[0:00]तुम अभी जो चार्ट देखते हो उसमें सच दिखता है या सिर्फ तुम्हारा भरोसा? मैं तुम्हें एक अजीब एक्सपेरिमेंट करने के लिए कहूंगा। अभी अपने दिमाग में सोचो अगर तुम्हारे सारे इंडिकेटर्स एक सेकंड में गायब हो जाएं तो क्या तुम फिर भी ट्रेड कर पाओगे या तुम पूरी तरह ब्लैंक हो जाओगे? यही वो जगह है जहां असली गेम शुरू होता है। क्योंकि ज्यादातर लोग ट्रेडिंग नहीं कर रहे होते। वो बस इंडिकेटर्स को फॉलो कर रहे होते हैं और उन्हें लगता है कि वो मार्केट को समझ रहे हैं जबकि सच में वो सिर्फ सिग्नल्स के गुलाम बन चुके होते हैं। मैंने भी यही गलती की थी। मैंने अपने चार्ट को इतना भर दिया था कि प्राइस खुद छिप गया था और मुझे लगता था कि मैं स्मार्ट हूं, एडवांस्ड हूं लेकिन असल में मैं सबसे बड़ी गलती कर रहा था। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरा पूरा नजरिया बदल दिया और उसी दिन मुझे समझ आया कि मार्केट को जीतने के लिए तुम्हें इंडिकेटर नहीं खुद को बदलना पड़ता है। आज मैं तुम्हें वही दिखाने वाला हूं जो ज्यादातर लोग कभी समझ ही नहीं पाते। मैं तुम्हें सीधा एक सच बताता हूं। अगर तुम्हारा भरोसा इंडिकेटर्स पर है तो तुम अभी भी मार्केट को समझ ही नहीं पाए हो। जब मैंने शुरुआत की थी, मैं भी बिल्कुल तुम्हारी तरह था। मुझे लगता था कि ट्रेडिंग एक टेक्निकल गेम है जहां सही टूल मिल गया तो पैसा अपने आप आने लगेगा। मैं हर दिन नया इंडिकेटर ढूंढता था, नई सेटिंग्स ट्राई करता था और हर बार खुद से कहता था बस यही है अब मैं मार्केट समझ गया हूं। लेकिन हर बार वही होता था कुछ ट्रेड्स जीतता, फिर अचानक सब वापस चला जाता और फिर मैं सोचता शायद इंडिकेटर गलत है, शायद मुझे दूसरा चाहिए। यहीं पर मैंने सबसे बड़ी गलती की। मैंने कभी खुद से सवाल ही नहीं किया कि समस्या इंडिकेटर में है या मेरे सोचने के तरीके में। मैंने अपने चार्ट को इतना जटिल बना दिया था कि वो एक क्लटर बन चुका था। आर एसआई कुछ और बोल रहा था एमएसीडी कुछ और और मूविंग एवरेज कुछ और और मैं हर सिग्नल के पीछे भाग रहा था। सच कहूं तो मैं ट्रेडिंग नहीं कर रहा था, मैं बस रिएक्ट कर रहा था। तुम समझ रहे हो इसका मतलब? जब तुम इंडिकेटर के सिग्नल पर ट्रेड करते हो तुम खुद कोई डिसीजन नहीं ले रहे होते। तुम बस एक टूल के पीछे चल रहे होते हो जो खुद पास्ट डेटा पर बना है। यानी तुम हमेशा मार्केट से एक कदम पीछे हो। और मार्केट वो कभी किसी का इंतजार नहीं करता। मैंने धीरे-धीरे नोटिस करना शुरू किया कि जब भी मैं इंडिकेटर के सिग्नल पर एंटर करता था तब तक मूव पहले ही हो चुका होता था और जब तक मैं समझता मार्केट उल्टा घूम जाता था। इसका मतलब साफ था। मैं लेट था हमेशा लेट, लेकिन उस समय मैं इसे एक्सेप्ट नहीं कर पा रहा था क्योंकि मेरा दिमाग यह मानने को तैयार ही नहीं था की शायद मैं गलत हूं। मैं खुद को यह समझाता था कि थोड़ा और सीखना है, थोड़ा और एडवांस इंडिकेटर चाहिए। लेकिन सच यह था कि मैं एक ही जगह पर घूम रहा था। फिर एक दिन मैंने अपने पुराने ट्रेड्स को बैठकर देखा एक-एक करके बिना किसी ईगो के और जो मैंने देखा उसने मुझे हिला दिया। मैंने पाया कि मेरे लॉसेस का कारण मार्केट नहीं था बल्कि मेरा बिहेवियर था। मैं जल्दी एंटर करता था, जल्दी एग्जिट करता था और हर बार डर और ग्रीड के बीच फंसा रहता था। और सबसे बड़ी बात इंडिकेटर ने मुझे कभी यह नहीं बताया कि मैं क्यों डर रहा या क्यों लालची हो रहा हूं। तभी मुझे पहली बार यह एहसास हुआ कि शायद मैं गलत जगह पर फोकस कर रहा हूं। मैं मार्केट को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा था जबकि मुझे खुद को कंट्रोल करना चाहिए था और यहीं से एक बहुत बड़ा सवाल मेरे दिमाग में आया। इंडिकेटर्स अगर इंडिकेटर्स मुझे सिर्फ कंफ्यूज कर रहे हैं तो क्या होगा? अगर मैं इन्हें पूरी तरह हटा दूं और सिर्फ प्राइस को समझने की कोशिश करूं? मैंने सच में वह किया जिससे ज्यादातर लोग डरते हैं। मैंने अपने चार्ट से सब कुछ हटा दिया, कोई आर एसआई नहीं, कोई एमएसीडी नहीं, कोई मूविंग एवरेज नहीं। सिर्फ खाली स्क्रीन और उस पर चलता हुआ प्राइस। पहले कुछ मिनट अजीब लगे। ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरा सहारा छीन लिया हो क्योंकि अब मेरे पास कोई सिग्नल नहीं था, कोई कंफर्मेशन नहीं था, कोई बहाना नहीं था। अगर मुझे एंटर करना था तो वो मेरा डिसीजन होता और अगर गलत होता तो उसकी जिम्मेदारी भी मेरी होती। यही वो मोमेंट था जहां असली सीख शुरू हुई। मैंने पहली बार प्राइस को बिना किसी फिल्टर के देखना शुरू किया। पहले मैं कैंडल को नहीं देखता था, मैं सिर्फ इंडिकेटर की लाइन देखता था लेकिन अब कैंडल मेरे लिए एक मैसेज बन गई। मैंने खुद से पूछा ये कैंडल यहां क्यों बनी है? इससे पहले क्या हुआ था? इसके बाद क्या हो सकता है? धीरे-धीरे मुझे एक पैटर्न दिखने लगा लेकिन ये वो पैटर्न नहीं था जो किसी इंडिकेटर में दिखता है। ये ह्यूमन बिहेवियर का पैटर्न था। जब मार्केट तेजी से ऊपर जाता है तो सिर्फ चार्ट नहीं बढ़ रहा होता है। वहां लोगों का कॉन्फिडेंस बढ़ रहा होता है, उनकी ग्रीड एक्टिव हो रही होती है। और जब मार्केट अचानक गिरता है तो सिर्फ प्राइस नहीं गिर रहा होता है। वहां डर फैल रहा होता है। लोग पैनिक में सेल कर रहे होते हैं। तुम्हें यह समझना होगा कि मार्केट एक नंबर गेम नहीं है। ये एक साइकोलॉजिकल गेम है और सबसे इंटरेस्टिंग बात ये है कि ये साइकोलॉजी हर कैंडल में दिखाई देती है। अगर तुम उसे देखना सीख जाओ मैंने नोटिस किया जब मार्केट एक लेवल पर बार-बार रुकता है तो वहां कुछ हो रहा है। वहां खरीददार और विक्रेटा के बीच एक लड़ाई चल रही है और जब ये लड़ाई खत्म होती है तभी बड़ा मूव आता है। यह चीज किसी इंडिकेटर में साफ नहीं दिखती लेकिन प्राइस में बहुत क्लियर दिखती है। अब मैं ट्रेड लेने से पहले खुद से पूछता था यहां लोग क्या कर रहे हैं? क्या वे कंफ्यूज्ड हैं? क्या यहां डर ज्यादा है या लालच? और जब तुम यह समझने लगते हो तो तुम्हारा नजरिया बदल जाता है। अब तुम सिग्नल का इंतजार नहीं करते, तुम बिहेवियर को पढ़ते हो। लेकिन यहां एक और सच्चाई है ये आसान नहीं है क्योंकि अब तुम्हारे पास कोई एक्सक्यूज नहीं बचता। अगर तुम गलत हो तो वो तुम्हारी गलती है। सही हो तो वो भी तुम्हारा डिसीजन है और यही चीज ज्यादातर लोगों को रोकती है, जिम्मेदारी लेने का डर। मैंने भी ये डर महसूस किया था। कई बार मैं सही सेटअप देखकर भी एंटर नहीं करता था क्योंकि मुझे कंफर्मेशन चाहिए होता था। लेकिन धीरे-धीरे मैंने खुद पर भरोसा करना सीखा। मैंने समझा कि मार्केट में सर्टेनिटी नहीं मिलती सिर्फ प्रोबेबिलिटी मिलती है। और जब तुम प्रोबेबिलिटी को एक्सेप्ट कर लेते हो तो तुम्हारा डर कम हो जाता है। अब मैं हर ट्रेड को एक चांस की तरह देखने लगा ना कि एक गारंटी की तरह और यहीं से मेरी सोच बदलने लगी। लेकिन यहां एक सवाल आता है जो शायद तुम्हारे दिमाग में भी अभी चल रहा होगा। अगर मार्केट सिर्फ प्रोबेबिलिटी पर चलता है और कोई भी चीज 100% कंफर्म नहीं है तो फिर आखिर वो क्या चीज है जो एक ट्रेडर को लंबे समय तक कंसिस्टेंट बनाती है? यहीं से वो चीज शुरू होती है जिसे ज्यादातर लोग समझते तो है लेकिन अपनाते नहीं है। माइंडसेट। मैंने बहुत देर से ये समझा कि मार्केट में प्रॉफिट कमाने का असली गेम चार्ट पर नहीं दिमाग के अंदर खेला जाता है और जब तक तुम्हारा माइंडसेट क्लियर नहीं होता। तब तक दुनिया का कोई भी इंडिकेटर, कोई भी स्ट्रेटेजी तुम्हें कंसिस्टेंट नहीं बना सकती। मैं पहले हर ट्रेड को एक जजमेंट की तरह लेता था। अगर ट्रेड जीत गया तो मुझे लगता था मैं सही हूं। अगर हार गया तो मुझे लगता था मैं गलत हूं और यही सोच मुझे हर बार इमोशनल बना देती थी। तुमने शायद खुद भी यह फील किया होगा। एक लॉस के बाद गुस्सा आना, जल्द ही रिकवर करने की कोशिश करना, बिना सोचे समझे अगला ट्रेड लेना और फिर दूसरा लॉस। फिर और ज्यादा फ्रस्ट्रेशन। ये एक साइकिल है और ये साइकिल तब तक चलता रहता है जब तक तुम इसे पहचान नहीं लेते। मैंने खुद को ऑब्जर्व करना शुरू किया। मैंने देखा कि मैं मार्केट से ज्यादा अपने इमोशंस के खिलाफ लड़ रहा हूं। डर, ग्रीड, एक्साइटमेंट ये सब मेरे डिसीजन को कंट्रोल कर रहे थे और सबसे बड़ी बात मुझे ये लगता था कि मैं लॉजिक से ट्रेड कर रहा हूं जबकि असल में मैं इमोशन से ट्रेड कर रहा था। तभी मैंने अपने अप्रोच को पूरी तरह से बदल दिया। मैंने खुद से कहा मुझे हर ट्रेड में सही नहीं होना है। मुझे सिर्फ अपने सिस्टम को फॉलो करना है। ये सुनने में सिंपल लगता है लेकिन इसे अपनाना सबसे मुश्किल काम है। क्योंकि हमारा दिमाग सर्टेनिटी चाहता है, वो हर बार जीतना चाहता है लेकिन मार्केट में सर्टेनिटी नहीं होती, सिर्फ अनसर्टेनिटी होती है। और जब तुम इस अनसर्टेनिटी को एक्सेप्ट नहीं करते तो तुम हर ट्रेड में प्रेशर फील करते हो। मैंने धीरे-धीरे ये समझा कि हर ट्रेड एक इंडिपेंडेंट इवेंट है। उसका रिजल्ट पिछले ट्रेड से जुड़ा हुआ नहीं है। लेकिन हमारा दिमाग ऐसा नहीं सोचता। अगर पिछले दो ट्रेड लॉस में गए हैं तो हम तीसरे ट्रेड में डरते हैं। और अगर दो ट्रेड प्रॉफिट में गए हैं तो हम ओवर कॉन्फिडेंट हो जाते हैं। यही वह जगह है जहां ट्रेडर्स गलती करते हैं। मैंने अपने लिए एक रूल बनाया। मैं हर ट्रेड को बिना किसी एक्सपेक्टेशन के लूंगा। ना मैं यह सोचूंगा कि यह जीतने वाला है ना यह हारने वाला है। मैं सिर्फ यह देखूंगा कि क्या यह मेरे सेटअप के अनुसार है या नहीं? अगर है, तो मैं ट्रेड लूंगा। अगर नहीं है, तो मैं इंतजार करूंगा। और सबसे जरूरी मैं रिजल्ट को एक्सेप्ट करूंगा बिना किसी इमोशन के। यह अप्रोच आसान नहीं थी। कई बार मैं अपने रूल्स तोड़ देता था। कई बार मैं इमोशन में आकर गलत डिसीजन ले लेता था। लेकिन फर्क ये था अब मैं अवेयर था। मैं अपनी गलतियों को देख पा रहा था, समझ पा रहा था और धीरे-धीरे मैंने खुद को ट्रेन करना शुरू किया। अब मेरे लिए ट्रेनिंग सिर्फ पैसा कमाने का तरीका नहीं रही। ये एक मेंटल गेम बन गई जहां मुझे खुद को जीतना था। और जैसे-जैसे मैंने खुद पर कंट्रोल पाया वैसे-वैसे मेरे रिजल्ट्स बदलने लगे। अब मैं हर छोटे मूव पर रिएक्ट नहीं करता था, मैं धैर्य रखने लगा था। मैं सही मौके का इंतजार करता था। और यही चीज कंसिस्टेंसी लाती है। लेकिन यहां एक और गहरी बात है जो शायद तुमने अभी तक नहीं सोची होगी। अगर तुम्हें कंसिस्टेंट बनने के लिए अपने इमोशंस को कंट्रोल करना पड़ता है तो आखिर वो कौन सी सोच है? वो कौन सा इंटरनल बदलाव है जो एक ट्रेडर को पूरी तरह से इमोशन से फ्री कर देता है? मैं तुम्हें एक ऐसा दौर बताने जा रहा हूं जहां मुझे लगा था कि शायद ट्रेडिंग मेरे बस की बात ही नहीं है। ये वो समय था जब मैं सब कुछ जानता हुआ भी कुछ नहीं कर पा रहा था। स्ट्रेटेजी समझ आ रही थी, प्राइस एक्शन दिखने लगा था। माइंडसेट की बात भी समझ में आने लगी थी लेकिन रिजल्ट फिर भी कंसिस्टेंट नहीं थे। यही वो जगह है जहां ज्यादातर लोग हार मान लेते हैं क्योंकि बाहर से देखने पर सब ठीक लगता है लेकिन अंदर एक अजीब सा संघर्ष चलता रहता है। मैं चार्ट खोलता था, सेटअप दिखता था लेकिन एंटर करने से पहले ही एक आवाज आती थी। गलत अगर ये गलत हो गया तो और कई बार मैं एंटर ही नहीं करता था। फिर वही सेटअप काम करता था और मैं पछताता था। अगली बार मैं ओवर कॉन्फिडेंस में जल्दी एंटर कर लेता था और इस बार मार्केट उल्टा चला जाता था। ये एक मेंटल ट्रैप है और ये इतना सूक्ष्म होता है कि तुम्हें पता भी नहीं चलता कि तुम इसमें फंस चुके हो। मैंने महसूस किया कि मेरा असली दुश्मन मार्केट नहीं था। मेरा पास्ट एक्सपीरियंस था। हर लॉस, हर गलत ट्रेड मेरे दिमाग में एक निशान छोड़ चुका था और वही निशान मेरे हर नए डिसीजन को प्रभावित कर रहा था। यानी मैं प्रेजेंट में ट्रेड नहीं कर रहा था। मैं अपने पास्ट के डर और उम्मीद के आधार पर ट्रेड कर रहा था। और जब तक यह पैटर्न चलता रहेगा, तुम कभी फ्री होकर ट्रेड नहीं कर सकते। यहीं पर मैंने खुद के साथ सबसे ईमानदार काम किया। मैंने खुद के अंदर झांकना शुरू किया। मैंने खुद से पूछा मुझे डर किस बात का है? क्या मुझे पैसे खोने का डर है या गलत साबित होने का? और जवाब साफ था। मुझे गलत साबित होने का डर था। मैं अपने आप को प्रूव करना चाहता था कि मैं सही हूं और यही चाहत मुझे हर बार इमोशनल बना रही थी। तभी मैंने एक बड़ा डिसीजन लिया। मैंने अपने लिए यह तय किया कि अब मैं ट्रेनिंग को राइट या रॉन्ग के नजरिए से नहीं देखूंगा। मैंने इसे एक गेम की तरह देखना शुरू किया जहां हर ट्रेड सिर्फ एक प्रोबेबिलिटी है। सही हुआ, अच्छा है, गलत हुआ तब भी ठीक है क्योंकि मेरा फोकस अब रिजल्ट पर नहीं, प्रोसेस पर था। मैंने खुद को यह सिखाया कि हर ट्रेड से पहले मैं पूरी तरह न्यूट्रल रहूं। ना कोई एक्साइटमेंट, ना कोई डर। और जब मैंने यह करना शुरू किया तो धीरे-धीरे मेरा माइंड शांत होने लगा। अब मैं ट्रेड लेते समय अपने पास्ट को साथ नहीं लाता था। मैं सिर्फ उस मूवमेंट में रहता था और यहीं से एक अजीब सी फ्रीडम मिली। अब मुझे हर ट्रेड में जीतने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। अब मैं मार्केट से लड़ नहीं रहा था, मैं उसे एक्सेप्ट कर रहा था और जैसे ही तुम मार्केट को एक्सेप्ट करते हो, वैसे ही तुम अपने अंदर के प्रेशर से फ्री हो जाते हो। लेकिन यहां एक और गहरी चीज है। जब तुम अपने डर और एक्सपेक्टेशन से फ्री हो जाते हो, तब भी एक चीज बचती है जो तुम्हारे रिजल्ट को तय करती है और वो है तुम्हारा डिसिप्लिन। अब सवाल यह है अगर तुम्हारा माइंड शांत हो गया, तुम इमोशन से फ्री हो गए तो फिर वो कौन सी आदत, कौन सा सिस्टम है जो तुम्हें लंबे समय तक कंसिस्टेंट प्रॉफिट की तरफ ले जाता है? अब मैं तुम्हें उस आखिरी चीज के बारे में बताने जा रहा हूं जो सारी बातें जोड़ती है और वही चीज है जो एक ट्रेडर को कंसिस्टेंट बनाती है, डिसिप्लिन। मैंने बहुत समय तक सोचा कि मुझे और नॉलेज चाहिए और स्ट्रेटेजी चाहिए और कोई सीक्रेट चाहिए। लेकिन सच यह था कि मुझे सिर्फ एक चीज की कमी थी। अपने ही रूल्स को फॉलो करने की। जब मेरा माइंड शांत होने लगा। जब मैंने इमोशंस को समझना शुरू किया तब मुझे एहसास हुआ कि असली चैलेंज मार्केट को समझना नहीं है बल्कि खुद को एक ही तरीके से बार-बार सही काम करने के लिए तैयार करना है। डिसिप्लिन का मतलब ये नहीं है कि तुम परफेक्ट हो जाओगे। इसका मतलब ये है कि तुम अपनी गलतियों के बावजूद अपने सिस्टम को नहीं छोड़ोगे। मैंने अपने लिए एक बहुत क्लियर सिस्टम बनाया। कब एंटर करना है, कब नहीं करना है? कितना रिस्क लेना है और कब बाहर निकलना है? लेकिन असली टेस्ट तब होता है जब मार्केट तुम्हें लुभाता है। जब कोई मूव छूट रहा होता है और तुम्हारा मन कहता है अभी कूद जाओ, वहीं पर डिसिप्लिन की जरूरत होती है। पहले मैं हर मूव को पकड़ना चाहता था। मुझे लगता था कि अगर मैंने मौका छोड़ दिया तो मैं कुछ खो दूंगा। लेकिन धीरे-धीरे मैंने ये समझा कि मार्केट में मौके कभी खत्म नहीं होते लेकिन तुम्हारा कैपिटल खत्म हो सकता है। और जब ये बात अंदर बैठ जाती है तब तुम हर ट्रेड को बहुत अलग नजरिए से देखने लगते हो। अब मैं सिर्फ वही ट्रेड लेता था जो मेरे सिस्टम में फिट होता था, चाहे दिन भर कुछ ना करूं लेकिन गलत ट्रेड नहीं लूंगा। यही वो आदत है जो एक आम ट्रेडर और एक प्रोफेशनल ट्रेडर के बीच फर्क पैदा करती है। प्रोफेशनल ट्रेडर प्रॉफिट के पीछे नहीं भागता। वो अपने प्रोसेस को फॉलो करता है। और जब तुम लगातार सही प्रोसेस को फॉलो करते हो तो प्रॉफिट अपने आप आने लगता है। अब अगर मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे साफ दिखता है कि मेरी सबसे बड़ी ग्रोथ तब हुई जब मैंने इंडिकेटर्स को नहीं खुद को बदलना शुरू किया। मैंने अपने माइंडसेट पर काम किया, अपने इमोशंस को समझा और सबसे जरूरी अपने डिसिप्लिन को मजबूत किया। और यही वो चीज है जो मैं तुम्हें देना चाहता हूं। अगर तुम सच में ट्रेनिंग में आगे बढ़ना चाहते हो तो इंडिकेटर्स के पीछे भागना बंद करो, अपने चार्ट को सिंपल बनाओ, अपने माइंड को क्लियर करो और अपने सिस्टम को फॉलो करना सीखो। हर दिन खुद से एक सवाल पूछो क्या मैं आज अपने रूल्स के अनुसार ट्रेड कर रहा हूं या अपने इमोशंस के अनुसार? अगर तुम इस सवाल का ईमानदारी से जवाब देने लगे तो तुम्हारी जर्नी बदल जाएगी और सिर्फ ट्रेडिंग में ही नहीं तुम्हारी लाइफ के हर एरिया में। क्योंकि यह सिर्फ ट्रेनिंग की कहानी नहीं है। ये सेल्फ कंट्रोल पेशेंस और डिसिप्लिन की कहानी है। अगर तुम इन तीन चीजों को अपने अंदर डेवलप कर लेते हो तो कोई भी फील्ड हो, तुम आगे बढ़ सकते हो। धीरे चलो, लेकिन सही दिशा में चलो। सीखते रहो लेकिन खुद को खोने मत दो और याद रखो, मार्केट तुम्हें तभी रिवॉर्ड करेगा, जब तुम खुद को कंट्रोल करना सीख जाओगे। अगर तुम यहां तक देख चुके हो तो एक बात साफ है, तुम सिर्फ टाइम पास करने नहीं आए थे, तुम सच में कुछ बदलना चाहते हो? और मैं तुम्हें यही कहना चाहता हूं जो तुमने आज सुना वो सिर्फ ट्रेनिंग की नॉलेज नहीं है। ये एक अलग नजरिया है, एक अलग तरीका है सोचने का। ज्यादातर लोग यहां गलती करते हैं, वो वीडियो देखते हैं, मोटिवेट होते हैं और फिर अगले दिन सब भूल जाते हैं। लेकिन अगर तुम सच में आगे बढ़ना चाहते हो तो आज से ही एक छोटा सा बदलाव शुरू करो। अपने चार्ट को देखो और खुद से पूछो क्या मैं सच में प्राइस को समझ रहा हूं या सिर्फ इंडिकेटर्स पर डिपेंड हूं? अपने हर ट्रेड से पहले खुद को ऑब्जर्व करो। क्या तुम शांत हो या तुम्हारे अंदर जल्दी पैसे कमाने की हड़बड़ी है? क्योंकि सच यही है। मार्केट तुम्हारे खिलाफ नहीं है, तुम्हारा अपना माइंड तुम्हारे खिलाफ काम करता है। और जब तुम अपने माइंड को समझना शुरू कर देते हो तभी तुम असली गेम में एंटर करते हो। मैं चाहता हूं कि तुम इस वीडियो से सिर्फ इंफॉर्मेशन लेकर मत जाओ। एक डिसीजन लेकर जाओ। डिसीजन की अब तुम भीड़ का हिस्सा नहीं बनोगे, तुम वही करोगे जो सही है, भले ही वो मुश्किल क्यों न हो। शायद शुरुआत में कन्फ्यूजन होगा। शायद तुम्हें लगेगा कि बिना इंडिकेटर के ट्रेड करना मुश्किल है। लेकिन याद रखना हर प्रोफेशनल कभी ना कभी बिगिनर था। फर्क सिर्फ इतना है कि उसने हार नहीं मानी। उसने खुद पर काम किया। तुम्हें भी वही करना है। छोटे-छोटे स्टेप्स लो, खुद को ऑब्जर्व करो, अपनी गलतियों को एक्सेप्ट करो और धीरे-धीरे अपने सिस्टम को मजबूत बनाओ। और सबसे जरूरी पेशेंस रखो क्योंकि यह कोई जल्दी अमीर बनने का गेम नहीं है। ये खुद को बेहतर बनाने का गेम है। अगर तुमने खुद को बदल लिया तो रिजल्ट अपने आप बदल जाएगा और अगर तुम्हें यह वीडियो सच में वैल्यू दे पाया तो इसे सिर्फ लाइक या शेयर मत करो। इसे अपने अंदर उतारो क्योंकि असली बदलाव वहीं से शुरू होता है। हम फिर मिलेंगे एक और ऐसी ही सीख के साथ। तब तक खुद पर काम करो, शांत रहो और याद रखो असली एज तुम्हारे अंदर

सारे INDICATORS कूड़े में फेंक दो ! बस ये चीज सीख लो | Mark Douglas Philosophy
Brainwave Trader
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