[0:14]एक बूढ़े संन्यासी कुछ दिन पहले मेरे पास आए।
[0:23]कुछ भी पाने को नहीं है अभी। ऐसी छोटी-छोटी मन की सूक्ष्मताओं की झलकें मिली हैं। कभी शांत बैठे हैं तो प्रकाश दिखाई पड़ गया है। कि कभी शांत बैठे हैं तो भीतर ऊर्जा का उठता हुआ स्तंभ दिखाई पड़ गया है। ऐसी छोटी-छोटी बातें जिनका कोई बड़ा मूल्य नहीं जो कि मन के ही खेल हैं, जिनके की पार जाना है। जिनमें उलझे तो कभी भी परमात्मा तक पहुंचा नहीं जा सकता। बड़े परेशान भी थे क्योंकि अब आगे कैसे बढ़ें? मैंने उनसे कहा कि साफ सी बात है। आगे कैसे बढ़ें यह बड़ा सवाल नहीं है, जो आपको अभी तक हुआ है उसको आप पकड़े हैं तो आगे कैसे बढ़ेंगे? जैसे कोई आदमी रास्ते के किनारे लगे एक वृक्ष को पकड़ ले, फिर पूछे कि अब आगे कैसे बढ़ें? उसमें क्या मामला है? इस वृक्ष को छोड़ो। इसको पकड़े हो तो आगे कैसे जाओगे? छोड़कर ही कोई आगे जाता है। एक सीढ़ी छोड़ो तो दूसरी सीढ़ी पर पैर पड़ता है। सीढ़ी पकड़ लो तो आगे पैर पड़ना बंद हो जाता है। अब वह अकड़े हुए हैं। वह कहते हैं उनकी कुण्डलिनी जग गई। वह अकड़ बता रही है कि वह जो छोटे-छोटे अनुभव हुए, पकड़ लिए गए। कहते हैं उन्हें नील ज्योत दिखाई पड़ रही है। और मुझसे पूछने आए थे कि मैं अब कौन सी अवस्था में हूं? मैंने उनसे कहा कि यह पूछो ही मत क्योंकि दो ही अवस्थाएं हैं ज्ञानी की और अज्ञानी की। तीसरी कोई अवस्था नहीं। और तीसरी अगर बनाई तो वह अज्ञानी का ही उपद्रव होगा। दो ही अवस्थाएं हैं या तो उसकी जो पहुंच गया या उसकी जो अभी नहीं पहुंचा है। और जो नहीं पहुंचा है उसने अगर कोई अवस्था बना ली मध्य की तो उसी अवस्था को पकड़ लेगा। पकड़ने के कारण पहुंचना मुश्किल हो जाएगा। अवस्था बनाओ मत। अभी तो दो में से तय कर लो। तुम ही कहो कि इन दो में से तुम्हारी कौन सी अवस्था है? अज्ञानी की कहने में उनको बड़ी कठिनाई हुई। अगर वह कह सकते कि अज्ञानी की आखिरी मंजिल का खतरा अलग हो जाता। यात्रा शुरू हो जाती। उन्होंने कहा कुछ कुछ ज्ञानी की। पूरा ज्ञानी तो मैं नहीं हूं। कहा कभी सुना है अधूरा ज्ञान कभी सुना है कि ज्ञान की कोई डिग्री होती? कि अभी 50% हो गया अब 60% हो गया अब 70% हो गया।
[3:27]कभी सुना है कि यह बुद्ध 10% यह बुद्ध 20% यह बुद्ध 70% और यह बिल्कुल खालिस 24 कैरेट। बुद्धत्व की कोई कोई अवस्थाएं नहीं। बुद्धत्व या अबुद्धत्व। लेकिन मन अबुद्धत्व पर तो राजी नहीं होता और मन यह भी जानता है कि बुद्धत्व का तो दावा कैसे करें? क्योंकि अगर बुद्धत्व भी दावा करना है तो मेरे पास पूछने क्यों आए? बात खत्म हो गई। दूसरे तुम्हारे पास पूछने आएंगे तुम क्यों मेरे पास पूछने आए हो? यह भी नहीं कह सकते कि मैं बुद्ध हो गया हूं। वह तो हुए भी नहीं। कहां कोई जरूरत ही ना था कहीं जाने की। और यह कहने में मन सकुचाता है कि मैं अज्ञानी हूं। यही खतरा है। जब तक परम ज्ञान ना हो जाए तब तक तुम अज्ञान को ही अपनी अवस्था समझना। और इंच वर्ब की तरकीबें मत निकालना कि हां कई तरह के अज्ञानी हैं कुछ मुझसे नीचे हैं। कोई अज्ञानी तुमसे नीचे नहीं है और तुम किसी अज्ञानी से ऊंचे नहीं हो। अज्ञानी यानी अज्ञानी। कुछ अज्ञानी धन में खोए होंगे कुछ अज्ञानी धर्म में खोए हैं। किन्हीं ने तिजोड़ियां भर ली हैं किन्हीं ने त्याग कर लिया है। किन्हीं के पास सिक्के चांदी के हैं किन्हीं के पास सिक्के त्याग के। किन्हीं ने उपवास खाते बहियों से भर रखे हैं त्याग व्रत और किन्हीं ने कुछ और कूड़ा कबाड़ इकट्ठा कर लिया है। कोई बाहर की रोशनी के लिए दीवाने किन्हीं ने भीतर की रोशनी को पकड़ रखा है लेकिन सब अज्ञानी है। बाहर और भीतर से कोई फर्क नहीं पड़ता है। ज्ञान की घड़ी के पहले तक आखिरी क्षण तक तुम अपने को अज्ञानी ही समझना। अगर आखिरी क्षण को आने देना हो। जब तक कि तुम मंदिर में बुला ही ना लिए जाओ भीतर तब तक तुम अज्ञानी ही बने रहना। तब तक तुम याचक ही रहना। तब तक भिक्षा पात्र को फेंक मत देना। तब तक तुम अपने को विनम्र ही रखना। तब तक जरा भी अहंकार को निर्मित मत होने देना। अगर इस अहंकार को तुम रास्ते पर निर्मित होने दिए तो आखिरी क्षण में यही अहंकार तुम्हें डूबाएगा। यही सांप है। जो तुम्हें आखिरी क्षण से लीन जाएगा और वापस पहुंचा देगा जहां उसकी पूंछ है। इसे तुम पहले ही क्षण से स्मरण रखना। धर्म को संपदा मत बनाना। और अनुभवों को इकट्ठा मत करना। कहना कि सब राय के किनारे की बातें हैं घटती है सामान्य है। उन पर ज्यादा ध्यान मत देना। उनका विचार भी मत करना। उनके साथ अकड़ को मत जोड़ना। अगर तुम पहले से ही होश पूर्वक चले और अंतिम क्षण तक अपने को अज्ञानी ही जानना तो तुम्हें आखिरी मंजिल के कदम से कोई भी वापस ना भेज सकेगा।



