Thumbnail for गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम् | Gajendra Moksha Stotram with Lyrics | Madhvi Madhukar Jha by Madhvi Madhukar

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम् | Gajendra Moksha Stotram with Lyrics | Madhvi Madhukar Jha

Madhvi Madhukar

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[0:04]ओम गजेन्द्र मोक्ष श्री सुख उवाच एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि जजाप परमं जाप्यं प्राक जन्म्यनुशिक्षितं गजेन्द्र उवाच ओम नमो भगवते तस्मै यत एतत चिदात्मकम पुरुषाय आदि बीजाय परेशाया भिधीमहि यस्मिन निदम यतचेदम येनेदम य इदम स्वयं योमात परस्माच परस्तम प्रपत्ये स्वयंभुवम य स्वात्मनिदम निज माययार्पितम क्वचित विभातम कच तत्रोहीतम अविदत् त्रिक साक्ष्यभयम तत इक्षते स आत्ममूलो व तुमा परातपर कालेन पंचत्वमितेषु कृष्णश लोक पालेषु च सर्व हेतुषु तमस्त दासीत गहनं गभीरम यस्तस्य पारे भी विराजते विभु न यस्य देवा रिशयः पदम विदुर जन्तो पुन को रति गंतु मीरितुम यथा नटस्याकृति भिर विचेष्टितो दुरत्यनुक्रमण स मावतु त्रिकश वो यस्य पदम सुमंगलम विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवा चरन्त्य लोक प्रथम प्रणम वने भूतात्म भूताः सुरदः स मे गति न विध्यते यस्य न जन्म कर्म वा न नाम रूपे गुण दोष एव वा तथापि लोकाव्यसंभवाय यः स्वमायया तान्युणुकालमृच्छती तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणे अनंत शक्तये अरूपायोरूपाय नमः आश्चर्य कर्मणे नमः आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने नमो गिरान विदुराय मनसशचेत सामपि सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नष्कर्मयेण विपश्चिता नमः कैवल्य नाथाय निर्वाण सुखसंविदे नमः शांताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञान घनाय च क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे पुरुषाय आत्म मूलाय मूल प्रकृतये नमः सर्वेन्द्रिय गुणद्रष्टे सर्व प्रत्यय हेतवे असतः चायोक्ताय सदाभासाय ते नमः नमो नमस्ते खिल कारणाय निष कारणाय अद्भुत कारणाय सर्वागमाम नाय महार्णवाय नमो पवर्गाय परायणाय गुणानिच्छन्नचि दूक्ष्मपाय तक्षोभ विस्फूजित मानसाय नैष्कर्म भावेन विवर्जितागमं स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि मात्रिक प्रपन्न पशुपाश विमोक्षणाय मुक्त भूरिकरुणाय नमोलयाय स्वंशेन सर्व तनुभिन्न मनसि प्रतीत प्रत्यद्रषे भगवते बृहते नमस्ते आत्मात्मजाप्त गृहा वित्त जनेषु सक्तै दुष्प्रापणाय गुणसंग विवर्जिताय मुक्तमभि स्व हृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नमः ईश्वराय यम धर्म कामार्थ विमुक्ति कामा भजंत इष्टं गतिमाप्नुवंति किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मे दभ्र दयो विमोक्षणं एकांतिनो यस्य न कंचनार्थं वांचंति य वै भगवत प्रपन्न अत्यद्भुतं तचरितं सुमंगलम गायंत आनंद समुन्द्रमग्ना तम क्षरम ब्रह्म परम परेशन अव्यक्तमाध्यात्मिक योगम्यम अतिन्द्रियम सूक्ष्म मिवाती दूर अनंत माध्यम परिपूर्ण मीड़े यस्य ब्रह्मादयो देव वेदा लोकाश चराचरा नाम रूप विभेदेन फलया च कलया कृता यथा आरचितो ग्नहे सवितुर् घ भस्तयो निरियाती सन्याति सक्रियत् स्वोरोचिश तथा यतोयंगुण संप्रवाहो बुद्धि मनः खानि शरीर सर्गा सवेन देवा सुरमर्त तिरछ्य न स्त्री न षंडो न पुमान न जन्तु नायम गुणः कर्म न सन्न चासन निषेध शेषो जयता दशेष जिजीवीषे नाहमिहामुया किम् अंतर बहिषा वृतये भयो अन्य इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवस्तस्यात्मलोका वरणस्य मोक्षम सोहम विश्वसृजं विश्वम अविश्वम विश्ववेदासम विश्वात्मानम जम ब्रह्मा प्रणतोस्मि परम पदम योगरधित कर्मणो हृदि योग विभाविते योगिनो यं प्रपश्यंति तं नतोस्म्यहम नमो नमस्तुभ्यम सहय वेग शक्तित्रयायाखिल धिगुणाय प्रपन्न पालाय दुरंत शक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवत्मने नायम वेद स्वमात्मानम यचक्त्या हम धिया हतम तं दुरत्यय माहात्मयं भगवनमितोस्म्यहम श्री सुक उवाच एवं गजेन्द्र मुप वर्णित निर्विशेषम ब्रह्मादयो विविध लिंग भिदाभिमाना नैते यदोप ससृप्र निखिल आत्मकत्वात् तत्र अखिला मरमयो हरि राविरासीत तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य

[7:54]सग्राह माशु सरसः कृपयोजहार ग्रहाद विपाटित मुखादारिणा गजेन्द्रम संपश्यताम हरिरमुमुचु दुस्त्रियाणाम

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