[0:00]नमस्कार दोस्तों, क्या आपको याद है आज से दो साल पहले जब गर्मियों का मौसम आया था, साल 2022? इस आर्टिकल को देखिए, उसे हॉटेस्ट समर एवर करके पुकारा गया था। उस साल इतनी भयंकर गर्मी पड़ी थी इंडिया में कि 122 साल का रिकॉर्ड टूट गया था। लेकिन फिर आई 2023 की गर्मियां। 2023 में गर्मियों का मौसम इतना जलता हुआ गर्म था कि साइंटिस्ट ने कहा कि पिछले 2000 सालों की यह हॉटेस्ट समर थी धरती के नॉर्दन हेमिस्फीयर में। लेकिन फिर आते हैं हम साल 2024 पर। जनवरी 2024 हॉटेस्ट जनवरी एवर रिकॉर्डेड। फरवरी 2024 हॉटेस्ट फरवरी एवर रिकॉर्डेड। मार्च 2024 हॉटेस्ट मार्च एवर रिकॉर्डेड। अप्रैल 2024 हॉटेस्ट मंथ एवर रिकॉर्डेड। पिछले 11 महीने दोस्तों धरती पर रिकॉर्ड ब्रेकिंग रहे हैं गर्मी के मामले में। आज जिस तपती गर्मी को आप सह रहे हो, यह नॉर्मल नहीं है, और आप अकेले भी नहीं हो। पिछले महीने साउथ इंडिया में और पूरे ही साउथ ईस्ट एशिया में ऐसी रिकॉर्ड ब्रेकिंग हीट वेव देखी गई। वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया हर जगह ऐसे ही अनबेयरेबल टेम्परेचर्स देखे गए। फिलिपींस में हीट इंडेक्स 53 डिग्री सेल्सियस तक क्रॉस कर गया था। उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर्स देखने को मिली। मई के पहले हफ्ते में उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और झारखंड में भी फॉरेस्ट फायर्स देखी गई। देश भर में हीट वेव्स की वार्निंग दी जा रही है। यहां तक कि केरला जैसी जगहों पर भी जहां आमतौर पर हीट वेव्स नहीं रिकॉर्ड होती। और अब नॉर्थ इंडिया में 46 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा के टेम्परेचर्स देखे जा रहे हैं। एक सीधा कारण इस सबके पीछे है ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज। लेकिन क्या यह इकलौता कारण है? नहीं। आइए इस वीडियो में समझते हैं दो और कारण जिसकी वजह से यह सब हो रहा है और लोकल लेवल पर क्या सॉल्यूशन है इसका? क्या कर सकते हैं हम सब इस गर्मी से बचने के लिए?
[1:50]पहले तो हमें यह समझना होगा दोस्तों कि इस तरीके के एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स सिर्फ इंडिया या साउथ ईस्ट एशिया में ही नहीं, बल्कि धरती के कोने-कोने में देखने को मिल रहे हैं। इसी महीने साउथ अमेरिका में क्या हुआ? देखिए खबर को। at least 83 people are dead after days of heavy rain in southern Brazil and more than 100 are missing. Another 122,000 people have been displaced by floods. ब्राजील में इतने भयानक फ्लड्स आए कि डेढ़ लाख से ज्यादा लोग डिस्प्लेस हो गए हैं। पूरे के पूरे शहर पानी के अंदर डूब गए। साउथ अफ्रीका में क्या हो रहा है? भयंकर ड्राउट की सिचुएशन देखने को मिल रही है। The southern African region is experiencing a severe drought with many families unable to cater for their daily needs like food. I just spoke with some of the elders from the community and the last time they can remember this type of drought is 1947. So it's this is not a normal circumstance. ऐसा ड्राउट जो पिछले कई दशकों में नहीं आया है। इसीलिए कई सदन अफ्रीकन कंट्रीज ने 5.5 बिलियन डॉलर्स की रिक्वेस्ट करी है बाकी दुनिया से, भुखमरी की सिचुएशन ना आ जाए। इस सब तबाही के पीछे एक वेदर इवेंट है जिसे सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जाता है। एल नीनियो। वैसे तो यह धरती के क्लाइमेट की एक नेचुरल साइकिल है जो हर पांच से सात साल में देखने को मिलती है। लेकिन क्लाइमेट चेंज की वजह से यह और एक्सट्रीम होती जा रही है साल भर साल। इस साइकिल का पूरा नाम है एल नीनियो-साउदर्न ऑसिलेशन। शॉर्ट में कहा जाए तो ENSO. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार यह दूसरी सबसे बड़ी चीज है जिसकी वजह से धरती का क्लाइमेट बदलता है। इससे ऊपर पहले नंबर पर आता है धरती और सूरज के बीच का जो रिलेशनशिप है। अर्थ जो सन के अराउंड रिवॉल्व करती है जिसकी वजह से मौसम बदलते हैं, गर्मियों के बाद सर्दियां, सर्दियों के बाद गर्मियां आती है। लेकिन उस इफेक्ट के बाद दूसरा सबसे बड़ा इंपैक्ट एल नीनियो का ही पड़ता है। क्या है यह एल नीनियो? यह एक ऐसी चीज है जो पैसिफिक ओशन में देखने को मिलती है। पैसिफिक ओशन दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे गहरा समुद्र जो एशिया और अमेरिकाज़ के बीच में है। इमेजिन करो यह पूरा समुद्र एक टब की तरह है, एक बाथ टब जिसमें पानी इधर से उधर हिलता रहता है।
[3:49]जब आप टब में हाथ फेरते हो तो पानी इधर से उधर चले जाता है, फिर उसके बाद उधर से वापस इधर आता है। इसी तरीके से पैसिफिक ओशन में हवाएं चलती हैं जो ईस्ट से वेस्ट की डायरेक्शन में फ्लो करती हैं।
[3:59]इन हवाओं को ट्रेड विंड्स कहा जाता है और ज्यादातर टाइम यह हमेशा अमेरिका से लेकर एशिया और ऑस्ट्रेलिया की डायरेक्शन में ही फ्लो करती हैं क्योंकि धरती की रोटेशन ऐसे होती है। कोरिओलिस इफेक्ट, इसके बारे में आपने स्कूल में भी पढ़ा होगा। क्योंकि अर्थ वेस्ट से ईस्ट की तरफ रोटेट कर रही है, इस कोरिओलिस इफेक्ट की वजह से यह ट्रेड विंड्स उल्टी डायरेक्शन में फ्लो कर रही हैं। अब इसकी वजह से नॉर्मली क्या होता है? पैसिफिक ओशन के सरफेस पर जो पानी है वह वेस्ट की दिशा में फ्लो करने लगता है। यानी कि ऑस्ट्रेलिया की तरफ फ्लो करने लगता है। और जब सरफेस का पानी उस तरफ फ्लो करने लगेगा तो ईस्ट की दिशा में समुद्र के नीचे का जो पानी है वह ऊपर की तरफ आने लगता है। यानी साउथ अमेरिका के पास समुद्र के नीचे से पानी ऊपर आने लगता है। इस चीज को कहा जाता है अपवेलिंग। यह जो पानी समुद्र के नीचे से ऊपर आ रहा है, यह ज्यादा ठंडा होता है कंपैरेटिवली और ज्यादा न्यूट्रिएंट्स होते हैं इसमें। इसकी वजह से मछलियों को मरीन लाइफ को भी फायदा मिलता है। तो इस नॉर्मल सिचुएशन में जो गर्म पानी है वह ऑस्ट्रेलिया की तरफ चला गया और जो ठंडा पानी है वह साउथ अमेरिका की तरफ आ गया। अब जब पानी गर्म होता है तो वह इवैपोरेट ज्यादा आसानी से हो जाता है। और उस इवैपोरेशन की वजह से बादलों की फॉर्मेशन होती है और ज्यादा बारिश देखने को मिलती है ऑस्ट्रेलिया के पास। लेकिन अब इमेजिन करो दोस्तों कि यह ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ गई। यह हवाएं इतनी तेजी से नहीं बह रही पैसिफिक ओशन के ऊपर से। क्या होगा? जो अपवेलिंग है वह कमजोर होगी, ऑलमोस्ट होगी ही नहीं। जो सरफेस पर गर्म पानी है वह कंसिस्टेंटली गर्म ही रहेगा। जो बारिश ऑस्ट्रेलिया की तरफ होती थी, वह बारिश पैसिफिक ओशन के बीच में कहीं भी हो सकती है। तो ऑस्ट्रेलिया का रीजन काफी ड्राई बन जाएगा। यही फिनोमेना होता है एल नीनियो का जो कि एक साइकिल की तरह होता है। लेकिन यह कोई रेगुलर साइकिल नहीं है। कभी यह हर चार साल बाद हो जाता है, कभी पांच साल बाद तो कभी सात साल बाद होता है। लेकिन जब यह होता है एल नीनियो तो यह 6 से 12 महीने तक चलता है। लेकिन इस एल नीनियो की ड्यूरेशन के दौरान दुनिया भर के वेदर पैटर्न्स बदल जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया और साउथ ईस्ट एशिया में इसकी वजह से ज्यादा गर्मी पड़ती है, ज्यादा ड्राई कंडीशंस देखने को मिलती हैं। हीट वेव्स का रिस्क बढ़ जाता है और ऑस्ट्रेलिया में जो वाइल्ड फायर्स हुई थी आपको याद हो अगर 2020 में बहुत ही भयंकर वाइल्ड फायर्स हुई थी। उसके पीछे कारण भी यही एल नीनियो का इवेंट था। आखिरी एल नीनियो का इवेंट हुआ था 2018-19 में जो कि करीब जनवरी 2020 तक चला था। यही कारण कि ऑस्ट्रेलिया में बुश फायर्स दिसंबर 2019 में देखी गई थी। उसके बाद से आज के दिन जनवरी 2023 से लेकर अभी तक एक और एल नीनियो चल रहा है। इंटरेस्टिंग चीज यहां पर यह है कि साउथ अमेरिका पर एल नीनियो का उल्टा असर पड़ता है जो एशिया और ऑस्ट्रेलिया पर पड़ता है उसका। यानी कि वहां ज्यादा बारिश देखने को मिलती है। फ्लड्स का खतरा बढ़ जाता है। यही कारण कि आज ब्राजील में भयंकर फ्लड्स देखने को मिल रहे हैं। अब इसके अलावा दोस्तों एक उल्टा फिनोमेना होता है एल नीनियो का, जो कि है ला नीनियो। यह दोनों वर्ड स्पेनिश से आते हैं वैसे। एल नीनियो का मतलब है द बॉय और ला नीनियो का मतलब है द गर्ल। जो नॉर्मल कंडीशंस मैंने आपको बताई थी जो पैसिफिक ओशन में होती हैं, नॉर्मली, अगर वो एक्सट्रीम में चली जाएं तो ला नीनियो का इफेक्ट देखने को मिलता है। इसका मतलब क्या हुआ? जो ट्रेड विंड्स चल रही हैं वेस्ट की डायरेक्शन में वो और स्ट्रोंगली उस डायरेक्शन में चलने लगती है। इसकी वजह से और ठंडा पानी साउथ अमेरिका के पास आता है, और गर्म पानी ऑस्ट्रेलिया के पास आता है और और ज्यादा बारिश होने लगती है ला नीनियो के केस में ऑस्ट्रेलिया में। ला नीनियो के इवेंट्स यूजुअली ज्यादा लंबे चलते हैं, यह एक, दो, तीन, चार साल तक भी चल सकते हैं। 2018-19 के एल नीनियो के बाद जब ला नीनियो आया 2020-21 में, तो वह इतना एक्सट्रीम चला गया कि ऑस्ट्रेलिया में उसकी वजह से फ्लडिंग देखने को मिली, इतनी तेज बारिश हुई ऑस्ट्रेलिया में। मार्च 2021 की आप खबरें देख सकते हैं फ्लड्स इन ऑस्ट्रेलिया। यह एक बड़ा इंटरेस्टिंग चार्ट है जो आप स्क्रीन पर देख सकते हैं। इसमें पिछले 30 सालों में हुए एल नीनियो और ला नीनियो के इवेंट्स को ग्राफ पर डिपिक्ट किया गया है। जो ग्राफ ऊपर की तरफ उठ रहा है रेड कलर में वह एल नीनियो वाले इवेंट्स है और जितना ज्यादा ऊपर उठेगा उतना ही ज्यादा स्ट्रॉन्ग एल नीनियो का इवेंट रहा है। अभी तक का स्ट्रॉन्गेस्ट एल नीनियो का इवेंट 2015-16 में देखा गया था। उसके बाद 1997-98 वाला था और फिर अब जो हम देख रहे हैं 2023 और 2024 वाला। दूसरी तरफ नीचे ब्लू कलर में आप ला नीनियो के इवेंट्स देख सकते हैं। 2020-21 में लेटेस्ट वाला हुआ, जो कि ऑल द वे अप टू जनवरी 2023 तक चला। इससे पहले स्ट्रॉन्गेस्ट वाला जो ला नीनियो हुआ था वह 1999 और 2000 में हुआ था। और लेटेस्ट टाइम पर अगर आप जूम इन करेंगे तो आप देखेंगे कि एल नीनियो का ग्राफ वापस से नीचे जा रहा है। और साइंटिस्ट का मानना है कि जुलाई और अगस्त के महीने में ही ला नीनियो शुरू हो सकता है। इससे इंडिया पर क्या इंपैक्ट पड़ेगा? इससे इंडिया का जो मॉनसून है वह बेटर देन एवरेज हो सकता है। पिछले साल 2023 में जो बारिश का मौसम था उस समय बारिश इतनी ज्यादा नहीं हुई थी एल नीनियो की वजह से। और यही एल नीनियो एक बड़ा कारण है दोस्तों जिसकी वजह से 2023 और 2024 की गर्मियां बहुत गर्म रही। जिसकी वजह से सदन अफ्रीकन कंट्रीज में ड्राउट्स देखने को मिले हैं और दुबई में हुई भारी बारिश और फ्लड्स के पीछे भी इसका हाथ बताया जाता है, कुछ हद तक। अब साइंटिस्ट का मानना है कि इंसानों के द्वारा किए गए क्लाइमेट चेंज की वजह से यह एल नीनियो का इफेक्ट और ज्यादा एक्सट्रीम बनता जा रहा है। यानी कि एल नीनियो की वजह से आए फ्लड्स और ज्यादा खतरनाक बनते जा रहे हैं, हीट वेव्स और ज्यादा भयंकर बनती जा रही हैं। यही कारण है कि केरला में आज तक सिर्फ दो बार ही हीट वेव की वार्निंग दी गई है। पहली बार 2016 में था और दूसरी बार 2024 में। दोनों ही टाइम एक एल नीनियो चल रहा था। इंडियन मीटीओरोलॉजिकल डिपार्टमेंट का एक बेसिक क्राइटेरिया है हीट वेव को डिक्लेअर करने का। यह कहते हैं अगर प्लेंस में टेम्परेचर 40 डिग्री के ऊपर हो, कोस्टल एरियाज़ में टेम्परेचर 37 डिग्री के ऊपर हो और पहाड़ों में टेम्परेचर 30 डिग्री के ऊपर हो। इसके अलावा टेम्परेचर दो कोंसिक्यूटिव डेज़ के लिए 4.5 डिग्री सेल्सियस अबव नॉर्मल रहे तो एक हीट वेव डिक्लेअर की जाएगी। और अगर यह 6.4 डिग्री सेल्सियस अबव नॉर्मल रहेगा दो कोंसिक्यूटिव डेज़ के लिए तो एक सीवियर हीट वेव डिक्लेअर करी जाएगी। लेकिन अगर टेम्परेचर 45 डिग्री सेल्सियस के ऊपर क्रॉस करता है तो बिना और किसी कंडीशन के हीट वेव वैसे ही डिक्लेअर कर दी जाती है। अब यह तो हुई दोस्तों टेम्परेचर की बात लेकिन अपने आप में टेम्परेचर को इतना ज्यादा यूज़फुल मैट्रिक नहीं है। क्योंकि अगर आपने कभी नोटिस किया हो मई के महीने में दिल्ली में 45 डिग्री का सेल्सियस टेम्परेचर टॉलरेट करना ज्यादा आसान है एस कंपेयर टू मुंबई में 38 डिग्री सेल्सियस का टेम्परेचर टॉलरेट करना। मुंबई में 38 डिग्री ज्यादा अनबेयरेबल लगता है दिल्ली के 45 डिग्री के कंपैरिजन में। ऐसा क्यों है? ऐसा है ह्यूमिडिटी की वजह से। जितनी ज्यादा ह्यूमिडिटी होती है हवा में, उतना ज्यादा गर्म टेम्परेचर्स को टॉलरेट करना मुश्किल होते जाता है। ह्यूमिडिटी होती क्या चीज है वैसे? रिलेटिव ह्यूमिडिटी का मतलब है कि हवा एक पर्टिकुलर टेम्परेचर पर कितना मॉइस्चर होल्ड कर सकती है। 100 परसेंट रिलेटिव ह्यूमिडिटी का मतलब है कि एक सर्टेन टेम्परेचर पर हवा कंपलीटली सैचुरेट हो चुकी है। जितना मॉइस्चर वह होल्ड कर सकती है उतना कर रही है उससे ज्यादा नहीं कर पाएगी। यह चीज वैसे आपने स्कूल में भी पढ़ी होगी। और स्कूल से याद आया दोस्तों, आपकी पढ़ाई में मदद करने के लिए एक बहुत ही बढ़िया AI की ऐप है गिन्नी AI ट्यूटर। इस ऐप में क्लास 4 से लेकर क्लास 8 तक सारे सब्जेक्ट्स की सारी सीबीएसई की किताबों की नॉलेज है। तो सिर्फ क्लास वाइज सब्जेक्ट वाइज जाकर ही नहीं बल्कि हर सब्जेक्ट के चैप्टर वाइज जाकर भी यह ऐप आपको एमसीक्यू क्वेश्चन, ट्रू एंड फॉल्स के क्वेश्चन जनरेट करके दे सकती है। कोई भी कांसेप्ट किसी चैप्टर में नहीं समझ में आया आप इससे बड़ी आसानी से पूछ सकते हो। इतना ही नहीं किसी भी साइंस मैथ्स के क्वेश्चन को सॉल्व करने में मुश्किल हो रही है तो सिंपली क्वेश्चन की फोटो खींच के ऐप पर डालो और इसका AI आपको आंसर बता देगा। इनफैक्ट सॉल्यूशन को एक तरीके से निकालना है या दूसरे तरीके से समझाना है वो भी किया जा सकता है। टाइम के साथ-साथ इस ऐप में नई-नई क्लासेस भी ऐड हो रही हैं लेकिन अगर आप ऊपर वाली क्लासेस में है जैसे की 11th और 12th तो भी आप इससे डायरेक्टली चैट कर सकते हैं और फोटो चैट फीचर फिर भी आपके लिए काम करेगा। इसके अलावा इसमें PDF चैट और YouTube वीडियो चैट भी अवेलेबल है। यानी कि किसी भी YouTube वीडियो का लिंक आप इस ऐप में डालो। और फिर उस वीडियो की आपको अगर समरी चाहिए या कोई डाउट है उस वीडियो में उठाए गए किसी सवाल पर तो भी आप इससे पूछ सकते हो। फ्री टू डाउनलोड ऐप है इसका लिंक इस QR कोड में मिल जाएगा या नीचे डिस्क्रिप्शन में भी देख सकते हैं और ज्यादातर फीचर्स फ्री है। हालांकि कुछ फीचर्स जैसे कि YouTube वीडियो चैट और फोटो चैट फीचर्स पेड है। लेकिन चैट जीपीटी के कंपैरिजन में इसकी कॉस्ट आधी से भी कम है और परफॉरमेंस वही चैट जीपीटी 4 लेवल की है। आप खुद जाकर ट्राई आउट करके देख सकते हैं। अब टॉपिक पर वापस आते हैं। और बात यह है कि जितनी ज्यादा गर्म होती है हवा, उतनी ही ज्यादा इसकी कैपेसिटी बढ़ जाती है मॉइस्चर होल्ड करने की। गर्म हवा में ज्यादा मॉइस्चर होल्ड किया जा सकता है एस कंपेयर टू ठंडी हवा में। इसका मतलब है कि अगर ठंडी हवा और गर्म हवा दोनों की रिलेटिव ह्यूमिडिटी 100% है गर्म हवा में ज्यादा मॉइस्चर होगा। और जितनी ज्यादा ह्यूमिडिटी बढ़ती है, उतना ही मुश्किल होता जाता है हमारी बॉडी के लिए पसीनों को इवैपोरेट करना। और पसीने आना जैसा कि आप जानते हैं हमारी बॉडी का नंबर वन तरीका है हमारे को ठंडा रखने का। अगर हवा में बहुत-बहुत ज्यादा गर्मी है और बहुत-बहुत ज्यादा ह्यूमिडिटी है तो हमें पसीने आ ही नहीं पाएंगे और हमारी बॉडी अपने आप को ठंडा रख ही नहीं पाएगी। यानी कि बहुत ही जानलेवा हो सकता है। इसी रीज़न से टेम्परेचर और ह्यूमिडिटी दोनों को कंसीडर करना जरूरी है और एक मैट्रिक जो इन दोनों चीजों को साथ में कंसीडर करता है वह है हीट इंडेक्स। हीट इंडेक्स हमें बताता है कि एक्चुअली में जो गर्मी है बाहर वह कितनी गर्म फील हो रही है हमारी बॉडी को। फोन की वेदर ऐप पर आप अक्सर देखते होंगे मुंबई में जैसे टेम्परेचर लिख रखा है 31 डिग्रीज लेकिन फील्स लाइक 37 डिग्री सेल्सियस। कुछ ऐपस में इसे रियल फील करके लिखा जाता है। यह फील्स लाइक वाला इंडिकेटर हीट इंडेक्स से ही निकल कर आता है। इस चार्ट में आप देख सकते हैं अलग-अलग टेम्परेचर्स के लेवल और अलग-अलग रिलेटिव ह्यूमिडिटी और उनका करेस्पोंडिंग हीट इंडेक्स। अगर 35 डिग्री के टेम्परेचर पर 50% रिलेटिव ह्यूमिडिटी है तो आपको फील होएगा कि यह 41 डिग्री का टेम्परेचर हो जैसे। लेकिन इसी टेम्परेचर पर अगर 75% रिलेटिव ह्यूमिडिटी पहुंच जाती है तो फीलिंग आएगी 53 डिग्री सेल्सियस जितने खतरनाक टेम्परेचर की। और यह रेड कलर की कैटेगरी में आता है यानी एक्सट्रीम डेंजर। इस हीट इंडेक्स पर आपको एक हीट स्ट्रोक या सन स्ट्रोक होने का बहुत ही हाई चांस है। और यही रीज़न है कि फिलिपींस में जो अभी हीट वेव आई थी वह इतनी खतरनाक और जानलेवा क्यों थी? क्योंकि वहां पर हीट इंडेक्स 53 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। जो लोग इस चीज को नहीं जानते वह शायद एक्चुअल टेम्परेचर को देखकर कहें कि अरे टेम्परेचर तो सिर्फ 40 या 41 ही दिखा रहा है कोई इतनी भी ज्यादा गर्मी नहीं होगी। लेकिन हीट इंडेक्स पर यहां ध्यान देना बहुत जरूरी है। क्योंकि इवन 32 से लेकर 41 डिग्री का जो हीट इंडेक्स है उसमें भी आपको एक्सट्रीम कॉशन लेनी होती है। अगर आप धूप में ज्यादा टाइम बिताएंगे या फिर कोई फिजिकल एक्टिविटी करेंगे तो वहां भी पॉसिबल है कि आपको हीट स्ट्रोक हो जाए। ऐसे ही वह केसेस सुनने को मिलते हैं जहां पर लोग अपनी जान खो देते हैं गर्मी की वजह से, हीट वेव की वजह से। और यही रीज़न है कि टेम्परेचर वाइज दिल्ली में गर्मी अभी ज्यादा है लेकिन हीट इंडेक्स वाइज कितना बेयरेबल है बाहर रहना। जून एंड में यह इंटॉलरेबल हो जाता है। क्योंकि तब बारिश का मौसम नजदीक होता है और ह्यूमिडिटी बढ़ जाती है हवा में। हालांकि आज हालत ऑलरेडी इतनी खराब हो गई है कि हीट इंडेक्स 50 डिग्री सेल्सियस पर टच कर रहा है दिल्ली में। और इस रिपोर्ट के अनुसार अगले कुछ दिनों में यह 56 डिग्री सेल्सियस तक भी पहुंच सकता है। अब इसके अलावा एक और इफेक्ट है जिसकी वजह से लोकल लेवल पर हीट वेव्स का इंपैक्ट कहीं ज्यादा बढ़ जाता है। एक ऐसा इफेक्ट जिसका सॉल्यूशन कहीं ज्यादा आसान है और सारे इफेक्ट से। यह है अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट। एक शहर के अंदर अलग-अलग एरियाज में कुछ जगहें ज्यादा गर्म होती है कुछ जगहें ज्यादा ठंडी होती है। यह चीज आपने भी नोटिस करी होगी। जहां ज्यादा पेड़ लगे होते हैं पार्क में या कहीं भी और वहां का टेम्परेचर रिलेटिवली थोड़ा सा ज्यादा कंफर्टेबल रहता है बाकी एरियाज के कंपैरिजन में। और जिन एरियाज में सिर्फ बड़ी-बड़ी बिल्डिंग हैं कंक्रीट की, ग्लास की लंबी-लंबी बिल्डिंगें लगी हुई है। आठ-आठ लेन के हाईवेज बने हुए हैं, Asphalt बिछा हुआ है। यह जगहें कुछ ज्यादा ही गर्म रहती है। इन जगहों को अर्बन हीट आइलैंड्स कहा जाता है और एक बड़ा सिंपल रीज़न है इसके पीछे। बिल्डिंगों में लगा हुआ ग्लास, बिल्डिंगों में लगा हुआ कंक्रीट, सड़कों पर बिछा हुआ Asphalt, यह सारी चीजें हीट को अब्सॉर्ब करती हैं, सनलाइट को अब्सॉर्ब करती है। और एक शहर में जब बहुत सारा कंक्रीट एक साथ इकट्ठा हो वहां प्रॉपर वेंटिलेशन भी नहीं होती हवा की सर्कुलेशन भी नहीं होती। तो होता क्या है पूरे दिन भर गर्मी में सारी हीट ऑब्ज़र्व होती रहती है। हवा चलती नहीं ज्यादा और रात में जो हीट अब्सॉर्ब हुई है वह बाहर निकल कर आती है। इस इफेक्ट पर दिल्ली में एक स्टडी करी गई थी जिसने पाया कि जिन जगहों पर यह अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट देखने को मिल रहा है। जैसे कि कनोट प्लेस, सीताराम बाजार, भिका जी कामा प्लेस। यह जगहें 3 से 8 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म थी एस कंपेयर टू वह जगहें जहां पर ज्यादा पेड़ लगे हुए हैं जैसे कि हॉस कास्ट डिस्ट्रिक्ट पार्क, बुद्धा जयंती पार्क। सोच कर देखो दोस्तों 7 से 8 डिग्री सेल्सियस कितना बड़ा फर्क होता है। इससे आपको अहमियत पता चल जानी चाहिए पेड़ों की। और यही कारण है जिसकी वजह से मैं कहता हूं कि किसी भी शहर में सड़कों का जाल बिछा देना यह कोई डेवलपमेंट का इंडिकेटर नहीं होना चाहिए। मैंने एक पुराने वीडियो में कहा था जिसकी क्लिप काट कर कई लोग ट्विटर पर फैला रहे थे कि यह देखो यह तो डेवलपमेंट के खिलाफ है। क्या हमें सही में जरूरत है और हाईवेज की? क्या हमें सही में डबल हाईवेज की जरूरत है? डबल एयरपोर्ट्स की जरूरत है? क्योंकि यह जो एक्ज़िस्टिंग अब हाईवेज बनाए जा रहे हैं उनके लिए कितने फॉरेस्ट काटे जा रहे हैं दोस्तों? कई-कई ऐसे हाईवे हैं जिनको नेशनल पार्क के बीच में से निकाला जा रहा है, वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के बीच में से निकाला जा रहा है। शहरों के अंदर यह कंक्रीट और Asphalt बिछा देना, सड़कों को बड़ा करना मेरी राय में यह डेवलपमेंट नहीं है। मेरी राय में डेवलपमेंट का मतलब है कि लोगों के लिए ढंग की वॉकेबल प्लेसेस बनाई जाएं। ऐसे शहर बनाए जाए जहां बाहर का टेम्परेचर ज्यादा कंफर्टेबल हो क्योंकि इतनी ग्रीनरी हो कि लोग चलकर जा सके कहीं पर भी। गाड़ियों का कम से कम इस्तेमाल किया जाए। क्योंकि गाड़ियां भी अपने आप में हीट रिलीज करती है जिनकी वजह से अर्बन हीट आइलैंड का इफेक्ट और ज्यादा बढ़ जाता है। इस चीज की बात मैंने इस वाले वीडियो में करी थी जिसमें मैंने बताया था कि शहरों के अंदर जितनी ज्यादा जगहें ऐसी हों जहां पर गाड़ियों को कंपलीटली बैन कर दिया जाए उतना ही अच्छा होगा लोगों के लिए। और यह एक ऐसी चीज है जो ज्यादातर डेवलप्ड देशों के शहर समझने लग रहे हैं अब। पेरिस के शहर में ट्रांसफॉर्मेशन देख लो। वहां की सरकार ने बड़े स्केल पर गाड़ियों को बैन किया शहर के अंदर से, Asphalt को हटाकर पेड़ लगाए, साइकिलिंग को प्रमोट किया। यह सारी चीजें की ताकि यह अर्बन हीट आइलैंड का इफेक्ट कम हो और लोगों को एक ज्यादा कंफर्टेबल टेम्परेचर मिल पाए शहर में घूमने के लिए ताकि लोग पैदल चलकर जा सके एक से दूसरी जगह पर। पब्लिक ट्रांसपोर्ट को प्रमोट करना एक अल्टरनेटिव के तौर पर बहुत जरूरी है यहां पर। एयर कंडीशनर्स का इस्तेमाल किया जाना। एक और ऐसी चीज जिसकी वजह से यह अर्बन हीट आइलैंड का इफेक्ट बढ़ता है। गर्मी बढ़ती है बाहर, लोग घरों में AC चलाते हैं। घरों में AC चलाने का मतलब है कि दूसरी तरफ से बाहर गर्मी निकलेगी और बाहर का जो एरिया है, एनवायरनमेंट है वह ज्यादा गर्म रहेगी। इसका एक अल्टरनेटिव है नेचुरल तरीकों का इस्तेमाल किया जाए। बिल्डिंग के डिजाइन में वेंटिलेशन इस तरीके से की जाए कि AC की कम से कम जरूरत पड़े। हिस्टॉरिकली हमारे पूर्वज अक्सर ऐसी बिल्डिंगों को डिजाइन किया करते थे। दुबई में ही इन ओल्ड बिल्डिंग्स को देख लो इनके ऊपर एक इमारत सी बाहर आती है बिल्डिंगों के ऊपर से जिसके ऊपर वेंटिलेशन का एरिया छोड़ा गया होता है ताकि हवा सर्कुलेट हो सके घर के अंदर। इसके अलावा कई जगहों पर छतों को एक्चुअली में व्हाइट कलर से पेंट किया जाता है ताकि सनलाइट को रिफ्लेक्ट किया जा सके। येल यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर इस आर्टिकल को देखिए। अपने घरों की छतों को अगर आप वाइट कलर से पेंट कर दोगे तो 2 से 3 डिग्री सेल्सियस का फर्क तो इसी चीज से ही पड़ जाएगा। क्योंकि डार्क कलर्स सनलाइट को अब्सॉर्ब करते हैं और व्हाइट कलर रिफ्लेक्ट करता है सनलाइट। और यह चीज सिर्फ शहरों के लिए ही नहीं बल्कि रूरल एरियाज के लिए भी एप्लीकेबल है। व्हाइट पेंट के अलावा दूसरा अल्टरनेटिव हो सकता है अपने घरों की छतों पर ग्रीनरी प्लांट करना, घास लगाना या फिर पेड़ उगाना। आप पूछोगे घरों में AC लगाने की जगह और क्या कर सकते हैं हम? उसका अल्टरनेटिव क्या हुआ आज इस मॉडर्न जमाने में? तो इसका एक सीधा जवाब है रेडिएंट कूलिंग। यह एक नई टेक्नोलॉजी है जिससे कहीं ज्यादा पैसे बचते हैं AC के कंपैरिजन में। इसमें होता क्या है? आप दीवारों के अंदर आप पाइप्स लगाते हो पानी की जिसके अंदर से ठंडा पानी गुजरता है। और आपकी दीवारों में क्योंकि ठंडा पानी गुजर रहा है उससे आपका पूरा घर ठंडा रहता है बिना AC के। यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है जो कई नई बिल्डिंग्स में इस्तेमाल की जा रही है लेकिन असल में यह बहुत पुरानी है। पुराने जमाने में राजा महाराजा जो किले बनाया करते थे, फोर्स बनाते थे, ताजमहल जैसी चीजें बनाते थे, कैसे रखते थे वह उन्हें ठंडा? वॉटर चैनल्स का इस्तेमाल करके। पानी के छोटे-छोटे चैनल्स बिल्डिंग के आसपास बहते थे और पानी क्योंकि वहां से गुजरता था इससे वह पूरा एरिया आसपास का ठंडा रहता था, वही कांसेप्ट है यह। इस टेक्नोलॉजी को प्रमोट करने से ना सिर्फ एक शहर ज्यादा ठंडा रहेगा बल्कि पैसे भी बचेंगे, इलेक्ट्रिसिटी बिल भी कम आएगा। और इसके अलावा ओबवियसली सरकारों को फोकस करना होगा कि शहरों को ज्यादा से ज्यादा हरा भरा बनाया जाए। और ज्यादा पेड़ और ज्यादा पार्क्स ताकि यह हीट वेव का इंपैक्ट कम से कम हो सके। और यह सारे सॉल्यूशंस हमें जल्द से जल्द इंप्लीमेंट करने होंगे क्योंकि आने वाले समय में यह हीट वेव्स और खतरनाक बनने वाली हैं और और बड़ी बनने वाली हैं। एक रीसेंट स्टडी करी गई थी फ्यूचर प्रोजेक्शंस फॉर द ट्रॉपिकल इंडियन ओशन। इसके अनुसार कुछ ही सालों में हमें ऑलमोस्ट परमानेंट मरीन हीट वेव्स देखने को मिलेंगी इंडियन ओशन में। साल 2050 तक कई सारे एरियाज में 220 से लेकर 250 दिन साल में हीट वेव्स देखने को मिलेंगी। यह वीडियो इनफॉरमेटिव लगा दोस्तों तो यह वाला वीडियो जरूर देखिए। क्योंकि इसी में मैंने समझाया है कि अगर हमें शहरों को रहने लायक बनाना है तो गाड़ियों को बैन करना क्यों इतना जरूरी है? यहां क्लिक करके देख सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद।



