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इन जगहों पर जाना मौत को दावत देना | दुनिया की 10 Impossible जगहें

Musta Official 2.0

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[0:00]सोचिए, एक पल के लिए एक ऐसी जगह जहां तापमान -67° तक गिर जाता है. इतना ठंडा कि आपकी सांस हवा में जमकर बर्फ बन जाए. एक ऐसा पुल जहां कोई रेलिंग नहीं, कोई सुरक्षा जाल नहीं बस कुछ रस्सियां और नीचे बहती हुई मौत. एक ऐसा चर्च जो पहाड़ की चट्टान में इतनी ऊंचाई पर बना है कि वहां पहुंचने के लिए आपको अपनी जान हथेली पर रखनी पड़ती है. दोस्तों ये सिर्फ कहानियां नहीं है. ये असली जगह है इस धरती पर जहां इंसान रहता है, जाता है और कभी-कभी वापस नहीं आता. आज हम बात करेंगे दुनिया के 10 ऐसे इंपॉसिबल प्लेसेस की जो हमें यह याद दिलाते हैं कि इस प्लेनेट पर अभी भी बहुत कुछ है जो हमारी समझ से परे हैं. और हां अगर आप इनमें से किसी एक जगह भी जाने की हिम्मत रखते हैं तो कमेंट में जरूर बताइए, लेकिन पहले पूरा वीडियो देखिए. शिबाम यमन. मैनहट्टन को सब जानते हैं, ऊंची-ऊंची बिल्डिंग्स ग्लास और स्टील से बनी, लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया का पहला स्काईस्क्रैपर शहर मिट्टी से बना था. और वह बना था आज से 2000 साल पहले. यमन के हजर मौत घाटी में बसा शिबाम जिसे रेगिस्तान का मैनहट्टन कहते हैं, एक ऐसा शहर है जहां 500 से ज्यादा मड टावर्स खड़ी हैं. जिनमें से कई 30 मीटर यानी लगभग नौ मंजिल तक ऊंची हैं. सोचिए कोई सीमेंट नहीं, कोई आयरन रॉड नहीं, कोई मॉडर्न इंजीनियरिंग नहीं. बस मिट्टी, पानी और इंसान की जुगत. लेकिन इस शहर की असली कहानी उसकी ऊंचाई में नहीं उसकी सर्वाइवल में है. शिबाम बना था एक खास मकसद से, बाढ़ से बचने के लिए. हजर मौत नदी जब तूफान पर होती थी तो पूरी घाटी डूब जाती थी. इसलिए यहां के लोगों ने जमीन से ऊपर उठकर घर बनाने शुरू किए. ऊंचे और ऊंचे और ऊंचे. यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया है, लेकिन असली खतरा अब भी बरकरार है. यमन में चल रहे गृह युद्ध, बारिश का कटाव और रखरखाव की कमी, यह सब मिलकर इस 2000 साल पुरानी विरासत को धीरे-धीरे खा रहे हैं. एक पूरी सभ्यता, एक पूरा शहर मिट्टी में बना और शायद मिट्टी में ही मिल जाए. लेकिन अगर शिबाम आपको वर्टिगो दे रहा है तो अगली जगह के लिए तैयार रहिए क्योंकि यहां लोग जमीन पर नहीं पेड़ों पर रहते हैं और 35 मीटर ऊपर. कोरोवाई ट्री हाउसेस इंडोनेशिया. इंसान ने चांद पर कदम रखा, समंदर की गहराइयों को नापा, लेकिन इंडोनेशिया के पापुआ के जंगलों में आज भी एक जनजाति है जो पेड़ों पर 35 मीटर की ऊंचाई पर घर बनाकर रहती है. मिलिए कोरोवाई ट्राइब से. कोरोवाई ट्राइब के लोग अपने घर सबसे ऊंचे और मजबूत पेड़ों की चोटी पर बनाते हैं.

[2:51]बैनियन और वैन बॉम्ब ट्रीज पर. यह घर बंबू और पाम लीव्स से बनते हैं और इन्हें बनाने में हफ्ते लगते हैं. अब आप सोच रहे होंगे भाई इतनी ऊंचाई पर क्यों? असल वजह है सुरक्षा. जमीन पर खतरा था दूसरी ट्राइब से, जंगली जानवरों से और पुराने समय में तो कैनिबेलिज्म का डर भी था. ऊंचाई पर घर मतलब सेफ हाउस, लिटरली. इन घरों तक पहुंचने के लिए एक पतला सा बेंबू का खंभा जिसमें पैर रखने के लिए सिर्फ निशान कटे हुए हैं. कोई रोप नहीं, कोई रेलिंग नहीं और कोरोबाई के बच्चे वो इस पर ऐसे चढ़ते हैं जैसे हम सीढ़ियां चढ़ते हैं. दुनिया मॉडर्नाइज हो रही है, लेकिन कोरोवाई ट्राइब अभी भी अपनी जड़ों से जुड़ी है. कुछ लोग नीचे बसने लगे हैं, लेकिन बड़े बुजुर्ग अभी भी कहते हैं. जमीन हमारे लिए नहीं है, हम आसमान के लोग हैं. पेड़ों से निकलकर अब हम पहुंचते हैं एक ऐसी जगह जहां जमीन खुद सुलग रही है. जहां पृथ्वी की आंते बाहर आ रही हैं. वेरीर जियोथर्मल एरिया. अगर आपसे कोई कहे चलो नरक देखने चलते हैं, तो शायद आप हंस दें. लेकिन आइसलैंड के उत्तर में एक जगह है जो लिटरली देखने में वैसी ही लगती है. नाम है वेरीर. वेरीर एक जियोथर्मल एरिया है जहां जमीन के नीचे से उबलती हुई कीचड़ बाहर आती है. जहरीले गैसेस उड़ते हैं और सल्फर की इतनी तीखी बदबू है कि पहली सांस में ही आंखें पानी से भर जाएं. और फिर भी टूरिस्ट्स यहां आते हैं हंड्रेड्स ऑफ थाउजेंड्स हर साल. यहां की जमीन का रंग है नारंगी, पीला, लाल और भूरा. जैसे किसी एलियन प्लेनेट की तस्वीर और एक्चुअली नासा के साइंटिस्ट्स यहां आते हैं मार्स मिशंस की प्रिपरेशन के लिए क्योंकि इससे बेहतर अर्थ पर मार्स कहीं नहीं मिलता. वेरीर जहां है उसके पास है लेक माइट्विन जहां का इकोसिस्टम इतना यूनिक है कि वह भी अपने आप में एक वंडर है. लेकिन वेरीर का असली ड्रामा है इसके मड पॉट्स में. बॉइलिंग मड लिटरली उबलती हुई कीचड़ जो रंग बदलती रहती है ब्लू, ग्रे, वाइट. और इस सब के बीच आइसलैंड के लोकल्स, उन्होंने इसकी जियोथर्मल एनर्जी को हार्नेस किया है. पूरे आइसलैंड की 25% बिजली और हीटिंग जियोथर्मल सोर्सेज से आती है. यानी जो जमीन नरक जैसी दिखती है वह एक्चुअली उनके लिए स्वर्ग जैसी है. आइसलैंड में हमें आग और कीचड़ दिखाई. अब हम जाते हैं एक ऐसी जगह जहां ऊंचाई ही आपकी सबसे बड़ी दुश्मन है. भारत की छाती पर बसी स्पीति वैली. हमारे अपने देश में हिमाचल प्रदेश के बीचोंबीच एक ऐसी घाटी है जिसे मिडिल लैंड कहते हैं. ना पूरी तरह भारत जैसी ना पूरी तरह तिब्बत जैसी. स्पीति वैली समुंदर तल से 12500 फीट की ऊंचाई पर है. जहां साल में सिर्फ 250 दिन तक सड़क खुली रहती है. बाकी चार महीने पूरी दुनिया से कटा हुआ. स्पीति का मतलब है मध्यभूमि और सच में यह जगह दो दुनियाओं के बीच है. यहां की आबादी है मात्र 12000 लोग एक ऐसे इलाके में जो दिल्ली से बड़ा है. यानी आप घंटों चलते रहिए कोई नहीं मिलेगा. यहां की रोड्स इंडिया की सबसे खतरनाक रोड्स में से एक. एक तरफ पहाड़ दूसरी तरफ हजारों फीट गहरी खाई. कोई बैरियर नहीं कोई गार्ड रेल नहीं. और ट्रक ड्राइवर्स जो यह रास्ता रोज चलाते हैं वह बताते हैं कि हम रोज भगवान को याद करके घर से निकलते हैं. लेकिन स्पीति की खूबसूरती भी उतनी ही एक्सट्रीम है जितना उसका खतरा. यहां मिलता है दुनिया का सबसे ऊंचा पोस्ट ऑफिस हिकिम में. यहां मिलता है 1000 साल पुराना की मोनेस्ट्री और यहां की रातों में आसमान इतना साफ है कि मिल्की वे नंगी आंखों से दिखती है. क्लाइमेट चेंज एक और खतरा बन रहा है स्पीति के लिए. ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं, वाटर सोर्सेज सूख रहे हैं. जो लोग 1000 सालों से यहां रहते आए हैं उनका भविष्य अनिश्चित है. स्पीति ने हमें ऊंचाई का डर दिखाया. अब हम उतरते हैं जमीन के नीचे बर्फ की गुफाओं में वापस आइसलैंड. वाटनाजोकुल आइस केव्स आइसलैंड. बताइए अगर आपसे कहा जाए कि पानी नीला हो सकता है, आसमान नीला हो सकता है, लेकिन बर्फ की दीवारें भी नीली हो सकती हैं. और वह भी इतनी गहरी नीली जैसे किसी फैंटेसी मूवी का सेट हो. वेलकम टू वटनोजोकुल, यूरोप का सबसे बड़ा ग्लेशियर और उसके अंदर छुपी हुई इन आइस केव्स की दुनिया. वटनोजोकुल ग्लेशियर आइसलैंड के लगभग 8% हिस्से को कवर करता है. और इस ग्लेशियर के अंदर बनती हैं आइस केव्स. नेचुरल टनल्स और चेंबर्स जो पिघले हुए पानी की धाराओं से बनती हैं. इन केव्स के अंदर जो नीला रंग दिखता है वह एक्चुअली हजारों साल पुरानी कंप्रेस्ड आइस का इफेक्ट है. इतनी कंप्रेशन में सारी एयर बबल्स निकल जाती हैं और बचता है क्रिस्टल क्लियर आइस जो नीली रोशनी को एब्जॉर्ब करता है. लेकिन इन केव्स तक पहुंचना आसान नहीं. यह केव्स सिर्फ नवंबर से मार्च के बीच एक्सेसिबल है. बाकी टाइम यह अनस्टेबल हो जाती हैं. सीलिंग टूट सकती हैं, बाढ़ आ सकती है. 2010 में अयाफलाजोकुल वोल्केनो फटा था जिसने आइसलैंड और यूरोप को हिला दिया था. वटनाजोकुल के नीचे भी वोल्केनोस हैं, मतलब आप लिटरली एक आइस केव में है जिसके नीचे एक्टिव वोल्केनो है. गाइड्स बताते हैं कि हर साल ये केव्स बदल जाती हैं. जो पैसेज पिछले साल था वह इस साल शायद ना हो. यह केव्स लिविंग ब्रीदिंग स्ट्रक्चर्स हैं और क्लाइमेट चेंज की वजह से यह केव्स हर साल छोटी होती जा रही हैं. साइंटिस्ट्स का कहना है कि 100-200 साल में वटनाजोकुल ग्लेशियर बड़े पैमाने पर पिघल सकता है. एक नीली दुनिया जो धीरे-धीरे खत्म हो रही है. बर्फ की गुफाओं से निकलकर अब हम पहुंचते हैं एक ऐसी जगह जहां ठंड सिर्फ एक मौसम नहीं एक जीवन शैली है. जहां इंसान सच में -67 डिग्री में जीता है. ओयम्याकॉन, रशिया. -67.7 डिग्री सेल्सियस. रुकिए जरा सोचिए. दिल्ली में जब 5 डिग्री होता है तो हम कहते हैं यार बहुत ठंड है. ओयम्याकॉन में -67.7 डिग्री रिकॉर्ड हुआ है. वह भी इनहैबिटेड यानी बसी हुई जगह पर. यह धरती का सबसे ठंडा परमानेंटली इनहैबिटेड विलेज है. ओयम्याकॉन रशिया के याकुटिया रीजन में बसा एक छोटा सा गांव है जहां लगभग 500 लोग रहते हैं. और ये लोग इस एक्सट्रीम ठंड में ना सिर्फ सरवाइव करते हैं, बल्कि थ्राइविंग करते हैं. यहां जिंदगी कैसी है. सुबह उठते हैं पानी का नल जमा हुआ. फोन की बैटरी तुरंत खत्म. कार को रात भर चालू रखते हैं वरना सुबह स्टार्ट नहीं होगी. इंक पेन से लिखना बंद क्योंकि इंक जम जाती है. ग्रेव्स खोदने के लिए जमीन को पहले आग से गर्म करते हैं. क्योंकि परमाफ्रोस्ट इतना कठोर होता है कि फावड़ा नहीं चलता. खाना मुख्यतः रॉ फ्रोजन फिश, रेनडियर मीट और हॉर्स मीट. वेजिटेबल्स उगते नहीं. जमीन साल भर जमी रहती है. स्कूल बंद होता है सिर्फ तब जब टेंपरेचर -52 से नीचे जाए. उससे ऊपर बच्चे स्कूल जाते हैं. और फिर भी ओयम्याकॉन के लोग अपनी जगह नहीं छोड़ते. वह कहते हैं यह हमारी मातृभूमि है. यहां जन्मे हैं, यहीं रहेंगे. ह्यूमन स्पिरिट की सबसे बड़ी मिसाल. ओयम्याकॉन में ठंड से दिल दहल गया. अब हम जाते हैं एक ऐसी जगह जहां दिल इसलिए नहीं दहलता कि ठंड है. बल्कि इसलिए कि आपके पैरों के नीचे सिर्फ रस्सियां हैं और नीचे सैकड़ों फीट गहरी खाई. हुसैनी हैंगिंग ब्रिज पाकिस्तान. दुनिया के सबसे खतरनाक पुलों में से एक. हुसैनी हैंगिंग ब्रिज पाकिस्तान के गिलगित-बलतिस्तान में बोरेट लेक के पास अपर हुंजा वैली में यह सस्पेंशन ब्रिज बना है जो इतना पुराना और जर्जर है कि इसके प्लैंक्स के बीच बड़े-बड़े गैप्स हैं. ब्रिज की लंबाई लगभग 300 मीटर्स. ब्रिज की चौड़ाई इतनी कि बस एक इंसान जा सके. ब्रिज के नीचे हुंजा नदी बर्फीला तेज बहाव. ब्रिज की हालत प्लैंक्स टूटे हुए हैं, रस्सियां घिसी हुई हैं और हवा के साथ पूरा ब्रिज झूलता है. और लोकल्स वो इस ब्रिज को ऐसे क्रॉस करते हैं जैसे हम फुटपाथ पर चलते हैं. बिना रुके, बिना झांके, स्ट्रेट चले जाते हैं. एक टूरिस्ट ने लिखा मैंने अपनी जिंदगी में जो सबसे डरावना काम किया वह यह ब्रिज क्रॉस करना था. एंड आई सर्वाइव्ड एवरेस्ट बेस कैंप. इस ब्रिज की जरूरत क्यों है. क्योंकि इसके बिना वैली के दोनों तरफ के गांव एक दूसरे से पूरी तरह कट जाते हैं. यह ब्रिज सिर्फ एक रास्ता नहीं यह एक लाइफलाइन है. लोगों ने बार-बार इसकी मरम्मत की है, नई रस्सियां लगाई हैं, लेकिन फ्लड सीजन में पुरानी रस्सियां टूट जाती हैं, प्लैंक्स बह जाते हैं. और फिर भी गांव के बच्चे इस ब्रिज पर दौड़ते हैं. डर वह तो हम टूरिस्ट्स का है. पाकिस्तान की घाटियों से निकलकर अब हम पहुंचते हैं चाइना के उन पहाड़ों में जहां इंसान ने खुद पहाड़ को अपना घर बना लिया, लिटरली. हेडाईशान चाइना. सन 491 ईसवी. एक बुद्धिस्ट मंक नाम था लियाओरान. उसने सोचा मुझे एक ऐसी जगह मंदिर बनाना है जहां बाढ़ ना आए, जहां शोर ना हो, जहां दुनिया की आपाधापी ना पहुंचे. और उसने चुनी एक वर्टिकल क्लिफ फेस 75 मीटर्स की ऊंचाई पर. हेंग्शान माउंटेन पर बना जुवांगकॉन्ग सी हैंगिंग टेंपल दुनिया के सबसे एक्स्ट्राऑर्डिनरी रिलीजियस साइट्स में से एक है. इसे हेडाईशान एरिया भी कहते हैं. यह मंदिर इसलिए स्पेशल नहीं कि यह बड़ा है बल्कि इसलिए कि यह ग्रेविटी को चैलेंज करता दिखता है. नीचे से देखो तो लगता है यह कैसे टिका है. बस कुछ पतले से लकड़ी के खंभे, लेकिन असल सीक्रेट है शैतेज बीम्स जो सीधे पहाड़ की चट्टान में घुसाई गई हैं और पहाड़ की चट्टान ही लोड बेयर करती है. वह दिखने वाले खंभे मोस्टली डेकोरेटिव हैं. 1500 साल पुरानी चाइनीज इंजीनियरिंग का कमाल. इस मंदिर में तीन रिलीजंस को एक साथ रिप्रेजेंट किया गया है, बुद्धिज्म, ताओइस्म और कंफ्यूजनिज्म. एक ही जगह तीन फिलॉसफीज यही इसकी यूनिकनेस है. 78 रूम्स हैं इस मंदिर में कॉरिडोर्स, हॉल्स और पवेलियंस सब पहाड़ की दीवार में काव्ड या अटैच्ड. आज टूरिस्ट्स इसे देखने आते हैं, लेकिन वह एक्चुअली अंदर जा सकते हैं, चल सकते हैं. उन्हीं कॉरिडोर्स पर जो 1500 साल पहले मोंक्स ने बनाए थे. यह एक लिविंग मॉन्यूमेंट है. चीन ने दिखाया कि इंसान पहाड़ में मंदिर बना सकता है. अब हम जाते हैं इथियोपिया जहां एक चर्च बना है ऐसी जगह कि वहां पहुंचना खुद एक स्पिरिचुअल जर्नी है और एक डेथ डिफाइंग चैलेंज भी. अबूना येमाटा गुह. आस्था इंसान से क्या-क्या करवा सकती है. इथियोपिया के टिग्रे रीजन में एक चर्च है अबूना यमाटागुह जो एक सैंडस्टोन पिनेकल की चोटी पर बना है. समुद्र तल से लगभग 2580 मीटर्स की ऊंचाई पर. इसे पूरी दुनिया के सबसे आइसोलेटेड और मोस्ट इनएक्सेसिबल चर्चेस में से एक माना जाता है. वहां पहुंचने का रास्ता पहले पहाड़ की सीधी खड़ी चट्टान पर चढ़ो बिना किसी हार्नेस के बिना रोप के सिर्फ हाथों और पैरों से. फिर एक नैरो लेज पार करो जो सिर्फ कुछ इंचेस चौड़ी है और नीचे 200 प्लस मीटर्स की खाई और तब चर्च का दरवाजा. फिफ्थ सेंचुरी में इस चर्च को बनाया था एक प्रीस्ट ने अबूना यमाटा. उन्होंने यह जगह इसलिए चुनी क्योंकि उन्हें यकीन था यहां तक आने वाला सिर्फ वही आएगा जो सच्चे दिल से आएगा. और वह सही थे. आज भी लोग आते हैं, प्रीस्ट्स, वशिपर्स, पिलग्रिम्स इस इंपॉसिबल क्लाइम को करते हैं. चर्च के अंदर 1500 साल पुरानी फ्रेस्कोज पेंटिंग्स जो आज भी जीवित हैं. 12 अपॉपल्स की तस्वीरें, बिब्लिकल सीन्स. एक ऑस्ट्रेलियन जर्नलिस्ट ने जब यह क्लाइंब की तो उसने लिखा जब मैं अंदर पहुंचा और उन पेंटिंग्स को देखा तो सारा डर गायब हो गया. मुझे समझ आया कि 1500 साल से लोग ये क्लाइंब क्यों कर रहे हैं. आस्था वाकई पहाड़ हिला सकती है. इथियोपिया की आस्था से निकलकर हम अब पहुंचते हैं हमारी लिस्ट की आखिरी और शायद सबसे पावरफुल जगह पर. जहां धरती खुद आग उगलती है. हवाई वोल्केनोस यूएसए. जरा सोचिए आप किसी ऐसी जगह खड़े हैं जो एक साल पहले एग्जिस्ट ही नहीं करती थी. जो जमीन आपके पैरों के नीचे है वह पिछले महीने समुंदर था. वेलकम टू हवाई वोल्केनोस नेशनल पार्क जहां धरती हर रोज नई जमीन बनाती है. हवाई के बिग आइलैंड पर दो एक्टिव वोल्केनोस हैं, किलाउए और माउनलोआ. किलाउए तो दुनिया के सबसे एक्टिव वोल्केनोस में से एक है. यह कंटीन्यूअसली 1983 से 2018 तक लगातार 35 साल फटता रहा. और 2018 में इसने एक रेजिडेंशियल एरिया को पूरी तरह लावा में दफन कर दिया, 700 से ज्यादा घर. लावा फ्लो देखना एक सररियल एक्सपीरियंस है. यह इतना धीरे-धीरे बहती है कि आप उसके पास खड़े रह सकते हैं, लेकिन यह रुकती नहीं. जो भी रास्ते में आए पेड़, घर, सड़क सब निगल जाती है और फिर वह लावा ठंडी होती है और बन जाती है नई जमीन. साइंटिस्ट्स के लिए हवाई एक लिविंग लैबोरेट्री है. यहां वह स्टडी कर सकते हैं कि पृथ्वी कैसे बनी क्योंकि वही प्रोसेस आज भी यहां हो रही है. माउनलोआ की बात करें तो यह समुंद्र की तलहटी से मेजर करें तो यह माउंट एवरेस्ट से भी ऊंचा है. यह अर्थ का सबसे मैसिव वोल्केनो है. 2022 में माउनलोआ फिर से एक्टिव हुआ पहली बार 38 साल बाद. वह पल जब अचानक रात में आसमान लाल हो गया, रेजिडेंट्स ने फोटोस शेयर किए. दुनिया ने देखा आग और खौफ, लेकिन साथ में एक अजीब सी ब्यूटी भी. हवाई हमें याद दिलाता है कि यह धरती जिसे हम अपना घर कहते हैं, यह अभी भी जीवित है, अभी भी बदल रही है, अभी भी बन रही है. और हम इस सबके बीच एक टाइनी फुट नोट है. तो दोस्तों आज हमने देखा शिबाम की मिट्टी की ऊंचाइयां कोरोवाई के आसमानी घर, आइसलैंड की धधकती जमीन और जमती हुई गुफाएं, स्पीति की सुनसान खूबसूरती. ओयम्याकॉन की जमाती ठंड, पाकिस्तान का डराने वाला पुल, चाइना का ग्रेविटी डिफाइंग टेंपल, इथियोपिया की आस्था की चट्टान और हवाई की जलती हुई क्रिएशन. इन सब जगहों में एक कॉमन थ्रेड है. जानते हैं क्या इंसान. इंसान जो -67 में जीता है, इंसान जो 35 मीटर ऊपर पेड़ पर घर बनाता है, इंसान जो मौत के पुल पर दौड़ता है. इंसान जो एक्टिव वोल्केनो के पास बसता है. धरती चाहे जितना एक्सट्रीम हो इंसान उसे अपना घर बना लेता है. यही हमारी सबसे बड़ी स्ट्रेंथ है और शायद यही हमारी सबसे बड़ी कहानी भी. अगर आपको यह वीडियो अच्छी लगी तो लाइक करिए, चैनल सब्सक्राइब करिए और कमेंट में बताइए इन 10 में से आप किस जगह जाना चाहेंगे और क्यों. मिलते हैं अगले वीडियो में एक और इंपॉसिबल स्टोरी के साथ तब तक के लिए जिज्ञासु रहिए.

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