[0:00]दोस्तों, यह कहानी है एक ऐसी राजकुमारी की जिसे न जीने दिया गया, न मरने दिया गया। जो दिन में पत्थर थी और रात में इंसान। जिसकी आंखों में आंसू थे लेकिन बहाने का वक्त सिर्फ कुछ घंटों का था। और जिसके दुख की जड़ उसका अपना खून था। बहुत पुराने समय की बात है। सूर्यगढ़ नाम का एक राज्य था। उस राज्य के राजा का नाम था भवानी प्रताप। राजा भवानी प्रताप को पूरी प्रजा पूजती थी। दरबार में उसकी तारीफ होती थी। मंदिरों में उसके नाम की जय जयकार होती थी। लेकिन जो बात किसी को नहीं पता थी, वो ये थी कि इस राजा के दिल में एक ऐसा राज दफन था जिसने एक मासूम की पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी थी। राजा भवानी प्रताप की एक बेटी थी, कनकलता। कनकलता जब छोटी थी तभी उसकी मां चल बसी थी। राजा ने दूसरी शादी नहीं की। दरबारी कहते थे कि राजा अपनी पहली पत्नी से बहुत प्रेम करता था। लेकिन सच यह था कि राजा को डर था। डर था कि अगर किसी ने ध्यान से उसकी जिंदगी को देखा, तो वो राज खुल जाएगा जो उसने सालों से छुपाया था। कनकलता बड़ी हुई। वो होशियार थी, नेक दिल थी। राजमहल में सब की चहेती थी। एक दिन कनकलता बगीचे में बैठी थी जब एक बूढ़ा साधु महल के द्वार पर आया। उसने अंदर आने की इजाजत मांगी। द्वारपाल ने उसे रोका। साधु ने कहा उसे भूख लगी है, बस थोड़ा भोजन चाहिए। द्वारपाल ने उसे धक्का दे दिया और कहा यहां भिखारियों के लिए कोई जगह नहीं है। कनकलता यह सब देख रही थी। वह दौड़कर आई और साधु को अंदर ले गई। खुद अपने हाथों से उसके लिए भोजन लाई। साधु ने खाया, पानी पिया। जाते-जाते उसने कनकलता की तरफ देखा और कहा, बेटी, तुम्हारे भीतर मां जगदंबे का अंश है। लेकिन जिस घर में तुम रहती हो उस घर में एक पाप पल रहा है। वो पाप एक दिन तुम्हें भी अपनी चपेट में ले लेगा। कनकलता ने पूछा, बाबा ऐसा क्यों कह रहे हो? साधु बोला, बेटी, पूछो अपने पिता से कि उन्होंने उस तपस्वी के साथ क्या किया जो आज से 20 साल पहले इसी महल के द्वार पर आया था। यह कहकर साधु चला गया। कनकलता के मन में बात घर कर गई। उसने शाम को अपने पिता से यह बात पूछी। राजा भवानी प्रताप का रंग एकदम बदल गया। उसने कहा, ये सब बकवास है। किसी पागल की बात पर ध्यान मत दो। लेकिन कनकलता ने देखा था कि पिता के हाथ कांप रहे थे। उस रात कनकलता सो नहीं पाई। और अगली सुबह जब सूरज निकला तो कनकलता उठ नहीं पाई। क्योंकि वह पत्थर बन चुकी थी। पूरे महल में हाहाकार मच गया। राज वैद्य आए, पंडित आए, तांत्रिक आए। किसी को कुछ समझ नहीं आया। राजा भवानी प्रताप रो रहा था। दरबारी सोच रहे थे कि शायद किसी दुश्मन ने ये जादू किया है। लेकिन जब रात हुई तो पत्थर की मूर्ति फिर से कनकलता बन गई। वो उठी, चारों तरफ देखा और समझ गई कि क्या हुआ है। वह रोई, चिल्लाई, अपने पिता को आवाजें दी। राजा दौड़कर आया। उसने बेटी को सीने से लगाया। कनकलता ने पूछा, पिताजी, वो साधु सच कह रहा था ना? आपने कुछ किया है। बताइए मुझे। राजा ने कहा, नहीं बेटी, कुछ नहीं किया। ये किसी दुश्मन की करतूत है। हम इसका तोड़ निकालेंगे। कनकलता ने अपने पिता की आंखों में देखा। उसे जवाब मिल गया था। लेकिन वो जवाब शब्दों में नहीं था, डर में था जो उन आंखों से टपक रहा था। उस रात कनकलता ने कुछ नहीं खाया। वो बस खिड़की के पास बैठी रही और आसमान को देखती रही। सुबह होने से पहले वो फिर पत्थर बन गई। यही उसकी जिंदगी हो गई। दिन में पत्थर, रात में इंसान। दिन का उजाला उसके लिए कैद था और रात का अंधेरा उसकी आजादी। महीने बीते। राजा ने हर जगह से मदद मांगी लेकिन किसी को कुछ पता नहीं चला। धीरे-धीरे दरबारियों ने इसे राजकुमारी का श्राप कहना शुरू कर दिया। लोग कानाफूसी करने लगे। कुछ ने कहा, राजकुमारी के किसी पिछले जन्म का पाप है। कुछ ने कहा, किसी ने तंत्र मंत्र किया है। लेकिन कनकलता जानती थी। उसे पता था कि इस सब की जड़ कहीं ना कहीं उसके पिता की किसी करतूत से जुड़ी है। लेकिन वो क्या कर सकती थी। वो रात को जागती, रोती, सोचती और फिर सुबह होते ही पत्थर बन जाती। एक रात कनकलता महल की छत पर बैठी थी। हवा चल रही थी। तभी उसने देखा, महल की दीवार के उस तरफ एक घोड़ा रुका और एक नौजवान नीचे उतरा। वो नौजवान दीवार फांदकर बगीचे में आ गया। कनकलता ने आवाज दी, कौन हो तुम? उस नौजवान ने ऊपर देखा। वह चौंका, बोला, मैं, मैं रास्ता भटक गया था। माफ करना। कनकलता ने कहा, रात के इस पहर कोई रास्ता नहीं भटकता। सच बताओ। नौजवान थोड़ा रुका फिर बोला, मेरा नाम वीरध्वज है। मैं पड़ोसी राज्य चंद्रपुर का राजकुमार हूं। मैंने सुना था कि सूर्यगढ़ के बगीचे में एक पत्थर की मूर्ति है जो रात को जी उठती है। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था इसलिए खुद देखने आया। कनकलता ने कड़वाहट से कहा, तो अब देख लिया? जी उठती हूं, तमाशा हो गया। वीरध्वज बोला, नहीं, मैं तमाशा देखने नहीं आया था। मैं, मैं सच में जानना चाहता था। क्योंकि मुझे लगा था कि शायद मैं कुछ मदद कर सकूं। जब मेरे पिता राजा है। जब पूरे राज्य के वैद्य और पंडित और तांत्रिक हार चुके हैं, तो तुम क्या करोगे एक अनजान राजकुमार? वीरध्वज ने कहा, मुझे नहीं पता। लेकिन चले जाने से पहले कम से कम एक बार सुनने की कोशिश तो कर सकता हूं। कनकलता चुप हो गई। उस रात पहली बार किसी ने उससे पूछा था, सुनाओ। और पहली बार उसका मन था सुनाने का। उसने सब बताया। साधु की बात, पिता की कांपती आंखें, हर रात का अकेलापन, हर सुबह का डर। वीरध्वज बैठकर सुनता रहा। जब कनकलता चुप हुई तो उसने कहा, तुम्हारे पिता कुछ छुपा रहे हैं। और जब तक वो सच सामने नहीं आएगा, यह श्राप नहीं टूटेगा। कनकलता बोली, यह मैं भी जानती हूं। लेकिन पिता बताते नहीं। वीरध्वज ने कहा, तो सच खुद ढूंढना होगा। वो उस रात बिना कुछ और कहे चला गया। लेकिन अगली रात फिर आया। और उसके अगली रात भी। धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगी। वीरध्वज हर रात आता, कनकलता से मिलता और सुबह होने से पहले चला जाता। कनकलता के लिए यह रातें जीने की वजह बन गई थी। दिन में पत्थर रहती थी, लेकिन मन में एक उम्मीद होती थी कि रात होगी, वीरध्वज आएगा। वीरध्वज के लिए भी वह वक्त ऐसा था जो उसने पहले कभी नहीं जिया था। एक रात वीरध्वज ने कहा, कनकलता, मैं तुमसे प्रेम करता हूं। कनकलता ने आंखें नीची कर ली। बोली, एक ऐसी लड़की से प्रेम जो आधी जिंदगी पत्थर है। वीरध्वज बोला, मैंने तुम्हारी आत्मा से प्रेम किया है। पत्थर और इंसान दोनों से। कनकलता की आंखें भर आई। उसने कहा, अगर तुम सच में मुझसे प्रेम करते हो तो एक काम करो। मुझे इस श्राप से मुक्त करो। वीरध्वज बोला, बताओ क्या करना है। कनकलता ने कहा, पहले वह राज ढूंढना होगा जो मेरे पिता ने छुपाया है। उस साधु ने कहा था, 20 साल पहले एक तपस्वी इस महल के द्वार पर आया था। उसके साथ क्या हुआ था यह जानना होगा। वीरध्वज ने सोचा और कहा, महल के पुराने नौकर जानते होंगे। जो 20 साल से यहां है। कनकलता बोली, लेकिन वे बताएंगे नहीं। राजा का डर है उन पर। वीरध्वज ने कहा, वे मुझे बताएंगे। क्योंकि मैं बाहरी हूं। मुझसे उन्हें डर नहीं। तुम मुझे किसी ऐसे नौकर का नाम बताओ जो पुराना हो और जिसका दिल साफ हो। कनकलता ने सोचा और कहा, महल में एक बूढ़ा माली है, हरिया। वह 30 साल से इस महल में है। उसकी आंखों में हमेशा एक उदासी रहती है जो मुझे बचपन से दिखती थी। लेकिन जब भी मैंने पूछा तो वो बात टाल देता था। अगले दिन वीरध्वज ने एक व्यापारी का भेष बनाया और सूर्यगढ़ के बाजार में आया। बाजार से होते हुए वह उस जगह पहुंचा जहां महल के नौकर शाम को बैठते थे। वहां उसने हरिया को देखा। एक दुबला-पतला बूढ़ा जो अकेला बैठा था। वीरध्वज उसके पास गया। बोला, बाबा, क्या आप महल में काम करते हैं? हरिया ने हां कहा। वीरध्वज बोला, मैं एक यात्री हूं। मेरे गुरु एक तपस्वी थे। उन्होंने मरने से पहले कहा था कि 20 साल पहले वे सूर्यगढ़ आए थे और यहां उनके साथ कुछ हुआ था। मैं बस यह जानना चाहता हूं कि मेरे गुरु के साथ यहां क्या हुआ था। हरिया का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया। उसने इधर-उधर देखा। फिर धीरे से बोला, जाओ भाई, यह बात मत पूछो। वीरध्वज ने कहा, बाबा, मेरे गुरु ने मुझे यह जानने को कहा था। उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी जब तक सच सामने ना आए। हरिया कांपने लगा। उसकी आंखों में पानी आ गया। वह बोला, बेटा, अगर मैंने यह बात बताई तो मेरी जान जाएगी। वीरध्वज बोला, बाबा, आपकी जान की रक्षा होगी। लेकिन एक मासूम का श्राप इसी सच से टूटेगा। हरिया ने लंबी सांस ली। उसने चारों तरफ देखा। फिर धीमी आवाज में बोलना शुरू किया। 20 साल पहले एक तपस्वी सूर्यगढ़ आया था। वह कोई साधारण तपस्वी नहीं था। वह सिद्ध पुरुष था। उसके पास दिव्य दृष्टि थी। जब वह राजा भवानी प्रताप के दरबार में आया तो उसने राजा को एकांत में बुलाया और कहा, राजन, मुझे पता है कि तुमने 20 साल पहले क्या किया था। तुमने अपने ही बड़े भाई को जहर दिया था ताकि गद्दी तुम्हें मिले। हरिया रुका। वीरध्वज सांस रोककर सुन रहा था। हरिया आगे बोला, राजा का बड़ा भाई असली राजा था। वह बहुत नेक था। लेकिन भवानी प्रताप को गद्दी का लालच था। उसने रसोइए को मिलाकर बड़े भाई के भोजन में धीमा जहर मिलवाया। भाई धीरे-धीरे बीमार पड़ा और मर गया। सबने सोचा वो किसी बीमारी से मरा। लेकिन उस तपस्वी को दिव्य ज्ञान से सब पता था। वीरध्वज ने पूछा, फिर क्या हुआ उस तपस्वी के साथ? हरिया की आंखों से आंसू बह गए। वह बोला, राजा ने उसे कारागार में डलवा दिया। और एक रात, एक रात चुपके से उसे महल के पीछे के जंगल में ले जाकर मरवा दिया। मैं उस रात पहरे पर था। मैंने सब देखा। लेकिन मैंने कुछ नहीं बोला, क्योंकि मुझे डर था। वीरध्वज वहां से उठा। उसके पांव भारी थे। उसके मन में कनकलता का चेहरा था। उस रात जब वह महल के बगीचे में आया तो कनकलता पहले से वहां बैठी थी। उसने वीरध्वज का चेहरा देखा और समझ गई कि कुछ भारी बात है। वीरध्वज ने सारी बात बता दी। कनकलता बहुत देर तक चुप रही। वो ना रोई, ना चिल्लाई। बस बैठी रही। आंखें बंद। जब उसने आंखें खोली तो उनमें एक अजीब सी शांति थी जो दर्द से भी गहरी थी। उसने कहा, मुझे पता था। दिल के किसी कोने में पता था। वीरध्वज बोला, कनकलता, श्राप तोड़ने के लिए तुम्हें ये सच सबके सामने लाना होगा। उस तपस्वी की आत्मा तभी शांत होगी। कनकलता ने कहा, मतलब, मुझे अपने पिता को दरबार में नंगा करना होगा। वीरध्वज चुप रहा। कनकलता बोली, वो मेरे पिता है। उन्होंने मुझे पाला है। उनके पाप बड़े हैं, लेकिन उनका प्रेम भी तो है मुझसे। वीरध्वज ने कहा, मैं जानता हूं। लेकिन जो उन्होंने किया वह माफ नहीं होगा। ना उस तपस्वी की आत्मा माफ करेगी ना ईश्वर। और तुम इस श्राप में जीती रहोगी। कनकलता ने आंखें बंद कर ली। उस रात सुबह होने तक वो बस बैठी सोचती रही। अगले दिन रात को जब वो उठी तो उसने वीरध्वज से कहा, मैंने फैसला कर लिया है। वीरध्वज ने पूछा, क्या? कनकलता बोली, मैं अपने पिता के पास जाऊंगी। उनसे आखिरी बार पूछूंगी। अगर उन्होंने खुद सच स्वीकार नहीं किया तो मैं दरबार में सच लेकर जाऊंगी। वीरध्वज ने उसका हाथ थाम लिया और कहा, मैं तुम्हारे साथ हूं। उस रात कनकलता अपने पिता के कक्ष में गई। राजा भवानी प्रताप जाग रहा था। उसे रात को नींद नहीं आती थी सालों से। कनकलता को देखकर उसकी आंखें भर आई। उसने कहा, बेटी, तुम ठीक हो? कनकलता ने कहा, पिताजी, मुझे सच बताइए। राजा ने कहा, कौन सा सच बेटी? कनकलता बोली, आपके बड़े भाई की मौत का सच। कमरे में सन्नाटा छा गया। राजा का चेहरा पत्थर हो गया। वह बोला, बेटी, यह बकवास है। कहां से सुन लिया यह सब? कनकलता ने कहा, हरिया बाबा से। राजा की मुट्ठी भिंच गई। वह बोला, उस बुड्ढे की बातों पर भरोसा मत करो। कनकलता ने शांत आवाज में कहा, पिताजी, मैं आपसे झगड़ने नहीं आई। मैं जानती हूं आप मुझसे प्रेम करते हैं। लेकिन आपकी एक गलती ने एक तपस्वी की जान ली और उसी की वजह से मैं यह श्राप झेल रही हूं। अगर आप सच स्वीकार करें तो शायद मुझे मुक्ति मिले। राजा उठा। उसने बेटी को देखा। उसकी आंखों में पहली बार इतना दर्द था जो शब्दों में नहीं समाता था। वह बोला, बेटी, अगर मैंने स्वीकार किया तो मेरी गद्दी जाएगी। लोग मुझे हत्यारा कहेंगे। कनकलता ने कहा, और अगर नहीं स्वीकार किया तो मैं ऐसे ही जीती रहूंगी। पत्थर और इंसान के बीच। ना जीना ना मरना। राजा ने आंखें बंद कर ली। उसके होंठ कांप रहे थे। बहुत देर बाद उसने कहा, जाओ बेटी। मुझे सोचने दो। कनकलता वापस आ गई। उसने वीरध्वज को बताया। वीरध्वज ने कहा, अब देखते हैं। कुछ फैसले इंसान को खुद करने होते हैं। दो रातें बीत गई। तीसरी रात को दरबार में बुलावा आया। राजा ने सभी दरबारियों, मंत्रियों और प्रजा के प्रतिनिधियों को इकट्ठा किया था। ये देर रात का दरबार था। असामान्य था। कनकलता भी वहां पहुंची। वीरध्वज बाहर था। उसने राजमहल में वेश बदलकर प्रवेश किया था। राजा भवानी प्रताप सिंहासन पर बैठे थे। उनका चेहरा थका हुआ था। आंखें सूजी हुई थी। वह खड़े हुए और उन्होंने बोलना शुरू किया। उन्होंने कहा, दोस्तों, आज मैं एक ऐसी बात कहने वाला हूं जो शायद तुम सब को मुझसे नफरत करा दे। लेकिन मैं अब इस बोझ को और नहीं उठा सकता। पूरे दरबार में सन्नाटा था। राजा ने एक-एक शब्द बोला, 20 साल पहले मैंने अपने बड़े भाई को जहर दिया था। ताकि यह गद्दी मुझे मिले। वो मुझसे बेहतर इंसान थे। लेकिन मेरे लालच ने उन्हें मुझसे छीन लिया। और जब एक तपस्वी ने मेरा सच जाना तो मैंने उसे भी मरवा दिया। दरबार में सन्नाटा टूटा। लोग एक दूसरे को देखने लगे। कुछ की आंखें फटी रह गई। कुछ मंत्री उठकर खड़े हो गए। राजा आगे बोला, मेरी बेटी आज इस श्राप में है। उसी तपस्वी का श्राप है। और इसकी वजह मैं हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी एक और दिन भी इस कष्ट में रहे। इसीलिए आज मैं ये स्वीकार कर रहा हूं। राजा ने अपनी तलवार उठाई और उसे सिंहासन के सामने रख दिया और कहा, यह राज्य अब तुम सबका है। जो भी न्याय उचित समझो मुझे दो। तभी दरबार में एक रोशनी हुई। सबने देखा, कनकलता जहां खड़ी थी वहां एक अजीब सी चमक आई। और फिर वो जोर से कांपी और गिर पड़ी। लोग दौड़े। वीरध्वज सबसे पहले पहुंचा। उसने कनकलता को थाम लिया। और तब उन्होंने देखा, कनकलता की आंखें खुल रही थी। पहली बार सुबह हो रही थी। सूरज की पहली किरण दरबार में आई। और कनकलता वहां थी इंसान की तरह, पत्थर नहीं। वो श्राप टूट चुका था। कनकलता उठी। उसने अपने हाथ देखे। अपना चेहरा छुआ। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे लेकिन इस बार दुख के नहीं, हैरानी के, राहत के। उसने मुड़कर अपने पिता को देखा। राजा भवानी प्रताप फर्श पर बैठे थे। उनका सिर झुका था। कनकलता उनके पास गई। वह बैठी और उन्होंने पिता का हाथ थाम लिया। राजा ने बेटी को देखा। उनकी आंखों में सालों का पाप था, सालों का दर्द था। और उस पल में एक ऐसी राहत थी जो उन्हें पहले कभी नहीं मिली थी। राजा ने कहा, बेटी, मुझे माफ कर दो। कनकलता ने कहा, पिताजी, माफ करना मेरे हाथ में नहीं है। जो आपने किया उसका हिसाब ईश्वर देगा। लेकिन मैं यह जरूर कहूंगी, आपने आज जो किया वो भी बड़े साहस का काम था। दरबार में मंत्रियों ने मिलकर फैसला किया। राजा भवानी प्रताप को गद्दी छोड़नी होगी। उन्हें काशी भेजा जाएगा जहां वो बाकी जिंदगी प्रायश्चित करेंगे। उस तपस्वी और उनके बड़े भाई की आत्मा की शांति के लिए यज्ञ होगा। राजा ने बिना कोई एतराज किए सब स्वीकार कर लिया। जाते वक्त उन्होंने एक बार कनकलता को देखा। कनकलता ने उन्हें प्रणाम किया। राजा की आंखों में एक बूंद आई जो बह गई। उस दिन के बाद सूर्यगढ़ में नया अध्याय शुरू हुआ। मंत्र परिषद ने राज्य की व्यवस्था संभाली। और कुछ दिनों बाद वीरध्वज ने कनकलता के सामने अपनी बात रखी। उसने कहा, मैंने तुमसे रात के अंधेरे में प्रेम किया था। आज उजाले में भी यही कह रहा हूं। कनकलता हंसी। पहली बार, खुलकर, बेफिक्र होकर।
[20:48]दोनों की शादी बड़े धूमधाम से हुई। पूरे सूर्यगढ़ में उत्सव था। वो लड़की जो महीनों से पत्थर बनी रहती थी, आज पूरे नगर की खुशी की वजह थी। और दोस्तों, अगर यह कहानी अच्छी लगी हो तो वीडियो को लाइक जरूर करें।
[21:28]हम फिर मिलेंगे एक नई कहानी लेकर। तब तक अपना ख्याल रखना। जय माता दी।



