[0:00]ये है दुनिया का सबसे सिक्योर्ड कॉन्वॉय। इसमें जिस चीज़ को सिक्योरिटी दी जा रही है वह शायद यूएस प्रेसिडेंट से भी ज्यादा इंपोर्टेंट है। इस कॉन्वॉय में न्यूक्लियर वेपन को एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसपोर्ट किया जा रहा है। अगर ट्रांसपोर्ट के दौरान कॉन्वॉय पर हमला हो जाए तो इसके नतीजे में दुनिया का सबसे खतरनाक वेपन गलत हाथों में जा सकता है। जिसका नुकसान सिर्फ एक कंट्री को नहीं बल्कि पूरी दुनिया को उठाना पड़ सकता है। इसीलिए इसकी सिक्योरिटी पर किसी किस्म का समझौता नहीं किया जा सकता। अमेरिका जैसी सुपर पावर कंट्री इन न्यूक्लियर वेपन्स को किस तरीके से ट्रांसपोर्ट करती है। इस कॉन्वॉय में कौन-कौन सी गाड़ियां किस काम में लाई जाती है? और अगर हमला हो जाए तो फेडरल एजेंट्स उसको किस तरीके से हैंडल करते हैं? ज़ैम टीवी की वीडियोस में एक बार फिर से खुशामदीद। नाजरीन दुनिया में 12,515 न्यूक्लियर वेपन्स हैं जिनमें से 41% अकेले यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के पास हैं। यह तमाम वेपन्स पूरे अमेरिका के चप्पे-चप्पे पर फैले हुए हैं। जो एक्टिव वेपन्स हैं वह यूएस एयरफोर्स मिलिट्री और नेवी की सबमरीन्स में मौजूद हैं। लेकिन इनमें से हजारों वेपन्स स्टोरेज मोड में हैं। यानी ये बैकअप वेपन्स हैं जो पूरे नॉर्थ अमेरिका में फैले हुए हैं। पर सवाल यह है कि न्यूक्लियर वेपन्स को फैलाकर ही क्यों रखा जाता है? न्यूक्लियर वेपन्स को हमेशा फैलाकर मुल्क के डिफरेंट पार्ट्स में छुपाकर रखा जाता है और यह इंफॉर्मेशन बहुत सेंसिटिव होती है। ऐसा इस वजह से किया जाता है ताकि दुश्मन अटैक करके उनको नाकारा ना बना दे। फैलाकर रखने से फायदा यह होता है कि दुश्मन को अगर हमला करना भी होगा तो वह एक साथ सारे न्यूक्लियर वेपन्स को तबाह नहीं कर पाएगा। इस तरीके से मुल्क के पास कुछ ना कुछ न्यूक्लियर वेपन्स सेल्फ डिफेंस के लिए बच जाएंगे। अब जब न्यूक्लियर वेपन्स एक सेफ जगह पर पड़े हैं तो उनको एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसपोर्ट करने की जरूरत ही क्यों पेश आती है? इसका सबसे बड़ा रीजन है मेंटेनेंस। जैसे मिलिट्री में हथियारों की मेंटेनेंस बहुत जरूरी है वैसे ही न्यूक्लियर वेपन्स की मेंटेनेंस करना भी बहुत जरूरी होता है। जाहिर है हर वक्त तो जंग का समा नहीं होता और ना ही वेपन्स हर वक्त इस्तेमाल होते हैं। इसीलिए पड़े-पड़े इनके मैकेनिकल पार्ट्स को जंग लग जाता है। इसके अलावा खास तौर पर न्यूक्लियर वेपन्स के अंदर मौजूद प्लूटोनियम या यूरेनियम की हेल्थ देखते रहना भी बहुत जरूरी होता है। ताकि ऐसा ना हो कि जब इनको इस्तेमाल करने का वक्त आए तो यह काम ही ना करें। इन सब चीजों को देखते हुए न्यूक्लियर वेपन्स को इंस्टॉल तो स्ट्रेटेजिक लोकेशन पे ही किया जाता है। लेकिन उनकी मेंटेनेंस एक ऐसी फैसिलिटी में की जाती है जो किसी सेंट्रल लोकेशन पे मौजूद हो। यूएसए के केस में इनके तमाम न्यूक्लियर वेपन्स की सिक्योरिटी और मेंटेनेंस के लिए एक अलग फेडरल एजेंसी नेशनल न्यूक्लियर सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन के नाम से मौजूद है। स्ट्रेटेजिक लोकेशन से न्यूक्लियर वेपन्स को हटाने की और भी कई वजूहात हो सकती हैं जैसा कि सिक्योरिटी कंसर्न। यानी इंटेलिजेंस एजेंसी को अगर न्यूक्लियर वेपन्स की लोकेशन लीक होने की इंफॉर्मेशन मिल गई तो उनको फौरन वहां से हटा दिया जाता है। जिन एरियास में न्यूक्लियर वेपन्स को रखा जाता है उनकी सिक्योरिटी इतनी सख्त और परफेक्ट होती है कि बगैर इजाजत के इन एरियास के आसपास भटकना भी पॉसिबल नहीं है। लेकिन जब इनको एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करना हो तो एक ही पल में पूरे शहर को मलियामेट करने वाले इस वेपन को उन्हीं रोड से होकर गुजारा जाता है जो हर कोई रोजाना इस्तेमाल करता है। जब तक यह रिमोट लोकेशन में छुपा है तब तो ठीक है लेकिन रोड पे आने पर इसकी सिक्योरिटी काफी कॉम्प्लिकेटेड हो जाती है। इस चैलेंज को फेस करने के लिए यूएस गवर्नमेंट ने एक पूरी एजेंसी बना रखी है। जिसका काम ही न्यूक्लियर वेपन्स की सिक्योरिटी करना है। यह मिलिट्री कॉन्वॉय जो आप देख रहे हैं यह अमूमन यूएसए में न्यूक्लियर वेपन्स को एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसपोर्ट करने के दौरान इस्तेमाल होता है। देखने में यह इतना बड़ा कॉन्वॉय नहीं लग रहा जितना किसी वीआईपी का सिक्योरिटी कॉन्वॉय होता है। लेकिन असल में यह इतना सिक्योर्ड है कि एक आम शख्स ऐसी सिक्योरिटी के बारे में सोच भी नहीं सकता। इस कॉन्वॉय में गाड़ियों की तादाद तो डिफरेंट हो सकती है क्योंकि यह डिपेंड करता है कि न्यूक्लियर वेपन कितना बड़ा है और कहां जाएगा। इस कॉन्वॉय के आगे और पीछे पुलिस की गाड़ियां होती हैं जिनका काम होता है रश वाले रोड से कॉन्वॉय को बगैर रुके गुजारना। इन पुलिस की गाड़ियों के बीच में जितनी भी गाड़ियां हैं यह है असल कॉन्वॉय। इनमें बख्तरबंद गाड़ियां ट्रक के करीब-करीब एक खास डिस्टेंस और खास साइड पे साथ-साथ चलती है। जिनको बेयरकैट कहा जाता है। इनको सिर्फ बुलेट प्रूफ कहना इनकी शान में गुस्ताखी करने जैसा होगा क्योंकि यह उससे काफी ज्यादा सिक्योर्ड है। एक-एक बख्तरबंद में चार से छह फेडरल एजेंट्स होते हैं जिनका काम होता है कॉन्वॉय को अटैक से बचाना और उसी वक्त काउंटर अटैक करना। इन बख्तरबंद गाड़ियों में जगह-जगह आप सुराख देख सकते हैं जिसकी मदद से एजेंट्स बाहर निकले बगैर अंदर से ही फायर कर सकते हैं। यह एजेंट्स कोई मामूली लोग नहीं बल्कि ट्रेंड कमांडोज होते हैं जिनके पास हैंड गंस शॉर्ट गंस और असॉल्ट राइफल्स के साथ-साथ लाखों राउंड्स मौजूद होते हैं। अगर फिर भी बात ना बने तो बख्तरबंद के ऊपर ऑटोमेटिक मशीन गन भी लगी होती है। पर यह सब वेपन्स तो सिर्फ खतरे की सूरत में इस्तेमाल किए जाते हैं अगर कभी न्यूक्लियर वेपन्स की ट्रक पर हमला हो जाए। नॉर्मल ट्रांसपोर्ट ऑपरेशन के दौरान यह एजेंट्स हर छोटी से छोटी चीज पर नजर रखकर एक दूसरे से शेयर करते हैं। कॉन्वॉय की तमाम गाड़ियां आपस में रेडियो के जरिए कनेक्टेड होती हैं। यह रेडियो कम्युनिकेशन तीन अलग-अलग चैनल्स पे होता है। एक चैनल पे यह सारी बख्तरबंद गाड़ियां अटैक की सूरत में एक दूसरे से कांटेक्ट करके कोऑर्डिनेट करती हैं। दूसरे चैनल पे बख्तरबंद के एजेंट्स अपने कॉन्वॉय की दूसरी गाड़ियों से अपडेट्स लेते हैं। एसओपी के मुताबिक न्यूक्लियर कॉन्वॉय में कम से कम सात बख्तरबंद गाड़ियां होनी चाहिए। पांच ट्रक के साथ और बाकी दो 1 किलोमीटर आगे। हर चंद मिनटों के बाद मेन कॉन्वॉय में बैठा कमांडर आगे मौजूद दो बख्तरबंद गाड़ियों से सूरते हाल मालूम करता है। कम्युनिकेशन को अलग-अलग चैनल्स में डिवाइड करने का मकसद यह होता है कि अगर अटैकर्स ने एक रेडियो फ्रीक्वेंसी जैम कर दी या फिर मेन कॉन्वॉय के साथ कोई मसला हो गया। तो आगे वाली दो गाड़ियां अपना अलग चैनल इस्तेमाल करके मदद बुला सकें। इसके अलावा यह पूरा कॉन्वॉय एक तीसरे चैनल पे इमरजेंसी कंट्रोल सेंटर के साथ भी कनेक्टेड होता है। कंट्रोल सेंटर के स्टाफ का काम है कि इमरजेंसी की सूरत में कॉन्वॉय की लोकेशन ट्रैक करें और फौरन मदद के लिए बैकअप फोर्स का बंदोबस्त करें। अगर कभी यह नौबत आ भी जाए तो कंट्रोल सेंटर जिस एक्स्ट्रा फोर्स को भेजेगा वह कॉन्वॉय के एजेंट्स के साथ एक खास एसओपी के तहत कांटेक्ट करेंगे। फिर चाहे यह एक्स्ट्रा फोर्स पुलिस की हो या मिलिट्री की। कंट्रोल सेंटर दोनों फोर्सेस को अलग-अलग कोड वर्ड इंक्रिप्टेड रेडियो लिंक के जरिए बताएगा। मौके पर पहुंचकर दोनों फोर्सेस तब तक एक दूसरे पर भरोसा नहीं करेंगी जब तक उन दोनों को बताए गए सीक्रेट कोड मैच ना कर जाएं। यह सिर्फ इसलिए किया जाता है ताकि कोई अटैकर जाली पुलिस ऑफिसर बनकर न्यूक्लियर वेपन तक रसाई ना पा सके। यह उन अनगिनत एसओपी में से सिर्फ एक है जबकि हर सूरते हाल से निबटने के लिए एजेंट्स के पास अलग-अलग एसओपी होती हैं। इन बख्तरबंद के बीच में चलने वाला ट्रक भी कोई मामूली ट्रक नहीं होता क्योंकि इसी के लिए तो यह सारी सिक्योरिटी है। न्यूक्लियर वेपन को ट्रांसपोर्ट करने के लिए यह ट्रक पूरी तरह से कस्टमाइज्ड बना होता है। यानी इसको खास इसी मकसद के लिए डिजाइन किया जाता है। ट्रक की बॉडी हार्ड स्टील से बनी होती है जिस पर आम जाम टूल्स काम ही नहीं करते। ना ही यह ग्राइंडर से कट सकती है ना इस पर ड्रिलिंग मशीन काम करती है और ना ही एक्सीडेंट होने पर इसकी बॉडी क्रैक हो सकती है। अगर इसको आग में भी डाल दिया जाए तो इसकी बॉडी अगले कई घंटों तक भी अंदर मौजूद न्यूक्लियर वेपन को महफूज रख सकती है। ड्राइवर कैबिन की बात की जाए तो यह बुलेट और बम प्रूफ होता है और इसके दरवाजे चाहे कुछ भी हो जाए सिर्फ अंदर से ही खुल सकते हैं। ट्रक की मजबूती जहां इसको अटैकर से बचाती है वहीं इसका एक नुकसान भी है। इसका वजन नॉर्मल ट्रक से काफी ज्यादा 25000 केजी के बराबर है। इसी वजह से अटैक की सूरत में यह ट्रक ज्यादा तेज नहीं चल सकती और ना ही शार्प टर्न्स ले सकती है। पर इसकी इसी कमजोरी के पीछे छुपा है एक और सिक्योरिटी फीचर। अगर कैसे भी करके अटैकर्स ट्रक पर कब्जा कर ले और इसको यहां से लेकर जाने की कोशिश करें तो ट्रक के एक्सल पे लगे एक्सप्लोसिव फट जाएंगे। जिससे ट्रक व्हील से अलग होकर जमीन पर गिर जाएगी। अब क्योंकि इसका वजन काफी ज्यादा है तो इसको बगैर पहियों के खींचना पॉसिबल ही नहीं होगा। रही बात ट्रक के अंदर पड़े न्यूक्लियर वेपन की तो इसके कंटेनर को खोलने का एक्सेस खुद कॉन्वॉय एजेंट्स के पास भी नहीं होता। इस पर इलेक्ट्रॉनिक लॉक्स लगे हैं जिसकी इलेक्ट्रिक चाबियां सिर्फ नेशनल न्यूक्लियर सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन के पास होती हैं। बहरहाल अगर कोई ट्रक के कार्गो तक जबरदस्ती पहुंच भी गया तो कंटेनर के अंदर उनका इस्तकबाल एक ऑटोमेटिक स्प्रे गन करेगी। यह बहुत ही गाढ़ा और चिपकने वाला स्प्रे है। जब यह किसी पर भी पड़ता है तो इसका एडहेसिव मटेरियल इंसान को आसानी से चलने फिरने नहीं देता। यानी उसकी मूवमेंट्स रिस्ट्रिक्ट हो जाती है। अगर फिर भी कंटेनर में कोई बचा होगा तो इसको फौरन इलेक्ट्रिक शॉक लगेगा जिसकी वोल्टेज घर में आने वाली इलेक्ट्रिसिटी से सिक्स टाइम्स ज्यादा होती है। और हां आपको बताते चले कि इस सारे कॉन्वॉय को यूएस मिलिट्री के दो हेलीकॉप्टर्स हर वक्त देख रहे होते हैं। हेलीकॉप्टर का फ्यूल जब कम होने लगे तो पहले दूसरे दो हेलीकॉप्टर्स इनको रिप्लेस करते हैं और फिर ये अपनी पोजीशन छोड़ सकते हैं। इन हेलीकॉप्टर्स के अंदर अलग से बैकअप फोर्स मौजूद होती है और यह भी न्यूक्लियर वेपन को बचाने के लिए हर हद पार करने को तैयार होते हैं। इन तमाम सिक्योरिटी फीचर्स की वजह से दुनिया का सबसे खतरनाक वेपन कम से कम यूएसए से तो किसी गलत हाथों में नहीं जा सकता। अमेरिका की हिस्ट्री में आज तक हजारों मर्तबा न्यूक्लियर वेपन्स ट्रांसपोर्ट किए जा चुके हैं लेकिन आज तक एक भी कॉन्वॉय पर अटैक नहीं हुआ। उम्मीद है जम टीवी की यह वीडियो भी आप लोग भरपूर लाइक और शेयर करेंगे। आप लोगों के प्यार भरे कमेंट्स का बेहद शुक्रिया। मिलते हैं अगली शानदार वीडियो में।

How Nuclear Weapons are Transported & Guarded
Zem TV
10m 53s1,814 words~10 min read
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