[0:00]क्या आपने कभी नोटिस किया है, जब सब लोग अपना फोन निकाल के सनसेट कैप्चर कर रहे होते हैं। तब एक पर्सन ऐसा होता है जो उसे सिर्फ अपनी आंखों से देख रहा होता है। जब वो कहता है, मैं सोशल मीडिया पर नहीं हूं, तो लोग उसे ऐसे देखते हैं जैसे वो किसी गुफा में रहता हो। लेकिन वो कोई टेक्नोफोब नहीं है। वो बस कुछ ऐसा बचा रहा है जो हम सब खो चुके हैं। सोशल मीडिया हमारे ब्रेन के प्रिमिटिव हिस्से को टैप करता है। सोशल वैलिडेशन। जब आप पोस्ट करते हैं और लाइक्स मिलते हैं, तो ब्रेन डोपामिन रिलीज करता है। इंजीनियर्स ने इन प्लेटफॉर्म्स को एडिक्टिव बनाने के लिए बिहेवियरल साइकोलॉजी का यूज किया है। लेकिन जो लोग सोशल मीडिया यूज नहीं करते, उन्हें भी डोपामिन मिलता है पर एक्सटर्नल वैलिडेशन से नहीं, इंटरनल सेटिस्फैक्शन से। उन्हें वेकेशन इंजॉय करने के लिए 200 स्ट्रेंजर्स के लाइक्स की जरूरत नहीं होती। सोशल मीडिया सिर्फ कनेक्शन नहीं है, यह कंपैरिजन का गेम है। आप अपनी बिहाइंड द सींस लाइफ को दूसरों की फिल्टर्ड हाईलाइट से कंपेयर करते हैं और हमेशा हारते हैं। स्टडीज दिखाती हैं, जो लोग सोशल मीडिया यूज नहीं करते, उनमें एंजाइटी कम होती है और लाइफ सेटिस्फैक्शन ज्यादा। क्यों? क्योंकि वह इस रेस से बाहर निकल चुके हैं। स्क्रॉल करना आपके ब्रेन को क्विक डोपामिन हिट्स का एडिक्ट बना देता है। सोशल मीडिया यूजर्स का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, जो फोकस और डिसीजन मेकिंग के लिए रिस्पांसिबल है, कम एक्टिव पाया गया है। लेकिन जो लोग इससे दूर हैं, वह एक बुक पढ़ सकते हैं, एक थॉट के साथ बैठ सकते हैं, बिना फोन चेक किए। सोशल मीडिया पर हर पोस्ट एक ऑडिशन है, अप्रूवल के लिए। यह कनेक्शन नहीं, यह थिएटर है। रियल कनेक्शन कहां होता है? स्क्रीन के बाहर, अनफिल्टर्ड हंसी में। और उन मोमेंट्स में जो फोटो के लिए ऑर्डिनरी है, लेकिन जीने के लिए परफेक्ट। सोशल मीडिया यूज ना करने वालों के रिलेशनशिप्स कम होते हैं, लेकिन डीपर होते हैं। एक एवरेज पर्सन साल के 38 फुल डेज स्क्रोलिंग में बिता देता है। लेकिन जो लोग इससे दूर हैं, वह यह 38 दिन वापस पा लेते हैं। वह क्रिएट करते हैं, सोचते हैं, और बिना ऑडियंस के जीते हैं। वह कंटीन्यूअस पार्सल अटेंशन के ट्रैप से बच जाते हैं, और जब वह आपके साथ होते हैं तो पूरी तरह वही होते हैं। फोमो, फियर ऑफ मिसिंग आउट सिर्फ एक डिजिटल नॉइज़ है। लोग सोशल मीडिया नहीं छोड़ पाते क्योंकि उन्हें लगता है वह पीछे छूट जाएंगे, लेकिन सच, एल्गोरिथम्स आपको हमेशा इनएडेक्वेट फील कराते हैं ताकि आप वापस आएं वैलिडेशन के लिए। सोशल मीडिया के बिना आपको खुद को पर्सनल ब्रांड की तरह मार्केट नहीं करना पड़ता। आप बस एक इंसान बन सकते हैं। सोशल मीडिया एक टूल है। सवाल यह नहीं है कि वह अच्छा है या बुरा। सवाल यह है, क्या आप उसे यूज कर रहे हैं या वह आपको यूज कर रहा है? जो लोग इसे यूज नहीं करते वह अजीब नहीं है, एंटी-सोशल्स नहीं है। उन्होंने बस एक फैसला लिया है अपना अटेंशन और मेंटल एनर्जी वापस लेने का। In a world full of performers, being authentic is the most revolutionary thing you can do.

"The Shocking Psychology Behind People Who Don't Use Social Media"
Psychologydecoded
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