[0:03]आचार्य जी प्रणाम। आप हमेशा बोलते हैं कि ऊंचे उद्देश्य रखते चाहिए। जिससे कि उसमें यदि हम काम करते हैं तो फिर किसी भी तरीके का कोई डेवििएशन नहीं होता है। अब ऊंचे उद्देश्य रखने की सामर्थ्यता नहीं मिल पाती है, करेल नहीं मिल पाता है। क्योंकि अपने आप को पाता हूं कि बहुत जगह मैं बेहोश रहता हूं। 5-10% की होश आता है कभी-कभी। कभी-कभी दृष्टा और दृष्टा का भाव आता है सामने चीजें दिखती है। कभी 90% नहीं दिखती है। तो एक कॉन्फिडेंस नहीं आ पाता है कि ऊंचे ऊंचे टारगेट को यदि मैं उद्देश्य रखता भी हूं तो उसके प्रति सिंसिरिटी सी नहीं आती है। बनावटी सी आती है। यह भी समझ में नहीं आता है कि एग्जैक्टली आप जैसे बोलते हैं बहुत श्रम करो। समय बहुत कम है। तो बहुत बार यह कंफ्यूजन होता है क्या श्रम करें। यानी जो अंदर की महाभारत है उसको यदि देखने का जो 5% का प्रोग्रेस चल रहा है वह 100% पहुंचते-पहुंचते तो पता नहीं क्या हो जाएगा। और बड़ा थोड़ा मार्गदर्शन कीजिए सर। जी, जी धन्यवाद आपने बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा है। बहुत-बहुत लोगों का यही प्रश्न रहता है कि ऊंचा उद्देश्य माने क्या? ठीक है? इतने लोग बार-बार यही पूछते हैं कि आचार्य जी बार-बार आपकी सुई वहीं अटक जाती है कि जीवन में ऊंचा उद्देश्य रखो, यह ऊंचा उद्देश्य चीज क्या होती है? ठीक है? मैं प्रयास करूंगा कि विस्तार से बता पाऊं। ऊंचा तो जो होता है वो अनिवर्चनीय होता है कौन उसकी बात करे? पहली बात। तो बात सिर्फ नीचे की की जा सकती है। ठीक है? जो ऊंचा है वो शब्दों और कल्पना और सिद्धांतों के बाहर की बात है। ठीक है? तो उसकी बातचीत कुछ नहीं। जब मैं कहता हूं ऊंचा उद्देश्य रखो और सब बहुत ध्यान से सुने क्योंकि मुझे लगता है कि 200 लोगों का यह सवाल होगा। जब मैं कहता हूं ऊंचा उद्देश्य रखो तो आशय है गौर से देखो कि नीचा क्या है जीवन में? गौर से देखो कि नीचा क्या है जीवन में उससे भिड़ जाओ। क्योंकि ऊंचे को पाने जैसा कोई उपक्रम आप चला नहीं पाएंगे। ऊंचा इतना ऊंचा होता है कि उस तक हमारे हाथ नहीं पहुंच सकते। सत्य होता है उदात। पर वह हमारी पहुंच पकड़ से भी बहुत आगे का। तो क्या बात करें ऊंचाई की? कोई बात नहीं हो सकती। बात सिर्फ नीचाई की हो सकती है। जो निचला है उससे बचना है। और वहां पर कोई बहाना भी नहीं चलेगा क्योंकि यह तो हम कह देते हैं कि ऊंचा क्या है आचार्य जी हम जानते ही नहीं ऊंचा उद्देश्य क्या है। ठीक है? जीवन में न्यून कोटि के, निम्न कोटि के जो संकल्प हैं, कामनाएं हैं, काम-धाम हैं, धंधे हैं, वह तो जानते हो नहीं जानते हो? ऊंचा क्या होगा हम नहीं जानते, समझ में नहीं आ रहा। नीचा क्या है यह भी समझ में नहीं आ रहा। वाकई? अच्छा, कितने लोग हैं जिन्हें बिल्कुल नहीं पता कि ऊंचे उनके जीवन में नीचा क्या है? कितने लोग हैं जो अपने जीवन में एक भी गिरी हुई चीज से परिचित नहीं है? हाथ उठाएं।
[4:23]सब हाथ उठ गए। बस इतनी सी बात बोलता हूं। यह बहुत कठिन है समझ में नहीं आती। तो उलझाव क्या है फिर? जब जानते ही हो कि जीवन में क्या है जो नहीं होना चाहिए तो उसे पकड़े काहे बैठे हो भाई। उसी को छोड़ना ऊंचा काम है। नीचे को छोड़ना ही ऊंचा काम है और कोई ऊंचा काम नहीं होता। ऊंचा काम कुछ नहीं होता जो नीचा है उसे छोड़ते चलो यही ऊंचाई है। और अंतिम ऊंचाई कोई होती नहीं। जो अंतिम है वह हमारी पकड़ से बहुत आगे का है नहीं पहुंचोगे कभी मर जाओगे नहीं पहुंचोगे। कोई नहीं पहुंचा। जब कोई पहुंचा नहीं तो उधर को चलें क्यों? मजा आता है। यही आनंद है। अपने खिलाफ अनवरत संघर्ष। लड़ते चलो, मिटते चलो। लड़ते चलो, मिटते चलो। उस मिटने में ही जीत है। मैंने नहीं कहा लड़ते चलो, जीतते चलो। मैंने क्या कहा लड़ते चलो, जीतते चलो। अपने ही खिलाफ तो लड़ रहे हो, जीतने का एक ही तरीका है अपने आप को मिटाओ। अपने आप को मिटाने का क्या मतलब? हम नीचे हैं जो नीचा है उसको मिटाना है यही है अपने आप को मिटाने का मतलब। बात खुल रही है?
[5:41]कोई हमें नहीं चाहिए पथ प्रदर्शक गुरु जो हमें बताए कि हमारे जीवन में फलानी चीज ठीक नहीं है। क्योंकि इतना अनाड़ी, इतना अज्ञानी तो कोई भी नहीं होता जो बिल्कुल ही नहीं जानता कि जीवन में कहां क्या कमी है। क्या हम ऊंचे दर्जे की बातें पूछते हैं समाधि कैसे लगेगी? वह तो अंतिम बात होगी। आपने आरंभिक बात भी करी क्या? आरंभिक बातें कीजिए। लेकिन हम कहते हैं पर मेरी बीमारी तो ऐसी है कि उसको आध्यात्मिक कह नहीं सकते। आपके पास अध्यात्म की एक छवि है। उस छवि में बहुत अलंकृत शब्द हैं। कि फलानी तरह का ध्यान करेंगे, फलानी यात्रा करेंगे, फलानी विधि फलानी क्रिया करेंगे इसको अध्यात्म कहते हैं। नहीं। अगर आपके जीवन में बातूनीपन बहुत मौजूद है, तो आपके लिए सबसे बड़ी साधना यही है कि अपने बातूनी होने पर अपनी वाचालता पर इस गसिप मॉंगरिंग पर रोक लगाएं। और रोक ऐसे नहीं कि स्टैपल कर दिया, सिल दिया। समझ गए कि हम क्यों बकबक कर रहे हैं। कबीरा यह गत अटपटी झटपट लखी न जाए। जब मन की खटपट मिटे अधर भया ठहराए। अधर भी तभी रुकेंगे जब मन की खटपट मिट जाएगी। मन खटपट क्यों कर रहा है समझिए। अभी ये तो बहुत छोटी सी बात है। इतने लोग हैं जो बहुत बोलते हैं। पर समझाने वाले समझा गए हैं कि तुम बहुत अगर बोलते हो तो उसके पीछे भी तुम्हारी एक आध्यात्मिक प्यास है। यह जो इतना मुंह चलाते हो ना वास्तव में तुम्हें कुछ चाहिए बहुत ऊंचा। वह मिल नहीं रहा है इसीलिए पक-पक-पक-पक। अधर इतनी अधर माने होठ। अधर इतने इसलिए चलते हैं क्योंकि मन में खटपट है। यही है ऊंचा काम जिसमें निचले काम को समझकर के उससे पीछा छुड़ा लिया। अब आप किसी से कहेंगे कि मैं पहले ज्यादा चैटिंग करता था अब कम करता हूं। और यह मेरी स्पिरिचुअल प्रोग्रेस है तो लोग कहेंगे यह कोई बात है। हमको देखो। हम अपने चक्र जागृत कर रहे हैं। और तुम होठों पे ही अटक के रह गए। वह जो कर रहे हैं करने दीजिए। आप जीवन पर ध्यान दीजिए। उन्हें उनके कल्पना लोक में उड़ने दीजिए। आपको जिंदगी जीनी है धरातल पर। जमीनी बात करिए।
[9:16]जब एक भीतरी चुनौती को जीत लेते हो। एक नीचाई से ऊपर उठ जाते हो तभी पता चलता है अगली ऊंचाई कौन सी है। जमीन पर बैठे-बैठे आउटर स्पेस की बातें करना ठीक नहीं। हजार सीढ़ियां चढ़कर के मंदिर आता है एक। अभी चढ़ाई शुरू भी नहीं करी शिखर की बात करना ठीक नहीं। एक सीढ़ी सोपान दर सोपान। एक-एक चरण आगे बढ़ाओ। रोशनी कम है हमारी आंखें बहुत प्रकाशित नहीं। जब एक कदम रखोगे तभी अगला सोपान नजर आएगा। नहीं समझे। यहां मैं बैठा हूं मुझे नहीं पता चल रहा दरवाजे के पार क्या है। दिख नहीं रहा, प्रकाश कम है। आगे बढ़ूंगा तो दिख जाएगा। तो थोड़ा आगे बढ़ो फिर और आगे का दिखेगा। यहां बैठे-बैठे बहुत आगे का पूछोगे कुछ नहीं मिलेगा। सत्यनिष्ठा के मूल में है थोड़ा आगे बढ़ना लगातार प्रतिदिन। थोड़े-थोड़े बेहतर होते चलो। इतना प्यार रहे मुक्ति से कि लगातार बंधनों पर नजर रहे। लगातार बंधनों से एक ऊब रहे। कुछ अगर पहन लो जो ठीक से फिट न हो रहा हो। टाइट हो। तो कितनी-कितनी देर में ख्याल आता है? हर 5 मिनट में आता है ना? ऐसा ही मन को होना चाहिए। तन पर बंधन है भले ही वह पैंट का क्यों ना हो, बेल्ट का क्यों ना हो या कि जूता टाइट है उसका क्यों ना हो तो तन के बंधन को मिटाने का ख्याल तो हर 5 मिनट में आता है ना? आता है कि नहीं आता है? कि जैसे ही मौका मिले किसी तरीके से जूता बदल लें। या मौका मिले यह पैंट बदल लें।
[11:47]वैसे ही मन के प्रति संवेदनशीलता रहे मन के बंधन के प्रति। बार-बार यह यह खीज उठती रहे। कि मन पे बंधन है, मन पे बंधन है, मन पे बंधन है। हटाओ, हटाओ। नहीं, नहीं चाहिए, नहीं जी सकते, नहीं चाहिए।
[12:10]कोई नाक ऐसे दबा दे आपकी तो कितनी-कितनी देर में ख्याल आएगा कि इसका हाथ हटाना है, नाक दबा रखी है। कितनी-कितनी देर में आएगा? लगातार आएगा ना? वैसे ही यह विचार लगातार रहना चाहिए कि जीवन को दबा रखा है किसी ने। किसी ने माने स्वयं ने ही। हटाओ, हटाओ। कौन है जो मुझे सांस नहीं लेने दे रहा? हाथ हटाओ। यह ऊंचा काम है। ऊंचा काम माने यह नहीं है कि हार्वर्ड की डिग्री ले आए। आचार्य जी ने कहा ऊंचा काम करना है कुछ तो। जरूर वह स्पेस स्टेशन की बात कर रहे थे। ऊंचा तो वही है। मार्स पर प्लॉट खरीदना ना आचार्य जी वही बोला था ना आपने? देखिए हम समझ गए, ऊंचा काम।
[13:06]देखो मैं तो झाड़ू मारने वाला हूं। मेरी नजर तो हमेशा नीचे रहती है। आकाश तो सदा ही स्वच्छ है। उसकी क्या बातें करूं, वहां कहां कोई गंदगी। गंदगी जहां होती है मैं वहां देखता हूं। मेरा आग्रह है आप भी वहां देखें जहां गंदगी है। आकाश की स्वच्छता के गीत गा कर क्या होगा? उसे आपके गीत नहीं चाहिए। आपको भी आपके गीत नहीं चाहिए। आपको झाड़ू चाहिए। यह बांसुरी छोड़ो। झाड़ू उठाओ। अपने मुंह पर मारो।
[13:52]समझ में आ रही है बात? यही ऊंचा काम है। जो कुछ नीचा मिलता चले उसको बिल्कुल विष्ठा की तरह त्यागते चलो। नहीं, नहीं चलेगा, नहीं चलेगा। दम घुटता है इसके साथ नहीं चलेगा। यह भी अभी क्या किया? नहीं। ठीक करेंगे, प्रायश्चित भी करेंगे और खुद को सजा भी देंगे। बहुत अच्छे शब्द हैं ये। प्रायश्चित और दंड। किसी बाहरी व्यवस्था पर या कर्म फल पर कानून वगैरह पर भरोसा मत करो कि मैंने कुछ गलत करा होगा तो वह सजा दे देंगे। गलती करो तुरंत खुद को सजा दे दो तत्काल तभी। इसी को तो प्रायश्चित कहते हैं।
[14:41]अपने प्रति निर्मम हो जाइए।
[15:09]ऊंचा काम समझ में आ रहा है? अब तो नहीं पूछेंगे? कि और भी आते हैं सूरमा। कह रहे हैं ये लिखो इन्हें कुछ पता है? हमारे मास साहब ने समझाया था कोई काम ऊंचा नीचा नहीं होता।
[15:29]काम ऊंचे-नीचे निश्चित रूप से होते हैं। बहुत सतर्क रहो कामों के बारे में।



