[0:00]अभी तुम्हें परीक्षा लेना नहीं आता इसलिए लगता है सब मेरे हैं। ठोक बजा के देखो तो कोई तुम्हारा नहीं निकलेगा। जब तक स्वार्थ है तो तुम्हें बहुत लोग अपना कहने वाले हैं। जिस दिन तुम किसी के काबिल नहीं रहोगे ऐसा लोगों को पता चल जाएगा तो तुम बुलाओगे भी तो कोई तुम्हारी तरफ देखेगा नहीं। सच्ची मानिए। यह झूठा प्यार, झूठा नाटक, झूठा संबंध है। मानते रहो सत्य। काल के एक प्रहार में सब विध्वंश हो जाएगा। फिर तुम्हें पता चलेगा तब समय नहीं होगा। मन पछतइ है अवसर बीते। समय व्यतीत हो गया अब तुम्हारे हाथ में श्वास रूपी खजाना नहीं रहा। अब पछताए क्या हो जब चिड़िया चुग गई खेत। इसलिए कोई तुम्हारा नहीं मान लो। यह कोई पद, प्रतिष्ठा, मान, सम्मान की, ये सब स्वाप्निक है। स्वप्न है। जग सपने को छोड़कर मन मोहिनी सोकर हेतु रे मन तोसो कहत हो बार-बार अब चेत। बार-बार वही तृष्णा भोगे हुए भोग को भोगने की इच्छा। बार-बार वही परिवार का राग बंधन धन की संग्रह वृत्ति। नाना प्रकार की मान प्रतिष्ठा की चाह अब तू चेत जा मन। श्री मन मोहिनी जो श्यामाजू के चरणों का चिंतन कर। श्यामाजू के चरणों का आश्रय ले ले। यह स्वाप्निक संसार संबंध है। सच्ची मानिए। आपको लगता है कि आपसे कोई बहुत प्यार करता है। वह स्वार्थ खत्म हो जाए जो वह देख रहा है। फिर हमें बताओ कि कौन प्यार करता है। नहीं। आप में कुछ उसको दिखाई दे रहा है स्वार्थ। इसलिए वह प्यार कर रहा है। अहेतु की प्यार तो श्री भगवान और उनके प्रेमी भक्तजन करते हैं। हेतु रहित जग जुग उपकारी तुम तुम्हार सेवक असुरारी हे हरि आप और आपके सेवक हरिदास। यही दो निष्काम प्रेम करते हैं। अन्यथा कुछ है जो देखकर के प्रीति की जाती है। अगर हमें कोई किसी भी तरह का स्वार्थ पूर्ति करता दिखाई दे रहा है, है उसके अंदर कोई मांग। ठोक बजा के देखो पता चल जाएगा।
[3:01]एक दुकानदार के पास से एक आदमी गया। 2 किलो ताजी भिंडी रखा। लो लो, आप पालो हमारे खेत के हैं। यही रख दो। थोड़ी देर बाद वो आया। कपड़े से ढक दिया था। ₹1000 मिलेगा मुझे? चाहिए। फिर हम दे देंगे। वो भिंडी उठा जा यहां से। तात्पर्य अगर कोई हम को कुछ भी प्यार दिखा रहा है कुछ भी उसके पीछे उसके स्वार्थ है। आप किसी योग्य हैं उसके स्वार्थ पूर्ति के लिए इसीलिए प्यार कर रहा है। नहीं तो परिवार सगा संबंधी कोई नहीं है प्यार करने वाला। हम अनुभव की बात कहते हैं। आपको अनुभव इसलिए नहीं कि आप राग रंग में फंसे हुए हैं। आपकी बुद्धि मोह ममता से युक्त हो चुकी है। यहां एकदम विवेक के कांटे पर तोल के देखा है पाई भर कोई प्यार नहीं करता। इतना रत्ती भर कोई प्यार नहीं करता संसार में। प्यार करने वाले हैं तो प्रभु और प्रभु के जन, ये शब्द याद कर लीजिए। दूसरा कोई प्यार नहीं करता केवल स्वार्थ बुद्धि। यह पता चल जाए कि हमारे काम लायक नहीं फिर पता चलेगा कौन कितना प्यार करता है। यह जो तुम्हें दिखाई दे रहा है ना लाखों का प्यार। यह श्री जी का प्यार है।
[4:36]ये लाखों रूपों में वही प्यार करे कोई मनुष्य नहीं है। श्री जी का प्यार, श्री जी का वैभव, श्री जी का आकर्षण, श्री जी की करुणा कृपा बरस रही इसलिए श्री जी। व्यक्ति नहीं। नाते नेह राम के मनियत सुरत सुषेव्य जालो। यदि प्रभु के संबंध से हमारा तो कोई घाटा नहीं। लेकिन देह संबंध से घाटा ही घाटा है। इसको बिना मिटाए श्यामाजु के चरणों में प्रीति नहीं होती। ताजी निद्रा यह मोह की रे मन चेतन होई यह जग स्वप्नों है सब कैसोए दिन खोए।
[5:27]क्यों मोह निद्रा में सो रहा है और नाना प्रकार की कल्पना रूपी स्वप्न देख रहा है। जग जा।
[5:37]जगा हुआ कौन है? जो मन सुमिरै श्याम को साचे हिए सोअब श्यामा श्याम की कृपा सो भाग जाए दुख सब। जो साचे भय जगत में उन्हें अपनायो श्याम यह मन तू विश्वास करी तू पावे पद अभिराम। जगा हुआ तभी माना जाता है जब रात दिन केवल भगवत चिंतन, भगवत सेवा, भगवत भाव किसी भी विषय भोग की कोई इच्छा नहीं। जान सुत भई जीव जग जागा जब सब विषय विलास बिरागा। समस्त विषयों से वैराग्य प्रभु के चरणों में अनुराग ये जगा हुआ पुरुष है। यह कब जगोगे? जग जाओ। सोने का नाटक मत करो तुम्हें ज्ञान है। तय बालक नहीं भरो सयानप काहे कृष्ण भजत नहीं नीके। तू बालक नहीं है बड़ा प्रवीण है क्यों ठीक से भजन नहीं कर रहा? क्यों अपना कल्याण नहीं कर रहा? यह आकर्षणकारी माया तभी तक है जब तक नाम जप निरंतर नहीं चल रहा। जो मन गावे श्यामाजू को और जो ध्यावे श्याम युगल चंद के चरण में वो पावेगो विश्राम। श्यामाजू के गोरे चरणों की ठसक और श्याम सुंदर के गुण गीत गा रहा है। बोले युगल सरकार प्रसन्न होकर अपने निज धाम श्री वृंदावन और अपनी चरण सेवा में उसे परम विश्राम देते हैं। रे मन सीच तू मूल को पात पात को त्याग यह सब जग है श्याम को या के चरणन लागू। और ध्रुव मूल मध शाखा मस्वतम प्राहु रब्यम। मूल है प्रभु श्री कृष्ण चंद्र जो। काहे कोई इधर-उधर मन दौड़ा कर समय नष्ट कर रहे हो। एकमात्र प्रभु श्री कृष्ण चंद्रजु के चरणों का आश्रय लेकर निरंतर नाम जप कर।
[8:25]जैसे मूल में जल चढ़ाने से सर्वत्र पहुंच जाता है, ऐसे प्रभु श्री कृष्ण की आराधना करने से समस्त देवी देवता सब प्रसन्न हो जाते हैं। प्रायः आगंतुक भक्तों का प्रश्न रहता है कि यदि हम हनुमान जी की उपासना नहीं करेंगे तो वह नाराज हो जाएंगे। अमुक की उपासना नहीं करेंगे वह नाराज हो जाएंगे। तो हमें लगता है कि पांच-पांच बार सबका नाम ले लेते हैं सबकी। यह प्रारंभिक भक्ति सबकी होती है। यह कोई निषेध नहीं है, अच्छा है। पर इतनी ही भक्ति नहीं है, आगे बढ़ना है। और एक बात समझ लीजिए। चराचर जगत में एक ही विश्वात्मा भगवान है। कई उदाहरणों से पता चलता है। जे ही सुदामाजु के तंदुल भगवान ने पाए तो पूरा विश्व तृप्त हो गया क्योंकि विश्वात्मा भगवान है जिनके एक-एक रोम कूप में करोड़-करोड़ ब्रह्मांड वास करते हैं। ब्रह्मांड निकाय निर्मित माया रोम-रोम प्रतिबिंब है। जिस समय दुर्वासा जी परीक्षा लेने के लिए आए दुर्योधन से प्रेरित होकर धर्मराज युधिष्ठिर जी के पास जब द्रौपदी प्रसाद पा चुकी थी। श्री भगवान को पुकारा आए और एक शीत पाया भगवान श्री कृष्ण ने अनंत ब्रह्मांड के जीव सब तृप्त हो गए क्योंकि विश्वात्मा भगवान है विश्वंभर भगवान है। इसलिए श्री कृष्ण चंद्र जो के चरणों की आराधना श्री हरि जो के चरणों की आराधना सबकी आराधना हो जाती है। रे मन सीच तू मूल को पात पात को त्याग जब मूल में जल चला गया तो सब जगह पहुंच जाता है। मूल की आराधना हो गई तो सबकी आराधना होती। जैसे कामी पुरुष हर समय उठते बैठते चलते कामिनी का चिंतन करता है। जैसे लोभी पुरुष धन का चिंतन करता है। जैसे मां अपने बच्चे का चिंतन करती रहती कोई भी कार्य करे बीच-बीच में देख लेगी बच्चे का चिंतन कहीं उसको कोई बाधा ना पहुंच जाए। ऐसे ही तुकाराम जी कह रहे हैं मेरा मन सदैव विट्ठल में लगा रहता है। कहे तुका जग भूला रे कहा ना मानत कोए हाथ पड़े जब काल के मारत फोरत धोए। मान जाओ पुकार-पुकार के कह रहा हूं कि नाम जप करो नाम जप करो यदि नहीं मानोगे तो काल का डंडा पड़ेगा तेरी खोपड़ी फोड़ेगा तुझे मारेगा तब रोता रहेगा कोई बचाने वाला नहीं मिलेगा। तुका मिल ना तो भला जब मन सु मन मिल जाए ऊपर ऊपर माटी घसे उनकी कौन भरा है। तुकाराम जी कह रहे हैं कि भगवान तो तब मिलते हैं जब मन मिला दो श्री भगवान से। स्वांग धरने से नहीं मिलते। दुनिया का बाहरी स्वांग रखने से भगवान की प्राप्ति कल चर्चा हुई थी। कह रहे थे कि आप जटा बढ़ा लो आप दंड धारण कर लो आप विविध वेश बना लो। लेकिन मन भगवान से नहीं जोड़ा तो भगवान मिलने वाले नहीं। बाहरी वेश से भगवान मिलने वाले नहीं। कहे तुका भला भया मैं हुआ संतन को दास क्या जानू कैसे मरता ना मिटती मन की आस। तुकाराम जी कह रहे हैं भला हुआ जो हमें संतों का दास बना दिया क्योंकि इसी से सब आशा वासना तृष्णा का नाश हुआ। जो संतों के दास नहीं वो जान ही नहीं पाते कि मन को कैसे मारना है, कैसे आशा का त्याग करना है, कैसे तृष्णा को मिटाना है। इसलिए आंखें खोलो। अभी तक बहुत समय हो गया मोह निद्रा में सोते हुए। क्या तूने अपनी माता की कोख में हुए कष्ट को विशार दिया। तुकाराम जी कहते हैं तूने नर्तन पाया बड़ी-बड़ी विपत्तियां सही क्या अभी भी विपत्ति में फंसना चाहता है? इसलिए सार्थक कर इस नर्तन को। संत तुझे जगा रहे हैं। अपनी नौका में चढ़ा के पार कर देंगे। बस तू श्री हरि श्री हरि राम कृष्ण हरि ऐसा निरंतर रटन कर। भगवत प्रिय भक्त ही सौभाग्यशाली है इस जगत में और कोई सौभाग्यशाली नहीं। भक्त का ही सौभाग्य असीम और अपार है। भक्त का जन्म सफल हो गया धन्य हो गया। उसके मां धन्य उसके पिता धन्य उसका कुटुंब धन्य उसका कुल धन्य उसकी जाति धन्य हो गई जिस कुल में भगवान का भक्त जन्म लिया। प्रभु के शरणागत उनका सब कुछ धन्य संसार में आना धन्य संसार से जाना धन्य। वे प्राणी धन्य जो ऐसे भक्तों का संग पा गए। भक्तों के पूर्वज ताल ठोक कर गरजते हैं कि अब मेरा उद्धार हो गया क्योंकि मेरे कुल में भगवान का भक्त जन्मा। वह असंख्य प्राणियों को भवसागर के से पार करने की सामर्थ्य रखता है जिसने अपने चित्त को भगवान से जोड़ दिया। भगवान के भक्त का बड़ा प्रभाव होता है। भगवान के भक्त के दर्शन मात्र से सारी कामनाओं की पूर्ति होती है और पाप नष्ट हो जाते हैं। और यदि यह श्रद्धा हो जाए कि यह तो साक्षात भगवान है तो भवसागर से तर जाए। इंद्र और रुद्र ब्रह्मा यह सब भक्त की महिमा का गान करते रहते हैं। पुरुषोत्तम भगवान श्री हरि के कृपा पात्र सीधे भगवान के धाम जाते हैं। वे भगवान के साथ निवास करते हैं। ऋषिकेश उनको बहुत दुलार करते हैं। ऐसे महा भाग्यशाली संत धन्य हैं। ऐसे संत भक्तों के चरणों में हम अपना मस्तक नवाते हैं। अगर तुम भगवत मार्ग में चल रहे हो, तुम्हारी कोई निंदा कर रहा है तो खुशी हो जाओ। निंदक दुर्जन की बलिहारी वो आगे पीछे देवे गारी निर्मल काया हृदय होए उजियारी। दोनों पवित्र कर देते हैं, शरीर और हृदय भी। ये जो निंदा करने वाले हैं, ये जो आगे पीछे दोष दर्शन देख के निंदा करते हैं धन्य है। प्रणाम है इनको। बिना साबुन और बिना पानी के निर्मल करे स्वभाव। निंदक नीरे राखिए आंगन कुटी छवाए। बहुत बढ़िया। बुरा ना लगना चाहिए। जब कोई निंदा करे अपमान करे बुरा ना लगे बहुत जल्दी आध्यात्मिक उन्नति हो जाएगी हृदय बहुत जल्दी पवित्र हो जाएगा। बोले मल मूत्र धोवे दुर्गुण बारी ऐसो निंदक परोपकारी। ये राम नाम सूं करे नयारी भोर भय उठी माणे रारी। कहत मान पूरी ना मन हमारी ताकि बात मोहे लागत प्यारी। ये जो निंदक है, जैसे माता मल मूत्र से सने हुए बालक को साफ करके निर्मल कर देती। ऐसे ही सुबह शाम जब मिलेंगे तब निंदा करेंगे तो तुम्हारे हृदय के सब दोष खत्म हो जाएंगे। इनसे झगड़ा मत करना इनकी पलट कर निंदा मत करना। इनको मैं नमन करता हूं इनका मान करता हूं। इनकी बातें मुझे बहुत अच्छी लगती है क्योंकि निंदा करके हमें भगवान के योग्य बना देते हैं। इसलिए भक्त को चाहिए कि जब उसकी निंदा हो तो आनंद मनाना चाहिए। बिना प्रारब्ध भोगे प्रारब्ध नष्ट कर रहा है निंदक। इससे बड़ा कौन हमारा मित्र हो सकता है? अरे मन धीरज काहे ना धरे शुभ अशुभ कर्म पुरवले के रत्ती घटे ना बढ़े। जिससे शरीर रच गया इसको तो भोगना पड़ेगा इसको भक्ति से मत जोड़िए। कि हमने भजन शुरू किया बुरा होने लगा या हमने भजन शुरू किया अच्छा होने लगा। यह वर्तमान का नहीं है, यह पूर्व का है। शुभ और अशुभ कर्म पुरवले के। रत्ती घटे ना बढ़े अरे मन धीरज काहे ना धरे। होनहार होवे पुनि सोई चिंता काहे करे। पशु पंछी सब कीट पतंगा उस सबकी सुधि करे। सबका हिसाब किताब है। एक-एक मच्छर का भी हिसाब किताब हमारे प्रभु के दरबार में है। तू चिंता क्यों कर रहा है? जो होना है वही होगा क्योंकि तेरे कर्म के अनुसार ही रच गया है। अब चिंतन कर भगवान का चिंता मत कर वही संभाल लेंगे। देखो। क्या व्यवस्था तूने अपनी की थी गर्भ में जब माता के था कैसी व्यवस्था हरि ने की? एक नाल का संबंध माता के उदर में ही करके पूरा पोषण सामग्री जा रही है। बाहर आए तो मां के शरीर के रक्त को दूध बना दिया और उससे पोषण होने लगा। गर्भवास में खबर लेत है। उ बाहर क्यों बिसरे। अरे मन धीरज काहे ना धरे। जब बाहर आ गया तो फिर संसार में रमण माता पिता सुत संपत्ति दारा फिर मोह के जाल जरे। मन तू हसन साहिब तज के भटकत काहे फिरे। अरे मन धीरज काहे ना धरे। फिर आकर के फिर ये माता-पिता भाई-भौजाई अमुक अमुक अमुक फिर फंस गया। जो आनंद प्रदान करने वाले परमहंस श्री हरि हैं, उनको तू भूल गया। साहब को भूल गया साहब को छोड़कर फिर भटकना शुरू हुआ। बड़े भाग्यशाली हैं जिनको साहब का परिचय बताने वाले गुरु मिल गए। सतगुरु छान और को ध्यावे कारज एक ना सरे। साधुन सेवा कर मन मेरे कोटिन व्याधि हरे। कहत कबीर सुनो भाई साधु सहज में जीव तरे। जिसने गुरुदेव का वरण किया उनकी आज्ञा पे चला तो गुरुदेव की कृपा से साधु सेवा की कृपा से सहज में संसार से तर गया। और जो गुरुदेव को छोड़कर के और कोई साधन तो फिर काज ना सरे। फिर परमार्थ की पूर्ति नहीं होती। प्रीति उसी से कीजिए जो और निभावें आर पार निर्वाह करे। बिना प्रीति के मनवा कहीं ठौर ना पावे ऐसी प्रीति तो केवल बिहारीजू से केवल उनके प्रेमी जनों से दूसरे से नहीं। हित तो कीजिए कमल नयन सों जा हित आगे सब हित लागे फीको। कह हित की जो साध संगत सो जो कलम शु जाए सब जी को। स्वामी हरिदास जी कहते दो ही प्रीति करने लायक है। भजवे को दो ही भले कह हरि कह हरिदास। प्रीति ठिकाने पे करो हरिजू से करो। नाम स्नेही जब मिले तब ही सच पावे अजर अमर घर ले चले भौजल नहीं आवें। अगर नाम जापक सद्गुरुदेव संत मिल जाए तो अजर अमर पद प्राप्त हो जाए। वो दिव्य घर अर्थात परमात्मा के धाम को ले जाए। नाम लगन छूटे नहीं सोई साधु सयाना हूं। माटी के बर्तन बन्यो पानी ले साना हूं। इस शरीर पर राग मत करो। पंच भूतों से बना हुआ है यह। मिट्टी पानी, हवा, अग्नि, आकाश यही है। यही पंचभूत है। होश में नाम लगन छूटे नहीं सोई साधु सयाना हूं। निरंतर नाम जप कर रहे नाम नहीं छूट रहा है वही सयाना है। एक क्षण की खबर नहीं है जो हमारे अंदर यह बात है कि हम फिर भजन कर लेंगे। जगत में खबर नहीं पल की। सुमिरन कर ले नाम सुमिर ले को जाने कल की। जगत में खबर नहीं पल की एक सेकंड का भी भरोसा नहीं इसलिए हर क्षण नाम जप कर।
[22:05]इस संसार में वही परम धन्य है जो गुरु उपदेश के अनुसार भजन में चित्त को जोड़े हैं। नहीं तो जन्म सिरान भजन कब करिबो। गर्भवास में भगत कबूल्यो बाहर आए भुलानो। बालापन तो खेल गंवाइयो तरुणाई अभिमान वृद्ध भए तन कांपन लागा सिर धुन धुन पछितान। कहे कबीर सुनो भाई साधु फिर जम के हाथ विकान पूरा जन्म व्यतीत हो गया भजन कब करोगे गर्भ में भगवान से वादा किया था एक बार निकाल दो जाके भजन करेंगे। बाल्यावस्था खेलकूद में जवानी अभिमान भोग वासना में बुढ़ापा में शरीर कांप रहा है प्रपंच मन में भरा है कब भजन करोगे। यमराज के फिर हाथ पड़ गए फिर भजन का मार्ग नहीं मिलेगा। एक बार कृपा करके भगवान ने मनुष्य शरीर दिया है। संभाल लो तोरी गठरी में लागे चोर बटुहिया का सोए तोरी गठरी में लागे चोर। बहुत जोर के चोर जन्म से लग गए। पांच, 25, तीन है चुरवा ये सब की ने शोर बटुहिया का सोए। गणित लगाओ भाई। पांच चोर 25 चोर और तीन चोर। यह बैच है अलग-अलग। तो पांच प्राण। प्राण उदान समान व्यान जो पांच प्राण हैं। और 25 शब्द स्पर्श रूप रस गंध पांच तन मात्रा श्रवणेंद्रिय त्वगेंद्रिय रसेंद्रिय घ्राणेंद्रिय नेत्रेंद्रिय। पांच ज्ञानेंद्रियां दस हस्तेंद्रिय, पादेंद्रिय वाकेंद्रिय, मूत्रेंद्रिय, गोदांद्रिय। पांच कर्मेंद्रियां 15।
[24:29]पंच महाभूत आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी। 20। मन बुद्धि चित्त अहंकार 24 अविद्या 25। पांच प्राण, 25 ये और तीन चुरवा। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण। पांच 25 तीन है चुरवा। ये सब की ने शोर बटुहिया का सोए तोरी गठरी में लागे चोर। रोज चुरा रहे श्वास रूपी धन बटुहिया का सोए जाग सवेरा बाट नेरा फिर नहीं लागे जोर। भवसागर एक नदी बहुत है बिन उतरे जा बे बोर। कहे कबीर सुनो भाई साधु जगत कीजिए भोर। अब जग जाए संसार में सुबह हो गया अब मत रात्रि मोह निद्रा में सो। तोरी गठरी में लागे चोर बटुहिया का सोए जग जाओ। जगा हुआ कौन पुरुष है? मन लागो यार फकीरी में। मन लागो मन लागो मन लागो यार फकीरी में। जो सुख पावा नाम भजन में सो सुख नाही अमीरी में मन लागो मेरो यार फकीरी में। भली बुरी सब की सुन ले वे भली बुरी सब की सुन ले वे करी गुजरान गरीबी में। मन लागो मेरो यार फकीरी में। जब तक संतोष रूपी धन नहीं आता तब तक वो निर्धन ही रहता है।
[27:33]कामनाओं का जाल बिछा रहता है। बिन संतोष सबूरी संतोष को। बिन संतोष ना का मन साही अछत काम सुख सपने ना ही। प्रेम नगर में रहन हमारी भली बन आई सबूरी में। हाथ में कूड़ी बगल में सोटा चारों दिशा जागीरी में। मन लागो मेरो यार फकीरी में आखिर ये तन खाक मिलेगा। कहा फिरत मगरूरी में।
[28:24]कहत कबीर सुनो भाई साधु साहिब मिलत सबूरी में मन लागो मेरो यार फकीरी में। जो सुख पावा नाम भजन में वो सुख नाही अमीरी में मन लागो मेरो यार फकीरी में।
[28:50]गुरु गोविंद दोऊ खड़े का के लागु पाए तो बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो मिलाए।
[29:15]सब धरती कागज करू लेखनी सब बनराय सात समुद्र की मस करू गुरु गुण लिखा ना जाए।
[29:40]कबीर ते नर अंध है गुरु को कहते और हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रूठे नहीं ठौर।
[30:21]गुरु बड़े गोविंद ते मन में देखो विचार हरि सुमिरै सो बार है गुरु सुमिरै सो पार।



