[0:03]संत मत, संत मत क्या है? संत मत कोई धर्म नहीं। यह संतों का उपदेश है और इसका संबंध किसी खास संत से नहीं, बल्कि संसार के सभी संतों महात्माओं से है। और सभी संतों महात्माओं का एक ही उपदेश है। धर्मों के रीति-रिवाज और कर्मकांड अलग हैं, पर रूहानियत सभी धर्मों की तह में एक ही है। संत महात्माओं का संबंध भी इसी रूहानियत की शिक्षा के साथ है। धार्मिक रीति-रिवाजों या कर्मकांड के साथ नहीं, उनका उद्देश्य हमेशा केवल रूहानियत का प्रचार करना होता है। संत मत का अर्थ ही संतों का उपदेश है और संत हमें धार्मिक रीति-रिवाजों या कर्मकांड के साथ नहीं जोड़ते। वे हमें परमात्मा की प्राप्ति का सही व सच्चा मार्ग व रास्ता समझाते हैं और परमात्मा जब भी प्राप्त होता है संतों के बताए हुए मार्ग पर चलकर ही प्राप्त होता है।
[1:12]इसी कड़ी में आज हम पहली पातशाही श्री गुरु नानक देव जी महाराज का शब्द ले रहे हैं, जिसमें उन्होंने परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बड़े ही अच्छे तरीके से बताया है। राग राग श्री राग मोहल्ला पहला घर पहला। वणज करो वणजारियों वक्खर ले हो संभाल तैसी वस्तु विसाहीय जैसी निभै नाल। आगे साहस जाणे हैं लैसी वस्तु संभाल। यह पहली पातशाही श्री गुरु नानक देव जी महाराज की वाणी है। आपने हम लोगों को व्यापारी कहकर संबोधित किया है। हमें वणजारा कहा है। आप अपनी इस वाणी में हमें इस संसार की असलियत के बारे में बता रहे हैं कि हम कौन हैं, यह संसार क्या है और परमात्मा कौन है? वह हम उसकी प्राप्ति कैसे करेंगे? हम सच्चा सुख किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं? संत महात्मा जब-जब इस संसार में आते हैं, तो हम सब जीवों को पार लगाने के लिए आते हैं। वे हमें हमारे असली घर सचखंड पहुंचाने के लिए आते हैं। असल में संत महात्मा मालिक का ही रूप होते हैं। वे मालिक से मिले होते हैं और हमारे भले के लिए, हमारे लाभ के लिए, हमारे प्रॉफिट के लिए इस संसार में मनुष्य के जामे में आते हैं। संत महात्मा अपने उपदेश में ऐसी वाणी हमारे सामने रखते हैं, जिस वाणी को सुनकर हम सबके मन में कुछ असर हो सके, जिसको कि हम समझ सके। इस वाणी में गुरु साहिब ने यह शब्द फरमाया है। आप हमें वणजारे व्यापारी कहकर संबोधित कर रहे हैं कि ऐ मेरे वणजारियों, व्यापारियों, आप इस संसार में वणज करने के लिए व्यापार करने के लिए आए हो। और उस परमात्मा ने आपको इस संसार में व्यापार करने के लिए ही भेजा है। अब कोई भी व्यापार करने के लिए पूंजी यानी कैपिटल की जरूरत होती है, रिक्वायरमेंट होती है। परमात्मा ने भी हमें इन श्वासों की अनमोल पूंजी के साथ इस संसार में भेजा है। यह पूंजी बड़ी अनमोल है। इस पूंजी के जरिए ही हमें इस संसार में व्यापार करना है। अब हमें विचार करना चाहिए जो भी सांसारिक काम धंधे व्यापार हम करते हैं, क्या कभी हम सोचते हैं या यह चाहते हैं कि उस काम धंधे में हमें घाटा पड़े, हमारा लॉस हो, हमें नुकसान हो?
[4:09]हमको तो हर काम में मुनाफा चाहिए, प्रॉफिट चाहिए। घाटे का सौदा लॉस का सौदा कोई भी नहीं करना चाहता। इस सांसारिक काम धंधे में हम घाटा नहीं चाहते, हर कोई फायदा ही चाहता है। लेकिन जो असल काम है, रियल वर्क है, जिस काम को व्यापार को बिजनेस को वणज को करने के लिए परमात्मा ने हमें भेजा है, उस व्यापार को काम को हम भूले हुए बैठे हैं। अब उसी काम की सच्चे व्यापार की यादें हमें आज की वाणी में गुरु साहिब करवा रहे हैं। आप फरमाते हैं, वणज करो वणजारियों, वक्खर ले हो संभाल। कहते हैं वस्तु को सामान को कि वह व्यापार आपने करना है, उस वस्तु का व्यापार आपने करना है, उस वस्तु को संभाल कर रखो। अब पहले तो हमें यह विचार करना है कि वह कौन सी वस्तु है जो कि हमारी श्वासों की पूंजी से भी ज्यादा कीमती है। क्योंकि हमें घाटे का सौदा नहीं करना, हमें तो मुनाफे का सौदा करना है। अब मुनाफे का सौदा, नफे का सौदा तभी होगा जब हम उस वस्तु का वखखर का व्यापार करें जो कि हमारी श्वासों की पूंजी से भी ज्यादा कीमती है। जिसकी हम खरीदारी करें ताकि हमें घाटा ना पड़े। संत महात्मा बड़े ही सुंदर ढंग से साफ-साफ लफ्जों में समझाते हैं कि ऐसी वस्तु जो हमें हमारे असल घर असली मुकाम तक पहुंचा दे, वह वस्तु जब हम अपनी श्वासों की पूंजी के जरिए खरीदेंगे, तब यह हमारा मुनाफे का सौदा होगा।
[6:03]लेकिन वह वस्तु क्या है? जिसका कि हमें व्यापार करना है, बिजनेस करना है, जिसकी हमें संभाल करनी है। जब हम संतों महात्माओं के सत्संग में जाते हैं, तो वहां हमें इस वस्तु का पता लगता है। कि हमें उस प्रभु परमात्मा के सच्चे नाम की खरीदारी करनी है, उसे प्राप्त करना है। उस नाम के जरिए ही हम हमारे घर परमात्मा के पास पहुंच सकेंगे। अब क्या करना है कि हमें नाम की वस्तु को लेने के बारे में सोचना है। नाम कि वह कैसे और कहां मिलेगा? अब यही बात श्री अब यही बात श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज फरमाते हैं। जिस वक्खर को लैन तू आया राम नाम संत घर पाया। जिस वस्तु को सौदे को लेने के लिए हम आए हैं, वह वस्तु वह नाम का धन नाम की दौलत वह सौदा संतों महात्माओं के पास उनकी शरण में उनकी संगति में जाने से मिलेगा।
[7:10]संत महात्मा उस मालिक से मिलाप का रास्ता बताने के लिए हमारी मदद करने के लिए इस दुनिया में आए हैं। अब हम इंसान हैं, जब तक कोई हमारे जैसा हमारी भाषा में हमारी लैंग्वेज में हमें ना समझाए हमें कुछ समझ नहीं आती। इसलिए जब तक समय का जीवित देहधारी संत सतगुरु हमें मालिक से मिलने का तरीका, रास्ता नहीं समझाए, हम खुद उस परमात्मा की प्राप्ति नहीं कर सकते हैं। बिन काया ब्रह्म कैसे बोले ब्रह्म बोले काया के ओले। बिना शरीर धारण किए स्वयं परमात्मा भी हमें नहीं समझा सकते। हमें समझाने के लिए ही मालिक परमात्मा सतगुरु के रूप में शरीर धारण करके आकर हमें समझाते हैं, उपदेश करते हैं। जब हम महात्माओं के सत्संग में जाते हैं, उनकी वाणी को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। वह अपनी वाणी, अपने सत्संग के जरिए हमारी शंकाओं, भ्रमों, वहमों को दूर कर देते हैं। जब हमारे अंदर के सभी सवालों का जवाब मिल जाता है, वहम व भ्रम दूर हो जाते हैं, हमारे सभी डाउट क्लियर हो जाते हैं। हमें संतों महात्माओं पर पूर्ण विश्वास व भरोसा हो जाता है। हम संतों महात्माओं से विनती करते हैं कि हमें हमारे असल घर पहुंचने का प्रभु की प्राप्ति का उसकी भक्ति का सही तरीका सच्चा साधन समझा दीजिए। महात्मा तो स्वयं दया का सागर हैं। आए ही वह हमारे उद्धार के लिए हैं। वह दया करके हमें मालिक की प्राप्ति का साधन समझा देते हैं। उसकी भक्ति का रास्ता बता देते हैं। वह हमें उस परमात्मा के सच्चे नाम, सच्चे नाम की बख्शीश प्रदान करते हैं।
[9:15]नाम की अनमोल वस्तु हमें सौंप देते हैं। परमात्मा की प्राप्ति का युगों-युगों से केवल और केवल एक ही तरीका चला आ रहा है कि वह परमात्मा जब भी मिलेगा अपने संतों के द्वारा प्रदान किए गए सच्चे नाम के जरिए ही मिलेगा। स्वयं मालिक ने यह कानून बनाया है। गुरु अर्जुन देव जी महाराज फरमाते हैं, जिसका गृह तिन दिया ताला कुंजी गुरु सौंप आई, अनेक उपाओ कर नहीं पावे बिन सतगुरु शरणाई। जिस परमात्मा ने हमें पैदा किया है, नाम की दौलत हमारे अंदर रखकर हमारे लिए उसका भेद संतों के हवाले कर दिया है। इसलिए उसे प्राप्त करने के लिए हमें संतों महात्माओं की सोहबत करनी है, उनकी शरण में जाना है। संत महात्मा कही बाहर से कोई चीज लाकर हमारे अंदर नहीं डाल देते। वे तो हमें बताते हैं कि भाई, तू यह तरीका अपना, इस साधन के जरिए, इस विधि के जरिए मालिक का उसके नाम का भजन सुमिरन कर। बशर्ते, वह नाम हमारे अंदर ही है। लेकिन जब तक महात्मा रास्ता या तरीका, साधन या मेथड नहीं बताएं, हमारा कुछ भी नहीं बनना है। जब हम महात्माओं की शरण में आकर उनके कहे अनुसार संत मत पर चलते हैं, उनकी शिक्षा पर अमल करते हैं, तो वह कुछ बंदिशें कुछ शर्तें भी हम पर लगा देते हैं। हमें साफ-सुथरा जीवन जीने के बारे में बताते हैं। शाकाहारी भोजन करने की नसीहत देते हैं। हक हलाल की कमाई करने के लिए भी कहते हैं और नेक चाल चलन पर चलने के लिए भी बताते हैं। इस तरह धीरे-धीरे, स्टेप बाय स्टेप, बड़े ही सिस्टेमेटिक ढंग से हमें साफ करते हैं। असल में यह नियम व शर्तें वे हमें कोई दुख या दर्द देने के लिए या बंदिशों में बांधने के लिए नहीं लगाते। यह तो इसलिए हैं कि इनके जरिए हमारे पाप कर्म कर्म होते जाएंगे, और हम जल्दी से जल्दी साफ-सुथरे होकर मालिक से परमात्मा से मिलने के काबिल बन जाएंगे। फिर जब संत महात्मा हमें नाम की बख्शीश प्रदान कर देते हैं, हम उनके बताए गए तरीके के अनुसार, नियम पूर्वक भजन सुमिरन करते हैं। तो इस सुमिरन के जरिए हमारे अंदर उस मालिक का प्यार, उसका शौक, उसकी भक्ति का शौक होना शुरू हो जाता है। वह नाम जो हमारी श्वासों से भी ज्यादा कीमती है, उस नाम की पूंजी को हम इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं, इन श्वासों की पूंजी के जरिए।
[12:15]उस अनमोल वस्तु का वणज यानी व्यापार करना है। और यही बात हमें आज की वाणी में गुरु साहिब समझा रहे हैं। फिर फरमाते हैं, तैसी वस्तु विसाहीय जैसी निभै नाल। गुरु साहिब ने पूरी टुक में हमारे सामने खोलकर रख दिया है कि कौन सी वस्तु इकट्ठी करनी है? ऐसी वस्तु विसाहीय, ऐसी वस्तु की खरीदारी इन श्वासों की पूंजी के जरिए करनी है, जैसी निभै नाल, जो हमारे साथ जा सके। कहां? जहां धर्म राय के यमदूत भी ना पहुंच सके। वह हमारे पास ना सके। नाम की दौलत जब हमारे पास होगी तो किसी की मजाल नहीं, ताकत नहीं कि कोई भी यमदूत हमारे पास आ सके। आएगा तो केवल वह मालिक परमात्मा ही आएगा, जिसके नाम को हमने सुमिरन करके इकट्ठा किया है। यही संत महात्मा भी समझाते हैं कि ऐसी वस्तु की खरीदारी करनी है जो हमारे साथ जा सके, हमेशा हमारे साथ रहे। फिर समझाते हैं, अग्गे साहू सुजान है, लैस वस्तु संभाल। साहू यानी परमात्मा। हमारा मालिक जो संतों महात्माओं के रूप में हमारे बीच में आया हुआ है, वह मालिक जानता है कि कौन सी वस्तु सही है। वह हमारी उस वस्तु को अपने पास संभाल कर रख लेगा। जब समय आएगा उसके साथ और पूंजी मिलाकर हमारी सहायता करेंगे। जब हमने रास्ते में कहीं फंसना है, उस समय वह हाजिर हो जाएंगे संत सतगुरु। किनके पास तो नाम की अपार पूंजी है, दौलत है। यहां इनको क्यों रोका जा रहा है? इनको आगे जाने दिया जाए। सतगुरु हर जगह हमारी सहायता करते हैं। यहां व वहां, उस लोक में भी सतगुरु ही हमारा सच्चा साथी है, जो हमेशा हमारा भला चाहता है, हमारा साथ देगा। जित्थे लेखा मंगीये तिथ्थे खडे दिसण। गुरु ग्रंथ साहिब में यह आया हुआ है। अब एक कहानी आपको सुनाई जाती है। बादशाह सिकंदर जब मरने लगा तो अपनी मां से मिलना चाहता था। उसने अपने वैद्यों को डॉक्टरों को बुलाकर कहा कि मुझे कुछ समय तक और जीवित रखो, कुछ सांसें मुझे और दे दो। मैं तुम्हें अपना राजपाट खजाना दे दूंगा। उसके वैद्य डॉक्टर कहते हैं, नहीं बादशाह, अब हम आपको एक भी सांस नहीं दे सकते, चाहे आप हमें कुछ भी क्यों ना दे दो। सो इन सांसों की इतनी ज्यादा कीमत है जिनको कि पाने के लिए एक समय ऐसा भी आता है कि इंसान अपना सब कुछ देने के लिए तैयार हो जाता है। लेकिन एक भी सांस उसे ज्यादा नहीं मिलती है और हम हैं कि इन बेशकीमती बेशकीमती सांसों की पूंजी को दुनिया के विषय विकारों में बर्बाद किए जा रहे हैं। यह जो मनुष्य जीवन परमात्मा ने हमें दिया है बड़ा ही बेशकीमती है, अनमोल है। यह एक मौका है एक अवसर है कि हम मालिक की भक्ति करके इस 84 के चक्कर से निकल सके मालिक से मिलाप हासिल करके सदा के लिए सुखी हो सके। इस दुनिया ने, इसके विषय भोगों ने हमारे साथ नहीं जाना। इसलिए हमें इन श्वासों की पूंजी को विषय विकारों में बर्बाद नहीं करना है। बल्कि समय रहते उस मालिक की परमात्मा की भक्ति में लगकर अपना जन्म सफल बनाना है। आगे बताते हैं। भाई रे राम कहो चित लाए। हर जस वक्खर ले चलो सह देखे पतियाए। अब समझाते हैं, भाई रे राम कहो चित लाए। संतों में हमारे प्रति कितना प्यार है।
[16:50]हमें भाई कहकर समझा रहे हैं कि ऐ मेरे भाई राम कहो चित लाए। यानी उस परमात्मा का राम का नाम का ध्यान चित लगाकर मन लगाकर करो। जब हम दुनिया का कोई भी काम करते हैं तो यदि मन लगाकर मेहनत से करते हैं तब उस काम में सफल होते हैं। यदि बेमन से केवल फॉर्मेलिटी के तौर पर खाना पूर्ति ही करते हैं, तो फिर वह काम सफल नहीं होता है। इसलिए यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि जब दुनियावी कामकाज में भी बिना मन लगाए, बिना मेहनत के सफलता प्राप्त नहीं होती, तब यह जो काम मालिक की भक्ति का उसकी प्राप्ति का है, यह बिना मन लगाए बिना चित लगाए कैसे सफल होगा? हमें भी मन लगाकर, मेहनत के साथ परमात्मा के राम के नाम की कमाई करनी है। उस प्रभु की भक्ति में लगना है। तब कहीं जाकर वह नाम की वस्तु हमारे हाथ लगेगी। फिर समझाते हैं, हरजस वक्खर ले चलो सह देखे पतियाय। यानी वह हरि के नाम की वस्तु वक्खर जो ऊंची से ऊंची कीमती चीज है, उसे ले चलो। कहां? सह के पास। परमात्मा के पास ताकि वह प्रभु देख पतियाए।
[18:27]सह देखकर परमात्मा देखकर खुश हो जाए कि जिस काम के लिए इसे भेजा था, उस काम को व्यापार को बिजनेस को वणज को यह फायदे के साथ प्रॉफिट के साथ पूरा करके आया है। अब इसके विपरीत यदि हम इस संसार की विषय विकारों की गंदगी में ही उलझे रहते हैं, कूड़ की ही कमाई करेंगे तो हमारा कुछ भी नहीं बनना। हमें तो दुनिया में रहकर भी अपने रिश्ते-नाते दुनिया के व्यवहार करते हुए भी उस परमात्मा की भक्ति उसके नाम का सच्चा व्यापार करना है। लेकिन अगर हम दुनिया में ही उलझे रहेंगे केवल दिखावे के लिए खानापूर्ति के तौर पर मालिक की भक्ति करेंगे, तो हम अपना समय ही बर्बाद करेंगे। हां, हमारी हाजिरी जरूर लग जाएगी कि हम बैठे हैं, लेकिन जो प्रेम से मन लगाकर बैठने से मिलना है, वह खाना पूर्ति करने से नहीं मिलना। चार गवाया हांड के चार गवाया साम लेखा रब मंगेसिया आया केड़े काम। हम चाहे कितनी ही गलतियां क्यों ना करें, चाहे हमारे कितने भी बुरे कर्म हैं, हम विषय विकारों की गंदगी में फंसे हुए हैं, लेकिन फिर भी संत महात्मा हमसे प्यार ही करते हैं। हमें बार-बार भाई, मेरे प्यारे कहकर ही समझाते हैं, क्योंकि उन्हें तो मालूम है कि हम भी उसी परमात्मा का अंश हैं। यहां इस संसार में आकर मन के चक्कर में फंसकर दुनिया की गंदगी में पड़े हुए हैं। जैसे कोई धोबी को चाहे कितना भी गंदा कपड़ा क्यों ना दे कि भाई इसे साफ करके देना है तो धोबी कभी भी इंकार नहीं करता, वह मना नहीं करता है। वह जानता है कि चाहे मेहनत थोड़ी ज्यादा लगेगी लेकिन मैं इस कपड़े की गंदगी को साफ कर दूंगा और कपड़ा साफ सुथरा होकर चमकने लगेगा। अब यदि चांदी का सिक्का कीचड़ में गिरकर गंदा भी हो जाए तो भी लोग उसे उठाने में हिचकिचाते नहीं, उसे धोकर साफ कर देंगे। आखिर है तो यह चांदी का सिक्का चाहे यह कीचड़ में ही गिरकर क्यों नहीं गंदा हो गया। इसी प्रकार संत महात्मा सतगुरु भी जानते हैं कि जब इसे परमात्मा की सच्ची भक्ति में लगा दिया जाएगा, परमात्मा की सच्ची भक्ति में लगा दिया जाएगा, साफ सुथरा बना दिया जाएगा।
[21:01]तो यह उनसे मिलने के काबिल बन जाएगा। हम यदि सच्चे मन से उस परमात्मा की मालिक की भक्ति करेंगे, उसका ध्यान करेंगे तो हमारे सभी दुख दर्द दूर हो जाएंगे। हम में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहेगा। भक्त की रक्षा के लिए स्वयं भगवान आ जाते हैं। प्रहलाद को बचाने के लिए भगवान ने नरसिंह अवतार धारण किया। लेकिन यह तभी होगा जब हम सच्चे मन से चित्त लगाकर परमात्मा के नाम की भक्ति करेंगे। गुरु अमरदास जी महाराज फरमाते हैं, बिन नावे धर नाही ता जम करे खुवारी। शब्द या नाम की कमाई के बिना मालिक के दरबार में जाने की कभी भी इजाजत नहीं मिलती और मौत के वक्त यमदूत ही आते हैं। वह हमें कष्ट देते हैं। एक व्यक्ति कहीं से कुछ सामान लेकर अपने घर की तरफ जा रहा था। उसके पास सामान ज्यादा था और वह अकेला उसे उठा नहीं पा रहा था। उसे आसपास की कोई और चीज नजर भी नहीं आ रही थी। और उसने इधर-उधर देखा, उसकी कोई मदद करने वाला भी वहां नहीं था जो कि उसके सामान को उसके घर तक पहुंचा दे। तभी उसने देखा कि एक साधु कहीं से चला आ रहा है। उसने उस साधु से कहा, कृपा करके मेरी मदद करें। यह सामान मेरे साथ उठाकर मेरे घर तक पहुंचाने में मेरी सहायता करें। उस साधु ने कहा, ठीक है। मैं आपकी सहायता कर देता हूं लेकिन मेरी एक शर्त है। या तो आप रास्ते भर मुझे कुछ सुनाते रहें या मैं आपको कुछ सुनाऊंगा। उस व्यक्ति ने सोचा, मैं क्या सुनाऊंगा? यह साधु जो कहेगा उसे ही सुनता चलूंगा। उसने साधु महाराज से कहा कि आप ही कुछ सुनाते हुए चलो महाराज जी। साधु ने कहा, ठीक है। वह रास्ते भर उसे परमात्मा की बातें भक्ति की बातें करता रहा। जब उस व्यक्ति का घर निकट आने वाला था तब उस साधु ने सोचा कि यह व्यक्ति भी क्या याद करेगा? कि किसी से मेरी मुलाकात हुई थी। उसने उस व्यक्ति से कहा, देख भाई, मैं तुझे एक जरूरी बात बताता हूं। आज से इतने इतने दिन बाद तू मर जाएगा। तूने अपने जीवन में आज तक कोई भी नेक कार्य नहीं किया है, कोई अच्छा कर्म नहीं किया। इसलिए यमदूत तुझे पकड़कर ले जाएंगे। लेकिन यह जो तूने मेरे साथ कुछ समय बिताया है, परमात्मा के नाम की जो बातें तूने सुनी है, यही तेरे जीवन काल के पूरे पुण्य का काम है। यमदूत तुझे जब यमराज के पास ले जाएंगे तो वहां तुझसे पूछा जाएगा कि सब अपने पाप कर्म का फल पहले भोगना चाहते हो या फिर पुण्य कर्मों का फल पहले भोगना चाहते हो। तब तुम कहना कि पहले मुझे पुण्य कर्मों का फल दे दो और वह यह कि मुझे उस साधु के पास ले चलो।
[24:55]खैर यमदूत उसे उस साधु के पास ले गए। जहां वह साधु बैठा था, उससे थोड़ी दूर पर यमदूत रुक गए। कहते हैं, जाओ। वह थोड़ी दूर पर जो साधु बैठे हैं, उनसे मिलकर जल्दी आना। हम उनके निकट नहीं जा सकते क्योंकि वहां परमात्मा के सच्चे नाम का सिमरन हो रहा है। और जहां परमात्मा के सच्चे नाम का सिमरन है, वहां हम नहीं जा सकते। वह व्यक्ति साधु के पास जाकर बैठ जाता है और कहता है, साधु महाराज, मैं आ गया। साधु ने कहा, ठीक है। यहीं बैठ जा और परमात्मा के नाम का सिमरन कर। वह व्यक्ति वहीं बैठकर मालिक के नाम का सुमिरन करने लगा। जब बहुत समय बीतने पर भी वह व्यक्ति वापस यमदूतों के पास नहीं आया, तो यमदूत खाली हाथ यमराज के पास लौट आए। उन्हें बताया कि वह व्यक्ति तो वापस नहीं आया। तब यमराज ने यमदूतों से कहा कि अब वह वापस नहीं आएगा। और अब तुम भी उसके पास नहीं जाना, वरना तुम जल जाओगे क्योंकि अब वह भी उस साधु महात्मा के साथ परमात्मा के सच्चे नाम की भक्ति में लग गया है।
[26:21]और तुम तो क्या स्वयं मैं यमराज होकर भी वहां नहीं जा सकता, जहां मालिक के सच्चे नाम का सिमरन होता है। इसलिए हमें भी हमेशा ध्यान रखना चाहिए। यदि हम मालिक को भूलेंगे तो हमारा क्या हाल होगा? क्या हश्र होगा? हमें तो दुख ही दुख मिलेगा, नरकों के चक्कर में फसेंगे। इसलिए अभी समय है, मौका है कि परमात्मा के नाम की कमाई चित्त लगाकर मन लगाकर कर लें और कुछ फायदा उठा लें।
[27:00]अब अगली कड़ियों में क्या फरमाते हैं। जिना रास ना सच है क्यों तिना सुख होई खोते वणज वणजिय मन तन खोटा होए।



