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Why do we Compare? (Ep #44) | The Brutal Psychology

Anshuman Joshi

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[0:00]बहुत बार ऐसा हुआ होगा कि तुम डिसाइड करते होंगे कि आज से मैं किसी से भी कंपेयर नहीं करूंगा। तुम खुद को समझाते हो कि भाई सबकी लाइफ अलग-अलग होती है। सबकी टाइमलाइन अलग-अलग होती है। फिर भी जब तुम किसी को अपने से ज्यादा सक्सेसफुल देखते हो, ज्यादा अट्रैक्टिव, ज्यादा कॉन्फिडेंट या ज्यादा पावरफुल देखते हो, तो तुम्हारा माइंड एक सेकंड के अंदर कैलकुलेशन करना स्टार्ट कर देता है। तुम्हें पता भी नहीं चलता और तुम्हारा दिमाग चुपचाप तुम्हें किसी दूसरे के अगेंस्ट में मेजर करना स्टार्ट कर देता है। कभी सैलरी के बेसिस पे, कभी लुक्स के बेसिस पे, कभी सोशल रेस्पेक्ट के बेसिस पे, कभी रिलेशनशिप के बेसिस पे। और सबसे इंटरेस्टिंग बात तो ये है कि तुम्हें भी पता है कि ये कंपैरिजन तुम्हें हर्ट करेगा, तुम्हें अननेसेसरी प्रेशर देगा, तुम्हारी पीस को डिस्टर्ब करेगा। बट फिर भी वो थॉट आता है जैसे बैकग्राउंड में कोई एक सॉफ्टवेयर चल रहा हो जो तुम्हारी कंट्रोल से काफी बाहर है। तुम कॉन्शियसली कंपैरिजन से बचना चाहते हो पर सबकॉन्शियस लेवल पे तुम्हारा माइंड ऑलरेडी कैलकुलेशन कर चुका होता है। अब यही वो पॉइंट होता है जहां पर अधिकतर लोग कंफ्यूज हो जाते हैं कि कंपैरिजन उनकी पर्सनल वीकनेस है या फिर उनका माइंडसेट वीक है या फिर उन्हें ग्रेटिट्यूड की प्रैक्टिस करनी चाहिए। लेकिन रियलिटी थोड़ी सी अनकंफर्टेबल है। कंपैरिजन सिर्फ एक हैबिट नहीं है। कंपैरिजन हमारा सर्वाइवल आर्किटेक्चर का पार्ट है। सोच के देखो। तुम किसी कमरे में जाते हो जहां पर 10 लोग बैठे हैं। अब ऑटोमेटिकली तुम्हारा दिमाग सबको स्कैन करना शुरू कर देगा। कि कौन कॉन्फिडेंट है, कौन अमीर है, कौन डोमिनेंट लग रहा है, किसको इग्नोर किया जा रहा है, किसकी कितनी रेस्पेक्ट है। ये चीजें तुम्हें पता भी नहीं चलती, इतनी स्पीड से हो जाती है। तुम्हें लगता है कि तुम सिर्फ लोगों को देख रहे हो। पर तुम्हारा नर्वस सिस्टम्स चुपचाप एक मैप बना रहा होता है। ये मैप बेसिकली एक चीज डिसाइड करता है। इस एनवायरमेंट में मेरी क्या पोजीशन है? तुम कॉन्शियसली ये सवाल नहीं पूछते हो पर तुम्हारा सबकॉन्शियस ब्रेन हर जगह इस सवाल का जवाब ढूंढ रहा होता है। और जब तुम्हारा दिमाग किसी दूसरे इंसान को तुमसे ऊपर परसीव करता है। चाहे लुक्स में, चाहे पैसों में, चाहे कॉन्फिडेंस में, चाहे इन्फ्लुएंस में, तो एक छोटा सा डिस्कंफर्ट आता है। और अगर तुम्हें लगता है कि तुम किसी से ऊपर हो, तो एक अजीब सा सेटिस्फेक्शन आता है। इन दोनों इमोशन का एक ही सोर्स है। सोशल हायरार्की। अब ये चीज समझनी पड़ेगी कि हमारा ब्रेन सिर्फ सर्वाइवल के लिए नहीं बना है। ये एक तरह की मशीन है जो स्टेटस को भी डिटेक्ट करती रहती है। पहले की हमारी ह्यूमन सोसाइटीज के बारे में देखें तो उसमें सर्वाइवल सिर्फ लोगों के साथ रहने से नहीं होता था। सर्वाइवल इस पे भी डिपेंड करता था कि तुम्हारी ट्राइब में क्या पोजीशन है। अगर तुम ट्राइब के रेस्पेक्टेड मेंबर हो, अगर ट्राइब में तुम्हारी वैल्यू ऊपर है, तो तुम्हें ज्यादा रिसोर्सेज मिलेंगे, ज्यादा प्रोटेक्शन मिलेगी, ज्यादा चांसेस मिलेंगे रीप्रोड्यूस करने के। लेकिन अगर तुम ट्राइब में बॉटम पे हो, लोग तुम्हें इग्नोर करते हैं, तुम्हें वीक समझते हैं या फिर तुम्हारी डिसरेस्पेक्ट करते हैं, तो तुम्हारे सर्वाइवल का चांस काफी कम हो जाएगा। और हजारों सालों तक हमारे ह्यूमन ब्रेन ने सिर्फ एक ही चीज सीखी है कि अपनी पोजीशन को लगातार इवैल्यूएट करते रहो। अब ये इवैल्यूएशन कंपैरिजन के बिना पॉसिबल ही नहीं थी। क्योंकि तुम्हें देखना पड़ता है ना कि कौन स्मार्ट है, कौन स्ट्रांग है, कौन लीडर है, कौन फॉलोअर है। यह इंफॉर्मेशन लाइफ और डेथ के बीच का डिफरेंस भी हो सकती थी। इसलिए आज भी जब तुम किसी सक्सेसफुल इंसान को देखते हो तो तुम्हारा दिमाग सिर्फ उसको एडमायर नहीं करता है। तुम उसको अपने अगेंस्ट में मेजर करना स्टार्ट कर देते हो। क्योंकि तुम्हारा ब्रेन अभी भी उस पुराने सॉफ्टवेयर पे चल रहा है। जहां पर सोशल रैंक इज इक्वल टू सर्वाइवल। अब यहां पर एक और इंटरेस्टिंग चीज आती है जो अधिकतर लोग नोटिस ही नहीं करते। जब तुम किसी को अपने आप से बेटर देखते हो, तो तुम्हें सिर्फ जेलसी या इनसिक्योरिटी नहीं होती है। बल्कि तुम्हारा ब्रेन थ्रेट मोड में चला जाता है। अब ये थ्रेट फिजिकल नहीं होता है। पर तुम्हारा ब्रेन इसे ऑलमोस्ट फिजिकल थ्रेट की तरह ही ट्रीट करता है। हमारे ब्रेन के अंदर एक छोटा सा स्ट्रक्चर होता है जिसे एमिग्डाला कहते हैं। जिसका काम है थ्रेट को डिटेक्ट करना। अगर आप रास्ते में जा रहे हैं और आपके सामने से शेर आ रहा है तब भी एमिग्डाला एक्टिवेट होता है। और जब आपको ये लगता है कि कोई आपसे ज्यादा पावरफुल, आपसे ज्यादा रेस्पेक्टेड या आपसे ज्यादा इन्फ्लुएंशियल है तब भी आपका एमिग्डाला एक्टिवेट होता है। क्योंकि हमारा ब्रेन इस सिचुएशन को एक स्टेटस थ्रेट की तरह देखता है। और स्टेटस थ्रेट का मतलब पुराने टाइम पे क्या होता था कि अगर ये इंसान मेरे से ऊपर है तो ये मुझसे मेरी सेफ्टी और रिसोर्सेज छीन सकता है। इसलिए तुम नोटिस करोगे कि जब भी कंपैरिजन ट्रिगर होता है तो हमारी बॉडी थोड़ी सी टेंस हो जाती है। अब इसमें डोपामिन का भी छोटा सा गेम आता है जो बेसिकली रिवॉर्ड केमिकल होता है। तो जब तुम अपने आप को किसी से बेटर फील करते हो चाहे लुक्स में, चाहे इंटेलिजेंस में या लाइफस्टाइल में, तो तुम्हारा ब्रेन थोड़ा सा डोपामिन रिलीज करता है। इससे तुम्हें एक प्लेजर मिलता है। इसी वजह से लोग कभी-कभी उन लोगों के ग्रुप में ज्यादा रहना पसंद करते हैं जिनसे कंपैरिजन में वो अपने आप को बेटर फील करवा सके। लेकिन जब सिचुएशन रिवर्स हो जाती है, जब कोई तुम्हें लगता है कि तुमसे भी बेटर आ गया है तो तुम्हारा डोपामिन लेवल गिरने लगता है और स्ट्रेस हार्मोन बढ़ने लगता है। अब इस टाइम पर तुम्हारी सेल्फ बर्ड बाहर की एनवायरमेंट पर डिपेंड करना शुरू कर देती है। और सोशल मीडिया ने इस चीज को और ज्यादा एम्प्लीफाई कर दिया है। पहले जब हमारी ट्राइब में हम रहते थे तब हमारा ग्रुप मैक्सिमम मैक्सिमम 40-50 लोगों का होता था। पर आज के टाइम पर आप Instagram पर बैठे करोड़ों लोगों से कंपैरिजन कर रहे हो। अब हमारा ब्रेन जो 40-50 लोगों को समझने के लिए, उनके साथ कंपैरिजन करने के लिए डिजाइन किया गया था वो अब ग्लोबल स्केल पर कंपैरिजन कर रहा है। लेकिन कंपैरिजन सिर्फ सक्सेस और लाइफस्टाइल तक सीमित नहीं है। रिलेशनशिप में भी ये देखने को मिलता है। जब तुम किसी कपल को देखते हो जहां पर लड़का एक्सट्रीमली कॉन्फिडेंट, सक्सेसफुल है या फिर लोग उसे एडमायर कर रहे हैं तो तुम उसके पार्टनर को भी एक डिफरेंट लेंस से देखना शुरू कर देते हो। जैसे उसकी वैल्यू भी उसके पार्टनर के साथ जुड़ चुकी है और उसका भी स्टेटस ऊपर हो गया है। ये सिर्फ जजमेंट नहीं है। ये हमारी प्रोग्रामिंग है। ह्यूमन बीइंग स्टार्टिंग से ही हाई स्टेटस पार्टनर के साथ एसोसिएट करने की टेंडेंसी रखते हैं। क्योंकि इनडायरेक्टली सर्वाइवल और सेफ्टी को सिग्नल करता है। इसलिए लोग कई बार कॉन्शियसली नहीं बट सबकॉन्शियसली ऐसे लोगों के अराउंड रहना ज्यादा पसंद करते हैं जिनके साथ रहकर उनकी सोशल वैल्यू ऊपर उठ सके। इसी वजह से जब तुम्हारा कोई बहुत क्लोज फ्रेंड सक्सेसफुल हो जाता है तो तुम्हारे अंदर एक अजीब सा डिस्कंफर्ट भी आ जाता है। तुम खुश भी होते हो बट तुम्हारी जो अंदर की हायरार्की है वो भी चेंज हो रही होती है। हम अक्सर ऐसे सोचते हैं कि हम हमारी जो आइडेंटिटी है वो अपनी वैल्यू से बनाते हैं। कि हम क्या सोचते हैं, हम किन बातों में बिलीव करते हैं, हम कैसी लाइफ चाहते हैं। लेकिन रियलिटी में आइडेंटिटी का एक बड़ा हिस्सा एक्चुअली रिलेटिव होता है। तुम अपने आप को डायरेक्ट सेंस में नहीं समझते हो। तुम अपने आप को दूसरों से कंपेयर करके समझते हो। अगर तुम एक ऐसे रूम में हो जहां पर तुम सबसे ज्यादा इंटेलिजेंट हो तो तुम्हें अपनी इंटेलिजेंस स्ट्रांग फील होगी। लेकिन वही अगर तुम किसी ऐसे रूम में चले जाओगे जहां पर तुमसे भी काफी ज्यादा इंटेलिजेंट लोग बैठे हैं तो तुम्हें अपनी इंटेलिजेंस पर डाउट होगा। तुम चेंज नहीं हुए हो लेकिन तुम्हारा सेल्फ परसेप्शन चेंज हो गया है। ये ये दिखाता है कि तुम्हारा ईगो कितना फ्रेजाइल और कॉन्टेक्स्ट डिपेंडेंट है। हम सोचते हैं कि हमारी आइडेंटिटी काफी स्टेबल है लेकिन सच ये है कि काफी हद तक हमारी आइडेंटिटी सोशल मिरर्स पर डिपेंडेंट है। अब ये वो जगह होती है जहां पर लोग एक बहुत डेंजरस ट्रैप में फंस आते हैं। क्योंकि अगर तुम्हारी सेल्फ वर्थ कंपैरिजन से लिंक्ड है तो तुम कभी भी स्टेबल फील नहीं करोगे। अगर आज तुम अपने आप को बेटर फील करते हो तो कल कोई तुमसे और बेटर आ जाएगा। अगर आज तुम किसी लेवल पर टॉप पे हो तो कल कोई तुम्हारे उस लेवल को क्रॉस कर देगा। सोशल हायरार्की एक मूविंग टारगेट है। और जब तुम्हारा ब्रेन इस टारगेट को चेस करने की कोशिश करता है, उसके पीछे पड़ जाता है तो तुम्हारा ब्रेन परमानेंटली रेस्टलेस हो जाता है। तुम्हें लगता है कि तुम अपनी लाइफ को इंप्रूव कर रहे हो लेकिन एक्चुअल में तुम एक ऐसी रेस में भाग रहे हो जिसकी फिनिश लाइन कभी एग्ज़िस्ट ही नहीं करती। लोग सोचते हैं कि कंपैरिजन सिर्फ इनसिक्योरिटी से आता है लेकिन रियलिटी थोड़ी सी और कॉम्प्लिकेटेड है। कभी-कभी कंपैरिजन एक्चुअली तुम्हारे एंबिशन सिस्टम का पार्ट होता है। जब तुम किसी को आगे बढ़ते हुए देखते हो, तो तुम्हारा ब्रेन सिर्फ थ्रेट डिटेक्ट नहीं करता है वो अपने आप को ये सिग्नल भी भेजता है कि ये पॉसिबल है। इसी वजह से कंपटीशन हिस्टॉरिकली ह्यूमन प्रोग्रेस का ड्राइवर रहा है। अगर पहले के लोग कंपटीशन नहीं करते तो शायद इतना फास्ट इनोवेशन नहीं हो पाता है। लेकिन प्रॉब्लम तब शुरू होती है जब कंपैरिजन इंस्पिरेशन से ज्यादा आइडेंटिटी अटैक बन जाता है। जब तुम किसी को देखते हो और तुम्हारा दिमाग चुपचाप कहता है कि अगर ये मुझसे ऊपर है तो शायद मैं इनफ नहीं हूं। ये सुनने में बहुत सिंपल लगता है बट इसका इमोशनल इंपैक्ट काफी डीप होता है। अब कभी-कभी तुम कॉन्शियसली कंपेयर करना नहीं चाहते हो। पर तुम्हारा दिमाग फिर भी कंपैरिजन करने लगता है क्योंकि तुम्हारे ईगो को अपनी हायरार्की को समझना है। ईगो को क्लेरिटी चाहिए होती है कि वो कहां पे स्टैंड करता है। ये बिल्कुल उसी सैनिक की तरह होता है जो बैटलफील्ड में अपनी पोजीशन को चेक करता रहता है। कि भाई ये फ्रंट लाइन में है या सेफ ज़ोन में है। जब तक उसको एक क्लेरिटी नहीं होगी कि वो सेफ है या नहीं तब तक उसका नर्वस सिस्टम शांत नहीं हो सकता है। इसी तरह से हमारा दिमाग भी कॉन्स्टेंट एक बैटलफील्ड में रहता है जो ये इंश्योर करता रहता है कि कौन मेरे से ऊपर है, कौन मेरे लेवल पे है, कौन मेरे से नीचे है। और जब तक तुम्हें इसका जवाब नहीं मिलता है तुम्हारा सिस्टम रेस्टलेस रहता है, बिल्कुल भी काम नहीं हो पाता है। अब यहां पर मुझे तुम्हारा थोड़ा सा अटेंशन चाहिए। अगर तुम अपने इमोशनल पैटर्न्स को समझना चाहते हो, अगर तुम समझना चाहते हो कि क्यों तुम सेम ओवरथिंकिंग, सेम अटैचमेंट लूप्स में फंस जाते हो, तो मैंने तुम्हारे लिए एक छोटी सी गाइड, एक छोटी सी ई-बुक लिखी है। बिहाइंड द डार्क। ये सिर्फ 32 पेजों की है बट इसमें मैंने सारी चीजें स्ट्रेट टू द पॉइंट तुम्हें बताई है। सो अगर तुम जेनुअली इसे पढ़ना चाहते हो, जेनुअली अपने इमोशनल पैटर्न्स को समझना चाहते हो तो डिस्क्रिप्शन और पिन कमेंट में तुम्हें इसकी लिंक मिल जाएगी। वीडियो पर वापस चलते हैं। अब इसमें सिस्टम क्या चलता रहता है कि तुम्हारा ब्रेन सिर्फ कंपेयर नहीं करता है वो अपने दिमाग में एक मैप बना लेता है। और जब तुम्हें लगता है कि अगर तुम अपने मैप में नीचे हो तो तुम्हारा नर्वस सिस्टम अलर्ट हो जाता है। और अगर तुम्हें लगता है कि तुम अपने मैप में ऊपर हो तो वो थोड़ा रिलैक्स हो जाता है। अब एक और इंपोर्टेंट चीज। कंपैरिजन हमेशा सिर्फ दूसरों को देखकर नहीं होता है। कभी-कभी तुम अपने पास्ट सेल्फ को देख के भी कंपेयर करते रहते हो। कि पहले मैं ज्यादा बेटर था, पहले मैं ज्यादा मोटिवेटेड था, पहले मैं ज्यादा बेटर परफॉर्म कर सकता था। अब ये इंटरनल कंपैरिजन भी उतना ही पेनफुल हो सकता है जितना एक्सटर्नल कंपैरिजन होता है। क्योंकि तुम्हारा दिमाग एक आइडियल इमेज बनाकर बैठा है। एक वर्जन जैसा तुम्हें होना चाहिए। और अगर तुम्हारी करंट रियलिटी उससे मैच नहीं करती है तो तुम डिप्रेस हो जाते हो मतलब सैड हो जाते हो। इसी वजह से कुछ लोग ऑब्जेक्टिवली सक्सेसफुल होने के बाद भी सेटिस्फाई फील नहीं करते। क्योंकि उनके दिमाग के अंदर एक जज बैठा रहता है जो उन्हें कॉन्स्टेंटली ये बोलता रहता है कि ये इनफ नहीं है। तुम और बेटर कर सकते थे। अगर तुम थोड़ा और डीप जाओगे तो ये कंपैरिजन वाला जो पैटर्न है ये बचपन से ही बिल्ड होना शुरू हो जाता है। एक बच्चा स्कूल में जाता है तो उसे मार्क्स को लेकर कंपेयर किया जाता है कि कौन एवरेज है, कौन टॉपर है, कौन वीक है। फिर बाद में करियर में कंपेयर किया जाता है, फिर बाद में लुक्स में कंपेयर किया जाता है, बाद में फाइनेंशियल कंडीशन को देखकर कंपेयर किया जाता है। सोसाइटी एक स्कोर बोर्ड बना देती है जिसके अंदर हर इंसान को एक रैंक दे दी जाती है और धीरे-धीरे तुम्हारा ब्रेन ये मान लेता है कि तुम एक ऐसे कॉम्पिटेटिव एनवायरमेंट में हो जहां तुम्हें लगातार ये प्रूव करना पड़ेगा कि तुम कहां स्टैंड करते हो। अब एक और पॉइंट जितना ज्यादा तुम अपने आप से कहोगे कि मुझे कंपैरिजन नहीं करना है, उतना ज्यादा तुम कंपैरिजन की तरफ ध्यान दोगे। क्योंकि जब तुम अपने आप से कहते हो कि मुझे अब कंपैरिजन नहीं करना है, तो तुम्हारे दिमाग के अंदर एक सिग्नल जाता है कि अब कंपैरिजन को मॉनिटर करो। और जब तुम्हारा ब्रेन किसी चीज को मॉनिटर करता है तो वो उस चीज को ज्यादा डिटेक्ट करता है। इसलिए तुम्हें कभी-कभी लगता है कि तुम पहले से ज्यादा कंपैरिजन करने लग गए हो। जबकि एक्चुअल में चेंज बस इतना हुआ है कि तुम अपने उस पैटर्न को और अच्छे से देख पा रहे हो। कभी-कभी लोग सीक्रेटली कंपैरिजन को एंजॉय भी करते हैं। इवन व्हेन दे कॉन्शियसली हेट इट क्योंकि कंपैरिजन से उन्हें एक फिक्स्ड आइडेंटिटी मिल जाती है। या तो सुपीरियर की या इनफीरियर की। और तुम्हारा ईगो इनमें से किसी भी कहानी में रह सकता है। जब तुम ये रियलाइज़ करना शुरू करते हो ना कि तुम्हारी लाइफ के तुम्हारे ज्यादातर डिसीजन अपनी खुशी के लिए नहीं थे बल्कि अपनी सोसाइटी की हायरार्की में अपनी पोजीशन को प्रूव करने के लिए थे। तो तुम्हारे अंदर एक अनकंफर्टेबल क्लेरिटी आती है। जैसे तुम अचानक से देख पाते हो कि तुम्हारे अंदर दो सिस्टम एक साथ काम कर रहे हैं। एक सिस्टम जो थक चुका है जो तुम्हें बोलता है कि भाई अब कंपैरिजन बंद करो मुझे अपनी नेचुरल लाइफ भी एक्सपीरियंस करनी है। और दूसरा सिस्टम जो तुम्हें चुपचाप पुश करता रहता है कि और काम करो, और अचीव करो, और प्रूव करो, और आगे बढ़ो। यह दूसरा वाला सिस्टम तुम्हें कभी भी खुलकर नहीं बोलेगा कि मैं कंपैरिजन को चला रहा हूं बस ये तुम्हें रेस्टलेस बना देगा। तुम्हें लगता है कि तुम एंबिशियस हो। लेकिन कभी-कभी तुम्हारे एंबिशन के पीछे एक डर होता है कि अगर मैं रुक गया तो शायद मैं पीछे रह जाऊं। और पीछे रह जाना सिर्फ एक प्रैक्टिकल प्रॉब्लम नहीं लगती है बल्कि एक एक्जिस्टेंशियल प्रॉब्लम लगने लगती है। क्योंकि अगर मैं हायरार्की में नीचे आ गया तो मेरी वैल्यू कम हो जाएगी मुझे रिसोर्सेज का एक्सेस कम हो जाएगा। जब तुम किसी को ग्रो करते हुए देखते हो तुम्हारे अंदर एक अजीब सा डिस्कंफर्ट आने लगता है। तुम उससे कंपेयर नहीं कर रहे हो बल्कि तुम्हारा दिमाग एक छोटा सा नैरेटिव बना रहा होता है कि अगर वो मुझसे आगे बढ़ रहा है और मैं नहीं बढ़ पा रहा हूं तो इसका मतलब मैं इनफ नहीं हूं। और इसका बहुत बड़ा इमोशनल इंपैक्ट होता है। इसलिए कंपैरिजन सिर्फ जेलसी क्रिएट नहीं करता है वो तुम्हारी पूरी आइडेंटिटी को हिला के रख देता है। और जब आइडेंटिटी हिलती है तो तुम्हारा नर्वस सिस्टम बहुत ज्यादा अनइजी हो जाता है। इसलिए लोग कंपैरिजन को एस्केप करने के लिए दो एक्सट्रीम स्ट्रेटजीज का यूज करते हैं। या तो हाइपर कॉम्पिटिटिव बन जाते हैं हर जगह प्रूव करने लगते हैं या फिर बिल्कुल ही विथड्रॉ कर लेते हैं, अपना एंबिशन ही छोड़ देते हैं। बट दोनों केसेस में ये प्रॉब्लम सॉल्व नहीं होती है। क्योंकि दोनों रिएक्शन ही कंपैरिजन के अराउंड ही रिवॉल्व कर रहे हैं। कंपैरिजन एक्चुअल में एक अटेंशन ट्रैप है। तुम्हारा ब्रेन जब किसी को ऑब्जर्व करता है कि तुमसे बेटर पोजीशन में है तो तुम्हारी अवेयरनेस ऑटोमेटिकली बाहर शिफ्ट हो जाती है। तुम अपने इंटरनल एक्सपीरियंस से डिस्कनेक्ट हो जाते हो। तुम्हारा फोकस मैं क्या कर रहा हूं, मैं क्या क्रिएट कर रहा हूं, मैं किस डायरेक्शन में ग्रो कर रहा हूं। इससे हटकर दूसरे क्या कर रहे हैं, दूसरे क्या बना रहे हैं पर शिफ्ट हो जाता है। और यहीं पर कंपैरिजन डेंजरस हो जाता है। क्योंकि जिस टाइम पर तुम्हारा अटेंशन दूसरों पर डिपेंडेंट हो गया। उस टाइम पर तुम्हारी रियलिटी भी दूसरों पर डिपेंडेंट हो गई। अगर दूसरा इंसान सक्सेसफुल है तो तुम अनकंफर्टेबल हो जाओगे। अगर दूसरा इंसान फेल हो गया तो तुम्हें रिलीफ मिलेगा। मतलब तुम्हारी इमोशनल स्टेट तुम्हारे लाइक के एक्शन से नहीं बल्कि दूसरों के एक्शन से कंट्रोल हो रही है। और यहीं पर लोग अपनी फ्रीडम को लूज कर देते हैं। उन्हें लगता है कि वो अपनी लाइफ को बिल्ड कर रहे हैं पर एक्चुअल में वो दूसरों के मूवमेंट पर रिएक्ट कर रहे होते हैं। अगर कोई दूसरा बिजनेस स्टार्ट करता है तो तुम्हें भी बिजनेस स्टार्ट करना। अगर किसी ने लग्जरी गाड़ी ली है तो तुम्हें भी वो गाड़ी चाहिए। सोसाइटी एक डायरेक्शन में मूव करती है और हमारा ब्रेन भी फिर उसी डायरेक्शन में बढ़ने लगता है। इसी वजह से पूरी की पूरी जनरेशन सिर्फ एक माइलस्टोन को चेस करने के पीछे पड़ी रहती है। बिना ये सवाल किए कि ये माइलस्टोन तुम्हारी इनर लाइफ को फुलफिल भी कर रहा है या नहीं। अब इस पैटर्न से बाहर निकलने का पहला स्टेप ये नहीं है कि तुम अपने ब्रेन को फोर्सफुली कंपेयर करने से रोको। ये इंपॉसिबल है। ब्रेन को अगर किसी एक हैबिट को डायरेक्टली स्टॉप करने के लिए बोलते हैं तो ऑलमोस्ट वो उस हैबिट को और ज्यादा स्ट्रांग कर देता है। रियल चेंज स्टार्ट होता है कि तुम अपने कंपैरिजन को ऑब्जर्व करना स्टार्ट करो। जब तुम किसी को सक्सेसफुल होते हुए देखते हो और तुम्हारे अंदर एक डिस्कंफर्ट आता है तो तुम उसको ऑब्जर्व करते हो। कि अभी देखो मेरी चेस्ट थोड़ी टाइट हो रही है। मुझे ऐसी टेंशन क्रिएट हो रही है। ये अवेयरनेस ही आपके नर्वस सिस्टम को काफी ज्यादा स्लो कर देती है। दूसरा स्टेप है कि तुम्हें अपने माइंडसेट को मेजरमेंट से हटाकर डायरेक्शन पर शिफ्ट करना पड़ेगा। हमारा ब्रेन कंपैरिजन के थ्रू मेजर करता है कि कौन ऊपर है, कौन नीचे है लेकिन ग्रोथ मेजरमेंट से नहीं डायरेक्शन से आती है। अगर तुम कल से बेटर हो, तुम प्रोग्रेस कर रहे हो। लेकिन अगर तुम हमेशा अपने आप को दूसरों से कंपेयर करते रहोगे तुम्हें असली प्रोग्रेस फील नहीं होगी। क्योंकि कोई ना कोई तुमसे हमेशा आगे होगा। डायरेक्शन थिंकिंग का मतलब ये होता है कि अब तुम्हारे कंपैरिजन का पॉइंट बाहर की दुनिया नहीं, बल्कि तुम्हारा खुद का पास्ट सेल्फ बन जाता है। और ये शिफ्ट सरप्राइजिंग ही पावरफुल होता है। क्योंकि अब तुम्हारा ब्रेन एक नया नैरेटिव बना रहा है कि मैं अब किसी और के साथ रेस में नहीं हूं। बस मैं अपने आप को इवॉल्व कर रहा हूं। आपका कंपैरिजन सिर्फ आपके साथ होना चाहिए। आपको बस अपने आप को देख के करना है कि मैं कल जो मैं कर रहा था आज मैं उससे बेटर कर रहा हूं नहीं कर रहा हूं। अगर कर रहा हूं तो अच्छी बात है वो प्रोग्रेस हो रही है। सो अगर आपको ये वीडियो रिलेटिव और वैल्यूएबल लगा है तो उसे लाइक करके चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए और हां अगर आप मेरी ईबुक को पढ़ना चाहते हो तो डिस्क्रिप्शन और पिन कमेंट में आपको उसकी लिंक मिल जाएगी। मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में। थैंक यू वैरी मच।

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