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संघ की कार्यपद्धति || दत्तोपंत ठेंगड़ी || DATTOPANT THENGADI

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[0:00]संभाषण बंधुओं, हम द्वितीय वर्ग के लिए आए हैं। तो यह स्पष्ट है कि संघ के विषय में प्राथमिक जानकारी प्रथम वर्ष में प्राप्त करने के पश्चात ही हम लोग द्वितीय वर्ष के लिए आए हैं।

[0:34]राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सिद्धांत, ध्येय, कार्यपद्धति आदि विषयों में प्राथमिक बातें हम जानते हैं। संक्षेप में हम यह जानते हैं कि हमारा ध्येय है परम वैभवं ने तुम में तत् राष्ट्म। यह स्वराष्ट्र यानी हिन्दू राष्ट्र परम वैभव तक ले जाना यह ध्येय है। उसके लिए साधन है विध्यास्य धर्मस्य संरक्षणम। धर्म का संरक्षण यह साधन है। इस साधन का आधार है विजय त्रिजानस समवाता कार्य शक्ति है। हमारी विजयशालिनी संगठित कार्यशक्ति याने संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन यह उसका आधार है। तो संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन यह आधार इस आधार के सहारे धर्म का संरक्षण, उसके फलस्वरूप हिन्दू राष्ट्र का परम वैभव। यह साध्य साधन विवेक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने रखा है। और इसमें संपूर्ण हिन्दू राष्ट्र का संगठन यह जो आधारभूत कार्य है वह कार्य संघ करेगा ऐसा तय किया है। यह सब बातें हम जानते हैं केवल पुनस्मरण के लिए संक्षेप में मैं बता रहा हूँ। संपूर्ण हिन्दू राष्ट्र का संगठन यह कार्य संघ ने अपनी तरफ लिया। जिसका मतलब होता है कि हिन्दू राष्ट्र के हर एक घटक को संपूर्ण राष्ट्र के साथ एकात्म बनाना एकात्मता का संस्कार देना मैं अलग नहीं पृथक नहीं स्वतंत्र नहीं राष्ट्र शरीर का एक अंग मात्र हूँ अवयव मात्र हूँ यह साक्षात्कार हर एक को कराना। इस तरह के जो साक्षात्कारित हिन्दू है यानी स्वयंसेवक है उनका अनुशासन बद्ध संगठन खड़ा करना। इस संगठन की सीमाएं बढ़ाते बढ़ाते बढ़ाते इतनी बढ़ाना के संघस्थान की सीमाएं और हिंदुस्तान की सीमाएं सम व्याप्त हो जाए। माने संपूर्ण हिन्दू राष्ट्र ही संगमय हो जाए और संघ हिन्दू राष्ट्र में विलीन हो जाए। संघ और हिन्दू समाज यह द्वैत समाप्त हो जाए यह धारणा लेकर संघ का काम चल रहा है। संपूर्ण समाज को सुसंगठित करने की दृष्टि से उपयुक्त कार्य पद्धति का विकास भी किया गया है। जिसका केंद्र बिंदु दिन प्रतिदिन का एकत्रीकरण। दिन प्रतिदिन एकत्रित आने के पश्चात सामूहिक कार्यक्रम सामूहिक कार्यक्रम के माध्यम से सामूहिक मन का निर्माण होता है। समष्टिगत कार्यक्रम के माध्यम से समष्टिगत मन का निर्माण होता है। इस मनोवैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर सामूहिक कार्यक्रम उनके द्वारा संस्कार देना। हर एक हृदय पर समाज के साथ एक आत्मता का संस्कार अंकित करना। यह जिसका केंद्र बिंदु है। दिन प्रतिदिन का एकत्रीकरण। यह नित्य कार्यक्रम जिसका है। और बाकी फिर कुछ नैमित्य कार्यक्रम जिसमें साल में नियमित रूप से आने वाले छ उत्सव और अनियमित रूप से नैमित्तिक कितने ही कार्यक्रम छोटे-बड़े होते रहते हैं। तो नित्य और नैमित्य कार्यक्रम केंद्र बिंदु दिन प्रतिदिन का एकत्रीकरण इस तरह की कार्य पद्धति का विकास किया। और संघ ने ऐसा कहा कि संघ जो कुछ भी हासिल करना चाहता है उस दृष्टि से संघ की कार्यपद्धति स्वयं पूर्ण है। स्वयं पूर्ण है इसके दोनों मतलब है। यदि हम इस कार्यपद्धति को लेकर चलते हैं तो संपूर्ण समाज को सुसंगठित करने के लिए दूसरे किसी भी पूरक सप्लीमेंट्री कार्य पद्धति की आवश्यकता नहीं। इसको यदि हम छोड़ देते हैं मोह वश तो दूसरी कोई भी ऐसी कार्यपद्धति हो नहीं सकती जो वैकल्पिक पर्याय सब्स्टिट्यूट अल्टरनेटिंग इस नाते काम कर सकती है। तो इस पद्धति को लेकर काम करते हैं तो पूरक कार्यपद्धति अनावश्यक हो जाती है। मोह वश इस कार्यपद्धति को छोड़ देते हैं जल्दबाजी में तो दूसरी कोई वैकल्पिक कार्य पद्धति हो ही नहीं सकती। दोनों अर्थों में हम लोगों ने कहा कि संघ की कार्य पद्धति यह स्वयं पूर्ण है। फिर संघ की कुल मिलाकर जो योजना है वह भी मामूली तौर पर हम लोग जानते हैं। संघ ने कहा कि हम हिन्दू समाज का संगठन करेंगे। याने हर एक हिन्दू को संपूर्ण समाज के साथ एकात्मता का साक्षात्कार कराना। एकात्मता का संस्कार देना। ऐसे लोगों का संगठन खड़ा करना। तो स्वयंसेवक का निर्माण और संगठन। इतना ही काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करेगा ऐसा कहा। आधारभूत कार्य है। किंतु अब भी प्रश्न निर्माण होता है। 1925 में भी यह प्रश्न निर्माण हुआ। कि आपने ध्येय बहुत बड़ा रखा है। परम वैभवम ने तुम में तत् स्वराष्ट्र। इस ध्येय को प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के कामों की आवश्यकता है। राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश करते हुए। वहां उपयुक्त कार्यों की रचना और विचारों का विकास करने की आवश्यकता है। और संघ ने कहा कि हम केवल संगठन करेंगे संगठन के अलावा कुछ नहीं करेंगे। ऑर्गेनाइजेशन इज अवर बिगिनिंग एंड ऑर्गेनाइजेशन आवर एंड। संगठन यह हमारा प्रारंभ है। संगठन यही हमारा अंत है। स्वयंसेवक का निर्माण और उनका संगठन इतना ही काम संघ करेगा और दूसरा कोई भी भला काम संघ नहीं करेगा। तो उस समय भी कहा गया आज भी पूछा जाता है कि दोनों का मेल कैसे बिठाया जा सकता है। परम वैभव प्राप्त करने के लिए सैकड़ों काम करने की आवश्यकता है। राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में। और आप कह रहे हैं कि आप कुछ नहीं करने वाले और संघ कुछ दूसरा काम नहीं करेगा केवल स्वयंसेवकों का निर्माण और उनका संगठन। तो फिर यह बाकी सारे काम कैसे हो सकते हैं और बगैर उनके परम वैभव कैसे प्राप्त हो सकता है। तो प्रारंभ से यह कहा गया कि संघ केवल संगठन करेगा। स्वयंसेवकों का निर्माण करेगा। उनको उपयुक्त संस्कार देगा। उनका अनुशासन बद्ध संगठन खड़ा करेगा। इस अनुशासन बद्ध संगठन को आशेष हिमांचल बढ़ाएगा। इतना ही काम संघ करेगा। लेकिन संघ से संस्कार और प्रेरणा प्राप्त किए हुए स्वयंसेवक। दिन प्रतिदिन शाखा में आने वाले संघ से संस्कार और प्रेरणा प्राप्त किए हुए स्वयंसेवक अपनी अपनी रुचि प्रकृति प्रवृत्ति के अनुकूल राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश करेंगे। और वहां कार्य और विचारों की रचना करेंगे। कार्य और विचारों की रचना यह स्वयंसेवकों का दायित्व है। स्वयंसेवकों का निर्माण यह संघ का दायित्व है। स्वयंसेवकों का दायित्व कार्यक्षेत्रों का निर्माण है।

[8:35]वे अपनी अपनी रुचि प्रकृति प्रवृत्ति के अनुकूल विभिन्न क्षेत्र में प्रवेश करते हुए कार्य और विचारों की रचना करें। लेकिन उसमें तीन तरह की परहेज रखनी चाहिए ऐसा शुरू से कहा गया। पहली बात कि हम राष्ट्र जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रवेश करते हैं तो वहां के कार्य की रचना और विचारों का विकास यह सस्ती लोकप्रियता के पीछे न लगते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जो सिद्धांत और आदर्श है उन्हीं के प्रकाश में कार्य की रचना और विचारों का विकास हम करे यह एक बात। दूसरा हमारे स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश करने के पूर्व उन क्षेत्रों में काम करने वाले अलग-अलग लोग पहले से है मौजूद है विद्यमान है। उन्होंने वहां कुछ काम का ढंग वायुमंडल आदतें निर्माण की है। कुछ अच्छी होगी कुछ खराब भी होगी। इसके कारण हो सकता है कि वायुमंडल अच्छा नहीं रीति-नीति अच्छी नहीं काम की पद्धति अच्छी नहीं। अब जिस क्षेत्र में हम जाते हैं वहां तुरंत यश प्राप्त हो इस दृष्टि से जो गलत आदत है वहां पहले से चल रही उन्हीं का स्वीकार करते हुए हम तुरंत कैसे यशस्वी हो सकते हैं। तो गंगा गए गंगा दास जमुना गए जमुना दास ऐसा करना नहीं है। तो विभिन्न क्षेत्रों को परिष्कृत करने के लिए साफ करने के लिए हम जा रहे हैं। हमें यश प्राप्त होने में देर हो सकती है इसमें आपत्ति नहीं लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हमें आपसी व्यवहार की जो रीति-नीति पद्धति सिखाई है। उसी रीति-नीति पद्धति को इंट्रोड्यूस करना है अपने क्षेत्र में हो सकता है इसके कारण यश प्राप्ति में कुछ देर हो किंतु जल्दबाजी में आकर गंगा गए गंगा दास जमुना गए जमुना दास ऐसा करना नहीं है। यह दूसरी बात। और तीसरी बात के सर्वसाधारण स्वयंसेवक के लिए भी यह कहा गया है कि प्रतिदिन शाखा पर आना चाहिए। यह बड़ा विचित्र है। एक तरफ हम कहते हैं कि संग में संस्कार दिए जाते हैं। लेकिन दूसरे तरफ हम देखते हैं कि आदमी बुड्ढा भी हो जाता है बाल पक जाते हैं चलना कठिन हो जाता है तो भी निकल पहनकर शाखा पर आ जाओ यह आग्रह चलता ही रहता है। मैंने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं। जैसे मिलों में होता है फैक्ट्री में होता है। कि इधर कपास डाल दिया उधर मैन्युफैक्चर गुड एक बार हो गया कि फिर से मशीनरी में डालने की आवश्यकता नहीं पक्का माल हो जाता है। वैसे 5 साल 10 साल तक शाखा में आ गए फिर यह मैन्युफैक्चर स्वयंसेवक हो गया फिर जीवन भर शाखा में आने की आवश्यकता नहीं अब तुम पक्का स्वयंसेवक हो गए हो सर्टिफाइड। ऐसा नहीं है। यहां संस्कार होते हैं। यह भी प्रतिज्ञा है और आखिर तक हर दिन शाखा पर आना है। यह भी कहा गया है। जिसका मतलब होता है कि संस्कार होते हैं यह सही है किंतु मनुष्य के मन की रचना ही ऐसी है। कि बाह्य वायुमंडल के संपर्क में हम जब आते हैं तो अच्छे लोगों के संस्कार भी धूमिल हो जाते हैं। वह जो मालिन्य है उसको हर दिन दूर करने की आवश्यकता है। पीतल का बर्तन जो है उसको हर दिन साफ करने की आवश्यकता है। इस विजयादशमी को एक बार पीतल का बर्तन साफ किया उसको आलमीरा में रख दिया अब अगले विजयादशमी में ही उसको मांज लेंगे इससे काम नहीं चलेगा हर दिन साफ करना पड़ता है। वैसे यहां संस्कार दिए जाते यह भी सही है लेकिन उनको कायम रखने के लिए हर दिन शाखा पर आकर फिर से संस्कारों की रिवीजन करना यह भी आवश्यक होता है। दोनों बातें कही गई। यह सर्वसाधारण स्वयंसेवक के लिए भी कहा गया है। अब जो विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हैं। वह तो जानबूझकर ऐसे कार्यक्षेत्र में है जहां पहले से गलत वायुमंडल लोगों ने तैयार किया है। उनके लिए तो मन को परिष्कृत करने की आवश्यकता सामान्य स्वयंसेवक की तुलना में अधिक हुआ करती है। इस दृष्टि से सामान्य स्वयंसेवक का दिन प्रतिदिन के उपस्थिति के विषय में जितना आग्रह होगा उससे अधिक आग्रह पूर्वक विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों ने दिन प्रतिदिन का उपस्थिति का आग्रह रखना चाहिए। ये तीन बातों की परहेज। एक। संघ के सिद्धांतों, आदर्शों के प्रकाश में ही अपने-अपने कार्य क्षेत्र में विचारों का विकास और कार्य की रचना हो। दूसरा संघ ने जो आपसी व्यवहार की रीति-नीति पद्धति बताई है। वही हम अपने-अपने कार्यक्षेत्र में इंट्रोड्यूस करें। और तीसरा कि सर्वसाधारण स्वयंसेवक से भी अधिक आग्रह दिन प्रतिदिन के उपस्थिति के विषय में हमारा रहे। तीन बातों की परहेज के साथ यह कहा कि हमारा स्वयंसेवक अपने रुचि प्रकृति प्रवृत्ति के अनुकूल विभिन्न कार्यक्षेत्रों में जाएंगे। और वहां कार्य का विकास विचारों विचारों का विकास कार्य की रचना करेंगे। इस तरह से राष्ट्र के परम वैभव के लिए आवश्यक वह सभी कार्य हो गए। कोई कार्य अछूता नहीं रहेगा। लेकिन यह सारे कार्य स्वयंसेवक करेंगे संघ नहीं करेगा। संघ स्वयंसेवकों का निर्माण करेगा। स्वयंसेवकों ने इन सब बातों का निर्माण करना है। एक तरह से डिवीजन ऑफ लेबर श्रम श्रम विभाजन है। कि संघ ने स्वयंसेवकों का निर्माण करना स्वयंसेवकों ने कार्यक्षेत्रों का विकास करना। यह एक ऑल आउट स्कीम कुल मिलाकर योजना पहले से बताई गई। और इसमें आधारभूत कार्य कुछ होगा तो वह स्वयंसेवकों का निर्माण और उनका संगठन और यह आधारभूत कार्य संघ ने स्वयं हाथ में लिया है। और इस दृष्टि से कार्यपद्धति का विकास किया। जैसे मैंने कहा दिन प्रतिदिन का एकत्रीकरण इसका केंद्र बिंदु है। इसके द्वारा उपयुक्त संस्कार मन पर अंकित किए जाते हैं। एकात्मता का संस्कार मन पर अंकित होता है। और उसके आधार पर फिर विभिन्न कार्यक्षेत्र में स्वयंसेवक काम कर सकते हैं। इस तरह का एक कुल मिलाकर एक योजना इस तरह की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सोची। 1925 से ही सोची। उसके मुताबिक काम चल रहा है और इतने साल से अपना काम चल रहा है। राष्ट्र पुनर्निर्माण की दृष्टि से। यही ऑल आउट स्कीम यह उपयुक्त है।

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