[0:00]सोचो अगर मैं तुमसे कहूं कि इस धरती पर एक ऐसी जगह है, जहां आज भी इंसान उसी तरह जी रहे हैं जैसे हजारों साल पहले जीते थे। जहां कोई मोबाइल नहीं, कोई सरकार नहीं, कोई कानून नहीं। और अगर तुम वहां जाने की कोशिश करो तो तुम जिंदा वापस नहीं आओगे। यह कोई फिल्म की कहानी नहीं है। यह हकीकत है। और यह जगह है नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड। यह वही द्वीप है जहां 2018 में एक अमेरिकी नागरिक गया था और उसका शव आज तक नहीं मिला। यह वही जगह है जहां भारतीय सेना का हेलीकॉप्टर तक नहीं उतर सका। और यह वही टापू है जिसके बारे में दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक भी कहते हैं कि हम इसके बारे में लगभग कुछ नहीं जानते। तो आज हम उस रहस्य की परते उधेड़ने वाले हैं जो दशकों से दुनिया को हैरान किए हुए है। और जो बात इस पूरी कहानी को और भी चौंकाने वाला बनाती है वह मैं तुम्हें आगे बताऊंगा। इसलिए वीडियो को अभी बंद मत करना। चलो शुरू से शुरू करते हैं। बंगाल की खाड़ी में अंडमान द्वीप समूह के पास एक छोटा सा द्वीप है, नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड। देखने में यह बिल्कुल वैसा ही दिखता है जैसे कोई खूबसूरत ट्रॉपिकल आइलैंड हो। हरे-भरे जंगल, नीला समुद्र, सफेद रेत। लेकिन इस खूबसूरती के पीछे एक ऐसी दुनिया छुपी है जिसे देखकर दुनिया के सबसे बहादुर लोग भी पीछे हट जाते हैं। इस द्वीप पर रहने वाली जनजाति का नाम है सेंटिनली। और इन लोगों ने पिछले 60,000 सालों से बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं रखा। 60,000 साल। जरा सोचो जब दुनिया में मोहनजोदड़ों की सभ्यता भी नहीं थी जब पिरामिड बने भी नहीं थे जब इंसान ने लिखना भी नहीं सीखा था। उस वक्त से यह लोग इस द्वीप पर रह रहे हैं और आज भी उसी तरह जी रहे हैं। अब तुम सोच रहे होगे कि आखिर ये लोग हैं कौन? कहां से आए और क्यों यह किसी से नहीं मिलना चाहते? तो इसका जवाब छुपा है इतिहास की उन परतों में जो अभी तक पूरी तरह खुली नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सेंटिनली जनजाति उन पहले इंसानों के वंशज हैं जो अफ्रीका से निकलकर एशिया की तरफ आए थे। यह माइग्रेशन लगभग 60,000 से 70,000 साल पहले हुई थी। यानी यह लोग उस समय के इंसानों की सबसे पुरानी जीवित कड़ी हैं जो आज भी धरती पर मौजूद हैं। और सबसे हैरान करने वाली बात क्या है? यह है कि इतने हजारों सालों में जब पूरी दुनिया बदलती रही सभ्यताएं बनती और मिटती रही इंसान ने चांद तक का सफर किया। इन लोगों की दुनिया जरा भी नहीं बदली। वो आज भी पत्थर के औजार इस्तेमाल करते हैं। वो आज भी तीर-कमान से शिकार करते हैं। वो आज भी उसी जंगल में रहते हैं जैसे उनके पूर्वज रहते थे। क्या तुम जानते हो कि इस द्वीप का कुल क्षेत्रफल कितना है? सिर्फ 72 वर्ग किलोमीटर। यानी दिल्ली के एक बड़े इलाके जितना। और इस छोटी सी जगह पर कितने लोग रहते हैं? यह भी कोई नहीं जानता। अनुमान है कि 15 से लेकर 500 तक लोग हो सकते हैं। इतना बड़ा अंतर इसलिए है क्योंकि आज तक कोई वहां जाकर गिन नहीं सका। और यहीं से शुरू होती है इस द्वीप की असली कहानी। भारत सरकार ने इस द्वीप के चारों तरफ 5 समुद्री मील यानी करीब 9 किलोमीटर का एक रिस्ट्रिक्टेड ज़ोन बना रखा है। इसका मतलब है कि कोई भी इंसान चाहे वह भारतीय हो या विदेशी इस दायरे में नहीं जा सकता। अगर गया तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है। लेकिन सच तो यह है कि कानून से पहले खुद सेंटिनली जनजाति ही किसी को अपने पास भटकने नहीं देती। इस द्वीप के आसपास जो भी जहाज या नाव गई है उसका स्वागत तीरों की बौछार से हुआ है। ये लोग किसी को नहीं छोड़ते। ना मछुआरे को, ना सैनिक को, ना पत्रकार को और ना ही मिशनरी को। और यही बात इस द्वीप को दुनिया की सबसे खतरनाक और सबसे रहस्यमई जगहों में से एक बनाती है। अब बात करते हैं उन घटनाओं की जिन्होंने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। साल था 1981। एक मालवाहक जहाज जिसका नाम था प्रिमरोज। वह बंगाल की खाड़ी में एक तूफान में फंस गया और बहते-बहते नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड के पास की चट्टानों से जा टकराया। जहाज के चालक दल के लोग किसी तरह जहाज पर ही रहे और उन्होंने रेडियो से मदद मांगी। लेकिन उस रात उन्होंने जो देखा वो उन्हें जिंदगी भर नहीं भूला। किनारे पर सेंटिनली लोग इकट्ठा होने लगे। उनके हाथों में तीर और भाले थे। वह जहाज की तरफ देख रहे थे। चालक दल ने देखा कि वह लोग कुछ बना रहे हैं नावें, छोटी-छोटी नावें ताकि वह जहाज तक पहुंच सके। उस रात चालक दल के लोग जहाज पर ही कांपते रहे। सुबह होते-होते एक हेलीकॉप्टर आया और उन्हें रेस्क्यू किया गया। अगर वह हेलीकॉप्टर थोड़ी देर और ना आता तो शायद उस चालक दल की कहानी बहुत अलग होती। जहाज आज भी वहां पड़ा हुआ है। गूगल अर्थ पर तुम उसे देख सकते हो। नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड के पास एक जंग खाया हुआ जहाज जो इस द्वीप के खतरे की एक खामोश गवाही देता है। रुको यहां एक सेकंड अगर यह वीडियो तुम्हें अब तक इंटरेस्टिंग लग रही है तो नीचे लाइक का बटन दबा दो और चैनल को सब्सक्राइब कर लो। क्योंकि आगे जो बताने वाला हूं वह इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा है। अब बात करते हैं 2004 की। वो साल जब हिंद महासागर में एक ऐसी सुनामी आई जिसने 14 देशों को तबाह कर दिया। 2 लाख 30,000 से ज्यादा लोग मारे गए। पूरे के पूरे शहर बह गए। अंडमान द्वीप समूह भी इस सुनामी से बुरी तरह प्रभावित हुआ। लेकिन नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड का क्या हुआ? जब सुनामी के बाद भारतीय सेना का एक हेलीकॉप्टर इस द्वीप के ऊपर से उड़ा। यह देखने के लिए कि वहां के लोग ठीक है या नहीं तो जो दिखा वो सबको हैरान कर गया। सेंटिनली लोग ना सिर्फ जिंदा थे बल्कि उन्होंने हेलीकॉप्टर पर तीर चलाए। मतलब वह पूरी तरह ठीक थे। उन्हें किसी मदद की जरूरत नहीं थी। यह सोचने वाली बात है। जिस सुनामी ने आधुनिक तकनीक से लैस शहरों को पल भर में मिटा दिया। उस सुनामी से यह लोग बिना किसी टेक्नोलॉजी के बच गए। कैसे? वैज्ञानिकों का कहना है कि इन लोगों के पास हजारों साल का वो ज्ञान है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है।
[6:41]समुद्र की आवाज, हवा का रुख, पक्षियों का व्यवहार, जानवरों की हलचल। यह सब मिलकर उन्हें एक नेचुरल वार्निंग सिस्टम देते हैं। जब सुनामी आने वाली थी इन सब संकेतों ने उन्हें पहले ही सतर्क कर दिया होगा। और वह ऊंची जमीन पर चले गए होंगे। यह उनका वह ज्ञान है जो किसी किताब में नहीं लिखा। किसी यूनिवर्सिटी में नहीं पढ़ाया जाता। यह तो बस उनके खून में है। साल 2006 यह वो साल है जिसने नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड को एक बार फिर दुनिया के अखबारों की सुर्खियों में ला दिया। और इस बार जो हुआ वो सुनकर तुम कुछ देर के लिए चुप हो जाओगे। दो मछुआरे सुरेश और पंडित तिवारी अंडमान के पास मछली पकड़ रहे थे। रात हो गई और वो थके हुए थे। उन्होंने सोचा कि नाव को लंगर डालकर थोड़ा आराम कर लेते हैं। लेकिन नींद में उन्हें पता नहीं चला कि समुद्री धारा उनकी नाव को बहाकर कहां ले जा रही है। जब सुबह उनकी आंख खुली तो वह नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड के बहुत करीब पहुंच चुके थे। और फिर जो हुआ वो उनके साथ आई मौत थी।
[7:54]सेंटिनली लोगों ने उन्हें देखा और देखते ही हमला कर दिया। दोनों मछुआरे मारे गए। उनके शव किनारे पर पड़े थे। जब भारतीय तटरक्षक बल का हेलीकॉप्टर उनके शव लेने के लिए वहां पहुंचा तो आदिवासियों ने हेलीकॉप्टर पर भी तीर चलाए। हेलीकॉप्टर को वापस लौटना पड़ा। वो शव आज तक वापस नहीं लाए जा सके। अब जरा सोचो। ये दोनों मछुआरे जानबूझकर नहीं गए थे। वो तो बस एक गलती से वहां पहुंच गए थे। लेकिन सेंटिनली जनजाति के लिए इरादा मायने नहीं रखता। उनके लिए बाहरी इंसान का मतलब सिर्फ एक है खतरा। और खतरे का जवाब वह एक ही तरीके से देते हैं। लेकिन यहां एक सवाल उठता है। क्यों? आखिर क्यों यह लोग इतने अग्रेसिव हैं? क्यों वह किसी से भी नहीं मिलना चाहते? क्या वह हमेशा से ऐसे थे? इसका जवाब जानने के लिए हमें इतिहास में थोड़ा पीछे जाना होगा। और जो सच सामने आएगा वह शायद तुम्हें इन लोगों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दे। साल 1880 अंग्रेज अफसर मॉरिस वाइडल पोर्टमैन अंडमान में तैनात था। वह इन आदिवासी जनजातियों के बारे में जानकारी इकट्ठा करना चाहता था। उसने नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड पर जाने का फैसला किया। एक बड़ी टीम लेकर वह द्वीप पर उतरा जंगल में घुसा और वहां उसे कुछ लोग मिले। एक बुजुर्ग जोड़ा और चार बच्चे। पोर्टमैन ने उन्हें पकड़ लिया और पोर्ट ब्लेयर ले आया। यह लोग बाहरी दुनिया में आकर बीमार पड़ गए। उनके शरीर में बाहरी दुनिया की बीमारियों से लड़ने की कोई इम्यूनिटी नहीं थी। बुजुर्ग जोड़े की मौत हो गई। बच्चों को कुछ तोहफे देकर वापस द्वीप पर छोड़ दिया गया। अब सोचो। उन बच्चों ने अपने घर वापस जाकर अपने लोगों को क्या बताया होगा कि बाहर से आने वाले लोग हमें उठा ले गए। हमारे बड़े मर गए और हमें वापस फेंक दिया गया। यह एक ऐसा जख्म था जो पीढ़ियों तक नहीं भरा। और शायद यही वो पल था जब सेंटिनली जनजाति ने यह तय कर लिया कि बाहरी दुनिया से कोई वास्ता नहीं रखना। और इसके बाद भी अंग्रेजों ने कई बार इस द्वीप पर जाने की कोशिश की। हर बार उन्हें तीरों से वापस भेजा गया। धीरे-धीरे यह बात साफ हो गई कि यह लोग कांटेक्ट नहीं चाहते। लेकिन इंसान की जिज्ञासा कभी खत्म नहीं होती ना। 1970 और 1980 के दशक में भारत सरकार ने कुछ कांटेक्ट एक्सपेडिशंस भेजी। इन एक्सपेडिशंस में एंथ्रोपोलॉजिस्ट टीएन पंडित शामिल थे। उन्होंने एक बेहद इंटरेस्टिंग अप्रोच अपनाई। वह नाव लेकर द्वीप के पास जाते और किनारे पर नारियल, केले और कुछ लोहे के औजार रख देते। फिर धीरे-धीरे पीछे हट जाते। पहले कुछ बार सेंटिनली लोगों ने कोई रिस्पांस नहीं दिया। फिर धीरे-धीरे वह किनारे पर आने लगे। तोहफे उठाने लगे। एक बार तो एक सेंटिनली व्यक्ति नाव के इतने करीब आया कि टीएन पंडित उसे छू सकते थे। यह एक ऐतिहासिक पल था। ऐसा लग रहा था जैसे 60,000 साल की दीवार थोड़ी सी हिल रही हो। लेकिन यह शांति ज्यादा देर नहीं टिकी। 1991 में एक कांटेक्ट एक्सपेडिशन के दौरान कुछ सेंटिनली लोग नाव के पास आए और नारियल लिए। यह सबसे सक्सेसफुल पीसफुल कांटेक्ट था। टीएन पंडित ने बाद में कहा कि उस पल में उन्हें लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया से मिल रहे हों। लेकिन इसके बाद भारत सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि अब इस जनजाति से कांटेक्ट बंद किया जाएगा। क्यों? क्योंकि यह साफ हो चुका था कि कांटेक्ट करने से इन लोगों को फायदा कम और नुकसान ज्यादा है। बाहरी दुनिया की बीमारियां, बाहरी दुनिया की कल्चर यह सब उनके अस्तित्व के लिए खतरा हैं। इसीलिए आज यह द्वीप ऑफिशियली एक प्रोटेक्टेड ज़ोन है। क्या आप जानते हैं कि इस जनजाति की भाषा दुनिया की किसी भी ज्ञात भाषा से बिल्कुल अलग है? लिंग्विस्ट्स ने जब भी इनकी आवाजें रिकॉर्ड की है तो वह किसी भी नोन लैंग्वेज फैमिली से मैच नहीं होती। इसका मतलब है कि यह भाषा 60,000 साल से अलग इवॉल्व होती रही है। दुनिया में जितनी भी भाषाएं बदली, बनी, मिटी इस भाषा पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। यह सोचकर ही दिमाग चकरा जाता है। एक ऐसी भाषा जो आज दुनिया में कोई नहीं समझता। एक ऐसा ज्ञान जो सिर्फ उन 15 से 500 लोगों के पास है। और अगर किसी दिन यह जनजाति खत्म हो गई तो वह भाषा, वो ज्ञान वो हजारों साल की मेमोरी हमेशा के लिए खो जाएगी। अब बात करते हैं उस घटना की जिसने 2018 में पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। जॉन एलन चाऊ। 26 साल का एक अमेरिकी एक क्रिश्चियन मिशनरी। इस नौजवान के मन में एक जुनून था। नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड पर जाना और वहां के लोगों को क्रिश्चियनिटी का संदेश देना। उसे पता था कि यह इलीगल है। उसे पता था कि यह खतरनाक है। लेकिन उसने फिर भी जाने का फैसला किया। नवंबर 2018 जॉन ने कुछ स्थानीय मछुआरों को पैसे देकर उन्हें द्वीप के पास तक ले जाने के लिए राजी किया। पहले दिन वो एक कयाक में बैठकर किनारे की तरफ बढ़ा। सेंटिनली लोगों ने उसे देखा। एक बच्चे ने उस पर तीर चलाया जो उसकी बाइबल में जाकर लगा। जॉन वापस लौट आया। लेकिन वो रुका नहीं। अगले दिन वह फिर गया। इस बार उसने चिल्लाकर कहा, मेरा नाम जॉन है। मैं तुमसे प्यार करता हूं और यीशु तुमसे प्यार करते हैं। सेंटिनली लोगों का जवाब था तीरों की बारिश। फिर भी वह नहीं माना। तीसरे दिन जॉन फिर उस द्वीप की तरफ गया। मछुआरे दूर रहे। और फिर जो हुआ वो किसी ने नहीं देखा। बस अगली सुबह मछुआरों ने दूर से देखा कि सेंटिनली लोग एक शव को रेत में दफना रहे हैं। जॉन एलन चाऊ अब वापस नहीं आएगा। उसकी डायरी मछुआरों के पास थी जो उसने जाने से पहले उन्हें दे दी थी। उस डायरी में आखिरी कुछ लाइनें थी जो उसने द्वीप पर जाने से पहले लिखी थी। उसने लिखा था, भगवान क्या यह द्वीप शैतान का आखिरी गढ़ है? मुझे डर लग रहा है, लेकिन तू मेरे साथ है। वो डर सही था। उसके बाद भारत सरकार और अमेरिकी सरकार दोनों ने उसके शव को वापस लाने के लिए बहुत कोशिश की। लेकिन हर बार यही जवाब मिला। तीर और भाले। आज तक जॉन एलन चाऊ का शव उस द्वीप की मिट्टी में दफन है। इस घटना के बाद दुनिया भर में डिबेट छिड़ गई। कुछ लोगों ने कहा कि जॉन एक ब्रेव आदमी था। कुछ ने कहा कि वह एक मूर्ख था जिसने एक प्रोटेक्टेड जनजाति की जिंदगी को खतरे में डाला। क्योंकि सोचो अगर जॉन के साथ कोई बीमारी उस द्वीप पर पहुंच जाती तो एक सिंपल फ्लू भी उस पूरी जनजाति को खत्म कर सकती थी। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। जब 1800 के दशक में अंडमान की दूसरी जनजातियों का बाहरी दुनिया से कांटेक्ट हुआ तो बीमारियों ने उन्हें तबाह कर दिया। ग्रेट अंडमान इस जनजाति में कभी हजारों लोग थे। आज उनकी संख्या सिर्फ 50 से 60 के बीच है। ओंगे जनजाति भी लगभग खत्म होने की कगार पर है। तो सेंटिनली जनजाति को बाहरी दुनिया से जो खतरा है वह सिर्फ कल्चरल नहीं है। वह बायोलॉजिकल भी है। उनके शरीर में हमारी दुनिया की किसी भी आम बीमारी से लड़ने की इम्यूनिटी नहीं है। एक सर्दी-जुकाम भी उनके लिए जानलेवा हो सकता है। यही वजह है कि भारत सरकार ने उन्हें इस तरह प्रोटेक्ट किया हुआ है। और यही वजह है कि वह खुद भी किसी को अपने पास नहीं आने देते। भले ही उन्हें यह साइंटिफिकली पता ना हो लेकिन हजारों साल के अनुभव ने उन्हें यह सिखा दिया है कि बाहरी लोग मौत लेकर आते हैं। अब तक इस वीडियो में तुमने जाना कि यह जनजाति कौन है। वह क्यों इतनी अग्रेसिव है। और क्या-क्या घटनाएं इस द्वीप के इर्द-गिर्द हुई हैं। लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी है। वो सवाल जो इस पूरी कहानी को और भी गहरा बनाता है। वह रहस्य जो आज तक सुलझा नहीं है। अगर तुम अभी तक यह वीडियो देख रहे हो तो एक काम करो चैनल को सब्सक्राइब कर लो और यह वीडियो लाइक करो। क्योंकि आगे जो बताने वाला हूं वह शायद तुमने पहले कभी नहीं सुना होगा। यह रहस्य है इस द्वीप के उस हिस्से का जो आज तक किसी इंसान ने नहीं देखा। सोचो 72 वर्ग किलोमीटर का एक पूरा द्वीप, घना जंगल और उसके अंदर क्या है? कोई नहीं जानता। सेटेलाइट इमेजेस से सिर्फ जंगल दिखता है। लेकिन उस जंगल में कहां रहते हैं यह लोग? कैसे रहते हैं? क्या खाते हैं? क्या उनके पास कोई रिचुअल है, कोई रिलिजन है, कोई हायरार्की है? 2004 की सुनामी के बाद जब सेटेलाइट इमेजेस ली गई तो एक चौंकाने वाली चीज दिखी। द्वीप के जंगल में कुछ रास्ते नजर आए जैसे पाथ्स बने हुए हों। इसका मतलब है कि यह लोग ऑर्गेनाइज हैं। उनका कोई स्ट्रक्चर है। लेकिन वो स्ट्रक्चर क्या है? यह आज भी एक अनसुलझी पहेली है। और यहीं पर यह कहानी एक नए मोड़ पर आ जाती है जो इस सबको और भी हैरान करने वाला बना देती है। वह बात जो मैं तुम्हें अभी बताने वाला हूं। वह बात यह है कि नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड सिर्फ एक द्वीप नहीं है। यह एक सवाल है। एक ऐसा सवाल जो इंसानी सभ्यता से पूछता है कि क्या तुमने सच में तरक्की की है? या सिर्फ यह सोचा है कि की है? जरा सोचो हम अंतरिक्ष में जा चुके हैं। हमने मार्स पर रोवर भेजा है। हम डीएनए की संरचना समझ चुके हैं, लेकिन अपनी ही धरती पर एक ऐसा द्वीप है जहां क्या हो रहा है यह हम आज तक नहीं जान सके। एक ऐसी जनजाति है जिसकी भाषा हम नहीं समझते, जिनकी संख्या हम नहीं जानते, जिनकी कल्चर हम नहीं जानते। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमें जानना चाहिए? दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक वह जो कहते हैं कि इन्हें बाहरी दुनिया से मिलाओ इन्हें एजुकेशन दो, मेडिसिन दो, आधुनिक जिंदगी दो। और दूसरे वह जो कहते हैं कि इन्हें अकेला छोड़ दो।
[18:35]यह खुश हैं, यह स्वस्थ हैं, यह आजाद हैं। इनकी आजादी में दखल देने का हमें कोई हक नहीं। और दूसरे वाले लोगों की बात में दम है। क्योंकि जब भी किसी आइसोलेटेड जनजाति का बाहरी दुनिया से कांटेक्ट हुआ है नतीजा तबाही रहा है। अमेज़न के जंगलों में जो जनजातियां थी उनमें से कई आज नामो-निशान नहीं हैं। नॉर्थ अमेरिका के नेटिव लोगों के साथ क्या हुआ यह इतिहास जानता है। अंडमान की ग्रेट अंडमान इस जनजाति हजारों से घटकर मुट्ठी भर रह गई। तो क्या सेंटिनली जनजाति ने सही किया कि उन्होंने खुद को दुनिया से अलग कर लिया? शायद हां, क्योंकि आज वो जिंदा हैं। आज वह अपनी जमीन पर है। आज उनकी भाषा जिंदा है। आज उनकी कल्चर जिंदा है।
[19:21]और यह सब इसलिए है क्योंकि उन्होंने अपने तीर और भाले उठाए और कहा यहां तक मत आओ। उनके वो तीर सिर्फ हथियार नहीं है। वो एक मैसेज है। एक ऐसा मैसेज जो 60,000 साल पुरानी एक सभ्यता अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए दे रही है। अब एक और बात जो तुम्हें जाननी चाहिए। वह यह है कि नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड के आसपास का समुद्र भी कम रहस्यमई नहीं है। इस इलाके में अजीब करेंटस है। छुपी हुई चट्टानें हैं जो किसी भी नाव को पलट सकती हैं। जैसे खुद प्रकृति ने इस द्वीप की रक्षा के लिए एक नेचुरल फोर्ट्रेस बना रखी हो। जैसे यह द्वीप खुद नहीं चाहता कि कोई उसके पास आए। प्रिमरोज जहाज जो 1981 में वहां फंसा था वह आज भी उन्हीं चट्टानों पर पड़ा है। जंग खाया हुआ, टूटा हुआ जैसे एक वार्निंग हो। एक साइलेंट वार्निंग। कि जो यहां आया वो यहीं रह गया। और इन सबके बीच वो सेंटिनली लोग अपने जंगल में जी रहे हैं। शिकार कर रहे हैं। अपने बच्चों को वह ज्ञान दे रहे हैं जो 60,000 साल पुराना है। रात को समुद्र की आवाज सुन रहे हैं। और शायद बस शायद वह हमसे ज्यादा खुश हैं। क्योंकि उनके पास कोई टेंशन नहीं है कि कल क्या होगा। उनके पास कोई सोशल मीडिया नहीं है जो उन्हें बताए कि वह कम है। उनके पास कोई रैट रेस नहीं है। उनके पास सिर्फ उनका जंगल है। उनका समुद्र है। उनका आसमान है। और यही सोच मुझे सबसे ज्यादा हैरान करती है। हम 60,000 साल में चांद तक पहुंचे और वो 60,000 साल में अपनी जमीन पर टिके रहे। हम तरक्की को मापते हैं टेक्नोलॉजी से। वो तरक्की को मापते हैं सर्वाइवल से। और इस पैमाने पर देखो तो वह हमसे बहुत आगे हैं। अब आखिरी बात। यह द्वीप, यह जनजाति, यह रहस्य यह सब मिलकर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। वह सवाल यह है कि इंसान होने का मतलब क्या है? क्या आधुनिक होना जरूरी है? क्या कनेक्टेड होना जरूरी है? या बस जिंदा रहना। अपनी जड़ों से जुड़े रहना यही काफी है। नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड इस सवाल का जवाब नहीं देता। वो बस यह याद दिलाता है कि यह सवाल मौजूद है। और जब तक यह द्वीप है, जब तक वह तीर चलते रहेंगे, जब तक वह जंगल घना रहेगा यह सवाल जिंदा रहेगा। तो अगर तुम भी इस रहस्य में खो गए हो अगर तुम्हारे मन में भी यह सवाल घूम रहे हैं तो इस वीडियो को लाइक करो और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करो। क्योंकि हम जल्द ही एक ऐसी मिस्ट्री लेकर आने वाले हैं जो इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली है। एक ऐसी जगह जो नक्शे पर तो है लेकिन जहां जाने की हिम्मत आज तक किसी में नहीं हुई। वह वीडियो तुम्हें जरूर देखना चाहिए। इसलिए चैनल को अभी सब्सक्राइब करके रखो ताकि वह वीडियो आते ही तुम तक पहुंचे। नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड एक रहस्य था। एक रहस्य है। और शायद हमेशा रहस्य ही रहेगा। और कुछ रहस्यों को रहस्य ही रहने देना चाहिए।



