Thumbnail for ताज महल बिना सीमेंट के कैसे बना ? | History Of Taj Mahal In Hindi | Taj Mahal Ki Kahani by Prajapati News

ताज महल बिना सीमेंट के कैसे बना ? | History Of Taj Mahal In Hindi | Taj Mahal Ki Kahani

Prajapati News

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[0:00]दोस्तों एक बार फिर से स्वागत है आपका प्रजापति न्यूज़ में। एक ऐसी इमारत जो बिना सीमेंट के बनी और 400 साल से आज भी वैसे ही खड़ी है। क्या यह इंसानी करिश्मा है या कोई ऐसा राज्य जिसे हमसे जानबूझकर छुपाया गया। सोचिए आज एक घर बनाते समय अगर सीमेंट की एक बोरी भी कम पड़ जाए तो हम घबरा जाते हैं। तो फिर 1600 के उस दौर में जब सीमेंट का नाम तक नहीं लिया गया था। ताजमहल जैसा महल आखिर बना कैसे और बनाई नहीं सदियों से भूकंप गर्मी बारिश सर्दी प्रदूषण सब कुछ झेलते हुए आज भी वैसे ही टिका हुआ है। यह वीडियो सिर्फ ताजमहल की कहानी नहीं है। यह उस तकनीक की कहानी है जिसे इतिहास की किताबों में जानबूझकर दबा दिया गया। हम आपको दिखाएंगे वो लकड़ी जो पत्थर से भी मजबूत थी। वो गोंद जो सीमेंट से ज्यादा टिकाऊ थी। और वो इंजीनियरिंग प्लान जो नासा के वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दे। और हां हम आपको एक ऐसा खतरा भी बताएंगे जो अगर सच हुआ तो ताजमहल कभी का गिर चुका होगा। लेकिन अभी भी वक्त है जानने का और बचाने का तो ये वीडियो सिर्फ देखने के लिए मत खोलिए। यह एक राज्य जानने का मौका है जो आपने मिस किया तो शायद कभी दोबारा ना मिले। लेकिन वीडियो शुरू करने से पहले एक छोटी सी रिक्वेस्ट है। कमेंट में जरूर बताइए कि आप ये वीडियो भारत के किस शहर या गांव से देख रहे हैं। चलिए देखते हैं ताजमहल की मोहब्बत देश के किन-किन कोनों तक पहुंची है। वीडियो के नीचे रेड कलर का सब्सक्राइब बटन दिख रहा होगा उस पर क्लिक करके सब्सक्राइब कर लें और साइड में बेल आइकन भी दिख रहा होगा उस पर भी क्लिक कर लें ताकि आपको वीडियो मिले सबसे पहले। आपने कभी सोचा है कि 17वीं सदी में जब दुनिया को सीमेंट का नाम तक नहीं पता था। उस दौर में एक ऐसी इमारत खड़ी की गई जो आज भी वक्त मौसम और भूकंप की मार सहकर सीना ताने खड़ी है। ताजमहल सिर्फ एक मकबरा नहीं बल्कि एक अजूबा है और इससे भी बड़ा अजूबा है इसका टिकी रहना। हर साल लाखों लोग इसे देखने आते हैं फोटो खिंचवाते हैं। उसकी खूबसूरती के कसीदे पढ़ते हैं लेकिन क्या आपने कभी रुक कर ये सवाल पूछा है कि बिना सीमेंट बिना स्टील बिना मॉडर्न मशीनरी आखिर यह सफेद संगमरमर की खूबसूरत इमारत बनी कैसे? और सिर्फ बनी नहीं 400 साल से भी ज्यादा वक्त तक टिकी भी कैसे रही। हमारी दुनिया में आज सीमेंट के बिना एक छोटी दीवार भी टिकती नहीं और यहां एक महल बना दिया गया। वो भी उस वक्त जब सीमेंट का आविष्कार तक नहीं हुआ था। आपको लग रहा होगा जरूर कोई राजा महाराजा की जादूगरी होगी। पर नहीं यह जादू नहीं एक ऐसी इंजीनियरिंग है जो आज की टेक्नोलॉजी को भी शर्मिंदा कर दे। इस वीडियो में हम ताजमहल की नींद से लेकर उसकी मीनारों तक हर उस राज से पर्दा उठाएंगे जिसे सदियों तक इतिहास की किताबों में दबा कर रखा गया। और हां वीडियो के आखिर में हम आपको वह रहस्य भी बताएंगे जो शायद आपने कभी नहीं सुना होगा। एक ऐसा रहस्य जो ताजमहल के भविष्य से जुड़ा है तो वीडियो को अंत तक जरूर देखिए। क्योंकि आज हम जानेंगे कि बिना सीमेंट के कैसे बना ताजमहल और क्या वह हमेशा यूं ही खड़ा रहेगा। कहते हैं सच्चा प्यार अमर होता है लेकिन कुछ प्रेम कहानियां ऐसी होती हैं जो वक्त के साथ सिर्फ जिंदा नहीं रहती बल्कि पत्थरों में भी धड़कती हैं। ताजमहल एक ऐसी ही प्रेम कहानी का सबसे खूबसूरत प्रतीक है शाहजहां और मुमताज महल की कहानी। साल था 1631 भारत के सम्राट शाहजहां अपनी बेपनाह महबूबा अपनी तीसरी पत्नी मुमताज महल को खो चुके थे। मुमताज अपने 14वें बच्चे को जन्म देते हुए दुनिया से विदा हो गई। कहते हैं उस दिन से शाहजहां का दिल टूट गया और उसी टूटी हुई मोहब्बत को हमेशा के लिए संजोने के लिए।

[4:21]उन्होंने तय किया एक ऐसी इमारत बनवाऊंगा जो दुनिया में प्यार की सबसे बड़ी मिसाल होगी। वहीं से शुरू हुआ ताजमहल का निर्माण 1632 में इसका काम शुरू हुआ और करीब 22 साल तक चला। इसमें 20000 से भी ज्यादा कारीगरों पत्थर तराशने वालों कलाकारों और वास्तुकारों ने हिस्सा लिया। भारत के अलावा तुर्की ईरान और अफगानिस्तान से भी कलाकार बुलाए गए थे और तब जाकर बनी वो इमारत जिसे देखकर आज भी लोग खामोश हो जाते हैं। उस समय ताजमहल के निर्माण में लगभग 3 करोड़ रुपए की लागत आई थी जो अगर आज के समय में मापें तो हजारों करोड़ों से भी ज्यादा होगी। आगरा की यमुना नदी के किनारे खड़ा यह सफेद संगमरमर का अजूबा सिर्फ एक कब्र नहीं बल्कि वो एहसास है जो कहता है। अगर मोहब्बत सच्ची हो तो उसकी यादें पत्थरों में भी सांस लेती है। लेकिन सवाल अब भी वही है। इतनी महंगी विशाल और जटिल इमारत बिना सीमेंट के बनी कैसे? इसका जवाब छिपा है ताजमहल की नीम और उसकी बनावट में। और अब हम उसी पर रोशनी डालेंगे आज अगर कोई बिल्डिंग बनती है तो सबसे पहली चीज जो जहन में आती है सीमेंट। दीवार हो छत हो पुल हो या गगनचुंबी इमारत बिना सीमेंट के कुछ भी संभव नहीं। लेकिन क्या आपको पता है कि सीमेंट का आविष्कार ताजमहल बनने के करीब 200 साल बाद हुआ था। जी हां 1824 में इंग्लैंड के एक ब्रिक लेयर यानी ईंट लगाने वाले जोसेफ एस्पिन ने पहली बार ऐसा पदार्थ बनाया जो आज के पोर्टलैंड सीमेंट की नींव बना। उन्होंने इसे लाइमस्टोन और क्ले को गर्म करके तैयार किया था और फिर इसका पेटेंट लिया गया। ताजमहल का निर्माण शुरू हुआ था 1632 में यानी लगभग 192 साल पहले। मतलब जब दुनिया को सीमेंट का नाम तक नहीं पता था भारत में एक ऐसी इमारत बनाई जा रही थी जो आज भी खड़ी है। अब सोचिए जब आज के जमाने की बिल्डिंग्स 50-60 साल में ही झुकने लगती हैं। टूटने लगती हैं तो उस दौर में बिना सीमेंट के खड़ी की गई इमारत आज भी वैसी की वैसी कैसे है? उस दौर की निर्माण तकनीक सीमेंट पर नहीं बल्कि प्राकृतिक तत्वों स्थानीय ज्ञान और बारीकी से समझी गई इंजीनियरिंग पर आधारित थी। इमारतें पत्थर को पत्थर से जोड़कर खास गोंदों से चिपका कर और सही वजन संतुलन से बनाई जाती थी। ताजमहल इन सब में भी अलग था। यह सिर्फ एक राजा की सनक नहीं था। यह एक संपूर्ण विज्ञान था। जहां हर पत्थर की दिशा वजन और स्थान का चयन बड़ी गहराई से किया गया था। उस समय के आम किले या महल छूने और पत्थरों से बनाए जाते थे लेकिन ताजमहल का निर्माण एक अलग ही दर्जे की बारीकी और तकनीक से हुआ। जिसमें मिश्रित गोंद विशेष पत्थर और एक ऐसी नीव थी जो आज भी रहस्य है और अब वक्त है उस रहस्य से पर्दा उठाने का ताजमहल की नीव। एक और वो लकड़ी जिसने इसे 400 सालों तक गिरने नहीं दिया। अब तक आप जान चुके हैं कि ताजमहल बिना सीमेंट के बना लेकिन असली चौंकाने वाली बात अभी बाकी है। क्या आप यकीन करेंगे अगर मैं कहूं कि ताजमहल की नीव पत्थर या स्टील से नहीं बल्कि लकड़ी से बनी है। जी हां वो इमारत जिसे देखने दुनिया भर से लोग आते हैं जिसकी एक-एक इंट मोहब्बत की निशानी मानी जाती है उसकी बुनियाद लकड़ी पर खड़ी है। अब सवाल उठता है कैसी लकड़ी इसका जवाब है इबोनी। इबोनी कोई आम लकड़ी नहीं होती ये बेहद ठोस भारी और टिकाऊ होती है। इतनी घनी कि यह पानी पर तैरती नहीं डूब जाती है। यही कारण है कि इसे काले पत्थर जैसा मजबूत माना जाता है लेकिन असली कमाल तो यह है कि यह लकड़ी सड़े नहीं गले नहीं अगर उसमें लगातार नमी बनी रहे। और यहीं से आता है दूसरा सबसे बड़ा रहस्य यमुना नदी ताजमहल को आगरा की यमुना नदी के किनारे इसलिए नहीं बनाया गया कि नजारा अच्छा लगे। बल्कि इसलिए कि इस लकड़ी की नीम को लगातार नमी मिलती रहे। ताजमहल की नीव में जो इबोनी की लकड़ियां इस्तेमाल की गई थी। वह यमुना के पानी से नमी खींचती रहती हैं यह नमी ही इन लकड़ियों को आज तक सड़ने से बचाए हुए हैं। और यही कारण है कि बिना सीमेंट बिना लोहा ताजमहल आज भी खड़ा है। लेकिन अब सवाल है क्या यह हमेशा यूं ही खड़ा रहेगा? नहीं यमुना आज वैसी नहीं रही जैसी 400 साल पहले थी। पानी का स्तर दिनबदिन गिर रहा है। नदी सूख रही है और जैसे-जैसे नमी कम होती जाएगी। लकड़ियां सूखती जाएंगी और जिस दिन उस लकड़ी की नमी 30 पर से नीचे चली गई ताजमहल की नीम खोखली हो जाएगी। यह सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत का खतरा नहीं है यह हमारी संस्कृति विरासत और प्रेम की सबसे बड़ी निशानी के खत्म होने का अलार्म है। क्या आपने कभी सोचा था कि यमुना के सूखने का असर ताजमहल पर पड़ेगा। अब आप समझ गए होंगे कि ताजमहल सिर्फ शाहजहां की मोहब्बत का नहीं यमुना की रूह से भी जुड़ा हुआ है।

[9:59]इस गूढ़ और अनसुने रहस्य के बाद अब हम जानेंगे ताजमहल के पत्थरों को जोड़े रखने वाली उस खास गोंद के बारे में जो सीमेंट से भी मजबूत थी। अब तक आपने जान लिया कि ताजमहल की नीव लकड़ी पर टिकी है और वह लकड़ी जिंदा है यमुना की नमी से। लेकिन अब सवाल उठता है ऊपर की पूरी इमारत को जो पत्थरों से बनाया गया है।

[10:20]वो पत्थर आपस में जुड़े कैसे आज हम मार्बल चिपकाने के लिए एपॉक्सी रेसिन या हाई ग्रेड सीमेंट का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन 17वी सदी में ना मशीन थी ना सीमेंट ना कोई मॉडर्न बाइंडर तो आखिर क्या था उस जमाने का सुपर गोंद। इसका जवाब छिपा है प्राकृतिक विज्ञान और लोक ज्ञान में। पुराने कारीगरों ने एक ऐसा मिश्रण तैयार किया था जो सिर्फ मजबूत ही नहीं बल्कि सदी दर सदी तक टिकने वाला था। इस गोंद में मुख्य रूप से शामिल थे चूना जिसे महीनों तक पानी में बुझाया जाता था जिससे वह बारीक और लचीला हो जाए। गुड़ और बेल का गूदा जो चिपचिपाहट और लचीलापन देता था उड़द की दाल और गोंद जो एक नेचुरल बॉन्डिंग एजेंट के रूप में काम करता था। गाय का गोबर और पेशाब जिनमें बैक्टीरियल प्रूफिंग की ताकत थी। तुलसी हल्दी और नीम जैसे मसाले जो एंटीसेप्टिक और दीमक रोधी थे। और हां इसमें एक ऐसा भी तत्व था जिसे जानकर आप चौक अंडे की सफेदी और शहद। जी हां यह दोनों सामग्री गोंद में वो चिकनाहट और टिकाऊपन लाती थी जिससे पत्थर जुड़ तो जाते थे लेकिन वक्त के साथ फैलते या दरक नहीं। इस मिश्रण को कई दिनों तक पकाया जाता था फिर ठंडा किया जाता और तब जाकर एक लेप की तरह पत्थरों के बीच लगाया जाता। यह प्राचीन गोंद इतनी ताकतवर थी कि कई जगहों पर आज भी अगर आप दीवार तोड़ेंगे तो पत्थर अलग नहीं होंगे। बल्कि खुद पत्थर टूट जाएंगे लेकिन जोड़ नहीं और इसीलिए बिना सीमेंट सिर्फ मिट्टी लकड़ी और प्रकृति के ज्ञान से ताजमहल बना। अब सोचिए एक तरफ हमारी आज की इमारतें जो 30 साल 40 साल में मरमत मांगती हैं। और दूसरी तरफ ताजमहल जो 400 साल से एक पत्थर की तरह खड़ा है सिर्फ एक गोंद के भरोसे। इस अद्भुत गोंद के बाद अब हम आपको ले चलते हैं ताजमहल की संरचना की उस गहराई में। जहां छुपा है उसकी मीनारों का रहस्य जो सीधी नहीं थोड़ी टेढ़ी क्यों बनाई गई? ताजमहल को अगर सिर्फ एक खूबसूरत इमारत कहें तो यह उसकी तौहीन होगी।

[12:44]यह सिर्फ सुंदर नहीं है यह एक इंजीनियरिंग का चमत्कार है जो हर एंट हर नक्काशी और हर मीनार में झलकता है। आइए सबसे पहले बात करें उन चारों मीनारों की क्या आपने गौर किया है कि ताजमहल की मीनारें बिल्कुल सीधी नहीं है। अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि ये चारों मीनारें थोड़ी-थोड़ी बाहर की तरफ झुकी हुई हैं और यह गलती नहीं जानबूझकर किया गया डिजाइन है। क्यों? क्योंकि अगर कभी भूकंप आता है और मीनारें गिरती हैं तो वह मुख्य गुंबद या समाधि पर नहीं बाहर की तरफ गिरे। यानी भूकंप आने पर सबसे पहले गिरने वाली चीजें खुद इमारत को बचाने के लिए बनाई गई थी। यह सोच आज के मॉडर्न सेफ्टी डिजाइन को भी मात देती है। अब बात करें हवा और वजन की। ताजमहल एक बहुत भारी इमारत है फिर भी इसकी दीवारें दरखती क्यों नहीं? क्योंकि पत्थरों की प्लेसमेंट में एक संतुलन है। ऊपर से नीचे तक हर ब्लॉक को इस तरह रखा गया है कि उसका वजन नीचे वाली परत को प्रेशर के बजाय स्थिरता देता है। इस तकनीक को आज हम लोड डिस्ट्रीब्यूशन इंजीनियरिंग कहते हैं। लेकिन ताजमहल में ये 17वी सदी में ही इस्तेमाल हो रही थी और सिर्फ डिजाइन ही नहीं। मटेरियल का चुनाव भी कमाल का था। ताजमहल के निर्माण में सिर्फ संगमरमर नहीं। बल्कि लगभग 28 प्रकार के कीमती और अर्ध कीमती पत्थर इस्तेमाल किए गए जैसे जैस्पर दक्षिण भारत से नीलम श्रीलंका से मलकट्ट और कारनेलियन तिब्बत और अफगानिस्तान से। इन पत्थरों को ना सिर्फ सजावट के लिए इस्तेमाल किया गया बल्कि कुछ का चुनाव उनकी थर्मल प्रॉपर्टीज और टिकाऊपन के आधार पर किया गया। मतलब यह कि ताजमहल को देखने में जितना खूबसूरत बनाया गया उतना ही वैज्ञानिक सोच से टिकाऊ भी बनाया गया। और एक और बात आप सुनते होंगे कि पुरानी चीजें मजबूत होती हैं लेकिन ताजमहल इसका सबसे बड़ा सबूत है। न सिर्फ इसकी नीव और गोंद शानदार थी बल्कि इसकी डिजाइन संरचना और सामग्री चयन सब कुछ सोच समझ कर विज्ञान के आधार पर किया गया था। अब चलिए देखते हैं कि ताजमहल के अंदर की दुनिया कैसी है। वह जड़ाई नक्काशी और वो पत्थर जिनमें मोहब्बत खुद को सजाकर पेश करती है। अगर ताजमहल को बाहर से देखकर आप हैरान होते हैं तो अंदर जाकर आपका दिल थम सा जाता है। क्योंकि वहां सिर्फ पत्थर नहीं है वहां मोहब्बत उकेरी गई है हर दीवार हर गुंबद हर मेहराब। इतनी बारीकी से तराशी गई है मानो पत्थरों में इबादत लिखी हो। क्या आप जानते हैं कि ताजमहल की दीवारों पर सिर्फ रंग नहीं बल्कि कीमती और अर्ध कीमती पत्थरों की जड़ाई की गई है। इस तकनीक को कहते हैं पिएत्रा दूरा या जड़ाई कला इसमें संगमरमर को काटकर उसमें नीलम मानिक पन्ना लेपिस लाजुली तुरमली। और कई रंगीन पत्थरों को इतनी सफाई से जोड़ा जाता है कि पत्थर और संगमरमर एक हो जाते हैं।

[16:02]और यह सिर्फ सजावट के लिए नहीं था हर फूल हर बेल हर अक्षर मुमताज के लिए एक प्रेम पत्र जैसा था। सोचिए जब शाहजहां कहते थे कि मुझे उसकी याद पत्थरों में भी चाहिए तो कारीगरों ने वाकई ऐसा कर दिखाया। पत्थरों में यादें उके दी इन नक्का सियों को बनाने में 20 साल से भी ज्यादा समय लगा और हर पत्थर को हाथ से तराशा गया था। कोई मशीन नहीं कोई लेजर नहीं सिर्फ कला समर्पण और प्रेम। अब एक सवाल जो अक्सर पूछा जाता है क्या सच में शाहजहां ने ताजमहल के बाद कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे। इसका जवाब है नहीं इतिहास में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता यह एक लोक कथा है जो समय के साथ फैलती चली गई। सच्चाई यह है कि कई कारीगरों को शाहजहां ने इनाम और सम्मान दिया था। हां उन्होंने यह जरूर सुनिश्चित किया कि ऐसा काम दोबारा कोई ना कर पाए और इसके लिए गुप्त दस्तावेजों को संरक्षित किया गया। यानी नक्काशी सिर्फ सुंदरता नहीं एक रहस्य भी है जो आज भी दीवारों में छिपा है। अब जब ताजमहल के हर पहलू को समझ लिया तो चलिए जानते हैं। आज के दौर में ताजमहल किस खतरे का सामना कर रहा है और क्या हम इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए बचा पाएंगे? ताजमहल सिर्फ एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं है। यह भारत की पहचान है लेकिन दुख की बात यह है कि आज यह पहचान खतरे में है। 400 साल तक मौसम समय और युद्ध की मार झेलने वाला ताजमहल। अब हमारी लापरवाही की वजह से कमजोर पड़ रहा है सबसे बड़ी चिंता है प्रदूषण। आसपास की फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं वाहन प्रदूषण और यमुना की गंदगी ने ताजमहल के संगमरमर को पीला करना शुरू कर दिया है। कभी जो दूध सा सफेद चमकता था वह अब धुंधला सा दिखने लगा है और फिर यमुना नदी की हालत जिस नदी ने सदियों तक ताजमहल की नीम को जीवन दिया।

[18:10]वही आज सूखने की कगार पर है नदी में पानी की कमी सीधा असर डाल रही है उस लकड़ी पर जिसकी नमी पर पूरी इमारत टिकी है। इतिहासकार और वैज्ञानिक दोनों चेतावनी दे चुके हैं अगर यमुना पूरी तरह सूख गई तो ताजमहल की नीव कमजोर हो जाएगी और गिरने का खतरा बढ़ जाएगा। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं पर्यटकों की भीड़ और रखरखाव की कमी भी इमारत पर असर डाल रही है। अब सवाल यह नहीं है कि ताजमहल कितना मजबूत है सवाल यह है कि क्या हम इसे भविष्य के लिए बचा पाएंगे? क्योंकि यह सिर्फ शाहजहां की मोहब्बत की पहचान नहीं। यह हम सबकी विरासत है ताजमहल एक इमारत नहीं है यह समय की रेत पर लिखा हुआ प्रेम पत्र है। एक राजा की मोहब्बत कारीगरों की मेहनत विज्ञान की सूझबूझ और प्रकृति का संतुलन सब कुछ इस एक इमारत में समाया हुआ है। बिना सीमेंट के खड़ी इमारत हमें सिखाती है कि जब इरादा मजबूत हो तो पत्थर भी सांस लेते हैं। जब कला दिल से निकले तो वह सदियों तक जिंदा रहती है लेकिन ताजमहल सिर्फ अतीत की कहानी नहीं है। यह हमारा आज भी है और आने वाली पीढ़ियों का कल भी इसे बचाना सिर्फ सरकार या आसी की जिम्मेदारी नहीं है यह हमारी सामूहिक विरासत है। तो अब मैं आपसे पूछता हूं क्या आपको पहले से यह बातें पता थी। क्या आपने कभी सोचा था कि ताजमहल सीमेंट के बिना बना है और उसकी नींद लकड़ी पर टिकी है। अगर आज आपने कुछ नया सीखा कुछ दिल को छू गया तो इस वीडियो को लाइक कीजिए। अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर कीजिए क्योंकि यह जानकारी जितने ज्यादा लोगों तक पहुंचेगी हम उतनी ही जागरूकता फैला पाएंगे। और अगर आप चाहते हैं कि हम ऐसे ही और इतिहास के छुपे हुए राज्य आप तक लाते रहे तो चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें और बेल आइकन दबा दें। ताकि अगली बार जब हम किसी और रहस्य से पर्दा उठाएं आप सबसे पहले जाने। अब हमें दीजिए इजाजत मिलते हैं अगले वीडियो में एक और अनसुनी लेकिन सच्ची कहानी के साथ।

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