[0:01]सुनाते हैं हम तुम्हें कष्ट किसे कहते हैं। महाराज नल का प्रसंग। युधिष्ठिर जी को सुना रहे हैं। बड़ा धार्मिक प्रसंग है और शिक्षाप्रद प्रसंग है। महाराज नल
[0:19]इसमें वर्णन है। भगवान व्यास देव जी वर्णन कर रहे हैं। महाराज नल सर्वगुण संपन्न हैं। भली भांति जब तक ब्याह नहीं हुआ ब्रह्मचर्य का पालन किया। महाराज नल ब्रह्मचर्य से रहते थे।
[0:38]चारों वेदों को कंठस्थ किए हुए थे। पंचम वेद स्वरूप समस्त इतिहास और पुराणों का गुरुकुल में रहकर अध्ययन किया था। सब धर्मों के ज्ञाता थे महाराज नल। और जब वहां से अपने घर आए तो पंच यज्ञों के धर्म के अनुसार संपूर्ण देवताओं का नित्य होम करके हवन के द्वारा बली वैश्व देव और पंच यज्ञों की आहुति अपने लोग जब नैस्टिक ब्रह्मचर्य में थे तो ये सब आदेश थे गुरुजनों के। ये सब करते थे। अहिंसा परायण सदैव सत्य बोलते, दृढ़ता पूर्वक जो नियम लेते उसका पालन करते। ऐसे तेजस्वी थे की दक्षता, धैर्य, ज्ञान, तपस्या, सोच, शम दम ये स्वयं उनमें निवास करते थे। ऐसे राजा नल के प्रभाव को देखकर के कलयुग ने कहा हमारे राज्य में ऐसे को सुखी नहीं रहना चाहिए। दमयंती जी जैसे नल जी ब्रह्मचर्य से रहते थे ऐसे दमयंती जी। जिनके साथ इनका पाणि ग्रहण संस्कार हुआ ब्रह्मचर्य से रहती थी। देवी स्वरूप हैं। सत कार्यों का अनुष्ठान, ब्रह्मचर्य से रहना और जब ब्याह के योग्य हुई तो इन्होंने धर्मात्माओं के मुख से महाराज नल के रूप सौंदर्य धर्मात्मा होने की बात सारे गुणों की बातें सुनी तो मन में निश्चय कर लिया कि अगर पति रूप से वरण करूंगी तो महाराज नल को। बड़ा प्रसंग है हम उधर पीछे नहीं जाते।
[2:27]देवताओं में लालसा प्रकट हो गई कि ऐसी निष्ठावान राजकुमारी का वरण तो जो देवी स्वरूपा है हम देवताओं को चाहिए। देवता गए।
[2:44]जो उनको पता चला कि महाराज नल के प्रति इनकी आ सकती है तो सबने नल रूप धारण कर लिया।
[2:52]नल जी को भी निमंत्रण गया था ये भी गए थे। पर ये पांच देवता जो थे उनको प्रणाम करके कहा मैं आपका दास हूं। मेरा जीवन आपके चरणों में समर्पित है। मैं ऐसा कभी गलती नहीं कर सकता कि आपके आगे स्वयंवर में मैं खड़ा हूं। तो हम कहा हम तुम्हारी दैन्यता से और इस प्रार्थना से प्रसन्न हैं। हमारा आदेश है तुम खड़े होइए। और वह जिसका वरण करेगी वही ले जाए। दमयंती के सामने नल, नल, नल, नल। दमयंती ने कहा मन वचन कर्म से हमने कभी धर्म का उल्लंघन नहीं किया। तो हे देवताओं, आप ही मुझे बताओ कि मेरे असली नल कौन है इनमें से। तत्काल हृदय में आया कि देवताओं की छाया नहीं होती और मनुष्य रूप में छाया होती। जिस नल में छाया पड़ रही थी जिस शरीर की जय माला उन्हीं के डाल दी। सब देवता प्रसन्न हो गए कि हम तुम्हारी पातिवृत धर्म निष्ठा पर प्रसन्न है कि जिसका वरण किया उसी के गले में माला डाली। यही तुम्हारी धर्म की परीक्षा थी। कलयुग इनके इस प्रभाव को देखकर के देवता भी जिस स्वयंवर के लिए गए उसमें इनकी विजय हुई इतना धर्मात्मा गुणवान है। ईर्ष्या हो गई। कलयुग को ईर्ष्या हो गई।
[4:17]जब देवता लोग वापस हो रहे थे तो कलयुग ने कहा कि यह मैं कभी सह नहीं सकता कि हमारे राज्य में कोई इतना गुणवान, धनवान धर्म से चलने वाला सुखी रहे। मैं इसको हर तरह से रौंद दूंगा कलयुग ने कहा। देवताओं ने कहा तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए। धर्मात्मा पुरुष बोले आपका काम हो गया आप जाइए हम अपना काम शुरू करते हैं। इसको किसी काम के लायक नहीं रखेंगे इसको नष्ट कर देंगे। कलयुग ने कहा मैं अपने क्रोध का उपसंहार नहीं कर सकता। अब मेरा चमत्कार देखना इसकी खोपड़ी में बैठता हूं इसी राजा की और इसका सर्वनाश करता हूं। मैं इनके भीतर निवास करूंगा। इनको राज्य से वंचित करूंगा। इनको इनकी पत्नी से वंचित करूंगा। सुखों से वंचित करूंगा और सर्वनाश कर दूंगा। इस प्रकार कलयुग ने उन देवताओं से कह करके महाराज नल के पीछे चल पड़ा। पर वो स्पर्श नहीं कर सकता था क्योंकि कहीं भी अधर्म आचरण नहीं था। बिना अधर्म आचरण के कलयुग किसी को स्पर्श नहीं कर सकता उसकी सामर्थ्य ही नहीं है।
[5:33]अब वो नल के दोष देखने के लिए तत्पर रहता कोई गलती ऐसी मिले धर्म विरुद्ध जिससे मैं उसके अंदर प्रवेश कर जाऊं और इसका नाश कर दूं। 12 वर्ष बीत गए कोई भी गलती नहीं मिली। एक कुमार एक कुमारी का जन्म भी हुआ। 12 वर्ष हो गए। एक भी गलती नहीं मिली। एक दिन किसी कार्य से बहुत शिथिल थे। संध्या का समय था सूर्य अर्ग देने का। तो लघुशंका गए हाथ धो लिया पर ना चरण धोए और ना आचमन किया और अर्घ में बस छिद्र मिल गया। कलयुग को प्रवेश करने का दोष मिल गया।
[6:29]और आविष्ठ होते ही बुद्धि बदली। नशा जैसे चढ़ता है ना। कलयुग का आवेश होते ही बुद्धि बदल जाती है। उधर एक पुष्कर थे जो इनके कजन भाई थे पर राजा ये बने हुए थे।
[6:51]बड़ा राजा होता था। उसके पास कलयुग उनकी बुद्धि में प्रवेश करके विचार करवाने लगा। मेरा भी तो अधिकार राज्य पे है। ये बड़ा है तो राजा हो गया तो क्या फंसाया जाए इसको। अभी तक नहीं था। जाके ललकारा कि तुम बहुत बड़े राजा बनते हो। आओ हमारे साथ जुआ खेल लो। महाराज नल विचार शून्य हो गए थे क्योंकि कलयुग का प्रवेश हो गया था।
[7:22]राजा नल कुछ सोचने विचारने की सामर्थ्य रहित होकर के कहा कि यदि धर्म पूर्वक जुआ खेलोगे तो हम तुम्हारे साथ खेलेंगे। जुआ कहीं धर्म पूर्वक होता है क्या? जुआ में छल और कपट का राज्य होता है। द्यूत कीड़ा के लिए पुष्कर ने आवाहन किया। राजा नल जुआ खेलने लगे। बुद्धि में कलयुग का प्रवेश हो गया था। राजा नल हारते चले जा रहे हैं। जुआ का एक जोश होता है। जितना हारता उतने उसके अंदर और जीतने की लालसा प्रबल होती। सब रत्न हार गए। स्वर्ण हार गए। राजकीय वाहन हार गए। बहुमूल्य वस्त्रों को दांव पर लगा दिया। कुछ भी अब ऐसा नहीं दिखाई दे रहा है कि जो लगाए महल भी दांव में लगा दिया। अब वो जुआ है। और इस समय कलयुग का संकल्प है इनको नष्ट करने का तो वही पांसा पड़ता है पुष्कर के हाथ में जिससे राजा नल हार जाए। एक भी बार नहीं जीते पर जोश इनका बढ़ता चला गया। सारथी ने महल में जाकर के दमयंती से निवेदन किया कि समस्त पुरवासी लोग आपसे प्रार्थना करना चाहते हैं। आपकी ही बात महाराज मान सकते हैं। रोक दीजिए इनको। नहीं तो नष्ट हो जाएगी पूरी प्रजा नष्ट हो जाएगी। अगर पुष्कर राजा होगा तो ये दुष्ट स्वभाव का है। ऐसे धर्मात्मा राजा को परास्त करके जुए के द्वारा अगर वो राजा बना तो प्रजा दुखी हो जाएगी। महाराज भावी संकट को ना देखकर के केवल जुए में मगन हो रहे हैं। ठीक नहीं है द्यूत क्रीड़ा में। दमयंती बहुत शोकित हुई। कि अपने पति को हम आदेश करें ऐसा हो नहीं सकता। पर ऐसी परिस्थिति में मुझे निवेदन करना चाहिए।
[9:33]द्वारपालों से कहा कि जाकर के महाराज से प्रार्थना कर दो हम उनके चरण दर्शन करना चाहती हूं और कुछ निवेदन करना चाहती हूं। कितना धर्म है।
[9:46]अब जाकर के बार-बार वहां कह रहे हैं दमयंती जी आपसे निवेदन कर रही हूं आपसे मिलना चाहती हूं उनको सुनाई ही नहीं दे रहा। बस पासे पर मनोवृत्ति लगी। हारने पे। दमयंती ने देखा कि महाराज तो उन्मत्त हो गए हैं।
[10:07]असावधान हैं। भय और शोक दोनों का त्याग कर अपने पति का हित करना पत्नी का परम कर्तव्य होता है। अगर महाराज का सब कुछ छिन गया तो महाराज संकट में पड़ जाएंगे इसलिए अब मुझे यह मर्यादा नहीं रखनी चाहिए कि वह आदेश दे तब उनके पास जाए। अगर स्वामी संकट में फंसने वाले हैं तो उनके आदेश की जरूरत नहीं अपने शरीर से वचन के द्वारा या जैसे भी बने संकल्प के द्वारा उनको संकट से निवृत्त करना सेवक का परम कर्तव्य होता है। वहां आदेश की जरूरत नहीं होती कि आदेश नहीं हुआ स्वामी संकट में फंसे हैं। मंत्रियों को बुलाया दमयंती जी ने और कहा प्रधान प्रधान क्या-क्या हारा गया है मुझे बताओ। मंत्री ने सब कुछ बता दिया अमुक-अमुक धन राशि, खजाना, महल, राज परिवार की सुविधाएं सब कुछ हार चुके हैं।
[11:17]शोक से व्याकुल हुई दमयंती महाराज के पास जाकर प्रसन्न मुद्रा में कह रही है। देखो यह धर्म कहता है यदि सामने वो निराश और हताश हो रहे हैं तो अपने को ऐसा सामने पेश नहीं करना कि और दुखी हो जाए। प्रसन्न मुद्रा में कहा कि महाराज आपको पता है आप क्या-क्या हार चुके हैं? और आप किस गति को पहुंच रहे हैं? प्रार्थना है आप सावधान हो जाइए। जो हुआ छोड़ दो। जितना बचा उतने में हम रह लेंगे। धर्म पूर्वक जीवन व्यतीत करो। यह अधर्म आचरण आपको परास्त कर रहा है। जुआ खेलने से महाराज का सारा का सारा ज्ञान चौपट हो गया था। दमयंती जी लाख समझाए महाराज ने आंख उठाकर भी नहीं देखा।
[12:17]सब कुछ हारते चले गए। अब लगाने के लिए कुछ नहीं बचा। कुछ नहीं। चक्रवर्ती सम्राट के पास कुछ नहीं बचा।
[12:28]तब पुष्कर ने हंसकर कहा कि तुम्हारे पास दमयंती रह गई है।
[12:37]जैसे दुर्योधन आदि ने प्रेरणा की। और तुम्हें मैंने जीत लिया सब कुछ। तुम्हारी अगर इच्छा हो तो एक दांव पर फाइनल हो जाएगा। आप दमयंती को रख दो। या तो तुम्हारी राज्य सहित और या फिर मेरी।
[12:59]महाराज के आंखों में आंसू आ गए। नहीं। इतना नहीं कर सकते। राज्य हार गया सब कुछ हार गया। इतना नहीं कर सकते। ऐसी धर्म से चलने वाली पत्नी को तुम जैसे कुमार्गगामियों के हाथ में नहीं थोड़ा काम किया बुद्धि। महाराज ने कहा कि मेरा हृदय विदर्ण हो गया तुम्हारी यह बात सुन कर के।
[13:27]मेरे में इतनी सामर्थ्य नहीं कि मैं ऐसा कर सकूं। मेरे आभूषण बचे हैं। क्या यह दांव में लग सकते हैं? सब कुछ तो चला गया। और आभूषण को दांव में लेकर के आप एक बार देख लीजिए। आभूषण वो पासा तो कलयुग के प्रभाव से। वो खत्म।
[13:53]महाराज ने कहा मेरे वस्त्र। वस्त्र भी ले लिए। बड़ा विचित्र भगवान का खेल है। इतना ज्ञानी मन। इतना संयमी राजा। और कलयुग प्रवेश कर गया तो कहां कुछ दिगंबर कपड़े उतरवा लिए।
[14:18]और आदेश किया इसी वक्त हमारे राज्य की सीमा के बाहर निकल जाइए। पुष्कर ने।
[14:29]दमयंती जी के शरीर पर कोई आभूषण नहीं होगा। एक वस्त्र का आदेश करते हैं। और तुम ऐसे निकलो राज्य से बाहर। पूरी प्रजा में हाहाकार महाराज नल तीन रात तीन दिन चलने के बाद उस नगर की सीमा के बाहर जंगल में पहुंचे। पुष्कर ने घोषणा करवा दी महान महाराज नल को जो कोई भी पानी, भोजन, वस्त्र देगा उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। राज्य में कोई भी पानी, भोजन, वस्त्र भी नहीं देगा। सम्मान की तो बात जाने दो। कोई भी प्रजा की ताकत नहीं थी कि उनको अब अधिकार उसके हाथ में है। पुष्कर के वचन के अनुसार कोई भी पुरवासी थोड़ा भी योग नहीं किया। किसी सरोवर में जल लेकर तीन रात तीन दिन बराबर चलकर के वो जंगल में वहां पहुंचे। भूख से पीड़ित हैं राजा रहे हैं। कुछ कंदमूल फल जुटाए। दमयंती जी उनके पीछे-पीछे चल रही है।
[15:53]दमयंती जी ने समझ लिया था कि जो बुद्धि शास्त्र विरुद्ध चलती है वह सर्वनाश करा देती है। तो अपने कुमार और कुमारी को महाराज के सारथी से कहा। कि तुम हमारे मायके में ले जाकर के इनको दे दो और यह महाराज का दिव्य अश्व है इसकी सुरक्षा की जाए। कभी समय आएगा तो हो सकता है महाराज की सेवा में। और तुम गुप्त रूप से रहना। तुम महाराज के सारथी हो महाराज के समान बुद्धिमान हो।
[16:41]का बड़ा विचित्र खेल है। यदि भगवत आश्रय ना हो तो कितना दुखी ही दुख है। अब दमयंती जी साथ चल रही छुधा से पीड़ित महाराज। कंदमूल फल एकत्रित करते हैं पर कंदमूल ऋषियों का आहार है जिन्होंने स्वाद को नष्ट कर दिया है। अब ये राजा थे तो सामने इनको दिखाई दिया कुछ पक्षी हैं जिनके स्वर्ण के पंख हैं।
[17:15]उनके मन में आया कि यदि यह पक्षी फंस जाए और स्वर्ण के पंख हम निकालकर बेच दें तो अन्न आदि मिल जाएगा तो भोजन तो हो जाएगा।
[17:28]मेरे भोजन की व्यवस्था इससे हो जाएगी। अब वहां जाल तो है नहीं।
[17:40]महारानी एक साड़ी है। बड़ा वस्त्र होता है।
[17:47]काटकर उसको उन पक्षियों को जो बैठे हुए थे फेंका। वो पक्षी नहीं थे। वो पासे थे। जो पक्षी रूप में आकर आकर्षित कर रहे थे। वो आधा वस्त्र उड़ा करके ले गए। और कहने लगे खोटी बुद्धि वाले नरेश जो धर्म का त्याग कर देता है उसको मैं पग-पग पर दंड देता हूं। मैं कोई पक्षी नहीं हूं। मैं पुष्कर के हाथ का पासा हूं। जो पक्षी बनकर आपको धोखा देने आया था। यह महाराज युधिष्ठिर को प्रसंग सुनाया जा रहा है भगवान व्यास देव जी ने रचना की है। अब मुझे चैन मिल रहा है आप इतने कष्ट में हो अब अच्छा लग रहा है। महाराज नल ने दमयंती से कहा तुम सती हो, साध्वी हो। देखो मेरा अब ना तो क्रोध काम करेगा और ना बल काम करेगा क्योंकि मैं बलहीन हो चुका हूं। क्षुधा पीड़ित हूं। पता नहीं मेरा जीवन अब किस तरफ जाएगा मुझे कुछ पता नहीं। मेरी प्रजा भी भयभीत है और मुझे कोई आदर नहीं देगी।
[19:04]देखो मैं इतना निर्बल हो गया कि वह वस्त्र भी पक्षी ले जा रहे हैं मैं उनको रोक नहीं पा रहा। आज हमारे जीवन में ऐसी परिस्थिति आ गई है मेरी चेतना लुप्त हो रही है। मैं तुम्हारा पति हूं। और तुम्हारा मित्र भी हूं। इसलिए एक तुम्हें बहुत हित की बात बता रहा हूं। यह जो मार्ग जा रहा है यह दक्षिण की दिशा की तरफ है। इसके आगे एक ऋक्षवान पर्वत है। उसे लांग करके जाना। वहां एक अवंती राज्य है। वहीं एक विंध्य पर्वत दिखाई दे रहा है। वहां पयोष्णी नदी है। बड़े-बड़े महर्षियों के आश्रम हैं। वहां महर्षिगण सुंदर-सुंदर फलादि की पहचान भी जानते हैं। तो वहां जाकर कुछ दिन रुकना। उनकी सुरक्षा में। और फिर वहां से विदर्भ देश का राज्य का मार्ग वह तुम्हें बता देंगे। तुम उस मार्ग से जाकर के अपने मायके में चले जाना।
[20:18]एकाग्र चित होकर मैं तुमसे तुम्हारी हित की बात कहता हूं। अब मेरे जीवन का तो क्या भरोसा कहां जाएगा क्या होगा कैसी परिस्थिति होगी। दमयंती जी विकल होकर के बोली कि मैंने सुख का वरण नहीं किया। मैंने किसी राजा का वरण नहीं किया। मैंने आपको वरण किया है। और आपको वरण किया है तो आप जिस परिस्थिति में हो मैं आपके साथ हूं। उनका हृदय बहुत व्यथित हुआ। कहां महाराज राज्य छिन जाने पर धन नष्ट हो जाने पर अपमान होने पर भी मुझे उतना दुख नहीं हुआ। जितना आपके वचन सुनकर दुख हुआ। आप मुझे अलग करने की बात करते हैं? मुझे असहाय बनाना चाहते हैं? अभी मैं असहाय नहीं हूं आपके साथ हूं तो। महाराज चाहे जैसी परिस्थिति में आप हो जब आप थके होंगे निराश होंगे तो हम आपके चरण दबाकर आपको वाणी के द्वारा सांत्वना देंगे आपका उत्साहवर्धन करेंगे। आप मुझे छोड़िएगा नहीं।
[21:54]नल ने कहा तुम जैसा कहती हो अक्षरशः ठीक है।
[22:00]पत्नी के समान कोई मित्र नहीं होता क्योंकि अपने जीवन को समर्पित किए हुए हैं। पर मेरा कर्तव्य मुझे तुम्हें साथ रखने के लिए आदेश नहीं करता। क्योंकि मुझे पता है मुझे भयंकर अब कष्ट पाना है। और मैं तुम्हें कष्ट से युक्त देख नहीं सकता। हे प्रिय। मैं शरीर का त्याग कर सकता हूं पर तुम्हें कष्ट में नहीं देख सकता। यह पति का धर्म है। समझे। मैं शरीर का त्याग कर सकता हूं। पर तुम्हें कष्ट से। नहीं ये पति का धर्म है। पत्नी का धर्म क्या? मेरा जीवन मेरा वचन आपको हर समय प्रसन्न रखेगा। कैसी भी परिस्थिति में हो मैंने आपका वरण किया है राज्य का नहीं आपके सदगुणों का नहीं आपकी महिमा का नहीं ये। तभी ऐसे सदगृहस्थ महात्मा कहे जाते हैं ऐसे सदगृहस्थ महात्मा कहे जाते हैं।
[22:56]महाराज मुझे पक्का पता है आप त्याग देंगे। क्योंकि आपने जो विदर्भ देश के मार्ग का वर्णन किया। इससे मुझे पक्का पता है कि आप मुझे त्याग देंगे। पर महिपते। बड़ी से बड़ी आपत्ति में भी अपने शरणागत का त्याग नहीं किया जाता और मैं आपकी शरण में हूं। आपको त्याग नहीं करना चाहिए। यदि आपका अभिप्राय है कि मैं बंधु-बांधवों के यहां सुखी रहूंगी तो कदापि नहीं। मैं आपके चरणों के समीप सुखी रहूंगी। महाराज नल ने कहा कि इस समय तुम्हारी यह बातें मुझे सुहाती नहीं। क्योंकि मुझे केवल एक बात दिखाई दे रही है मेरे सामने बड़ा दुख खड़ा है और मैं उस दुख को अकेले भोगना चाहता हूं क्योंकि मेरे ही कर्मों का ये फल। मैंने जुआ खेला। तुमने तो नहीं खेला ना। इसलिए हम तुम्हें दुखी नहीं करना चाहते।
[23:57]तुम पतिव्रता हो। तुम्हें कभी कोई किसी भी तरह से हानि नहीं पहुंचा सकता है मुझे विश्वास है। राजा नल ने अनेक प्रकार से उनको बोध कराएं कि तुम सती हो पातिव्रत धर्म से युक्त हो घबराना नहीं। दमयंती ने कहा इसका मतलब मेरी भक्ति में अभी कमी है। अगर भक्ति में कमी ना होती तो आप मुझे क्यों त्याग देते। महाराज ने कहा यह तो हम आपको बता रहे थे कोई त्याग थोड़ी रहे हैं। चलो दमयंती को साथ ले करके
[24:35]जंगल में ढूंढते रहे कि कोई स्थान मिले जिसमें रात्रि में शयन हो तो एक खंडेहर जैसा था वहां देखा। कहां आज रात्रि यही शयन करते हैं पर फिर हम तुम्हें संबोधन करते हैं कि यह मार्ग अमुक-अमुक जगह से ऐसे जाता है। वैसे तो समझ ही गई थी कि महाराज का क्या संकल्प है पर थकी इतनी थी कि उनको नींद आ गई। उनका थोड़ा वस्त्र काट करके ऐसे ही अपने शरीर को ढका और एक बार लौट के देखा और बस चल पड़े छोड़ कर के वहीं से।
[25:15]राजा नल यद्यपि बहुत हृदय से दुखी की सब कुछ छिन जाने पर भी ऐसी प्रिय धर्मात्मा पत्नी का इस तरह से त्याग करना बिल्कुल ठीक नहीं है। पर उनको यही लग रहा है पता नहीं कौन सा संकट मुझे भोगना पड़े। अगर यह चली जाएंगी तो सुरक्षित रहेंगी। अचानक रात्रि में आंख खुली तो देखा महाराज नहीं। विलाप करने लगी।
[25:46]क्या कोई अपने इस तरह समर्पित पत्नी का त्याग करता है? महाराज, आप जैसे नाथ होने पर भी मुझे अनाथ करके क्यों छोड़कर चले गए? और मेरा आधा वस्त्र शरीर से लिपटा हुआ है। इसका मतलब आधा वस्त्र आप अपने शरीर के लिए जिससे तन ढक जाए। यह हिंसक पशुओं से भरा हुआ बन है और मुझे अकेला छोड़कर आप जाने की सोच कैसे लिए? ऐसी वो विलाप कर रही हैं। राजा नल की बुद्धि में कलयुग सवार है। अशांति पैदा किए हुए हैं। कलयुग के स्पर्श से महाराज की बुद्धि धर्म निर्णय करने में शिथिल हो गई है। निर्णय ठीक नहीं हो पा रहा। क्योंकि बुद्धि कलयुग से ग्रसित हो गई है। वो अपनी ऐसी पतिव्रता पत्नी को अकेले ही निर्जन वन में छोड़ कर के चल दिए। निर्जन वन में अपने स्वामी को ना देखकर के दमयंती बहुत भयभीत हो गई। विलाप करने लगी। जो धर्मज्ञ हैं, सत्यवादी हैं। भला वो मुझको कैसे छोड़ सकते हैं? बार-बार प्रश्न आता है ऐसा कैसे कर सकते हैं? क्योंकि मेरा कोई दोष तो होना चाहिए। मृत्यु असमय में नहीं आती। ऐसे ही तुम्हें मुझे त्यागना नहीं चाहिए।
[27:19]अगर परिहास कर रहे हो तो महाराज प्रकट हो जाइए कहां हो? अगर विनोद कर रहे हो तो प्रकट हो जाइए। मैं बहुत डर गई हूं। आप मुझे दर्शन दीजिए। भूख, प्यास, परिश्रम, दुख ये मुझे परास्त नहीं कर सकते पर आपका संग त्यागना अब मैं परास्त हो जाऊंगी। अब मेरे दुख की सीमा नहीं रहेगी। ये सब दुख मैं सह सकती थी। प्रचंड शोक से दमयंती दुखी होकर चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगी। और वन में खोजने लगी।
[28:00]दमयंती दीर्घ श्वास लेते हुए हां महाराज हां महाराज ऐसा कह रही थी। विलाप करती हुई उस जन्म में जंगल में घूम ही रही थी कि एक विशाल भारी भरकम अजगर जो भूख से व्याकुल था दमयंती जी को देखा और उसने लंबी श्वास खींची। जो जंगल में बड़े-बड़े अजगर होते हैं वो दौड़ के नहीं खाते हैं। वो मुंह फैला दिया और श्वास खींची। जैसे प्रबल तूफान से कोई भागता चला जाए। ऐसी उनकी वायु के आकर्षण से वो उनके मुख तक आ जाता है। विशाल अजगर होते हैं। चक्कर काटती हुई दमयंती उसके मुंह के समीप आ गई। और वो निगलने की चेष्टा करने लगा।
[29:00]विलाप करती हुई कहने लगी कि यही उचित है। आपसे वियोग होने पर इस शरीर का नष्ट हो जाना ही ठीक है। क्योंकि आज मैं अनाथ हो गई आपके बिना।
[29:18]विलाप कर ही रही थी। अजगर आधा लील चुका था। ऐसे। वो धीरे-धीरे अपने शिकार को लीलता है। वहां एक व्याध टहल रहा था जो जंगल में ही रहता था पशुओं को मारकर खाता था। ऐसे हिंसक। उसने करुण क्रंदन सुना तो भाग के आया तो देखा इतना शरीर अजगर लील गया था। बड़े वेग से आया। और अजगर के द्वारा निगली जाती हुई दमयंती को बचाने उनके पास वस्त्र भी होते हैं। तुरंत उस अजगर को। काटकर मारकर दमयंती को निकाला। दमयंती से कहा आप चिंता मत करो। अब आप स्वस्थ हैं। वो मारा जा चुका है अजगर। तुम किस प्रकार से इतनी सुंदरी होती हुई इस जंगल में कैसे? दमयंती ने संक्षेप में अपना वृतांत सुनाया।
[30:22]विदर्भ विदर्भ कुमारी दमयंती के आधे वस्त्र से शरीर ढका था। आधा महाराज ले गए थे। और इतने सुंदर देवता जिनके वरण करने के लिए तो फिर व्याध। व्याध कामातुर होकर के उनसे बात करने लगा दमयंती जी से। दमयंती जी जैसे बालक को समझाती हैं ऐसे कहा देखो मैं आपकी भावना को देख रहे हैं। तनिक भी दूषित भावना मत करना हमारे प्रति। बड़ा तुम्हारा उपकार हुआ जो तुमने शरीर को बचाया पर इस शरीर पर काम भाव मत कर लेना। जानते हो मैं पतिव्रता हूं। पहली बार जो तुमने हमारा स्पर्श किया वो बचाने के लिए किया था। इसलिए तुम्हारा अमंगल नहीं हुआ। नहीं मेरे छूने मात्र से तुम्हारा मंगल हो जाएगा। अब वो व्याध बेचारा क्या जाने पतिव्रता क्या जाने भागवत बातें।
[31:26]दमयंती ने कहा बस एक कदम भी आगे नहीं। वाणी के द्वारा रोकने पर भी वो व्याध अत्यंत आविष्ठ हो गया। कुआ मदंधो, मदनातुरो हुआ। अंधों में अंधा कौन है? अर्थात सबसे बड़ा मंदांध कौन है? बोले जिसे काम चढ़ गया है। काम वेग आ गया। वो ये नहीं देखता है क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए। कोई देखता है कि नहीं देखता है। पाप है कि पुण्य। कुछ। कुआ मदंधो, मदनातुरोबा। जो ही आगे कदम बढ़ाया उन्होंने फिर कहा शांत हो जा और वापस हो जा। स्पर्श मत कर लेना। अब। पर वो समझने की बुद्धि खो चुका था। स्मृति नष्ट हो जाती है। बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है जहां काम का आवेश होता है। आगे बढ़कर जो ही दमयंती का स्पर्श करने को किया। दमयंती जी मन में संकल्प किया अपने पति के सिवा आज तक हमने कभी किसी को अगर काम भाव से चिंतन भी नहीं किया है। तो वही प्रताप हमारी रक्षा करें। जो ही ऐसा किया उसके शरीर में जैसे पेट्रोल डाल के आग लगा दी गई हो ऐसे आग लग गई। देखते-देखते वो भस्म हो गया। कोई श्राप नहीं दिया। कोई चेष्टा नहीं की। ये है पतिव्रता की सामर्थ्य। अगर मन वचन कर्म से मैंने कभी किसी के प्रति गंदी भावना नहीं की तो मेरी वही भावना मेरी रक्षा करेगी। तत्काल उस व्याध के शरीर में आग लग गई। और देखते-देखते वह भस्म हो गया। अब उस निर्जन एवं भयंकर वन में असहाय दमयंती जी जहां सिंह, चीता, रुरु, मृग, व्याग्र, भयानक स्वभाव वाले भैंसे, रीछ, बड़े-बड़े सब जंगली पशु। उनकी आवाज जो भय प्रदान करने वाली वृक्षावलियों की पंक्तियां, सेमल, जामुन, आम, खैर, शाकू, बेर, पदम, कांवला पाकर, कदंब, गूलर ये बड़े-बड़े वृक्षों की जहां ऐसे भयानक पशु ऐसे वृक्ष। अब अपने को छुप-छुप करके उन पशुओं से बचाते हुए विदर्भराज कुमारी अकेली ढूंढ रही हैं कहां है महाराज नल। पति का विरह संकट हृदय में जला रहा है। एक गुफा थी उसमें बैठकर के विचार करने लगी।
[34:09]कि शायद मेरे ही किसी कर्म का फल ऐसा उदय हुआ है कि जो मुझे भोगना पड़ रहा है अपने पति से विलग होकर। पर जिस मार्ग को मेरे पति ने आदेश किया है मेरा कर्तव्य बनता है उसी मार्ग में चलना। देखो कैसी भी परिस्थिति हो धर्मात्मा पुरुष कभी भी अपने पूज्य जनों की आज्ञा उल्लंघन नहीं करते। मन में विचार किया कि अगर उन्होंने छोड़ा तो उसके पहले मुझे मार्ग भी बताया कि इस मार्ग से जाना है। राजकुमारी दमयंती उस मार्ग में वो भयभीत होते हुए चल रही है। कितना कष्ट आता है जीवन में देखो अपने छोटे-छोटे कष्टों में वो बजाते हैं। चक्रवर्ती सम्राट की ऐसी सुखद महल में रहने वाली महारानी ऐसी परिस्थिति की तन ढकने के लिए पूरा वस्त्र नहीं है। कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं। कोई पास नहीं। ऐसा भयंकर जंगल जो प्रीतम पति हैं उन्होंने भी उनको छोड़ दिया है।
[35:58]विलाप करती हुई कहने लगी कि यही उचित है। आपसे वियोग होने पर इस शरीर का नष्ट हो जाना ही ठीक है। क्योंकि आज मैं अनाथ हो गई आपके बिना।
[51:00]Next part coming soon अगला अध्याय शीघ्र।



