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शून्य बनो, ईश्वर स्वयं प्रकट होंगे | अष्टावक्र गीता का अंतिम रहस्य।Silence-pragyan

Silence-pragyan

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[0:00]नमस्कार मित्रों, राधे राधे। मनुष्य के भीतर एक गहरी खोज हमेशा चलती रहती है। ईश्वर को पाने की, सत्य को जानने की, अपने अस्तित्व के रहस्य को समझने की। कोई मंदिर जाता है, कोई पूजा करता है, कोई ध्यान करता है, कोई तप करता है। हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से उस परम सत्य तक पहुंचने की कोशिश करता है। लेकिन एक बहुत गहरा प्रश्न यहां उठता है। क्या ईश्वर को वास्तव में किसी प्रयास से पाया जा सकता है? यहीं पर अष्टावक्र गीता का अद्वैत ज्ञान एक ऐसा सत्य प्रकट करता है जो साधारण नहीं बल्कि पूरी तरह उलट है। अष्टावक्र कहते हैं ईश्वर को पाने के लिए कुछ करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि जो तुम कर रहे हो उसे छोड़ने की आवश्यकता है। यह सुनते ही मन उलझ जाता है क्योंकि मन हमेशा कुछ करने में विश्वास करता है। उसे लगता है कि बिना प्रयास के कुछ नहीं मिल सकता लेकिन अष्टावक्र का संकेत है। ईश्वर कोई वस्तु नहीं है जिसे तुम बाहर जाकर खोज सको। ईश्वर तुम्हारा ही वास्तविक स्वरूप है। जो तुम हो उसे पाने के लिए प्रयास कैसे हो सकता है? यहीं से शून्य बनने का रहस्य शुरू होता है। शून्य बनने का अर्थ क्या है? क्या इसका मतलब है कि तुम सब कुछ छोड़ दो दुनिया से भाग जाओ या अपने विचारों को जबरदस्ती रोक दो? नहीं अष्टावक्र का शून्य इन सब से अलग है। शून्य का अर्थ है अपने भीतर जो भी पहचाने हैं उन्हें छोड़ देना। तुम अपने आपको शरीर मानते हो, यह एक पहचान है। तुम अपने आपको मन मानते हो यह भी एक पहचान है। तुम अपने आपको नाम, रिश्तों और भूमिकाओं से जोड़ते हो। यह सब पहचाने हैं यही पहचाने तुम्हें सीमित करती हैं। जब तक यह पहचाने बनी रहती हैं तब तक तुम अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं देख पाते। अष्टावक्र कहते हैं इन सब को छोड़ो। लेकिन छोड़ना यहां कोई क्रिया नहीं है, यह समझ है। जब तुम देख लेते हो कि यह सब तुम्हारा वास्तविक स्वरूप नहीं है तब यह अपने आप छूटने लगता है और जैसे-जैसे यह छूटता है तुम्हारे भीतर एक खालीपन प्रकट होता है। यह खालीपन डरावना लग सकता है क्योंकि मन हमेशा कुछ ना कुछ पकड़ कर रखना चाहता है। उसे लगता है कि अगर वह सब छोड़ देगा तो वह खो जाएगा लेकिन यही सबसे बड़ा भ्रम है। अष्टावक्र कहते हैं जब तुम सब कुछ छोड़ देते हो तब तुम वास्तव में खोते नहीं हो बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पाते हो। यह शून्य कोई नकारात्मक स्थिति नहीं है यह एक जीवंत, जागरूक और शांत अवस्था है जहां कोई भी विचार, कोई भी पहचान तुम्हें सीमित नहीं करती। इसी शून्य में ईश्वर प्रकट होता है। यहां प्रकट होना भी एक प्रतीक है क्योंकि ईश्वर कहीं बाहर से नहीं आता वह हमेशा से था। लेकिन तुम्हारी पहचाने उसे ढक रही थी जब वे हटती हैं तो वह अपने आप प्रकट हो जाता है। यही अष्टावक्र का गुप्त सूत्र है ईश्वर को पाने के लिए कुछ मत करो। केवल अपने आपको खाली करो। लेकिन यह सुनना जितना सरल है इसे समझना उतना ही गहरा है क्योंकि मन हमेशा कुछ ना कुछ पकड़ना चाहता है। ज्ञान, अनुभव, आध्यात्मिकता वह शून्य को भी एक लक्ष्य बना सकता है। यही एक नया बंधन बन जाता है। इसलिए अष्टावक्र कहते हैं शून्य बनने की कोशिश भी मत करो केवल यह देखो कि तुम क्या-क्या पकड़े हुए हो। और जैसे ही यह देखना गहरा होता है पकड़ अपने आप ढीली पड़ जाती है और तब बिना किसी प्रयास के बिना किसी खोज के ईश्वर स्वयं प्रकट होता है। जब शून्य का यह बीज भीतर पड़ता है तब मन एक अजीब सी स्थिति में आ जाता है। वह समझने की कोशिश करता है पकड़ने की कोशिश करता है। पर जितना समझना चाहता है उतना ही उलझता जाता है यही वह बिंदु है जहां अष्टावक्र गीता का वास्तविक प्रभाव शुरू होता है। अब धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगता है कि शून्य कोई अवस्था नहीं है जिसे बनाया जाए बल्कि यह वह स्थिति है जो तब प्रकट होती है जब सब कुछ अपने आप गिर जाता है। मन को आदत है भरने की वह हर खाली जगह को किसी विचार, किसी भावना, किसी पहचान से भर देना चाहता है। लेकिन अष्टावक्र कहते हैं इस बार कुछ मत भरो जो खालीपन उभर रहा है उसे रहने दो। पहले पहल यह खालीपन असहज लगता है तुम्हें लगता है कि कुछ कमी है कुछ छूट गया है। मन बेचैन हो जाता है और वह तुरंत कुछ पकड़ना चाहता है। कोई लक्ष्य, कोई संबंध, कोई विचार लेकिन अगर तुम थोड़ी देर रुक जाओ केवल देखो तो एक अद्भुत परिवर्तन होने लगता है। यह खालीपन धीरे-धीरे एक गहरी शांति में बदलने लगता है। अब यह कमी नहीं लगता बल्कि एक विस्तार जैसा महसूस होता है। जहां कुछ भी नहीं है फिर भी सब कुछ है यही शून्य का पहला अनुभव है। अब यहां एक बहुत सूक्ष्म बात समझनी होगी यह शून्य कोई मृत अवस्था नहीं है यह पूरी तरह जीवंत है। इसमें जागरूकता है, उपस्थिति है लेकिन कोई पकड़ नहीं है। तुम देख रहे हो। लेकिन देखने वाला भी धीरे-धीरे गायब हो रहा है यही वह बिंदु है जहां ईश्वर की झलक मिलती है। अष्टावक्र इसे किसी रूप या नाम में नहीं बांधते वे कहते हैं जो शून्य है वही पूर्ण है। यह विरोधाभास जैसा लगता है लेकिन यही सत्य है। जब सब कुछ छूट जाता है तब जो बचता है वही पूर्णता है। अब एक और गहरी प्रक्रिया शुरू होती है जैसे-जैसे यह शून्य स्थिर होता है तुम्हारे भीतर से कुछ बनने की इच्छा समाप्त होने लगती है। पहले तुम हमेशा कुछ बनना चाहते थे अधिक सफल अधिक शांत अधिक आध्यात्मिक लेकिन अब यह चाहा अपने आप गिरने लगती है। क्योंकि अब तुम्हें दिखता है कि जो तुम बनना चाहते थे वह पहले से ही हो यह समझ बहुत गहरी शांति देती है। अब तुम्हारे भीतर कोई दौड़ नहीं रहती तुम किसी लक्ष्य के पीछे नहीं भागते क्योंकि अब कोई लक्ष्य शेष नहीं है। अब जीवन अपने आप घटता है और तुम उसे बिना किसी हस्तक्षेप के देखते हो यही सच्चा ध्यान है। जहां कोई प्रयास नहीं है अब तुम्हें यह भी समझ में आता है कि ईश्वर स्वयं प्रकट होता है का अर्थ क्या है? यह कोई चमत्कार नहीं है कोई बाहरी घटना नहीं है यह एक आंतरिक स्पष्टता है जहां तुम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेते हो और वही ईश्वर है। लेकिन यहां भी एक खतरा है मन इस अनुभव को पकड़ना चाहता है वह कहता है। मुझे यह शून्य चाहिए मुझे यह शांति बनाए रखनी है और जैसे ही यह पकड़ आती है शून्य फिर से भरने लगता है। यही मन का खेल है इसलिए अष्टावक्र कहते हैं अनुभव को भी मत पकड़ो उसे आने दो जाने दो। तुम केवल साक्षी बने रहो बिना किसी पहचान के और जब यह भी छूट जाता है तब जो बचता है वही अंतिम सत्य है। जब यह शून्य धीरे-धीरे भीतर स्थिर होने लगता है तब जीवन का अनुभव पूरी तरह बदलने लगता है। अब अष्टावक्र गीता का संदेश केवल सुनाई नहीं देता बल्कि हर क्षण में जिया जाने लगता है। अब तुम देखते हो कि पहले जो जीवन तुम्हें भारी लगता था वही अब हल्का महसूस होने लगता है। क्योंकि पहले तुम हर चीज को पकड़ने की कोशिश करते थे विचार, भावनाएं, संबंध, अनुभव। लेकिन अब यह पकड़ धीरे-धीरे समाप्त हो रही है अब जो कुछ भी आता है उसे तुम आने देते हो जो जाता है उसे जाने देते हो। इस आने-जाने के बीच तुम स्थिर रहते हो यही शून्य की स्थिरता है। अब एक बहुत गहरा परिवर्तन होता है तुम अपने विचारों से अलग होने लगते हो पहले तुम हर विचार को मैं मानते थे मैं दुखी हूं मैं खुश हूं मैं चिंतित हूं। लेकिन अब तुम देखते हो कि यह सब केवल विचार हैं जो आते हैं और चले जाते हैं तुम उनसे अलग हो। यह दूरी तुम्हें एक गहरी स्वतंत्रता देती है अब कोई भी विचार तुम्हें बांध नहीं पाता अब तुम्हारे भीतर एक मौन है जो हमेशा स्थिर रहता है। चाहे बाहर कितना भी शोर क्यों ना हो यही मौन तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है। यही वह स्थान है जहां ईश्वर प्रकट होता है अब एक और गहरी बात स्पष्ट होती है जब तुम शून्य में स्थिर होते हो तब तुम्हें यह भी महसूस होता है कि तुम्हारे और संसार के बीच कोई दूरी नहीं है। पहले तुम अपने आप को एक अलग व्यक्ति मानते थे दूसरों से अलग, दुनिया से अलग। लेकिन अब यह विभाजन समाप्त होने लगता है तुम देखते हो कि जो चेतना तुम्हारे भीतर है वही हर चीज में है। पेड़, आकाश, लोग सब उसी चेतना की अभिव्यक्ति हैं और जब यह अनुभव गहराता है तब एक अद्भुत एकता का भाव उत्पन्न होता है। यहां कोई अलगाव नहीं है कोई दूरी नहीं है केवल एक ही अस्तित्व है जो सब में व्याप्त है। यही अद्वैत का अनुभव है अब जीवन में एक और परिवर्तन आता है तुम्हारे भीतर से नियंत्रण की इच्छा समाप्त हो जाती है। पहले तुम हर चीज को अपने अनुसार चलाना चाहते थे परिस्थितियां, लोग, परिणाम लेकिन अब तुम्हें समझ में आता है कि यह सब अपने आप घट रहा है। तुम केवल उसके साक्षी हो और यही समझ तुम्हें पूरी तरह से मुक्त कर देती है। अब तुम्हारे भीतर कोई तनाव नहीं रहता कोई चिंता नहीं रहती तुम जीवन के साथ बहते हो बिना किसी विरोध के यही सच्ची सहजता है। लेकिन यहां भी एक अंतिम जाल है मन इस शून्य को भी एक अनुभव बना सकता है और उसे पकड़ने की कोशिश कर सकता है। वह कह सकता है अब मैं शून्य में हूं अब मैं मुक्त हूं यही नया अहंकार बन सकता है। अष्टावक्र इस जाल को भी तोड़ते हैं वे कहते हैं जब तक मैं बना हुआ है तब तक कोई भी अनुभव अंतिम नहीं है। इसलिए तुम्हें यहां भी सावधान रहना होगा तुम्हें यह देखना होगा कि कहीं तुम शून्य को भी पकड़ तो नहीं रहे क्योंकि पकड़ ही बंधन है। और जब यह भी छूट जाता है तब जो बचता है वही अंतिम सत्य है शुद्ध, असीम और मौन। वही तुम हो जब यह शून्य पूर्ण रूप से भीतर स्थिर हो जाता है तब जीवन में एक ऐसी स्पष्टता प्रकट होती है जहां किसी भी प्रकार का भ्रम शेष नहीं रहता। अब अष्टावक्र गीता का ज्ञान केवल एक अनुभव नहीं बल्कि तुम्हारा स्वभाव बन चुका होता है। अब तुम्हें यह पूरी तरह दिखाई देता है कि तुमने जीवन भर जिस पूर्णता को पाने की कोशिश की वह हमेशा से तुम्हारे भीतर ही थी। तुमने उसे बाहर खोजा ध्यान में, साधना में, संबंधों में, उपलब्धियों में। लेकिन अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि वह कभी बाहर थी ही नहीं वह हमेशा तुम्हारे भीतर थी लेकिन तुम्हारी पहचाने, तुम्हारे विचार, तुम्हारे प्रयास उसे ढक रहे थे। जैसे ही यह सब गिरता है शून्य प्रकट होता है लेकिन यह शून्य वास्तव में खाली नहीं है यह पूर्णता का ही दूसरा नाम है। यही अष्टावक्र का सबसे गहरा रहस्य है शून्य ही पूर्ण है और पूर्ण ही शून्य है। अब एक बहुत गहरी शांति तुम्हारे भीतर स्थिर हो जाती है यह शांति किसी कारण पर निर्भर नहीं होती। यह ना किसी परिस्थिति से आती है ना किसी अनुभव से यह तुम्हारे अपने अस्तित्व से उत्पन्न होती है यही वास्तविक मुक्ति है।

[11:53]अब जीवन में एक और परिवर्तन आता है तुम किसी भी चीज को पकड़ने की कोशिश नहीं करते ना अनुभव को ना ज्ञान को ना ना ईश्वर को क्योंकि अब तुम्हें यह स्पष्ट है कि पकड़ ही बंधन है। जैसे ही पकड़ समाप्त होती है स्वतंत्रता अपने आप प्रकट हो जाती है अब तुम्हारे भीतर कोई खोज नहीं रहती तुम कहीं पहुंचने की कोशिश नहीं करते। क्योंकि अब तुम्हें यह समझ में आ गया है कि जहां तुम हो वही अंतिम है यही सच्चा विश्राम है। अब जीवन में जो कुछ भी होता है वह तुम्हें प्रभावित नहीं करता सुख आता है तुम उसे पकड़ते नहीं हो दुख आता है तुम उससे बचते नहीं हो। तुम दोनों को समान रूप से देखते हो यही समत्व तुम्हें एक गहरी स्थिरता देता है अब तुम्हारे भीतर कोई द्वंद्व नहीं रहता ना अच्छा ना बुरा ना सही ना गलत। सब कुछ जैसा है वैसा ही स्वीकार हो जाता है यही स्वीकार ही शांति है अब एक अंतिम अनुभूति प्रकट होती है। तुम देखते हो कि जो शून्य तुम्हारे भीतर है वही पूरे अस्तित्व में व्याप्त है कोई अलगाव नहीं है कोई दूरी नहीं है सब कुछ उसी एक चेतना की अभिव्यक्ति है। जब यह अनुभव स्थिर हो जाता है तब जीवन एक अद्भुत एकता में बदल जाता है यही अद्वैत का अंतिम सत्य है। अब कोई प्रश्न नहीं बचता कि ईश्वर कहां है क्योंकि अब यह स्पष्ट है कि जो चेतना तुम्हारे भीतर है वही ईश्वर है। वही हर जगह व्याप्त है यही अद्वैत का अंतिम अनुभव है लेकिन यहां भी एक अंतिम सावधानी आवश्यक है। मन इस अनुभव को भी पकड़ सकता है और उसे अपनी उपलब्धि बना सकता है वह कह सकता है। मैंने ईश्वर को पा लिया मैं अब मुक्त हूं यही एक नया बंधन बन सकता है। अष्टावक्र इस अंतिम भ्रम को भी तोड़ते हैं वे कहते हैं जहां कोई दावा है वहां सत्य नहीं है इसीलिए यहां भी सब कुछ छोड़ दो अनुभव को भी, ज्ञान को भी, मुक्ति के विचार को भी। जब यह सब छूट जाता है तब जो बचता है वही अंतिम सत्य है शुद्ध, असीम और मौन। वही तुम हो जब यह शून्य तुम्हारे भीतर गहराई से स्थिर होने लगता है तब जीवन के हर पहलू में एक अद्भुत परिवर्तन दिखाई देने लगता है। अब अष्टावक्र गीता का ज्ञान केवल अनुभव नहीं बल्कि तुम्हारा स्वभाव बन जाता है अब तुम्हें यह स्पष्ट दिखता है कि जीवन में जो कुछ भी हो रहा है वह अपने आप हो रहा है। पहले जहां तुम हर चीज में हस्तक्षेप करते थे सोचते थे योजना बनाते थे परिणामों को नियंत्रित करना चाहते थे अब वह सब धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। यह समाप्त होना कोई प्रयास से नहीं होता बल्कि समझ से होता है तुम देखते हो कि जितना अधिक तुम हस्तक्षेप करते हो उतना ही उलझते जाते हो और जैसे ही यह स्पष्ट होता है हस्तक्षेप अपने आप गिर जाता है। अब तुम्हारे भीतर एक गहरी स्वीकृति उत्पन्न होती है तुम जीवन को वैसा ही स्वीकार करने लगते हो जैसा वह है। यह स्वीकृति कोई हार नहीं है बल्कि यह एक गहरी जागरूकता का परिणाम है अब तुम परिस्थितियों से लड़ते नहीं हो सुख आता है तुम उसे पकड़ते नहीं हो दुख आता है तुम उससे भागते नहीं हो। तुम केवल देखते हो और उस देखने में ही एक शांति होती है यही वह बिंदु है जहां शून्य का अनुभव और गहरा हो जाता है अब यह केवल एक आंतरिक अनुभव नहीं रहता। बल्कि तुम्हारे हर कार्य हर व्यवहार में झलकने लगता है अब तुम जो भी करते हो उसमें एक सहजता होती है कोई दबाव नहीं, कोई जल्दी नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। तुम बस करते हो और छोड़ देते हो यही कर्म का शुद्ध रूप है अब एक और गहरी बात स्पष्ट होती है जब तुम शून्य में स्थिर होते हो तब तुम्हारे भीतर से अहंकार की पकड़ पूरी तरह ढीली हो जाती है। पहले तुम हर चीज को मैं से जोड़ते थे मैं कर रहा हूं मैंने किया मुझे मिलेगा लेकिन अब यह मैं धीरे-धीरे गायब होने लगता है। अब कार्य होते हैं लेकिन कोई करने वाला नहीं होता यही सच्चा त्याग है यह बाहर की चीजों को छोड़ना नहीं है बल्कि भीतर के कर्ता को छोड़ना है। जब यह कर्ता गिर जाता है तब जीवन एक अलग ही आयाम में प्रवेश कर जाता है अब हर चीज एक खेल की तरह लगती है। घटनाएं आती हैं जाती हैं लोग आते हैं जाते हैं परिस्थितियां बदलती रहती हैं लेकिन तुम स्थिर रहते हो यही स्थिरता तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है। यही वह स्थान है जहां ईश्वर का अनुभव निरंतर होता है अब ईश्वर कोई अलग सत्ता नहीं लगता जिसे तुम्हें खोजना है। अब यह स्पष्ट हो जाता है कि जो चेतना तुम्हारे भीतर है वही ईश्वर है वही हर जगह व्याप्त है यही अद्वैत का अंतिम अनुभव है। लेकिन यहां भी एक अंतिम सावधानी आवश्यक है मन इस अनुभव को भी पकड़ सकता है और उसे अपनी उपलब्धि बना सकता है वह कह सकता है। मैंने ईश्वर को पा लिया मैं अब मुक्त हूं यही एक नया बंधन बन सकता है अष्टावक्र इस अंतिम भ्रम को भी तोड़ते हैं वे कहते हैं जहां कोई दावा है वहां सत्य नहीं है। इसीलिए यहां भी सब कुछ छोड़ दो अनुभव को भी, ज्ञान को भी, मुक्ति के विचार को भी। जब यह सब छूट जाता है तब जो बचता है वही अंतिम सत्य है शुद्ध, असीम और मौन। वही तुम हो जब यह शून्य पूर्ण रूप से भीतर स्थिर हो जाता है तब जीवन में एक ऐसी स्पष्टता प्रकट होती है जहां किसी भी प्रकार का भ्रम शेष नहीं रहता। अब अष्टावक्र गीता का ज्ञान केवल एक अनुभव नहीं बल्कि तुम्हारा स्वभाव बन चुका होता है अब तुम्हें यह पूरी तरह दिखाई देता है कि तुमने जीवन भर जिस पूर्णता को पाने की कोशिश की वह हमेशा से तुम्हारे भीतर ही थी। तुमने उसे बाहर खोजा ध्यान में, साधना में, संबंधों में, उपलब्धियों में। लेकिन अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि यह भरना ही तुम्हारे और सत्य के बीच सबसे बड़ा पर्दा था। जितना तुम भरते गए उतना ही तुम अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होते गए जब यह समझ पूरी तरह उतरती है तब एक स्वाभाविक त्याग होता है बिना किसी प्रयास के बिना किसी संघर्ष के अब तुम कुछ भी पकड़ कर नहीं रखते।

[19:26]ना विचार ना अनुभव ना पहचान ना मैं जैसे ही यह सब गिरता है एक अद्भुत शून्यता प्रकट होती है लेकिन यह शून्यता मृत नहीं है यह जीवंत है, जागरूक है, असीम है। यही वह बिंदु है जहां यह अनुभव होता है कि ईश्वर कोई अलग सत्ता नहीं है जिसे तुम्हें खोजना है ईश्वर वही है जो इस शून्य में स्वयं प्रकट हो रहा है। बिना किसी रूप के, बिना किसी नाम के, बिना किसी सीमा के अब कोई खोज शेष नहीं रहती क्योंकि खोजने वाला ही समाप्त हो चुका होता है। अब कोई साधना शेष नहीं रहती क्योंकि साधक ही नहीं रहा अब केवल एक शुद्ध उपस्थिति है जो सब कुछ है और फिर भी कुछ भी नहीं है। यही अद्वैत का अंतिम अनुभव है यहां ना कोई मैं है ना कोई तुम है ना कोई ईश्वर अलग से है केवल एक ही सत्य है शुद्ध चेतना उसी में यह पूरा संसार एक खेल की तरह प्रकट होता है। विचार आते हैं, भावनाएं उठती हैं, घटनाएं घटती हैं लेकिन अब कुछ भी तुम्हें छू नहीं पाता तुम स्थिर हो, अचल हो, पूर्ण हो। यही अंतिम मुक्ति है ना कुछ पाने की आवश्यकता ना कुछ छोड़ने की आवश्यकता केवल यह पहचान कि जो तुम हो वही सत्य है। जब यह पहचान स्थिर हो जाती है तब जीवन एक अद्भुत सहजता में बदल जाता है अब हर क्षण पूर्ण है हर अनुभव संपूर्ण है हर स्थिति जैसी है वैसी ही सही है। यही अष्टावक्र का अंतिम संदेश है शून्य बनो और देखो कि ईश्वर कभी दूर था ही नहीं वह हमेशा यहीं था तुम्हारे भीतर तुम्हारे रूप में तुम्हारी ही चेतना के रूप में यही जीवन का परम रहस्य है। यही अंतिम सत्य है यही वास्तविक स्वतंत्रता है आपको यह वीडियो अच्छी लगी हो तो चैनल को सब्सक्राइब करें कमेंट्स में राधे-राधे जरूर लिखें।

[22:15]धन्यवाद

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