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91 Lakh Voters DELETED! | Reality of West Bengal Elections | Dhruv Rathee

Dhruv Rathee

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[0:00]2 अप्रैल 2026, वेस्ट बंगाल का माल्दा डिस्ट्रिक्ट, नेशनल हाईवे नंबर 12 पर बांस, फ़र्नीचर और जले हुए टायर्स का बैरिकेड लगा हुआ है. सैकड़ों लोग सड़क पर है और BDO ऑफिस के अंदर सात जुडिशियल ऑफिसर्स को होस्टेज बनाया जा चुका है. पूरे 9 घंटे तक ये भीड़ इन जजेज़ को बाहर नहीं निकलने देती. पुलिस की गाड़ियाँ जब पहुँचती हैं, तो लोग उन पर पत्थर बरसाते हैं. लेकिन जानते हो क्या, जजेज़ को होस्टेज बनाने वाले ये लोग कोई पेशवर क्रिमिनल्स नहीं थे. बल्कि ये वो लोग थे, जिनका नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया था. ये टीचर्स थे, किसान थे, दुकानदार थे. इनका कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं था, लेकिन सिस्टम इतना ओवरव्हेल्म हो चुका था. लोग इतने डेस्परेट थे कि हालात इस कदर बिगड़ गए थे. और ये सिर्फ एक जगह की बात नहीं है. आज के समय पूरे वेस्ट बंगाल में हल्ला मचा हुआ है. कई शहरों में प्रोटेस्ट हो रहे हैं, और इसकी वजह सिर्फ एक चीज़: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR).

[1:00]61 लाख लोगों का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है. 60 लाख लोग सस्पेक्टेड वोटर बन गए हैं, और ये डिसाइड कौन कर रहा है? कोई जज नहीं, कोई ऑफिसर नहीं, बल्कि एक सॉफ्टवेयर. सही सुना आपने, दोस्तों. एक ऐसा सॉफ्टवेयर, जिसे डिप्लॉय करने से पहले टेस्ट तक नहीं किया गया. एक सॉफ्टवेयर, जिसकी एक्यूरेसी के बारे में इलेक्शन कमीशन को खुद नहीं पता, और एक ऐसा सॉफ्टवेयर, जिसने एक रात में 7 करोड़ वोटर्स को सस्पेक्टेड बना दिया था. इसको समझने से पहले हमें समझना होगा कि SIR किस लेवल की तबाही मचा रहा है वेस्ट बंगाल में.

[1:37]नमस्कार दोस्तों, नवंबर 2025 को वेस्ट बंगाल में SIR शुरू हुआ था, और 28 फरवरी 2026 को फ़ाइनल वोटर लिस्ट पब्लिश हुई. बंगाल में हर 6 में से 1 वोटर इससे इफ़ेक्ट हुआ है. कुल 1.21 करोड़ लोग. सोच कर देखो, अगर आपके घर में 6 लोग वोट करते हैं, तो स्टैटिस्टिकली उनमें से एक का नाम कट सकता है. इस पूरी एक्सरसाइज में टोटल वोटिंग पापुलेशन के 8.09% वोटर्स, यानी 61 लाख लोगों का नाम वोटिंग लिस्ट से डिलीट कर दिया गया है. लेकिन बात यहाँ सिर्फ इस डिलीशन पर नहीं रुकी. 60 लाख वोटर्स को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज़ के नाम पर एक बिल्कुल नई कैटेगरी में डाल दिया गया है - अंडर एडज्यूकेशन. सिंपल शब्दों में कहा जाए तो सस्पेक्टेड. ना इनका नाम डिलीट किया गया, ना कंफर्म किया गया, बस बीच में लटका कर छोड़ दिया गया. और जानते हो क्या क्राइटेरिया था किसी वोटर को सस्पेक्टेड की कैटेगरी में डालने का? अगर नाम की स्पेलिंग ज़रा सी भी मिसमैच हुई, मोहम्मद में O की जगह U लगा दिया, मोंडल में A की जगह O लगा दिया, तो आपका नाम सीधा सस्पेक्टेड में आ जाएगा. इतना ही नहीं, अगर किसी का जेंडर मैच नहीं हुआ, अगर बाप-बेटे के बीच ऐज गैप 15 साल से कम या 45 साल से ज्यादा हो गया, तो भी सीधा सस्पेक्टेड वोटर. सोचकर देखो दोस्तों, इंडिया जैसे देश में जहां सरकारी डॉक्यूमेंट्स में स्पेलिंग मिस्टेक्स कितनी नॉर्मल बात है. जहां गांव में किसी सरकारी बाबू ने जो 20 साल पहले लिखा, वो फ़ाइनल हो गया, वहां एक स्पेलिंग मिसमैच के लिए लोगों का वोटिंग राइट छीना जा रहा है. सबसे शॉकिंग बात ये है कि ये सस्पेक्टेड की कैटेगरी पहले कभी एक्सिस्ट ही नहीं करती थी. 1952 से लेकर अब तक 13 बार SIR हो चुका है, लेकिन ये लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी, अंडर एजुकेशन, सस्पेक्टेड, ऐसी कोई कैटेगरी कभी नहीं रही है. नहीं, मतलब या तो कोई वैलिड वोटर होता है या नहीं होता, ये बीच में लटकाने का क्या सेंस बनता है? यहां पर इलेक्शन कमीशन पर आरोप लग रहा है कि जब लोगों ने रिक्वायर्ड डॉक्यूमेंट्स दे दिए थे, तो उन्हें जान-बूझकर फ़साने के लिए ये नई कैटेगरी बनाई गई है. अब शायद आप सोच रहे होंगे कि बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों की दिक्कत बहुत सालों से है, तो SIR होना तो एक ज़रूरी चीज़ है ना. जब SIR शुरू किया गया था, तब यही कहा गया था कि वोटिंग लिस्ट में बहुत सारे इलीगल इमीग्रेंट्स का नाम है, जिन्हें हटाने की ज़रूरत है. बीजेपी लीडर्स ने तब बार-बार कहा था कि बंगाल में 1 करोड़ से ज्यादा वोटर्स डिलीट होंगे, जिनमें बड़ा हिस्सा इलीगल बांग्लादेशी माइग्रेंट्स का होगा. बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में डेमोग्राफी में खतरनाक बदलाव आया है. लेकिन असल में दोस्तों, डेटा कुछ और ही कहानी बताता है. पूरी वेस्ट बंगाल की स्टेट में सिर्फ 4.3% वोटर्स ही ऐसे मिले हैं, जिन्हें 2002 के SIR वोटर रोल से मैप नहीं किया जा सका. और इनमें से भी मुस्लिम मेजोरिटी सीट्स पर सबसे कम अनमैप्ड वोटर्स हैं. डोमकल में 0.42%, रानीनगर में 0.91%, हरिहरपाड़ा में 0.6%. जानते हो सबसे ज्यादा नो मैपिंग का रेट कहाँ मिला? मतुआ कम्युनिटी वाली सीट्स में, जो दलित रेफ्यूजीज़ हैं. ये वो लोग हैं, जो 1947 और उसके बाद बांग्लादेश से भारत आए थे, हिंदू रेफ्यूजीज़. 17 मतुआ-फोकस्ड सीट्स पर एवरेज 9.47% अनमैप्ड वोटर्स मिले, यानी स्टेट एवरेज से डबल. तो मतलब समझ रहे हो, अगर बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करना मकसद था, तो डेटा बिल्कुल उल्टी कहानी बता रहा है. जहां मुस्लिम मेजोरिटी है, वहां अनमैप्ड वोटर्स सबसे कम हैं, और जहां सबसे ज्यादा है, वो हिंदू दलित रेफ्यूजी एरियाज़ हैं. आसाम के NRC में भी ऐसा ही कुछ पाया गया था, उसे भी बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करने के नाम पर लाया गया था. लेकिन जो सिटीजनशिप प्रूफ नहीं कर पाए, उनमें से आधे से ज्यादा हिंदू थे. तो ये घुसपैठियों वाला मकसद तो पूरी तरीके से फेल रहा, लेकिन सवाल ये है कि फिर असली मकसद था क्या? इसे समझने के लिए पहले ये देखना होगा कि ये सब हुआ कैसे. ये कहानी है एक सॉफ्टवेयर की. एक सॉफ्टवेयर जिसने 20 साल पुरानी वोटर लिस्ट को स्कैन करके करंट लिस्ट से मैच किया. और जहां भी थोड़ा सा मिसमैच मिला, वोटर को फ्लैग कर दिया गया. जब रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने इसे इन्वेस्टिगेट किया, तो पता चला कि इस सॉफ्टवेयर को डिप्लॉय करने से पहले इसे टेस्ट तक नहीं किया गया था. इसे इस चीज पर भी नहीं टेस्ट किया गया था कि क्या ये सॉफ्टवेयर पुराने रिकॉर्ड्स को करेक्टली रीड कर पा रहा है या नहीं कर पा रहा है. एक सीनियर इलेक्शन कमीशन के ऑफिसर ने खुद एक्सेप्ट किया कि उनको कोई आईडिया नहीं है कि ये सॉफ्टवेयर 95% एक्यूरेट था या 60% एक्यूरेट. मतलब सोचकर देखो क्या चल रहा है देश में. 60 लाख लोगों के वोटिंग राइट्स का फ़ैसला एक ऐसा सॉफ्टवेयर कर रहा है, जिसकी एक्यूरेसी का अंदाजा भी नहीं है इलेक्शन कमीशन को. बाद में वेस्ट बंगाल के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर ने माना कि सॉफ्टवेयर मलफंक्शन कर रहा है. और ये कोई छोटा-मोटा मलफंक्शन नहीं था, सबसे शॉकिंग बात हुई 24 मार्च की शाम को. इस सॉफ्टवेयर को जब चलाया गया, तो इसने एक ही झटके में वेस्ट बंगाल के 7 करोड़ वोटर्स को एक साथ सस्पेक्टेड कैटेगरी में डाल दिया. 7 करोड़, यानी ऑलमोस्ट हरेक वोटर को सस्पेक्टेड कैटेगरी में डाल दिया गया. जब ये रिजल्ट देखने को मिला तो 2 घंटे बाद इसे टेक्निकल ग्लिच बताकर ठीक किया गया. लेकिन फिर भी, दोबारा जब चलाया गया, कोई मैनुअल नहीं थी, कोई टेस्टिंग नहीं, कोई अकाउंटेबिलिटी नहीं. बिना किसी ग्राउंड वेरिफिकेशन के एक एल्गोरिथम ने डिसाइड किया कि कौन इंडियन है और कौन नहीं. इलेक्शन कमीशन की इस बेवकूफी की वजह से आज लाखों वोटर्स ट्रिब्यूनल्स के बाहर लंबी-लंबी लाइनों में खड़े हैं, हाथ में डॉक्यूमेंट्स लिए. बस इसलिए क्योंकि एक मशीन ने उनकी स्पेलिंग गलत पढ़ ली. और वैसे दोस्तों, सॉफ्टवेयर तो सिर्फ एक टूल है, असली सवाल ये है कि इसे चलाने वाले ने क्या किया. यहां पर कहानी और भी खतरनाक हो जाती है. बंगाल के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर्स ने WhatsApp के ज़रिये ऑर्डर्स जारी किए. जिनमें से कई तो ऐसे थे, जो चुनाव आयोग के खुद के रिटन इंस्ट्रक्शंस के खिलाफ थे. लोकल इलेक्शन ऑफिसर्स को ड्राफ्ट लिस्ट बनाने के लिए एक डेडलाइन दी गई, लेकिन चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर ने WhatsApp पर ऑफिशियल्स से कहा कि वोटर्स को ऑफिशियल डेडलाइन खत्म होने से पहले ही एब्सेंट मार्क कर दें. एक बार फिर से सोचकर देखो, कोई रिटन ऑर्डर नहीं, कोई ऑफिशियल गैजेट नहीं. बस WhatsApp मैसेजेस के ज़रिये लाखों लोगों के वोटिंग राइट्स जज किए जा रहे हैं. अब देखो इस सब का नतीजा क्या निकला. आप सोचोगे कि जो गरीब लोग हैं, अनपढ़ लोग हैं, उनको बहुत कुछ सहना पड़ा होगा, सबसे ज्यादा प्रॉब्लम्स उन्हें सहनी पड़ रही होंगी. लेकिन अगर आप देखोगे कि इस लिस्ट में कौन-कौन है, तो आपको यकीन नहीं होगा. मोहम्मद दुआल अली, एक कारगिल वॉर के वेटरन. इन्होंने देश के लिए गोलियां खाई, युद्ध में घायल हुए, और प्रूफ के तौर पर इन्होंने अपने आर्मी डॉक्यूमेंट्स दिखाए, सर्विस रिकॉर्ड दिखाया. लेकिन इलेक्शन कमीशन के सॉफ्टवेयर ने इन्हें सस्पेक्टेड वोटर की लिस्ट में डाल दिया. और सुनो, कलकत्ता हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस शहीदुल्लाह मुंशी, जो अभी वेस्ट बंगाल वक्फ बोर्ड के चेयरपर्सन भी है, उनका नाम भी वोटर लिस्ट से डिलीट कर दिया गया. उनकी पत्नी और बेटे को सस्पेक्टेड में डाल दिया गया. उन्होंने इसे बहुत ह्यूमिलिएटिंग और पेनफुल बताया, और बाद में जब इस केस को मीडिया अटेंशन मिली, तो रातों-रात उनका नाम रिस्टोर कर दिया गया. लेकिन एक बार फिर से सोचकर देखो, क्या क्रेडिबिलिटी रह गई है यहां पर इलेक्शन कमीशन की. अगर रिटायर्ड हाई कोर्ट के जज को अपना वोट बचाने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है, एक आम आदमी ऐसे केस में क्या करेगा जिसके पास कोई मीडिया एक्सेस नहीं, कोई लीगल नॉलेज नहीं? इसी तरह बंगाल के नवाब रहे मीर जाफर के डिसेंडेंट, 82 साल के सैयद रेज़ा अली मिर्ज़ा और उनके बेटे फहीम, इन दोनों का नाम भी वोटिंग लिस्ट से डिलीट कर दिया गया. अगर आपको लग रहा है मैं यहां पर सिर्फ इक्का-दुक्का सिलेक्टिव मिस्टेक्स दिखा रहा हूं तो ऐसा नहीं है, ये लिस्ट बहुत लंबी है. वर्ल्ड कप विनिंग वूमेन क्रिकेटर रिचा घोष, बंगाल की पहली महिला चीफ सेक्रेटरी नंदिनी चक्रवर्ती, बंगाल सरकार के दो मिनिस्टर्स शशि पांजा और मोहम्मद गुलाम रब्बानी, और इसके अलावा ढेर सारे डॉक्टर्स, लॉयर्स और पुलिस ऑफिसर्स तक का नाम सस्पेक्टेड वोटर्स की लिस्ट में डाला गया. अरे ये सब तो छोड़ो दोस्तों, SIR करवा रहे बूथ लेवल ऑफिसर्स तक का नाम सस्पेक्टेड में डाला गया. वो लोग जो दूसरे को वेरीफाई कर रहे हैं, अब खुद लाइन में खड़े हैं अपना नाम डलवाने के लिए. ये पूरा किस्सा दोस्तों कहानी का सिर्फ एक पहलू है, वोटर लिस्ट से नामों को काटना. इसका दूसरा पहलू है, वोटर लिस्ट में उन लोगों के नाम ऐड करना जो उस स्टेट में रहते नहीं. वेस्ट बंगाल के चीफ मिनिस्टर ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि बीजेपी बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के लोगों का नाम बंगाल की वोटर लिस्ट में ऐड करा रही है. एक ही दिन में करीब 30000 फॉर्म 6 सबमिट किए गए. फॉर्म 6 वो फॉर्म होता है, जिसके ज़रिये नए वोटर्स के नाम इलेक्टोरल रोल में ऐड किए जाते हैं. अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक फाइनल वोटर लिस्ट पब्लिश होने के बाद सिर्फ जुडिशियल ऑफिसर्स ही किसी का नाम वोटर लिस्ट में ऐड कर सकते हैं. चुनाव आयोग ये काम नहीं कर सकता. इसलिए ममता बनर्जी कह रही हैं कि ये जो 30000 नाम ऐड किए जा रहे हैं, ये इलीगल है. रूल्स के मुताबिक किसी भी पॉलिटिकल पार्टी का एजेंट एक दिन में केवल 50 फॉर्म 6 ही जमा करा सकता है. लेकिन TMC सपोर्टेड एक BLO ऑर्गनाइजेशन ने एक बीजेपी वर्कर को पकड़ा, 400 फॉर्म 6 एप्लीकेशन चुनाव आयोग के ऑफिस ले जाते हुए. इसका वीडियो यहां आप स्क्रीन पर देख सकते हो.

[9:57]इसमें क्या है भैया. टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने और भी इसके वीडियो एविडेंसेस सामने लाए, जिनमें एलेजेडली एक बीजेपी वर्कर बल्क फॉर्म 6 एप्लीकेशन सबमिट करते हुए दिख रहा है. साथ ही चुनाव आयोग के ऑफिस में बहुत सारे फॉर्म्स रखे हुए दिख सकते हैं. अगर आपको याद हो दोस्तों, ये पहली बार नहीं है कि इस तरीके के आरोप लग रहे हैं. इससे पहले दिल्ली और महाराष्ट्र की स्टेट इलेक्शंस में भी ये आरोप लग चुका है कि बीजेपी फॉर्म 6 के ज़रिये बाहर दूसरी स्टेट्स के लोगों को वोटर लिस्ट में ऐड करा रही है, स्टेट इलेक्शन से ठीक पहले, और चुनाव आयोग इसमें उनका साथ दे रहा है. यानी पैटर्न एक ही है. पहले जेनुइन वोटर्स के नाम काटो, फिर अपने लोगों के नाम वोटर लिस्ट में ऐड करवा दो. अगर आपके मन में आपको कहीं भी थोड़ा सा लगता है कि नहीं इलेक्शन कमीशन फेयरली काम कर रहा है, तो मुझे इस सवाल का जवाब दो कि डेटा छुपाने की फिर क्या ज़रूरत पड़ी? वेस्ट बंगाल की जो फाइनल वोटिंग लिस्ट पब्लिश की गई, उसकी केवल स्कैंड PDF कॉपीज़ अपलोड की गई. ये कॉपीज़ ना तो सर्चएबल थी और ना ही मशीन रीडेबल. और जहां पर फाइल साइज़ इन कॉपीज़ का 1 MB होना चाहिए, वो 228 MB की फाइल इन्होंने बना दी. अननेसेसरीली ज्यादा बड़ा बनाया गया फाइल साइज़. और इसके अलावा हर फाइल को डाउनलोड करने से पहले एक Captcha आता है, जो किसी भी ऑटोमेशन को ब्लॉक कर देता है. ऊपर से लगभग 10% वोटर एंट्रीज़ पर अंडर एडज्यूकेशन का वॉटरमार्क लगा हुआ है, ताकि कोई AI का इस्तेमाल करके या मैन्युअली भी इस डेटा को एनालाइज ना कर पाए. मतलब इलेक्शन कमीशन चाहता ही नहीं कि आप इस डेटा को आसानी से पढ़ पाओ. क्यों ज्ञानेश कुमार जी, सही बोल रहा हूं ना. लेकिन अनफॉर्चूनेटली ज्ञानेश कुमार जी, इस डेटा को सही से पढ़ पाना और एनालाइज कर पाना, ये जनता का अधिकार है. और बहुत सारे देशभक्त लोग हैं, जो इस काम में लग गए. ऑल्ट न्यूज़ की टीम ने 558 PDF फाइल्स को मैन्युअली प्रोसेस किया, और 352287 वोटर रिकॉर्ड्स को डिजिटाइज कर दिया. और हर रिकॉर्ड का सीरियल नंबर, वोटर ID, नाम और एडज्यूकेशन स्टेटस निकालकर सामने रख दिया. ये पूरा डेटाबेस अब पब्लिकली सबके सामने अवेलेबल करा दिया गया है. आप इस वेबसाइट पर जाकर इसको चेक कर सकते हो, इसका लिंक मैंने डिस्क्रिप्शन में भी डाल दिया है. आप जाकर अपनी कॉन्स्टिट्यूएंसी का डेटा देख सकते हो, डेमोग्राफिक्स चेक कर सकते हो, और अपना नाम भी आसानी से इसमें सर्च कर सकते हो. असल में दोस्तों, इलेक्शन कमीशन ने इन सस्पेक्टेड वोटर्स के नाम पब्लिकली बताने से ही इंकार कर दिया था. ये सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हुआ कि इन्हें मजबूरी में पब्लिकली इन्हें दिखाना पड़ा. एक बार फिर से सवाल ये उठता है कि क्यों? आखिर इलेक्शन कमीशन इतनी सीक्रेसी क्यों रखना चाह रहा है? जवाब इसका डेटा में छिपा है, और जब आप ये डेटा देखेंगे तो शायद इसका जवाब समझ जाएंगे. न्यूज़ पोर्टल आर्टिकल 14 की इन्वेस्टिगेशन में सामने आया कि जिन 10 डिस्ट्रिक्ट्स में सस्पेक्टेड वोटर्स के हाईएस्ट केसेस हैं. उन 10 में से 9 डिस्ट्रिक्ट्स में मुस्लिम वोटर पॉपुलेशन 50% या उससे ज्यादा है. मुर्शिदाबाद जहां 66% मुस्लिम पॉपुलेशन है, वहां सबसे ज्यादा ऐसे केसेस देखे गए, 11 लाख वोटर्स के. और ऑफिशियल डेटा अब कंफर्म करता है कि इन 11 लाख में से 4.55 लाख वोटर्स को नॉन एलिजिबल घोषित किया गया है. लेकिन जब कॉन्स्टिट्यूएंसी लेवल पर आप डेटा को देखोगे तो ये पिक्चर और भी ज्यादा क्लियर हो जाती है. डेक्कन हेरल्ड के मुताबिक कोलकाता पोर्ट में लगभग 50% मुस्लिम वोटर्स हैं, लेकिन सस्पेक्टेड लिस्ट में उनका शेयर 82% है. मेटियाब्रूज में 60% मुस्लिम हैं, लेकिन सस्पेक्टेड लिस्ट में उनका शेयर 87% तक है. ममता बनर्जी की खुद की सीट भवानीपुर में 20% मुस्लिम है, लेकिन सस्पेक्टेड लिस्ट में 52% मुस्लिम हैं. क्या ये सारे नंबर सिर्फ कोइन्सीडेंस हैं? अगर बूथ बाय बूथ कंपैरिजन देखोगे तो पिक्चर और भी ज्यादा डिस्टर्बिंग है. द वायर की इन्वेस्टिगेशन के मुताबिक रानीनगर विधानसभा के हिंदू मेजोरिटी बूथ पर केवल 3% वोटर्स को सस्पेक्टेड में डाला गया है, वहीं मुस्लिम मेजोरिटी बूथ पर 35 से 58% वोटर्स तक को फ्लैग किया गया है. मतलब इमजिन करो, 3% वर्सेस 58%, एक ही कॉन्स्टिट्यूएंसी, एक ही सॉफ्टवेयर, एक ही रूल्स, बस डेमोग्राफिक्स का फर्क दिख रहा है. इसके अलावा 42% सस्पेक्टेड केसेस केवल तीन जिलों में है, जहां TMC ट्रेडिशनली जीतती आई है. लेकिन 2021 में जीत का अंतर 2500 से लेकर 4000 वोट्स तक का ही था. मतलब बहुत छोटे मार्जिन से TMC ने इन कॉन्स्टिट्यूएंसीज़ को जीता था 2021 की इलेक्शन में. और अगर अब यहां पर सस्पेक्टेड वोटर्स सबसे ज्यादा डिलीट किए जाते हैं, तो तस्वीर देख सकते हो कैसे पूरी तरीके से बदल सकती है. और बात सिर्फ इन तीन जिलों की नहीं है, वेस्ट बंगाल की 294 सीट्स में से 234 सीट्स पर अफेक्टेड वोटर्स की संख्या 2024 लोकसभा चुनाव के विनिंग मार्जिन से ज्यादा है. और इत्तेफाक की बात देखो, 2021 में TMC को बीजेपी से लगभग 60 लाख वोट्स ज्यादा मिले थे, और इतने ही वोट्स ऑलरेडी वोटर लिस्ट से डिलीट किए जा चुके हैं. मतलब कोइन्सीडेंसस का तो यहां पर बवंडर आ रखा है. इसी कारण से ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि इस मैनिपुलेशन के ज़रिये बीजेपी वेस्ट बंगाल पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रही है, और ये एक अनडिक्लेयर्ड इमरजेंसी है. ये मुद्दा यहां पर सिर्फ वेस्ट बंगाल का नहीं है. इससे पहले दिल्ली और महाराष्ट्र की इलेक्शंस में भी ऐसे ही आरोप लग चुके हैं. मेरी विधानसभा में पिछली बार जब मैं लड़ा था 148000 वोट थे. जब मैं जेल से लौट के आया 106000 वोट बचे थे, 42000 वोट इन्होंने पीछे से कटवा दिए. यानी कि ऑलमोस्ट 30% वोट मेरी विधानसभा के इन्होंने कटवा दिए, 3000 वोट से जीत गए. पिछली बार मैं 30000 वोट से जीता था. अगर एक अनटेस्टेड सॉफ्टवेयर, WhatsApp ऑर्डर्स और एक सीक्रेटिव प्रोसेस के ज़रिये 61 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटे जा सकते हैं, तो कल को ये आपके साथ भी किया जा सकता है. ये हरेक इंडियन सिटीजन का मुद्दा है, जो मानता है कि वोटिंग आपका अधिकार है. ये आपसे डेमोक्रेसी छीनने की कोशिश की जा रही है. लेकिन इस बार अच्छी खबर ये है कि शायद इस वोट चोरी को समय से पहले पकड़ा जा चुका है. अगर आप वेस्ट बंगाल के वोटर हैं, तो मेरी आगे की बात को ध्यान से सुनिए. स्टेप 1, अभी जाकर इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर चेक कीजिए, आपका नाम वोटर लिस्ट में है या नहीं. इसका लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में है. इस वेबसाइट पर चेक कर सकते हैं. इस लिंक पर जब आप क्लिक करेंगे, तो आपको बूथ वाइज लिस्ट मिलेगी, जिसमें आपको अपना नाम सर्च करना होगा. अगर आपका नाम इसमें नहीं है, तो इसका मतलब आपका नाम वोटर लिस्ट से काटा जा चुका है. ऐसे में क्या किया जाए? आपके पास फिर भी मौका है अपना नाम लिस्ट में ऐड कराने का, क्योंकि इलेक्शंस अभी भी थोड़ी दूर हैं. इसके लिए आप इस वाली वेबसाइट पर जाइए, ECINET पोर्टल, और एक अपील सबमिट कीजिए. लेकिन ये भी नहीं, आप एक ऑफलाइन अपील भी सबमिट कर सकते हैं SDM, SDO और DM के ऑफिस में. और फिर कायदे से आपका नाम वापस वोटर लिस्ट में ऐड किया जाना चाहिए, ट्रिब्यूनल हियरिंग के बाद. लेकिन अनफॉर्चूनेट चीज़ ये है दोस्तों कि 27 लाख से ज्यादा डिलीटेड वोटर्स में से अभी तक सिर्फ 2 की ट्रिब्यूनल हियरिंग हुई है, एग्जैक्टली 2 वोटर्स की. और 2 लाख से ज्यादा अपील्स सबमिट करी जा चुकी है. इस चीज को लेकर अब मंडे को यानी 13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में हियरिंग है. और मैं उम्मीद करता हूं कि कोर्ट यहां पर जल्दी से जल्दी सभी लोगों को ट्रिब्यूनल हियरिंग का मौका देगा. सुप्रीम कोर्ट को ये बात समझनी होगी कि यहां पर देश की डेमोक्रेसी का सवाल है. और फाइनली अगर आप वेस्ट बंगाल के वोटर हैं या फिर वेस्ट बंगाल में आपके दोस्त या परिवार के सदस्य रहते हैं, तो इस वीडियो को उनके साथ ज़रूर शेयर कीजिए. अपने फैमिली मेंबर्स और दोस्तों को बताइए कि वो भी अपना नाम चेक करें, क्योंकि ये वोट आपका अधिकार है. और कोई सॉफ्टवेयर, कोई WhatsApp ऑर्डर और कोई तानाशाह आपके इस अधिकार को आपसे छीन नहीं सकता. वेस्ट बंगाल की इलेक्शंस 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को होंगी, लेकिन अगर आप इस वीडियो में यहां तक रुके रहे हैं, तो आपके लिए एक और इवेंट है, जो इसके ठीक बीच में होने जा रहा है. 26 अप्रैल को AI मास्टरक्लास 3.0. ये एक लाइव वर्कशॉप है, जहां मैं पर्सनली लाइव आकर आपको 30 से ज्यादा AI टूल्स सिखाता हूं. AI से बिना कोडिंग सीखे वेबसाइट्स कैसे बनानी है, प्रेजेंटेशंस और रिपोर्ट्स कैसे बनानी है, AI इमेज जेनरेशन, वीडियो जेनरेशन, AI से गाने बनाना, AI से VFX बनाना. ये सब कुछ आपको सिखाया जाता है और इसकी कॉस्ट 2 मूवी टिकट्स से भी कम की है. पिछले सेशंस में जिन लोगों ने इसे अटेंड किया था, उनके रिव्यूज आप स्क्रीन पर देख सकते हो. 82% लोगों ने कहा था कि जितना उन्होंने एक्सपेक्ट किया था, उससे अबव एंड बियॉन्ड उन्होंने सीखा है. ये सबसे फास्टेस्ट और अफोर्डेबल तरीका है अपने आपको AI की फील्ड में अपस्किल करने का. तो जॉइन करने में देरी मत कीजिए. इसका लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन और पिन कमेंट में मिल जाएगा, और या फिर आप यहां क्लिक करके भी जॉइन कर सकते हैं. AI की बदलती दुनिया का हिस्सा बनिए, और अगर ये वीडियो आपको पसंद आया तो बिहार इलेक्शन फ्रॉड वाला भी वीडियो काफी इंटरेस्टिंग लगेगा. क्योंकि काफी सारी चीजें जो मैंने आपको अभी बताई, ये ऑलरेडी बिहार वाले वीडियो में भी समझाई थी. यहां क्लिक करके देख सकते हो. बहुत-बहुत धन्यवाद.

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