[0:13]मगनपुर गांव में एक छोटा सा घर था जिसमें शिवा अपनी मां और बहन के साथ रहता था कम उम्र में ही गरीबी और बेरोजगारी ने उसकी कमर तोड़ दी थी अब तो वक्त ऐसा आ गया था कि खाने के लाले पड़ गए थे हटो मां मैं कोशिश करती हूं लकड़ियां सुलग रही हैं तो बस फूंकनी से धीरे-धीरे फूंक दे शायद जल जाए तब तक मैं देखूं आटा है कि नहीं कुछ नाश्ता बन जाए तो शिवा काम ढूंढने निकलेगा ममता आटा देखने उठी
[1:06]तो उसने देखा कि शिवा एक मूर्ति जैसे बैठा हुआ है ए शिवा क्या हुआ तू ऐसे क्यों बैठा है मां मां मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा हूं मां मेरे जिंदा होने का क्या ही मतलब है बोलो जब मैं इस घर में एक पैसा तक ना ला सकूं तो मेरे निकम्मेपन के कारण आज तुम सब लोग दो वक्त के खाने को भी तरस रहे हो मां अरे तू कैसी बातें कर रहा है तू कोशिश कर तो रहा है ना अरे मां कोशिश से घर नहीं चलता है पूनम ए पूनम चूल्हा बुझा दे घर में कुछ नहीं है बिना वजह के लकड़ी बर्बाद मत कर बहन पर हम लोग खाएंगे क्या इस सवाल से घर में ऐसा सन्नाटा सा छा जाता है जैसे वहां कोई रहता ही ना हो और फिर वह सन्नाटा टूटा ममता की खांसी से और ममता ने खून थूक दिया मां आप ठीक तो हो हे भगवान मां आप ठीक तो हो ना मैं भी कैसा अभागा बेटा हूं अपनी मां का इलाज तक नहीं करवा सकता बहुत बुरा बेटा हूं मैं बहुत बुरा अरे मैं ठीक हूं बस ये तो यूं ही हो जाता है कभी-कभी शिवा अपने आप में ही घुट रहा था उससे बर्दाश्त नहीं हुआ और वो बाहर निकल गया
[2:37]मैं अब इस घर में तब तक नहीं लौटूंगा जब तक कमाई का इंतजाम ना कर लूं हां वरना ना मैं खुद को माफ कर पाऊंगा और ना पिताजी की आत्मा मुझे माफ करेगी हां वह शहर की ओर चला इस उम्मीद में कि शायद कुछ काम हाथ लग जाए
[3:04]पर शहर शहर तो जैसे किसी और ही धुन में चलता है शिवा सुबह से शाम तक हर दुकान हर फैक्ट्री के फाटक तक गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ कर्मचारी पूरे हैं फिर कभी आना भाई आधी मजदूरी मिलेगी करना चाहो तो कर लो अरे अरे साहब आधी मजदूरी में घर कैसे चलेगा बताइए अरे तेरा घर चले या ना चले हमें क्या है काम करना है तो करो वरना आगे बढ़ो भैया शिवा पूरा शहर घूम कर थक गया उसके पैरों में जैसे जान ही नहीं बची थी धूल से चेहरा काला पड़ गया था पर वो पोंछने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहा था तभी हल्की सी खुशबू आई गले में अटके दुख को भी पल भर को बुला देने वाली उसने गर्दन उठाई सामने एक दुकान थी लकड़ी के छोटे से तख्त पर कुल्हड़ सजे थे और उसके नीचे कोयले की धीमी आंच में मटन पक रहा था उसके सामने लोग खड़े बड़े चाव से कुल्हड़ वाले मटन चावल खा रहे थे अरे अरे ये तो ये तो मैं भी कर सकता हूं कुल्हड़ बनाना तो मुझे आता है और खाना हां थोड़ा बहुत तो बना ही लेता हूं हां हां मैं गांव में यही करूं तो कितना अच्छा रहेगा गांव में तो कुल्हड़ वाले कढ़ी चावल कोई बेचता भी नहीं है और रही बात मांसाहारी की तो तो हमारे गांव में तो कोई खाता नहीं है तो हां यही सही रहेगा कढ़ी चावल ही सही रहेगा हां जैसे किसी ने उसकी पीठ पर हाथ रख कर कहा हो चल अब तेरी बारी है वो फौरन गांव लौट पड़ा
[4:58]हां अगर यह काम चल गया ना तो शायद मां का इलाज करा पाऊंगा और और फिर पूनम की शादी भी करा पाऊंगा और क्या पता किसी दिन यह घर फिर से घर जैसा बन जाए
[6:10]भैया रात के 2:00 बज रहे हैं सो जाओ ना
[6:16]अरे बहना तू सो जा देख मेरी तो नींद उठ चुकी है अब यह तभी आएगी जब घर में पैसे आएंगे तू सो जा मेरी फिक्र मत कर सो जा शिवा इतना मत थक बेटा ऐसा क्या हो गया इतनी रात गए तो कबाड़ में लगा पड़ा है अरे मां आप भी सो जाओ ना कल की सुबह कुछ अलग होने वाली है देखना बस अपने बेटे को आशीर्वाद दो मां मैं कढ़ी चावल बना कर बेचूंगा कल से वह तो हमेशा तेरे साथ है पर कढ़ी चावल के लिए पैसे कहां से लाएगा मां वह मैंने मैंने अपनी पुरानी साइकिल बेच दी है मां पर भैया सिर्फ कढ़ी चावल कौन खाता है यहां गांव में लोग कढ़ी चावल के साथ पुदीने की चटनी पसंद करते हैं दोनों बनाना पुदीने की चटनी अरे हां अरे हां हां अरे अरे वाह बहन यह तो तूने बहुत अच्छा सुझाव दिया मेरी समझदार बहन कितनी अच्छी है तू
[7:27]शिवा पूरे जज्बे के साथ पहले दिन ठेला लेकर गांव के चौपाल में जा खड़ा हुआ
[7:41]ठेला चमक रहा था कुल्हड़ कतार में सजे थे कढ़ी की खुशबू उबलते ही उड़ने लगी लेकिन लोग आए ठेले को देखा और बिना रुके निकल गए किसी ने भी मुड़ कर ना देखा
[8:01]अरे कोई आ क्यों नहीं रहा है बहुत देर हो गई शायद मेरे कढ़ी चावल में वह बात नहीं है तभी दो लड़के आए
[8:19]ओए शिवा एक कुल्हड़ दे भूख लग रही है हां हां ये लो ये लो ये लो भाई शिवा ने कुल्हड़ लिया और उसने पहले चावल डाले और ऊपर से कढ़ी साथ में फ्लेवर के लिए पुदीने की चटनी
[8:38]अरे यार ये क्या बनाया भाई नमक ही नहीं है अबे बनाना नहीं आता तो ठेला लेकर क्यों खड़े हो गए भाई अबे इस बकवास कढ़ी चावल के हम कोई पैसे नहीं देंगे समझा हां नहीं देंगे दोनों लड़के मुंह बनाकर चले गए
[9:05]पर शिवा हारने वालों में से नहीं था
[9:14]रात को बैठकर उसने मसाले बदले नुस्खा सुधारा कई बार चखा फिर चूल्हा बुझा दिया दिन गुजरने लगे पर ग्राहक गिनती के आते वह भी मजाक बना देते अरे एक बात कहूं कढ़ी चावल से ज्यादा स्वादिष्ट तो यह कुल्हड़ लग रहा है मुझे तुम्हारा अरे एक काम कर भाई तू कुल्हड़ ही रख ले और खाना फेंक दे कैसा रहेगा है शिवा हंस देता पर अंदर से रोता रहता पैसे आ रहे थे पर लागत से कम कोई फायदा नहीं हो रहा था
[10:01]शिवा बैठकर सोचता लगता है लगता है मैं गलत रास्ते पर हूं शायद भगवान ने मेरे लिए कुछ कुछ लिखा ही नहीं है मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती बेटा बस हिम्मत मत छोड़ हां भैया मैं भी आपके साथ हूं आप हिम्मत रखो बहन हिम्मत भी पेट खाली होने पर ना डगमगा जाती है समझी
[19:28]और फिर अगली सुबह शिवा मिट्टी लेने गया तो ढेर में कुछ चमकता दिखा अरे यह कैसी पोटली है और इसमें यह चमक और ये खुशबू
[19:55]एक काम करता हूं इसे भी मिट्टी में मिला ही लेता हूं क्या पता जो वो बाबा कह रहे थे उनकी बात सच ही हो जाए शिवा वह पोटली ले आया
[20:09]और उसने थोड़ा सा पाउडर मिट्टी में मिलाया और नए कुल्हड़ बनाए अरे अरे अरे ये कुल्हड़ गर्म क्यों हो रहे हैं अरे अरे और ये खुशबू आ ये खुशबू तो मदहोश कर रही है अरे वाह बड़ी अच्छी सुगंध है उस दिन उसने ठेला फिर से लगाया
[20:50]लोग पहले दूर रहे पर खुशबू ने उन्हें खींच ही लिया अरे भाई वाह क्या खुशबू आ रही है भैया कहां से आ रही है अरे शिवा के ठेले से अरे चल कर देखता हूं
[21:13]ठेले पर भीड़ उमड़ पड़ी
[21:20]देखते ही देखते कुल्हड़ गरम कढ़ी चावल ने रंग जमा दिया सारे कुल्हड़ बिक गए और शिवा ढेर सारे पैसे लेकर घर पहुंचा अरे वाह मेरा बेटा आज तो खूब कमा कर आया है हां मां आज मैंने बहुत कमाई की है आज सब कुल्हड़ बिक गए मां



