चैव मत्स्यः कूर्मो वराहकम्॥ सिंहाक्रान्तं महाक्रान्तं मुद्गरं पल्लवं तथा। एता मुद्राश्चतुर्विंशतिर्जपादौ परिकीर्तिताः॥ जब से पूर्व ये 24 मुद्राएं होती हैं
[24:06]इसके बाद आपको गायत्री जप करना होता है यह आठ मुद्राएं हैं आठ मुद्राएं आपको बनानी होती है जप के बाद सुभिर्ज्ञान वैराग्य योनि शंखोत पंकजम लिंग निर्वाण मुद्रा जपतेष्टो प्रदर्शय यह ज्ञानं सुर्भि वैराग्य योनि शंख वायम पंकजम निर्वाणम यह आपको आठ मुद्राएं हैं इसके बाद गायत्री कवच का पाठ करना होता है गायत्री कवच में सबसे पहले विनियोग
[24:32]ओम अस्य श्रीगायत्रीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिरग्निगायत्री छंदो गायत्री देवता ओम भूः बीजम्, भुवः शक्तिः, स्वः कीलकम्, गायत्रीप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः। फिर आपको गायत्री कवच प्रारंभ करना है
[24:50]ओम पञ्चवक्त्रां दशभुजां सूर्यकोटिसमप्रभाम्। सावित्रीं ब्रह्मवरदां चन्द्रकोटिसुशीतलाम्। त्रिनेत्रां सितवक्त्रां च मुक्ताहारविराजिताम्। वराभयाङ्कुशकशाहैमपात्राक्षमालिकां शंखचक्राब्जयुगलं कराभ्यां दधतीं वराम्।
[25:07]शंखचक्राब्जयुगलं कराभ्यां दधतीं वराम्। सितपङ्कजसंस्थां च हँसारूढां सुखस्मिताम्। ध्यात्वैव मानसांभोजे गायत्रीकवचं जपेत्॥ ओम ब्रह्मोवाच विश्वामित्र! महाप्राज्ञ! गायत्रीकवचं शृणु। यस्य विज्ञानमात्रेण त्रैलोक्यं वशयेत्क्षणात्॥ सावित्री मे शिरः पातु शिखायाममृतेश्वरी। ललाटं ब्रह्मदैवत्या भ्रुवौ मे पातु वैष्णवी। कर्णौ मे पातु रुद्राणी सूर्या सावित्रिकाम्बिके। गायत्री वदनं पातु शारदा दशनच्छदौ।
[25:46]द्विजान् यज्ञप्रिया पातु रसनायां सरस्वती। सांख्यायनी नासिकां मे कपोलौ चन्द्रहासिनी॥ चिबुकं वेदगर्भा च कण्ठं पात्वघनाशिनी। स्तनौ मे पातु इन्द्राणी हृदयं ब्रह्मवादिनी॥ उदरं विश्वभोक्त्री च नाभौ पातु सुप्रिया। जघनं नारसिंही च पृष्ठं ब्रह्माण्डधारिणी॥ पाश्वों मे पातु पद्माक्षी गुह्यं गोगोप्रतिकारवतु। ऊर्वोरोंकाररूपा च जान्वोः सन्ध्यात्मिकावतु। जङ्घयोः पातु अक्षोभ्या गुल्फयोर्ब्रह्मशीर्षिका।
[26:17]सूर्या पदद्वयं पातु चन्द्रा पादाङ्गुलीषु च। सर्वाङ्गं वेदजननी पातु मे सर्वदाऽनघा॥ इत्येतत् कवच ब्रह्मा गा यत्र्याः सर्वपावनम्। पुण्यं पवित्रं पापनघ्नं सर्वरोगनिवारणम्॥ त्रिसन्ध्यं यः पठेद्विद्वान् सर्वान् कामानवाप्नुयात्। सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स भवेद्वेदवित्त्तमः। सर्वयज्ञफलं प्राप्य ब्रह्मान्ते समवाप्नुयात्। प्राप्नोति जपमात्रेण पुरुषार्थांश्चतुर्विधान्॥ श्री विश्वामित्रसंहितोक्तं गायत्रीकवचं सम्पूर्णम्॥ इस प्रकार गायत्री कवच है तो प्रातःकाल आपको तर्पण करना होता है गायत्री संध्या में तो गायत्री तर्पण का पहले विनियोग इस प्रकार है
[27:04]ओम गायत्र्या विश्वामित्र ऋषिरग्नि गायत्री छंदः सविता देवता गायत्री छंदः गायत्री तर्पणे विनियोगः फिर गायत्री तर्पण इस प्रकार करना है
[27:16]ओम भूः ऋग्वेदपुरुषं तर्पयामि ओम भुवः यजुर्वेदपुरुषं तर्पयामि ओम स्वः सामवेदपुरुषं तर्पयामि ओम महः अथर्ववेदपुरुषं तर्पयामि ओम जनःइतिहासपुराणपुरुषं तर्पयामि ओम तपः सर्वागंमुपुरुषं तर्पयामि ओम सत्यं सत्यलोकपुरुषं तर्पयामि ओम भूः भूलोकपुरुषं तर्पयामि ओम भुवः भुवर्लोकपुरुषं तर्पयामि ओम स्वः स्वर्लोकपुरुषं तर्पयामि ओम भूः एकपदां गायत्रीं तर्पयामि ओम भुवः द्विपदां गायत्रीं तर्पयामि ओम स्वः त्रिपदां गायत्रीं तर्पयामि ओम भूर्भुवः स्वः चतुष्पदां गायत्रीं तर्पयामि ओम सरस्वतीं तर्पयामि ओम वेदमातरं तर्पयामि ओम सावित्रीं तर्पयामि ओम अजां तर्पयामि ओम कौशिकीं तर्पयामि ओम सांकृतिं तर्पयामि ओम सार्वजितीं तर्पयामि ओम तत्सद ब्रह्मार्पणमस्तु देवी भागवत
[28:12]इसके बाद मन से भगवान की गायत्री माता की प्रदक्षिणा करें ओम यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च। तानि तानि प्रणश्यन्तु प्रदक्षिण पदे-पदे॥ इसके बाद गायत्री माता का विसर्जन होता है सबसे पहले विनियोग किया जाता है
[28:26]पहले क्षमा प्रार्थना उसके बाद विसर्जन ओम उत्तमे शिखरे इत्यस्य वामदेव ऋषिः गायत्री देवता अनुष्टुप छंदः गायत्री विसर्जने विनियोगः फिर मंत्र से विसर्जन कर दीजिए
[28:47]ओम उत्तमे शिखरे देवि भूम्यां पर्वतमुर्धनि ब्राह्मणेभ्यो अनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्। इस प्रकार छोड़कर के जो जल बचा जल है वह जल पीना नहीं चाहिए क्योंकि
[29:00]लिखा है पाद शेषम पीत शेषम संध्या शेषम तथैव च सुनो मूत्रसमं तोयं पीत्वा चन्द्रायणं चरेत्
[29:11]बोले पाद शेषम पैर धोया हुआ जल पीत शेषम पी करके बचा हुआ जल संध्या शेषम संध्या से बचा हुआ जल सुनो मूत्रम कुत्ते के मूत्र के समान है इसलिए उसको
[29:24]छूना नहीं चाहिए उसको फेंक देना चाहिए पौधे इत्यादि में डालकर उसको छोड़ देना चाहिए तो इस प्रकार संध्या वंदन अगर आपके पास पुस्तक नहीं है तो आप कमेंट कीजिएगा
[29:34]अपने पूरे एड्रेस के साथ आपको संध्या आपकी पते पर भेज दी जाएगी अभी लॉकडाउन चल रहा है लॉकडाउन खत्म हो जाएगा उसके बाद आपको यह संध्या वंदन आपको भेज दी जाएगी तो देखने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद



