[0:01]जंगल के बीचो बीच शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर एक नई सड़क बनाने का काम शुरू हुआ था। चारों तरफ सिर्फ घने पेड़, परिंदों की आवाजें और हमारे तीन कलाकार, राजू, गोपाल और भावना।
[0:19]सूरज ढलने वाला था। ठेकेदार सुरेश अपनी पुरानी जीप स्टार्ट करते हुए बोला। अरे सुनो, मैं शहर जा रहा हूं राशन और सब्जी लेने। तुम लोग टेंट लगाओ। मैं दो घंटे में वापस आया। आज रात मस्त चिकन बनाएंगे। राजू ने हाथ हिलाते हुए कहा, ठीक है सेठ जी जल्दी आना। गोपाल के पेट में चूहे कबड्डी खेल रहे हैं। सुरेश गया। अंधेरा हो चुका था पर सुरेश अभी तक वापस नहीं आया। रात के 10:00 बज गए। राजू भाई, सेठ जी लगता है रास्ता भूल गए या किसी ढाबे पर खुद खा कर सो गए। चुप कर, फोन मिला कर देख। नेटवर्क कहां है यहां? पेड़ पर चढ़ के देख लिया बस नो सर्विस आ रहा है। सो जाओ सुबह आएंगे शायद। वो रात तो बस पानी पीकर कट गई। सुबह हुई फिर दोपहर हो गई। सुरेश का कोई अता पता नहीं था। अब असली समस्या शुरू हुई। पास में कोई गांव नहीं था। कोई दुकान नहीं। सिर्फ सड़क बनाने का सामान। सीमेंट, रोडी, रेत और वो बड़ा सा पीला कंक्रीट मिक्सर। गोपाल जमीन पर लेट गया। मैं मर जाऊंगा राजू भाई मेरा पेट अब पीठ से चिपक गया है।
[1:40]भावना ने अपने झोले से एक पैकेट निकालते हुए कहा, मेरे पास घर से लाया हुआ दो किलो कच्चा चावल है। सोचा था बाद में काम आएगा। राजू की आंखें चमक गई। अरे वाह भावना देवी है तू देवी पर पकाएंगे किसमें ना पतीला है ना कढ़ाई ना गैस सिलेंडर सब कुछ तो सुरेश की जीप में था। तीनों शांत हो गए। चावल है पर बर्तन नहीं। तभी झाड़ियों में से कुछ हिलने की आवाज आई। दो मोटी ताजी जंगली मुर्गियां वहां घूम रही थी। गोपाल ने पत्थर उठाया। अगर यह हाथ आ गई तो चावल के साथ मजा आ जाएगा। रुक पहले यह सोच पकाएंगे कहां? हेलमेट में खिचड़ी बनाएगा क्या? तभी राजू की नजर उस बड़े से लोहे के कंक्रीट मिक्सर पर पड़ी। उसके दिमाग की बत्ती जली। बर्तन मिल गया। कहां है दिख तो नहीं रहा। राजू ने मिक्सर की तरफ उंगली की, वो देखो हमारा ऑटोमेटिक बिरयानी मेकर। भावना ने माथा पीट लिया। तू पागल हो गया है क्या उसमें सीमेंट घुलता है, बिरयानी नहीं बनती। अरे सुनो तो मिक्सर लोहे का है। ड्रम के नीचे आग जलाएंगे। जब ड्रम घूमेगा तो चावल और चिकन बराबर पकेंगे। बिल्कुल हांडी बिरयानी जैसा टेस्ट आएगा बस यह मिक्सर बिरयानी होगी। भूख में इंसान कुछ भी कर सकता है। गोपाल और भावना मान गए। सुबह पहला मिशन था सफाई। गोपाल ने पानी का पाइप लगाया और राजू ने मिक्सर के अंदर घुस कर ऐसी सफाई की जैसे दिवाली की सफाई हो रही हो। भाई अगर सीमेंट का स्वाद आया तो। तो समझ लेना कैल्शियम की गोली खाई है। हड्डियां मजबूत होंगी। चुपचाप लकड़ी इकट्ठी कर। गोपाल और राजू ने बड़ी मुश्किल से उन जंगली मुर्गियों को पकड़ा। पर आखिर में चिकन हाथ आ ही गया। मसाले के नाम पर उनके पास ट्रक के टूल बॉक्स में पड़ी कुछ सूखी लाल मिर्च थी जो ड्राइवर नजर उतारने के लिए रखता था। और भावना के पास थोड़ा नमक था। अदरक, लहसुन तो भूल ही जाओ। मिक्सर के ड्रम के नीचे एक बड़ी सी आग जलाई गई। पहले पानी डाला गया। पानी उबलने लगा तो राजू चिल्लाया, भावना, डाल चावल। भावना ने चावल मिक्सर के मुंह में डाल दिए। फिर कटा हुआ चिकन और फिर मिर्च और नमक डाला गया। राजू ने मिक्सर का इंजन स्टार्ट कर दिया।
[4:18]ड्रम घूमने लगा। अंदर चावल और चिकन डांस कर रहे थे। गोपाल आग में लकड़ियां डालते हुए बोला। राजू भाई खुशबू तो आ रही है पर यह मिक्सर की आवाज से लग रहा है जैसे सड़क बन रही है खाना नहीं। यह खुशबू मेहनत की है पगले। देखना फाइव स्टार होटल फेल है इसके आगे। करीब 45 मिनट तक मिक्सर चलता रहा। बीच-बीच में राजू इंजन बंद करके अंदर देख लेता।
[4:53]बस थोड़ा और दम लग रहा है अभी।
[5:09]आखिरकार राजू ने ऐलान किया, बिरयानी तैयार है इंजन बंद करो। अब अगला सवाल खाएंगे किस में? प्लेट तो थी नहीं। भावना ने समझदारी दिखाई और पास के केले के पेड़ से एक बड़े-बड़े पत्ते तोड़ लाई। तीनों ने जमीन पर पत्ते बिछाए। पर निकालेंगे कैसे? हाथ डाला तो जल जाएगा। आज हम शाही अंदाज में खाएंगे बेलचा सर्विस। राजू ने मिक्सर को अनलोड मोड पर डाला। जैसे ही ड्रम उल्टा घुमा गरमागरम धुआं छोड़ती हुई लाल मिर्च वाली चिकन बिरयानी सीधा बेलचे पर गिर गई।
[5:52]राजू ने एक बेलचा भरकर गोपाल के पत्ते पर डाला। फिर भावना के और फिर अपने।
[6:04]गोपाल ने पहला निवाला खाया। उसकी आंखें बड़ी हो गई। तभी भावना ने पूछा, कैसा है? सीमेंट लग रहा है क्या? गोपाल बोला, अरे अरे यह तो कमाल है मसाला हर दाने में मिक्स हुआ है। मिक्सर ने तो कमाल कर दिया। सच में मिक्सर के घूमने से चावल और चिकन इतने अच्छे से घुलमिल गए थे कि वैसा शायद हाथ से भी नहीं बन पाता। तीनों ने जम कर खाया। हंसी मजाक चल रहा था तभी राजू बोला, अगली बार से सड़क बनाने का कॉन्ट्रैक्ट नहीं मिक्सर बिरयानी का स्टॉल लगाएंगे। रात के करीब 11:00 बजे सुरेश ठेकेदार भागता हुआ आया। उसके कपड़े मैले थे और चेहरा उतरा हुआ था। अरे तुम लोग जिंदा तो हो। मेरी जीभ खराब हो गई थी 20 किलोमीटर पीछे पैदल आ रहा हूं मैं जंगल से। मुझे लगा तुम लोग भूख से बेहोश पड़े होंगे। सुरेश ने नजारा देखा। तीनों मजे से केले के पत्ते पर ढेर सारा खाना खा रहे थे। आग जल रही थी। सुरेश ने हवा सूंगी, यह चिकन बिरयानी की खुशबू कहां से आ रही है। और यह चावल कहां से आया? कोई कैटरिंग वाला आया था क्या यहां?
[7:15]राजू ने मुस्कुराते हुए अपना बेलचा उठाया जिसमें अभी भी थोड़ी बिरयानी बची थी। आओ सेठ जी आओ, कैटरर नहीं इंजीनियर राजू का दिमाग चला है। यह लीजिए गरमागरम कंक्रीट मिक्सर दम बिरयानी स्पेशल ऑफर। सुरेश की आंखें फटी की फटी रह गई। उसने मिक्सर के अंदर झांका फिर इनके हाथ में बेलचा देखा। भूख तो उसे भी लगी थी। उसने बिना सवाल किए एक पत्ता उठाया और बोला, भाई डाल दे एक बेलचा मेरे लिए भी। भूख से जान निकल रही है। सुरेश ने खाया और बोला, जिंदगी में ऐसी बिरयानी नहीं खाई। इसमें एक अलग ही स्मोकी फ्लेवर है। गोपाल धीरे से बोला, हां सेठ जी वो शायद इंजन के धुएं और थोड़े डीजल की महक होगी। सब जोर से हंस पड़े। जंगल गूंज उठा। इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि मुसीबत के वक्त रोना नहीं चाहिए। बस थोड़ा सा दिमाग और जुगाड़ लगाना चाहिए। भूख और मजबूरी इंसान को सबसे बड़ा इंजीनियर बना देती है।



