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अभिमन्यु ने दुर्योधन को वस्त्रहरण की वेदना का अनुभव कराया | Suryaputra Karn | Episode 258 | Swastik

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[0:06]Section 1

अपने जीवन में आप कितने मित्रों से मिलते होंगे कितनों को आप स्वयं जानते होंगे. कितनों का आप शुभ चाहते होंगे और कितने आपका शुभ चाहते होंगे....

[3:00]Section 2

आज मैं आपको उस अपमान का अनुभव कराऊंगा आपकी पूरी सेना और महारथियों के समक्ष आपका वस्त्र हरण करूंगा और कोई कुछ नहीं कर पाएगा. तनिक कार्य तो...

[6:20]Section 3

परंतु मैं तुम्हें जाने नहीं दे सकता तुम कदाचित मुझे रोक सकते थे अर्जुन परंतु तुमने एक भूल कर दी.

[8:27]Section 4

मैं मानता हूं कि आपका वध करना काका श्री की प्रतिज्ञा थी. उनकी प्रतिज्ञा को भंग करने का दंड मैं सह लूंगा. परंतु आज अपनी माता के अपमान का द...

[12:03]Section 5

एक वीर योद्धा से सुना था मैंने कि हे मृत्यु तैयार यदि तू आने को प्रसन्न मुखार द्वार खुला है तेरा स्वागत.

[15:58]Section 6

और आज आज कौरवों की विजय हुई है गांधारी पांडवों की एक अक्षणी सेना को ध्वस्त कर दिया है हमने आज.

Pull quotes
[0:06]क्या उनकी समस्या मार्ग में खड़ी बाधाएं हैं या वह कठिनाइयां जो उनके कार्य को कभी संपन्न ही नहीं होने देती.
[0:06]आधे मार्ग से उल्टा लौट जाने से अधिक बुरा यह है कि अपना कार्य कभी प्रारंभ ही ना करें.
[0:06]आप कभी खाली हाथ नहीं होंगे आपको गर्वित करने के लिए सफलता भले ही आपके हाथों में ना हो.
[0:06]बालक मेरी शत्रुता तुमसे नहीं है मेरे मार्ग से हट जाओ अन्यथा अपने प्राणों से हाथ धो बैठोगे.
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[0:06]अपने जीवन में आप कितने मित्रों से मिलते होंगे कितनों को आप स्वयं जानते होंगे. कितनों का आप शुभ चाहते होंगे और कितने आपका शुभ चाहते होंगे. और कितने ऐसे भी होते कि आपके समक्ष आते, आपसे मिलते हैं. वह अपने जीवन का दुखड़ा गाने लगते हैं कि उनका कोई कार्य ही नहीं बनता. वह क्या करें कार्य प्रारंभ होने से पूर्व ही कठिनाइयां आ जाती है. कठिनाइयों के कारण वह आगे नहीं बढ़ पाती. क्या आपको पता है. ऐसे लोगों की वास्तविक समस्या क्या होती. क्या उनकी समस्या मार्ग में खड़ी बाधाएं हैं या वह कठिनाइयां जो उनके कार्य को कभी संपन्न ही नहीं होने देती. सत्य तो यह है कि वास्तव में ऐसे लोग अपना कार्य कभी प्रारंभ ही नहीं करते. आधे मार्ग से उल्टा लौट जाने से अधिक बुरा यह है कि अपना कार्य कभी प्रारंभ ही ना करें. तनिक कार्य तो प्रारंभ करके देखिए विश्वास कीजिए. आप कभी खाली हाथ नहीं होंगे आपको गर्वित करने के लिए सफलता भले ही आपके हाथों में ना हो. परंतु सफलता पाने का ज्ञान आपके हाथों में अवश्य होगा. बालक मेरी शत्रुता तुमसे नहीं है मेरे मार्ग से हट जाओ अन्यथा अपने प्राणों से हाथ धो बैठोगे. धो तो आज मैं उस कलंक को दूंगा जो मेरे परिवार के माथे पर कि अपने कुलवधु के अपमान का प्रतिकार नहीं कर पाए.

[2:15]अनुभव करो इस ज्वाला को युवराज दुर्योधन. यह वही ज्वाला है जो इतनी वर्षों से मेरी माता के हृदय में धधक रही है.

[2:29]छोटा था मैं बहुत पर मेरा रोम-रोम जल उठता था यह सुनकर कि मेरी माता के साथ क्या हुआ.

[2:41]सोचो मेरे माता-पिता और मेरे काकाओं पर क्या बीती होगी. जब उन्होंने वह दृश्य देखा मेरे माता पर क्या बीती होगी जब सहस्रों आंखें उनके वस्त्रहीन होते शरीर पर पड़ रही थी.

[3:00]आज मैं आपको उस अपमान का अनुभव कराऊंगा आपकी पूरी सेना और महारथियों के समक्ष आपका वस्त्र हरण करूंगा और कोई कुछ नहीं कर पाएगा. तनिक कार्य तो प्रारंभ करके देखिए विश्वास कीजिए.

[3:40]अनुभव करो उस अपमान का अनुभव करो उस वस्त्रहरण से हुए अपमान का जो आप सभी ने किया. नदी जब सीमा तोड़ती है तो बाढ़ आती है आज आपकी पाप की धारा की बाढ़ में आप स्वयं बह जाएंगे काका श्री.

[5:50]आपको मेरी सहायता की आवश्यकता है चलो सत्यसेन.

[6:05]कहां चले अंगराज मैं जानता हूं कि तुम्हारे मित्र पर आए संकट का संदेश तुम्हें मिल चुका है.

[6:20]परंतु मैं तुम्हें जाने नहीं दे सकता तुम कदाचित मुझे रोक सकते थे अर्जुन परंतु तुमने एक भूल कर दी.

[6:33]तुम अपने रथ पर नहीं हो अर्जुन हां वासुदेव तुम्हारे सारथी है. परंतु महाबली हनुमान का आशीर्वाद तुम्हारे रथ पर नहीं.

[7:07]नहीं मैं अभी भी पराजित नहीं हुआ तुम इस प्रकार दौड़ छोड़कर नहीं जा सकते.

[7:17]तुम युद्ध के नियम भूल रहे हो अर्जुन युद्ध का नियम है कि महारथी महारथी के साथ द्वंद कर सकता है. और तुम रथ विहीन हो इसलिए मैं तुम्हारे साथ द्वंद नहीं कर सकता. पहले अपने रथ का पहिया सुधारो फिर आकर मुझे युद्ध का आह्वान देना. क्योंकि परशुराम शिष्य करण नियम तोड़कर युद्ध नहीं करेगा.

[8:27]मैं मानता हूं कि आपका वध करना काका श्री की प्रतिज्ञा थी. उनकी प्रतिज्ञा को भंग करने का दंड मैं सह लूंगा. परंतु आज अपनी माता के अपमान का दंड मैं आपको अवश्य दूंगा.

[9:07]किसी की प्रतिज्ञा टूटे पर मेरी प्रतिज्ञा नहीं टूटेगी अभिमन्यु. और मेरी प्रतिज्ञा है कि जब तक मैं जीवित रहूंगा मेरे मित्र के प्राण नहीं जाएंगे.

[10:25]अब मेरे पास बाणों की कमी है और ना प्रहारों की. यह अंतिम अवसर है अभिमन्यु लौट जाओ.

[10:42]तुम मेरी तुनीर में भी उत्तर प्रस्तुत है अंगराज.

[12:03]एक वीर योद्धा से सुना था मैंने कि हे मृत्यु तैयार यदि तू आने को प्रसन्न मुखार द्वार खुला है तेरा स्वागत.

[12:24]मुझे रोकने का अब केवल एक ही अस्त्र है आपके पास यह आपको मेरा वध करना होगा.

[13:04]पुरुषोत्तम ने अपना विकल्प स्वयं चुना था वह रणभूमि छोड़कर जा सकता था परंतु उसने मृत्यु चुनी. गर्व है मुझे तुम जैसे युवा योद्धाओं पर जो अपना कर्तव्य पूर्ण करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. मैं जानता हूं कि तुम पीछे नहीं हटने वाले अभिमन्यु परंतु मुझे भी अपना कर्तव्य पूर्ण करना है.

[15:48]क्या हो रहा है

[15:58]और आज आज कौरवों की विजय हुई है गांधारी पांडवों की एक अक्षणी सेना को ध्वस्त कर दिया है हमने आज.

[16:17]एक किंतु दुर्योधन का क्या महाराज.

[20:39]नहीं नहीं दुर्योधन देखो अपने क्रोध पर काबू पाओ देखो विजय हमारे निकट है दुर्योधन मानो मेरी बात छोड़िए मुझे मामा श्री. छोड़िए मुझे अन्यथा इस अग्नि में मैं अपने आप से पहले आपकी अहुति दे दूंगा. छोड़िए मुझे नहीं छोड़िए छोड़िए मुझे आ छोड़िए मुझे.

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