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ओह ले भाई || Ohh le Bhai || Yusuf Bhardwaj || Kavi Sammelan

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[0:00]जो मैं एक काम किया था हमने तो एक शब्द छोड़ा था, जिससे सारी टेंशन दूर होती है। मतलब सब जगह होते हैं, सारे हमारे अंदर जीत लगाते रहे दूसरे के साथ में। जिस तरह वहां यूपी वाले जो है ना वह बड़े सबसे है। बारात में जाओगे ना तो लड्डू वाला कहेगा, लड्डू जी, लड्डू में भी जी लगाओगा। गुड़िया ना होगा तो वह कहेगा पूड़ी जी पूड़ी जी, दाल वाला कहेगा दाल जी दाल जी। वह सारे लड्डू जी पूड़ी जी, दाल जी सब आगे एक पानी वाला आ गया, जो ले पानी पानी जी। पानी के तय है, बोला जल्दी जल्दी जल्दी, वो ले जल्दी दे दिया। जल्दी पिया दे वो लस उठ गया। कोरा पानी ले ले। जो हर एक जगह के शब्द हैं। तो मैं एक शब्द चाहता हूं, ले भाई। उससे क्या होता है, कि सारी समस्या समाप्त। जिससे मैं गिलास हाथ में पकड़ रहा हूं, हाथ में छूट गया। छूट गया, बोलो ले भाई। यह तो टूट गया बस वह बात खत्म। हम कहते हैं मैंने बात तो दिमाग में ना ले आऊं, यू ले भाई। या तो मत जी, बस वह ले भाई कह सारी समस्या खत्म, दूर। तो एक ले भाई कह एक चौधरी ने हल जोड़ना था मुंह अंधेरे। वह उठ गया सवेरे सवेरे, उठ के करा करे था धूम्रपान कोका गया उसका ध्यान। चिलम भर ली, कोके पर धर ली, घूंट मारी देखा कि आवाज नहीं आ रही। यू बोल ले भाई। मैं रुक गए सारी बात। वहां चौधरी तो जाके मैंने फुलन खातिर धरती में हाथ एक फुटकल दिया साथ, उसमें एक लीका ना पा गया। चिलम तार के निकल गया बोला ओ ले भाई। यू क्यों हो रहा है। हाथ टूट गया। निकला मैं ठीक गया। बोलो ले भाई। सारा काम टूट गया। जल्दी में काम किया गया। तो चौधरी तो चिलम पर काम करा गया। चिलम भी टूट गई। बोला ओ ले भाई। किस्मत भी टूट गई। फिर बैल ने बोला सरपंच वाला गया खेत, हल्का बना दिया खेत, खाली का बना दिया भेद। राम के निकलते ला गया सिली हवा का धोखा, खेत थोड़ा डरने लगा तो वह भी दे गया धोखा। खेत सारी कुटकी पर उसकी बोगने खाती नहीं आएगी। और खेत समझ गए व ले लिए पुलिस ने खेत। वोट डरने लग गया तो सारे मैं ही निकल गया। बोला ओ ले भाई। सारा काम टूट गया। सारे काम तो हो रहे थे बारी बारी। खेत में तो अटका के करी हार जोड़न की तैयारी, एक बैल को जुआ चला आ गया, दूसरा नहीं आया। बोला कसम तूने भी खाई और रोशनी तुझे भी पर तक ना टोल पाया, यू बोला ओ ले भाई। एक बैल के थे दोनों टूट गए। अब चौधरी के साथ हुई तो हुई सो घर में भी जान। टंटन उठते उठते उसकी भी आत्म मान, गांधीस्थानी खेत ने बास भी धो के, करी हार कादन की तैयारी। आज का ना ना बन भर के ही कोई नहीं है। बिना ना ना थी वह हार कदन बैठ गई। जब करनी पाए तो उसके जाने। वो लाके देखा कौन से बैल कड़ा था। और सारी बात समझ गए वो काम चला गया। बोला ओ ले भाई। जाके जगह बैल छोड़ गया। अपनी तो किसमतो थोड़ी, मेरी भी थोड़ी। वाह वाह। ये रिश्ते बनते रहे इतनी बहुत है, आप सब लोग हंसते रहे इतने। वाह वाह वाह वाह। की रिश्ते बनते रहे इतनी बहुत है, आप सब लोग हंसते रहे इतने। हर कोई हर पल साथ नहीं रह सकता। याद एक दूसरे के बसते रहे। इतना ही बहुत है।

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