[0:00]13 अगस्त 1972, पाकिस्तान के रावलपिंडी में मौजूद एक कड़ी सुरक्षा वाले प्रिजनर ऑफ वॉर यानी पीओडब्ल्यू कैंप में वह रात इतिहास बनने वाली थी. यही वह कैंप था जहां 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भारतीय वायुसेना के 12 पायलटों को बंदी बनाकर रखा गया था. कैंप की सुरक्षा इतनी सख्त थी कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि यहां से कोई जिंदा बाहर निकल पाएगा. चारों तरफ ऊंची-ऊंची दीवारें, दीवारों के ऊपर काटी ले तार, हर जगह हथियारबंद पाकिस्तानी सैनिक. लेकिन इसी नामुमकिन जगह पर तीन ऐसे भारतीय पायलट मौजूद थे जिनके इरादे किसी दीवार, किसी तार और किसी बंदूक से डरने वाले नहीं थे. वह इस जेल से कुछ इस तरह भागे जिसे देख पाकिस्तानियों के होश उड़ गए. इस कहानी की शुरुआत होती है 3 दिसंबर 1971 से, जब भारत और पाकिस्तान के बीच जोरदार युद्ध चल रहा था. जमीन पर भारतीय सेना हर मोर्चे पर पाकिस्तान को पीछे धकेल रही थी, लेकिन आसमान में हालात उतने आसान नहीं थे. पाकिस्तान के जफरवाल शहर के पास बना एक ऊंचा वॉच टॉवर भारतीय वायुसेना के लिए बड़ी परेशानी बन चुका था. वहां से पाकिस्तानी सेना भारतीय मूवमेंट पर नजर रखती थी और कई बार भारतीय विमानों पर सटीक फायरिंग भी की जाती थी. इस वॉच टावर को तबाह करने की जिम्मेदारी दी गई भारतीय वायुसेना के जांबाज पायलट दिलीप पारुलकर को. दिलीप पारुलकर अपने साहस, अनुशासन और हिम्मत के लिए जाने जाते थे. उन्हें पता था कि मिशन आसान नहीं है, लेकिन देश के लिए यह जोखिम उठाना जरूरी था. 10 दिसंबर 1971 को दिलीप पारुलकर अपने सुखोई सेवेन फाइटर जेट के साथ मिशन पर निकले. जैसे ही वह वॉच टावर के पास पहुंचे पाकिस्तान की एंटी एयरक्राफ्ट गनों ने जबरदस्त फायरिंग शुरू कर दी. गोलियां सीधी उनके जेट की तरफ आ रही थी. कुछ ही पलों में उनका विमान बुरी तरह डैमेज हो गया. हालात बिगड़ते देख पारुलकर ने बिना समय गवाए इजेक्ट किया. उनकी जान तो बच गई, लेकिन किस्मत ने उन्हें दुश्मन की जमीन पर उतार दिया. जमीन पर उतरते वक्त पारुलकर पहले से घायल थे. दर्द से जूझते हुए वह खुद को संभाल ही रहे थे कि आसपास के पाकिस्तानी आम लोग वहां जमा होने लगे. भीड़ दुश्मन-दुश्मन चिल्लाने लगी. देखते ही देखते लोगों ने उन्हें पीटना शुरू कर दिया. उनका सामान छीन लिया गया. चोट, थकान और मारपीट की वजह से पारुलकर वहीं बेहोश हो गए. अगर थोड़ी भी देर हो जाती तो शायद भीड़ उन्हें जान से मार देती. लेकिन तभी पाकिस्तानी सैनिक वहां पहुंच गए. सैनिकों ने भीड़ को हटाया और कहा, "यह जिंदा हमारे ज्यादा काम का है." इस तरह दिलीप पारुलकर को मौत के मुंह से निकालकर हिरासत में ले लिया गया. जब पारुलकर को होश आया तो उन्होंने खुद को एक अंधेरी, तंग और सीलन भरी कोठरी में बंद पाया. सामने एक पाकिस्तानी अधिकारी खड़ा था. उसने कागज और पेंसिल उनकी तरफ बढ़ाए और कहा, "आदमपुर एयरबेस का नक्शा बनाओ." आदमपुर एयरबेस भारतीय वायुसेना का एक बेहद अहम ठिकाना था. पारुलकर ने तुरंत मना कर दिया. इसके बाद शुरू हुआ टॉर्चर का सिलसिला. आखिरकार भारी दबाव में आकर पारुलकर ने नक्शा बना दिया. पाकिस्तानी अधिकारी बहुत खुश हुआ, लेकिन कुछ देर बाद वह गुस्से में वापस लौटा. असल में पारुलकर ने आदमपुर एयरबेस का नहीं, बल्कि मुंबई एयरपोर्ट का नक्शा बना दिया था. गुस्से में अधिकारी ने सजा सुना दी. पूरी रात कोठरी के एक कोने में खड़े रहना होगा. एक गार्ड को आदेश दिया गया कि अगर पारुलकर बैठे तो तुरंत गोली मार दी जाए. पूरी रात पारुलकर खड़े रहे, शरीर जवाब दे रहा था. लेकिन गार्ड को उन पर तरस आ गया. उसने धीरे से कहा, "सुबह तक बैठ जाओ, अगर कोई आएगा तो मैं खास दूंगा, तब तुम खड़े हो जाना." इसके बाद कई रातें पारुलकर ने उसी अंधेरी कोठरी में बिताई. लगातार टॉर्चर हुआ, लेकिन उन्होंने अपने मुंह से कुछ नहीं निकाला. आखिरकार पाकिस्तानी अधिकारी भी थक गए और कुछ दिनों बाद उन्हें बाकी भारतीय बंदियों के साथ एक ही कैंप में डाल दिया गया. यही था रावलपिंडी का पीओडब्ल्यू कैंप जहां भारतीय वायुसेना के 12 पायलट कैद थे. यहां पारुलकर को पता चला कि बाकी साथियों के साथ भी ऐसा ही बर्ताव हुआ था. सबने दर्द सहा था, लेकिन किसी का हौसला नहीं टूटा था. इस कैंप के इंचार्ज थे उस्मान हामिद. वह भारतीय पायलटो के साथ सम्मान से पेश आते थे, हालांकि कई पाकिस्तानी अधिकारियों को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी. उसी उस्मान हामिद ने भारतीय पायलटों को एक कैसेट प्लेयर और एक एटलस दिया. शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यह छोटी सी मदद आगे चलकर कितनी बड़ी कहानी लिखेगी. 25 दिसंबर 1971 को कैंप में खबर पहुंची, ढाका में पाकिस्तान ने सरेंडर कर दिया है. भारत युद्ध जीत चुका है. 93000 पाकिस्तानी सैनिक भारत की कायद में थे. कैंप में खुशी की लहर दौड़ गई. सबको लगा कि अब जल्द ही वह घर लौटेंगे, लेकिन दिलीप पारुलकर का मन कुछ और कह रहा था. उन्हें पता था कि कैदियों की अदला-बदली में लंबा वक्त लग सकता है. उन्होंने साथियों से कहा, "अगर हम यहां बैठे रहे तो शायद सालों लग जाए, क्यों ना हम खुद ही रास्ता निकालें." पहली बार किसी ने उनका साथ नहीं दिया, लेकिन पारुलकर हार मानने वाले नहीं थे. उनके दिमाग में एक बीज पड़ चुका था. आजादी का बीज और यही बीज आने वाले महीनों में एक ऐसी योजना में बदलने वाला था जो रावलपिंडी की दीवारों को हिला देने वाली थी. 25 दिसंबर 1971 के बाद रावलपिंडी पीओडब्ल्यू कैंप में एक अजीब सी खामोशी फैल गई थी. बाहर की दुनिया में जंग खत्म हो चुकी थी, लेकिन इन 12 भारतीय पायलटों के लिए लड़ाई अभी बाकी थी. सबको उम्मीद थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध बंदियों की अदला-बदली जल्द होगी. लेकिन दिन बीतते गए, हफ्ते गुजर गए और कोई ठोस खबर नहीं आई. दिलीप पारुलकर को अंदर ही अंदर यह महसूस हो रहा था कि सरकारों की बातचीत में बहुत समय लग सकता है. उनका मन मानने को तैयार नहीं था कि वह बस इंतजार करते रहे. उनके लिए आजादी का मतलब था खुद के दम पर निकलना. शुरुआत में उन्होंने एक अलग योजना सोची. जब रात को टॉयलेट जाने के लिए एक सिपाही उनके साथ आता था, तब उसकी बंदूक छीनकर उसे ढाल बनाकर बाहर निकलने का प्लान बनाया गया. लेकिन यह रास्ता बहुत जोखिम भरा था. काफी सोच-विचार के बाद पारुलकर ने यह प्लान खुद ही छोड़ दिया. समय बीतता गया. कई महीने गुजर चुके थे, लेकिन भारत सरकार की तरफ से कोई हलचल नहीं दिख रही थी. इसी दौरान कैंप में मायूसी बढ़ने लगी, तब पारुलकर ने एक बार फिर अपने साथियों से बात की. इस बार दो लोग आगे आए, एम एस ग्रेवाल और हरीश सिंह जी. तीनों ने तय किया कि अगर किस्मत ने मौका दिया है तो वह उसका इस्तेमाल जरूर करेंगे. अब शुरू हुआ असली प्लान. सबसे पहले उन्होंने कैंप के इंचार्ज उस्मान हदीद द्वारा दिए गए एटलस को ध्यान से पढ़ना शुरू किया. रात-रात भर वह नक्शे देखते, रास्ते समझते और संभावनाएं तलाशते. प्लान साफ था. जेल से निकलने के बाद सीधे भारत-पाकिस्तान बॉर्डर जाना बहुत खतरनाक था, क्योंकि युद्ध के बाद वहां सुरक्षा बेहद सख्त थी. इसलिए उन्होंने तय किया कि वह पहले अफगानिस्तान की तरफ जाएंगे और वहां से किसी तरह भारत पहुंचेंगे. अगला कदम था सही सेल चुनना. उन्हें ऐसा सेल चाहिए था जो कैंप की बाहरी दीवार के सबसे पास हो जहां गार्ड कम आते-जाते हो. काफी निरीक्षण के बाद उनकी नजर पड़ी सेल नंबर चार पर, लेकिन उस सेल में शिफ्ट होना आसान नहीं था. यहीं पर पारुलकर की समझदारी काम आई. उनका व्यवहार गार्ड्स के साथ हमेशा ठीक रहा था. धीरे-धीरे उनकी कुछ सिपाहियों से जान-पहचान हो गई थी. उसी का फायदा उठाकर उन्होंने रिक्वेस्ट डाली और आखिरकार पारुलकर, ग्रेवाल और हरीश सिंह जी को सेल नंबर चार में शिफ्ट कर दिया गया. इस सेल में पहले से एक और भारतीय पायलट मौजूद थे, विद्याधर शंकर चाटी. चाटी भागने के प्लान में शामिल नहीं होना चाहते थे, लेकिन वह इन तीनों की मदद करने को तैयार थे. और यही मदद आगे चलकर बेहद अहम साबित होने वाली थी. अब असली चुनौती थी दीवार में सुरंग बनाना. सेल की दीवार लगभग 18 इंच मोटी थी. बिना किसी औजार के इसे तोड़ना नामुमकिन था, लेकिन किस्मत एक बार फिर उनके साथ थी. किसी तरह उन्होंने एक कैंची और एक स्क्रूड्राइवर चुरा लिया. हर रात ठीक 12:00 बजे से 1:00 बजे तक बेड के नीचे जाकर काम शुरू होता. एक आदमी दीवार कुरेदता, बाकी तीन पहरा देते. दीवार से निकलने वाली मिट्टी और सीमेंट को बेड के नीचे छुपा दिया जाता. सुरक्षा बढ़ाने के लिए उन्होंने सेल के अंदर लगे बल्ब का फ्यूज उड़ा दिया ताकि गार्ड ठीक से देख ना सके. जेल में बल्ब बदलने की प्रक्रिया लंबी थी और इसका फायदा इन तीनों को मिला. एक रात खतरा बहुत करीब आ गया. एक गार्ड ने बाहर से झांककर देखा और उसे लगा कि सेल में सिर्फ तीन पायलट हैं, जबकि उस वक्त हरीश सिंह जी बेड के नीचे थे. गार्ड ने आवाज लगाई, लेकिन तीनों ने सोने का नाटक किया. गार्ड भागकर इंचार्ज उस्मान हामिद को बुलाने गया. उसी पल सिंह जी चुपचाप बाहर निकले और लेट गए. जब उस्मान हामिद आए और चारों पायलटों को देखा तो उन्होंने गार्ड को ही डांट दिया. दिन बीतते गए, हफ्ते महीनों में बदल गए. दीवार की ईंटों से सीमेंट निकाला जाता, फिर ईंटों को वैसे ही वापस लगा दिया जाता. बाहर से देखने पर सब सामान्य लगता था. साथ ही उन्होंने भागने के बाद के लिए तैयारी शुरू कर दी. हर कैदी को हर महीने ₹57 मिलते थे. इन्हीं पैसों से तीनों ने ड्राई फ्रूट्स, कंडेंस्ड मिल्क और जरूरी सामान इकट्ठा किया. उन्हें पता था कि जेल से बाहर निकलने के बाद जिंदगी और भी कठिन होने वाली है. दिशा जानने के लिए उन्हें कंपास चाहिए था. उन्होंने कैसेट प्लेयर के मैग्नेट और कपड़े सिलने वाली सुई से जुगाड़ू कंपास बनाया. पारुलकर को घर से जो कपड़े मिले थे उनसे जेल के टेलर को पैसे देकर तीनों के लिए पठानी सूट सिलवाए गए. ताकि बाहर निकलने के बाद वह आम लोगों में घुलमिल सके. धीरे-धीरे दीवार का छेद इतना बड़ा हो गया कि एक इंसान उसमें से निकल सके. आखिरी परत जो कि सिर्फ प्लास्टर था उसे जानबूझकर छोड़ी गई ताकि भागने वाली रात उसे आसानी से तोड़ा जा सके. 13 अगस्त 1972 की रात, रावलपिंडी पीओडब्ल्यू कैंप के ऊपर काले बादल छाए हुए थे. तेज हवा चल रही थी और थोड़ी ही देर में मूसलाधार बारिश शुरू हो गई. यही वह रात थी जिसका इंतजार दिलीप पारुलकर, एमएस ग्रेवाल और हरीश सिंह जी महीनों से कर रहे थे. तीनों ने अपने पठानी सूट पहने, ड्राई फ्रूट्स, कंडेंस्ड मिल्क, जुगाड़ से बना कंपास और थोड़े पैसे अपने पास रखे. जाने से पहले उन्होंने अपने साथी विद्याधर शंकर चाटी को गले लगाया. अब आखिरी कदम बाकी था. पारुलकर ने दीवार की आखिरी परत को धीरे-धीरे तोड़ा. बारिश की वजह से आवाज बाहर तक नहीं गई. एक-एक करके तीनों उस संकरे छेद से बाहर निकल आए. बाहर आकर उन्होंने देखा दीवार के पास ही एक पाकिस्तानी गार्ड चारपाई पर सो रहा था. तीनों सीधे दीवार की तरफ भागे. कुछ कपड़ों को बांधकर उन्होंने रस्सी बनाई. उसे ऊपर फेंका और दीवार के कांटेले तारों के पार अटका दिया. पहले परुलकर, फिर ग्रेवाल और आखिर में हरीश सिंह जी दीवार फांद कर दूसरी तरफ उतर गए. अब वो जेल से बाहर थे, लेकिन असली लड़ाई अब शुरू होने वाली थी. तीनों तेजी से भागते हुए बस स्टैंड पहुंचे. किस्मत उनके साथ थी उन्हें पेशावर जाने वाली बस मिल गई. पूरी रात सफर करने के बाद सुबह करीब 6:00 बजे वह पेशावर पहुंच गए. यहां सबसे बड़ा खतरा पहचान का था. अगर उनसे कलमा पढ़ने को कहा जाता या मेडिकल चेक होता तो तुरंत पकड़े जाते. इसलिए तीनों ने खुद को क्रिश्चियन बताने का फैसला किया. पेशावर से उन्होंने एक और लोकल बस ली और सुबह करीब 9:30 पर लंडी कोटल पहुंचे. उधर सुबह 11:00 बजे रावलपिंडी के वॉर कैंप में अचानक हड़कंप मच चुका था. पाकिस्तानी गार्ड्स को पता चल गया था कि तीनों भारतीय पायलट भाग चुके हैं. जब गार्ड्स उनके सेल में पहुंचे और दीवार में बना वह बड़ा सा सुराख देखा तो कुछ पल के लिए सब सन् रह गए. किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी कड़ी सुरक्षा के बावजूद यह नामुमकिन काम हो गया. गार्ड्स गुस्से से तमतमा उठे. उन्हें लगा कि अगर सीनियर अफसरों को सच्चाई पता चली तो सजा उन्हीं को मिलेगी. इसी गुस्से और डर में उन्होंने सोचा कि विद्याधर शंकर चाटी जिन्होंने इन तीनों की मदद की थी उन्हें गोली मार दी जाए. फिर सीनियर्स को यह बताया जाए कि चाटी भी भागने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए मजबूरी में उन्हें मारना पड़ा. लेकिन सीनियर अफसरों को जल्दी ही साफ जानकारी मिल गई कि असल में कितने कैदी भागे हैं. इसी वजह से गार्ड्स चाटी को मारने की हिम्मत नहीं कर पाए. उधर जेल से दूर निकल चुके तीनों पायलटों के सामने अगली सबसे बड़ी चुनौती खड़ी थी. अब उन्हें अफगानिस्तान में दाखिल होने के लिए तोरखम बॉर्डर पार करना था, जो वहां से सिर्फ 5 किलोमीटर दूर था. दूरी कम थी लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उन्हें रास्ता बिल्कुल नहीं पता था. उन्होंने अपने पास मौजूद एटलस में देखा कि तोरखम बॉर्डर के पास एक जगह दिखाई गई थी, लंडी खाना रेलवे स्टेशन. नक्शे के हिसाब से अगर वह वहां पहुंच जाते तो वहीं से होते हुए तोरखम बॉर्डर जाना आसान हो सकता था. लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि यह नक्शा बहुत पुराना था और लंडी खाना रेलवे स्टेशन 1932 में ही बंद हो चुका था. तीनों एक चाय की टपरी पर पहुंचे और वहां खड़े एक आदमी से पूछा, "लंंडीखाना कैसे जाए?" यह सुनते ही आसपास के लोग उन्हें घूरने लगे. तभी एक आदमी आगे आया और सख्त लहजे में पूछा, "तुम कौन हो, कहां से आ रहे हो और कहां जा रहे हो?" पारुलकर ने जवाब दिया, "हम पाकिस्तान एयरफोर्स के अफसर हैं, छुट्टी पर हैं और घूमने जा रहे हैं." दुर्भाग्य से वह आदमी तहसीलदार का क्लर्क था, उसे शक हो गया. उसने कहा, "यहां इस नाम की कोई जगह नहीं है." भिड बढ़ने लगी, उस आदमी ने ताना मारा, "तुम तीनों बंगाली हो ना, अफगानिस्तान भाग रहे हो?" ग्रेवाल ने हंसते हुए कहा, "क्या हम आपको बंगाली लगते हैं?" लेकिन शक और गहरा गया. तीनों को पकड़कर तहसीलदार के पास ले जाया गया. वहां भी उन्होंने खुद को पाकिस्तानी एयरफोर्स अफसर बताया, लेकिन तहसीलदार ने भरोसा नहीं किया. आखिरी दांव खेलते हुए पारुलकर ने कहा, "हमने अपने वतन के लिए खून पसीना बहाया है. अगर आपको भरोसा नहीं है तो पाकिस्तान एयरफोर्स के एडीसी उस्मान हामिद से बात करवा दीजिए." पारुलकर को लगा था कि इससे वह बच जाएंगे, लेकिन यही बात उनकी सबसे बड़ी गलती बन गई. तहसीलदार ने तुरंत उस्मान हामिद को फोन किया और दिलीप से बात करवाई. दिलीप को बात करनी ही पड़ी, इसी पल उस्मान हामिद को समझ आ गया कि तीनों वही भारतीय पायलट हैं जो रावलपिंडी कैंप से भागे हैं. उस्मान हामिद ने तहसीलदार से फोन पर कहा, "यह हमारे लोग हैं जब तक हमारे सिपाही वहां नहीं पहुंचते इन्हें सुरक्षित रखा जाए." कुछ घंटों बाद पाकिस्तानी सैनिक आए और तीनों को दोबारा रावलपिंडी ले जाया गया. उन्हें 30 दिन की सॉलिटेरी कन्फाइनमेंट की सजा दी गई. इसके बाद सभी भारतीय पायलटों को रावलपिंडी से हटाकर फैसलाबाद की जेल भेज दिया गया जहां 500 से ज्यादा भारतीय पीओडब्ल्यूएस रखे गए थे. इसी दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध बंदियों की अदला-बदली पर बातचीत तेज हो गई. आखिरकार दिसंबर 1972 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने सभी भारतीय युद्ध बंदियों को रिहा करने का ऐलान कर दिया. जब यह भारतीय जवान वागा बॉर्डर से भारत लौटे तो वहां इंसानों का सैलाब उमड़ पड़ा. हजारों लोग तिरंगे लेकर खड़े थे, नारों की गूंज थी. सैनिकों की आंखों में आंसू और चेहरे पर गर्व था. यह कहानी सिर्फ एक जेल से भागने की नहीं थी. यह कहानी थी हौसले की. यह कहानी थी उस जज्बे की जो सलाखों के पीछे भी आजाद रहना जानता है और रावलपिंडी की वह दीवारें आज भी शायद याद करती होंगी कि कभी तीन भारतीय पायलट उन्हें चकमा देकर निकल गए थे. दोस्तों अगर वीडियो पसंद आया हो तो वीडियो को एक लाइक जरूर करें और चैनल को भी सब्सक्राइब जरूर करें. हम ऐसे ही वीडियो हर हफ्ते लाते रहेंगे तब तक के लिए जय हिंद.

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[0:00]13 अगस्त 1972, पाकिस्तान के रावलपिंडी में मौजूद एक कड़ी सुरक्षा वाले प्रिजनर ऑफ वॉर यानी पीओडब्ल्यू कैंप में वह रात इतिहास बनने वाली थी.
[0:00]यही वह कैंप था जहां 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भारतीय वायुसेना के 12 पायलटों को बंदी बनाकर रखा गया था.
[0:00]कैंप की सुरक्षा इतनी सख्त थी कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि यहां से कोई जिंदा बाहर निकल पाएगा.
[0:00]चारों तरफ ऊंची-ऊंची दीवारें, दीवारों के ऊपर काटी ले तार, हर जगह हथियारबंद पाकिस्तानी सैनिक.
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