[0:00]चुपचाप सब को छोड़ दो। यह क्रोध में कहा गया शब्द नहीं है, यह जागरण में जन्मा हुआ निर्णय है। यह भागना नहीं है, यह स्वयं को बचाना है। यह नफरत नहीं है, यह सम्मान है। यह दुनिया से मुंह मोड़ना नहीं है, यह अपने भीतर लौटना है। बहुत बार मनुष्य दूसरों को पकड़े-पकड़े स्वयं से दूर चला जाता है। वह सब को साथ रखने की कोशिश में अपनी शांति खो देता है। वह सब को खुश करने के प्रयास में अपना सत्य खो देता है। वह सब को समझाने में अपनी ऊर्जा गंवा देता है। और एक दिन थक कर पूछता है, मैं कहां हूं? उसी दिन भीतर से एक आवाज उठती है, अब चुपचाप सब को छोड़ दो। हर किसी को साथ लेकर चलना तुम्हारा काम नहीं है। हर किसी को समझाना तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है। हर किसी से स्वीकृति लेना तुम्हारी आवश्यकता नहीं है। तुम कोई बाजार की वस्तु नहीं हो जिसे सब पसंद करें। तुम कोई प्रदर्शन नहीं हो जिसे सब सराहे। तुम एक चेतना हो, एक जीवित संभावना हो, एक अद्भुत ऊर्जा हो। और जब ऊर्जा गलत हाथों में फंस जाती है, तो वह बुझने लगती है। इसलिए जो लोग तुम्हारी रोशनी कम करते हैं, उनसे दूर होना बुद्धिमानी है। तुमने देखा होगा, कुछ लोग तुम्हारे जीवन में आते हैं और तुम्हारे भीतर आनंद जगाते हैं। उनके पास बैठो तो मन हल्का होता है। उनसे बात करो तो विश्वास बढ़ता है। उनके साथ चलो तो दिशा मिलती है और कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास बैठते ही थकान आ जाती है। उनसे बात करते ही संदेह बढ़ जाता है। उनके साथ रहते ही तुम स्वयं को भूलने लगते हो। पहचानो कौन तुम्हें उठाता है और कौन गिराता है। फिर निर्णय लो चुपचाप सब को छोड़ दो जो तुम्हें नीचे खींचते हैं। जीवन बहुत छोटा है उसे हर किसी को समझाने में बर्बाद करने के लिए। लोग तुम्हें गलत समझेंगे। तुम्हारे बारे में कहानियां बनाएंगे। तुम्हारी नियत पर सवाल करेंगे। तुम्हारे मौन को कमजोरी समझेंगे। उन्हें समझाने बैठोगे तो जीवन निकल जाएगा। मौन रहोगे तो समय उत्तर देगा। इसलिए शब्दों से लड़ाई मत करो। समय से बड़ी कोई दलील नहीं होती। तुम्हारा बदलता हुआ जीवन ही सबसे बड़ा जवाब बनेगा। तुम्हें यह सीखना होगा कि हर रिश्ता बचाने योग्य नहीं होता। कुछ रिश्ते केवल आदत होते हैं प्रेम नहीं। कुछ रिश्ते केवल डर से टिके होते हैं, सम्मान से नहीं। कुछ रिश्ते केवल सुविधा पर चलते हैं, सच्चाई पर नहीं। और कुछ रिश्ते तुम्हारी आत्मा को रोज थोड़ा-थोड़ा घायल करते हैं। ऐसे रिश्तों को पकड़े रहना पुण्य नहीं, मूर्खता है। छोड़ देना पाप नहीं, उपचार है। बहुत लोग छोड़ नहीं पाते क्योंकि उन्हें अकेलेपन से डर लगता है। वे भीड़ में टूटना स्वीकार कर लेते हैं पर अकेले होकर बनना स्वीकार नहीं करते। याद रखो, अकेलापन शत्रु नहीं है। वही स्थान है जहां तुम पहली बार स्वयं से मिलते हो। भीड़ में तुम दूसरों की आवाज सुनते हो। अकेले में अपनी आवाज सुनते हो। भीड़ में तुम भूमिका निभाते हो। अकेले में तुम वास्तविक होते हो। इसलिए यदि कुछ समय अकेले चलना पड़े तो डरना मत। वहीं से असली यात्रा शुरू होती है। चुपचाप सब को छोड़ दो इसका अर्थ यह नहीं कि कटुता पा लो। इसका अर्थ यह नहीं कि बदला लो। इसका अर्थ केवल इतना है कि जहां तुम्हारा सम्मान नहीं वहां उपस्थित मत रहो। जहां तुम्हारी शांति टूटती है, वहां बार-बार मत जाओ। जहां तुम्हें छोटा किया जाता है वहां स्वयं को सिद्ध करने मत रुको। जहां प्रेम नहीं वहां याचना मत करो। उठो, मुस्कुराओ, आशीर्वाद दो और आगे बढ़ जाओ। तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह रही होगी कि तुमने अपनी कीमत उन लोगों से पूछी जो स्वयं अपनी कीमत नहीं जानते। तुमने अपनी सुंदरता उन आंखों से मापी जो ईर्ष्या से भरी थी। तुमने अपनी क्षमता उन लोगों से पूछी जो डर के कारण छोटे रह गए। तुमने अपने सपनों का निर्णय उन लोगों से करवाया जो सपने देखने से पहले हार मान चुके थे। अब यह भूल बंद करो। अपनी कीमत स्वयं जानो। कुछ लोग तुम्हें तभी चाहते हैं जब तुम उनके अनुसार चलो। जब तुम हां कहते हो तब वे पास रहते हैं। जब तुम अपनी सीमा तय करते हो तब वे दूर हो जाते हैं। यह प्रेम नहीं, नियंत्रण है। यह अपनापन नहीं, उपयोग है। जो तुम्हें स्वतंत्र देखकर खुश हो वही अपना है। जो तुम्हें झुका कर रखना चाहे वह तुम्हारा नहीं। ऐसे लोगों से दूर होना आत्म सम्मान है। तुम्हें पता है सबसे सुंदर उत्तर क्या है? सफलता भी नहीं। मौन भी नहीं, परिवर्तन। जब तुम बदल जाते हो तो बहुत से प्रश्न अपने आप समाप्त हो जाते हैं। जो लोग तुम्हें हल्के में लेते थे वे चुप हो जाते हैं, जो तुम्हें रोकते थे, वे देखते रह जाते हैं। जो तुम्हें तोड़ना चाहते थे वे समझ नहीं पाते कि तुम और मजबूत कैसे हो गए। इसलिए बहस कम करो, परिवर्तन अधिक करो। यदि तुम्हें हर समय दुखी रहना पड़ रहा है तो रुक कर देखो दुख परिस्थिति दे रही है या संगति। बहुत बार समस्या जीवन नहीं होता। समस्या वे लोग होते हैं जिनके बीच तुम जी रहे होते हो। गलत लोगों के बीच सही व्यक्ति भी टूटने लगता है। विषैले वातावरण में फूल भी मुरझा जाता है। इसलिए वातावरण बदलना कमजोरी नहीं, बुद्धिमत्ता है। चुपचाप सब को छोड़ दो और स्वयं को पकड़ लो। सुबह जल्दी उठो, शरीर को मजबूत करो, मन को शांत करो, नई चीज सीखो, लक्ष्य बनाओ, आदतें सुधारो। वही ऊर्जा जो तुम लोगों को मनाने में खर्च करते थे, अब स्वयं को बनाने में लगाओ। देखना, कुछ महीनों में तुम्हारा चेहरा बदल जाएगा। आंखों में चमक आ जाएगी। चाल में आत्मविश्वास आ जाएगा। आवाज में स्थिरता आ जाएगी। तुम्हें हर बार एक्सप्लेन करने की जरूरत नहीं है कि तुम क्यों दूर हुए। जो समझदार हैं, वे बिना बताए समझ जाएंगे। जो समझना नहीं चाहते, उन्हें 100 कारण भी कम पड़ेंगे। इसलिए एक्सप्लेनेशन की आदत छोड़ो। हर निर्णय की घोषणा आवश्यक नहीं होती। कुछ निर्णय मौन में लिए जाते हैं और जीवन बदल देते हैं। जो लोग तुम्हारी अनुपस्थिति से कुछ महसूस नहीं करते, उनकी उपस्थिति का मूल्य भी बहुत अधिक नहीं होता। यह कठोर सत्य है। बहुत लोग केवल तब तक पास रहते हैं जब तक उन्हें लाभ मिलता है। जैसे ही तुम बदलते हो, सीमाएं बनाते हो, अपने ऊपर ध्यान देने लगते हो, वे छूटने लगते हैं। उन्हें जाने दो। जो तुम्हारे सत्य के साथ न रह सके, वह तुम्हारे भविष्य के साथ भी नहीं चल सकता। तुम्हें डर होगा कि लोग क्या कहेंगे। लोग हमेशा कुछ न कुछ कहेंगे। जब तुम रुकते हो तब भी कहेंगे। जब तुम चलते हो तब भी कहेंगे। जब तुम सफल होते हो तब भी कहेंगे। जब तुम असफल होते हो तब भी कहेंगे। इसलिए लोगों की आवाज पर जीवन मत बनाओ। जो लोग तुम्हारे लिए जी नहीं रहे उन्हें तुम्हारे लिए निर्णय करने का अधिकार भी नहीं है। आज यदि तुम थके हुए हो, टूटे हुए हो, बार-बार चोट खा चुके हो तो यह सही समय है। क्योंकि टूटन के बाद ही मनुष्य गंभीर होता है। चोट के बाद ही वह देखता है कि कौन अपना था। कौन अभिनय कर रहा था। दर्द के बाद ही वह समझता है कि किसे छोड़ना है किसे रखना है। इसलिए जो हुआ उसे दुर्भाग्य मत कहो। वह जागरण भी हो सकता है। एक दिन आएगा जब तुम पीछे मुड़कर देखोगे और कहोगे अच्छा हुआ मैंने कुछ लोगों को खो दिया। अच्छा हुआ मैंने कुछ दरवाजे बंद कर दिए। अच्छा हुआ मैंने सब को साथ रखने की जिद्द छोड़ दी। क्योंकि यदि वे सब बने रहते, तो मैं कभी स्वयं तक नहीं पहुंचता। कभी अपनी शक्ति नहीं जानता। कभी अपनी दिशा नहीं पाता। इसलिए आज निर्णय लो। शोर नहीं करना, घोषणा नहीं करनी, किसी को दोष नहीं देना। बस भीतर से उठो और धीरे-धीरे जो तुम्हें नीचे खींचता है, उससे दूरी बना लो। जो तुम्हें छोटा करता है, उससे दूरी बना लो। जो तुम्हें इस्तेमाल करता है, उससे दूरी बना लो। जो तुम्हारी शांति चुराता है, उससे दूरी बना लो। और फिर देखना, जब गलत लोग जाते हैं तो सही अवसर आते हैं। जब बेकार शोर जाता है तो भीतर संगीत सुनाई देता है। जब नकली रिश्ते जाते हैं तो आत्मा का रिश्ता बनता है। जब भीड़ छूटती है तो मार्ग खुलता है। इसलिए डरो मत। कई बार खोना ही पाना होता है, कई बार छोड़ना ही आगे बढ़ना होता है। कई बार अकेले चलना ही सही लोगों तक ले जाता है। याद रखो, तुम किसी को छोड़ नहीं रहे, तुम स्वयं को चुन रहे हो। और जिस दिन मनुष्य स्वयं को चुन लेता है उसी दिन उसका नया जीवन शुरू हो जाता है। उसी क्षण भीतर कुछ बदलता है। चाल वही रहती है, चेहरा वही रहता है, दुनिया भी लगभग वही रहती है पर देखने वाली आंख बदल जाती है। पहले जहां तुम दूसरों को पकड़ कर जी रहे थे, अब तुम अपने केंद्र से जीना शुरू करते हो। पहले तुम स्वीकृति मांगते थे, अब तुम सम्मान जीतते हो। पहले तुम भीड़ में खोए थे, अब तुम मौन में मिलते हो। यही परिवर्तन सबसे बड़ा चमत्कार है। जब मनुष्य स्वयं को चुनता है तब वह पहली बार समझता है कि उसकी सबसे बड़ी कमी लोग नहीं थे उसकी सबसे बड़ी कमी स्वयं से दूरी थी। वह दूसरों के पीछे भागता रहा पर अपने भीतर की पुकार नहीं सुनी। वह सब को समय देता रहा पर अपने सपनों को समय नहीं दिया। वह सबकी समस्याएं उठाता रहा पर अपनी आत्मा का बोझ नहीं देखा। अब समय है कि यह दिशा बदले। तुम्हें अब अपने जीवन को दोबारा बनाना है। जैसे टूटा हुआ घर फिर से बनाया जाता है, वैसे ही टूटे हुए मन को भी फिर से बनाया जा सकता है। एक-एक ईंट रखनी होगी। एक नई आदत, एक नया विचार, एक नया निर्णय, एक नया अनुशासन। कोई भी महान परिवर्तन एक दिन में नहीं होता। वह छोटे-छोटे सत्य कदमों से जन्म लेता है। इसलिए जल्दबाजी मत करो पर रुकना भी मत। सुबह उठो और स्वयं से कहो, आज मैं अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं करूंगा। आज मैं उस व्यक्ति के बारे में नहीं सोचूंगा जिसने मेरी कद्र नहीं की। आज मैं उस जगह की चिंता नहीं करूंगा जहां मुझे छोटा किया गया। आज मैं अपने भीतर निवेश करूंगा। जो ऊर्जा शिकायत में जाती थी, उसे निर्माण में लगाओ। जो शक्ति दुख में जलती थी, उसे उद्देश्य में लगाओ। तुम्हें पता है सबसे खतरनाक आदत क्या है? उन लोगों के लिए उपलब्ध रहना जो तुम्हारे लिए कभी उपलब्ध नहीं थे। मनुष्य यही गलती बार-बार करता है। वह जहां सम्मान नहीं मिलता वहीं लौटता है। जहां दर्द मिला वहीं उम्मीद रखता है। जहां टूटन हुई वहीं प्रेम खोजता है। यह प्रेम नहीं पुरानी आदत है। जागो। जो तुम्हें बार-बार तोड़ता है वह तुम्हारा घर नहीं हो सकता। चुपचाप सब को छोड़ दो इसका दूसरा अर्थ है। पुरानी सोच को भी छोड़ दो। केवल लोग नहीं, धारणाएं भी छोड़नी होती है। मैं अकेला नहीं रह सकता। मेरे बिना वह खुश रहेंगे। मैं उनके बिना अधूरा हूं। मेरी कीमत दूसरों से तय होती है, इन सब भ्रमों को छोड़ दो। मनुष्य पहले मन से बंधता है, बाद में रिश्तों से। मन आजाद हो जाए तो दुनिया की कोई जंजीर रोक नहीं सकती। अब अपने भीतर जगह बनाओ। जहां पहले शिकायत थी, वहां कृतज्ञता लाओ। जहां पहले क्रोध था, वहां समझ लाओ। जहां पहले कमजोरी थी, वहां अभ्यास लाओ। जहां पहले तुलना थी, वहां आत्मविश्वास लाओ। जीवन खाली स्थान में नया भरता है। यदि भीतर पुराना कचरा भरा है, तो नया प्रकाश कहां उतरेगा? तुम देखोगे कि जैसे-जैसे तुम दूर होते जाओगे, कुछ लोग अचानक तुम्हें याद करने लगेंगे। क्यों? क्योंकि उन्हें तुम नहीं तुम्हारी सुविधा चाहिए थी। उन्हें तुम्हारा प्रेम नहीं, तुम्हारी उपलब्धता चाहिए थी। उन्हें तुम्हारी आत्मा नहीं, तुम्हारा समय चाहिए था। जो तुम्हें खोकर केवल सुविधा खोता है, उसने तुम्हें कभी पाया ही नहीं था। इसलिए लौट कर मत फांसना। दया अलग है। दोबारा जाल में गिरना अलग। तुम्हें अब अपने अकेलेपन को प्रयोगशाला बनाना है। वहीं पढ़ो, सीखो, शरीर बनाओ, ध्यान करो, योजना बनाओ, कौशल सीखो, धन कमाने की दिशा बनाओ, मन को मजबूत करो। बहुत लोग अकेलेपन में रोते हैं, कुछ लोग अकेलेपन में बनते हैं। निर्णय तुम्हारा है। दर्द को बहाना बनाओगे या ईंधन। याद रखो, जो व्यक्ति स्वयं के साथ खुश रहना सीख लेता है, उसे दुनिया नियंत्रित नहीं कर सकती। उसे धमकाया नहीं जा सकता कि हम चले जाएंगे। उसे डराया नहीं जा सकता कि तुम अकेले रह जाओगे। जो अकेले रहना सीख गया वह आधा मुक्त हो गया। जो अकेले में खिलना सीख गया, वह पूरा स्वतंत्र हो गया। अब यह भी समझो कि छोड़ना हमेशा लोगों को छोड़ना नहीं होता। कई बार आलस छोड़ना होता है। कई बार देर तक सोना छोड़ना होता है। कई बार टालना छोड़ना होता है। कई बार मोबाइल में डूबे रहना छोड़ना होता है। कई बार हर समय दुखी रहना छोड़ना होता है। कई बार पुरानी पहचान छोड़नी होती है। इसलिए इस वाक्य को गहराई से समझो, चुपचाप सब को छोड़ दो। सब में वे आदतें भी शामिल हैं जो तुम्हें छोटा रखती हैं। आज से अपना समय पवित्र मानो। जिसे भी दे रहे हो सोच कर दो। हर बातचीत जरूरी नहीं होती। हर बहस मूल्यवान नहीं होती। हर निमंत्रण स्वीकार करना आवश्यक नहीं होता। हर रिश्ता निभाना जरूरी नहीं होता। जो समय तुम्हारे सपनों को मिलना चाहिए, वह यदि बेकार लोगों में जा रहा है, तो तुम भविष्य गिरवी रख रहे हो। तुम्हारे भीतर जो शक्ति है, वह अभी पूरी तरह जागी नहीं है। क्योंकि बिखरे हुए लोग अपनी शक्ति नहीं देख पाते। जो हर किसी में उलझा है, वह स्वयं को कहां देखेगा? जब तुम लोगों, शोर, उलझनों, नकली रिश्तों और बेकार आदतों से थोड़ा हटोगे, तभी पहली बार अपनी असली ताकत महसूस करोगे। तभी समझोगे कि तुम कितने सक्षम थे और कितना व्यर्थ बंधे हुए थे। तुम्हें शायद शुरुआत में दर्द होगा। कुछ लोगों की याद आएगी। कुछ रातें भारी लगेंगी। कुछ दिन खाली लगेंगे पर धैर्य रखो। यह विड्रॉल है, हार नहीं। जैसे विष बाहर निकलता है तो शरीर असहज होता है। वैसे ही गलत जुड़ाव टूटते समय मन बेचैन होता है। लेकिन उसी बेचैनी के बाद शांति आती है। उसी खालीपन के बाद स्पष्टता आती है। उसी दूरी के बाद शक्ति आती है। धीरे-धीरे तुम नोटिस करोगे कि मन हल्का है। सिर कम दर्द करता है। दिल कम उलझता है। नींद बेहतर होती है। लक्ष्य याद आने लगते हैं। पुराना उत्साह लौटने लगता है। यह संकेत है कि तुम सही दिशा में हो। बहुत बार बीमारी का कारण जीवन नहीं, गलत संगति होती है। तुम्हें किसी को सजा नहीं देनी। केवल स्वयं को बचाना है। तुम्हें किसी से नफरत नहीं करनी। केवल दूरी बनानी है। तुम्हें किसी को गिराना नहीं। केवल स्वयं उठना है। यही परिपक्वता है। अपरिपक्व व्यक्ति बदला लेता है। जागरूक व्यक्ति आगे बढ़ जाता है। एक दिन वही लोग पूछेंगे तुम इतने बदल कैसे गए? तुम मुस्कुराना। उन्हें लंबा उत्तर मत देना। परिवर्तन का इतिहास शब्दों में नहीं, व्यक्तित्व में दिखता है। तुम्हारी आंखों की शांति उत्तर होगी। तुम्हारी चाल का आत्मविश्वास उत्तर होगा। तुम्हारी सफलता उत्तर होगी। तुम्हारा मौन उत्तर होगा। इसलिए अभी दुखी मत हो कि कौन छूट गया। प्रसन्न हो कि कौन स्पष्ट हो गया। दुखी मत हो कि कौन गया। खुश हो कि जगह खाली हुई। दुखी मत हो कि कौन समझा नहीं। आनंदित हो कि अब तुम्हें स्वयं समझने का समय मिला। आज निर्णय लो, मैं किसी को पकड़ कर नहीं जीऊंगा। मैं अपनी शांति बेचकर साथ नहीं खरीदूंगा। मैं सम्मान खोकर रिश्ता नहीं रखूंगा। मैं डर के कारण किसी को नहीं पकड़े रहूंगा। मैं अकेले चलना सीखूंगा। मैं स्वयं को चुनूंगा। और जैसे-जैसे तुम स्वयं को चुनते जाओगे, जीवन भी तुम्हें चुनना शुरू कर देगा। अवसर तुम्हें खोजेंगे। सही लोग तुम्हारी ओर आएंगे। सम्मान बिना मांगे मिलेगा। और सबसे सुंदर बात तुम्हें अब किसी के पीछे भागने की जरूरत नहीं रहेगी। क्योंकि जिसने स्वयं को पा लिया, उसने आधी दुनिया पाली है। बाकी आधी दुनिया फिर अपने समय पर स्वयं चली आती है। सम्मान भी आता है, अवसर भी आते हैं, सही लोग भी आते हैं और वह शांति भी आती है जिसे लोग वर्षों तक बाहर खोजते रहते हैं। मनुष्य जब स्वयं से जुड़ जाता है, तब जीवन उसके विरुद्ध नहीं रहता। उसके पक्ष में बहने लगता है। अब तुम्हें यह समझना है कि चुपचाप सब को छोड़ दो। केवल दूरी बनाने की बात नहीं है, यह ऊंचा उठने की बात है। बहुत लोग लोगों से दूर तो हो जाते हैं पर दर्द से चिपके रहते हैं। वे चले जाते हैं पर भीतर शिकायत रख लेते हैं। वे रिश्ता खत्म कर देते हैं पर मन में कहानी चलती रहती है। यह अधूरा छोड़ना है। पूरा छोड़ना तब होता है जब तुम व्यक्ति से भी मुक्त हो जाओ और पीड़ा से भी मुक्त हो जाओ। जिसने तुम्हें चोट दी उसे अपने मन में रोज जगह देना बंद करो। जिसने तुम्हारी कद्र नहीं की, उसे अपने विचारों का केंद्र बनाना बंद करो। जिसने तुम्हें रोका, उसे अपनी दिशा तय करने देना बंद करो। लोग बाहर से जितना नुकसान करते हैं, उससे अधिक नुकसान हम उन्हें भीतर जगह देकर करते हैं। इसलिए बाहर की दूरी के साथ भीतर की मुक्ति भी आवश्यक है। अब अपने मन की सफाई शुरू करो। पुरानी बातों को बार-बार दोहराना बंद करो। हर रात वही दृश्य याद करना बंद करो। हर सुबह उसी व्यक्ति को सोच कर उठना बंद करो। यह आदत तुम्हें अतीत का कैदी बनाए रखती है। तुम जेल में नहीं हो पर मन बंद है। दरवाजा खुला है बस बाहर चलना है। तुम्हें पता है सबसे बड़ा बदला क्या है? शांति। सबसे बड़ी जीत क्या है? विकास। सबसे सुंदर उत्तर क्या है? मुस्कान। यदि किसी ने तुम्हें गिराना चाहा और तुम ऊंचे उठ गए, यही उत्तर है। यदि किसी ने तुम्हें तोड़ना चाहा और तुम और गहरे हो गए, यही उत्तर है। यदि किसी ने तुम्हें रुलाया और तुमने जीवन को धन्यवाद कहना सीख लिया, यही उत्तर है। अब अपने दिन को नई दिशा दो। सुबह शरीर को जगाओ, मन को जगाओ, आत्मा को जगाओ। थोड़ा चलो, थोड़ा पढ़ो, थोड़ा ध्यान करो, थोड़ा लिखो। हर दिन स्वयं को एक प्रतिशत बेहतर बनाओ। लोग चमत्कार चाहते हैं पर चमत्कार रोज के छोटे अनुशासन से बनता है। पहाड़ अचानक नहीं उठते, धरती धीरे-धीरे उठती है। चुपचाप सब को छोड़ दो। इसका एक अर्थ तुलना को छोड़ देना भी है। किसी की कार देखकर दुखी मत हो। किसी की सफलता देखकर टूटो मत। किसी की शादी, किसी की नौकरी, किसी की प्रसिद्धि देखकर स्वयं को कम मत समझो। तुम किसी और की कहानी के पन्ने पर नहीं जी रहे। तुम्हारी पुस्तक अलग है, तुम्हारा अध्याय अलग है, तुम्हारा समय अलग है। तुलना वह जहर है जो बिना आवाज के आत्मविश्वास मार देता है। आज जो पीछे दिख रहा है, वही कल सबसे आगे निकल सकता है। जीवन सीधी रेखा नहीं है। कई लोग तेज शुरुआत करते हैं और बीच में खो जाते हैं। कई लोग देर से शुरू करते हैं और इतिहास बनाते हैं। इसलिए अभी अपनी गति को देखकर निराश मत हो। जो टिकता है, वही पहुंचता है। जो धैर्य रखता है, वही खिलता है। तुम्हें अब अपने लक्ष्य से प्रेम करना होगा, लोगों की राय से नहीं। राय बदलती रहती है। आज लोग हंसेंगे कल वही ताली बजाएंगे। आज कहेंगे नहीं होगा, कल पूछेंगे कैसे हुआ? इसलिए लोगों की आवाज पर अपना जीवन मत टिकाओ। भीड़ का मन मौसम की तरह बदलता है। तुम्हारा केंद्र पर्वत की तरह स्थिर होना चाहिए। कई बार तुम सोचोगे कि मैं इतना अकेला क्यों हूं? तब याद रखना कुछ यात्राएं अकेले ही तय होती हैं। ज्ञान अकेले मिलता है। आत्मविश्वास अकेले बनता है। चरित्र अकेले गढ़ा जाता है। जो शक्ति भीतर जन्म लेती है, वह भीड़ में नहीं जन्मती। भीड़ मनोरंजन देती है, एकांत परिवर्तन देता है। इसलिए यदि अभी तुम्हारे जीवन में शांति है और लोग कम है, संभव है जीवन तुम्हें तैयार कर रहा है। तुम्हें अपने आंसुओं पर शर्म नहीं करनी। जिसने दर्द महसूस किया है वही गहराई समझता है। जिसने टूटन देखी है वही मजबूती की कीमत जानता है। जिसने अकेलापन जिया है, वही सच्चे साथ का सम्मान करता है। तुम्हारा दर्द व्यर्थ नहीं गया है। उसने तुम्हें सिखाया है कि किसे चुनना है, किससे बचना है और स्वयं को कैसे थामना है। अब यह भी समझो कि हर बंद दरवाजा नुकसान नहीं होता। कुछ दरवाजे इसलिए बंद होते हैं ताकि तुम गलत कमरों में भटकते ना रहो। कुछ लोग इसलिए जाते हैं ताकि तुम सही लोगों के लिए जगह बना सको। कुछ योजनाएं इसलिए टूटती हैं ताकि बेहतर दिशा खुल सके। जो अभी नुकसान लगता है, वही कल सुरक्षा साबित हो सकता है। तुम्हें बस इतना करना है हर दिन थोड़ा आगे बढ़ना है। बहुत बड़ा कदम नहीं चाहिए। एक फोन कम, एक घंटा पढ़ाई ज्यादा। एक शिकायत कम, एक धन्यवाद ज्यादा। एक बहाना कम, एक प्रयास ज्यादा। एक डर कम, एक निर्णय ज्यादा। छोटे परिवर्तन ही बड़े परिणाम बनाते हैं। धीरे-धीरे तुम देखोगे कि जिन लोगों को छोड़ने से डरते थे, उन्हें छोड़कर तुम हल्के हो गए। जिन आदतों को छोड़ने से डरते थे, उन्हें छोड़कर तुम शक्तिशाली हो गए। जिन जगहों से दूर होने में दर्द था, उनसे दूर होकर तुम स्पष्ट हो गए। कई बार मनुष्य जिस चीज को अंत समझता है वही आरंभ होता है। तुम्हारे भीतर एक नया व्यक्तित्व जन्म ले रहा है। जो पहले हर बात पर टूट जाता था, अब स्थिर हो रहा है। जो पहले हर किसी को खुश करना चाहता था, अब स्वयं का सम्मान सीख रहा है। जो पहले पीछे भागता था, अब अपने रास्ते पर चल रहा है। जो पहले शोर में खोया था, अब मौन में चमक रहा है। यही विकास है। यही जागरण है। एक दिन लोग कहेंगे तुम बदल गए हो। मुस्कुरा कर कहना हां, क्योंकि मैं बच गया हूं। मैं थक गया था सब को ढोते-ढोते। मैं टूट गया था सब को मनाते-मनाते। मैं खो गया था सब को पकड़ते-पकड़ते। अब मैं स्वयं को जी रहा हूं। याद रखो, दुनिया तुम्हें वही मानती है जो तुम स्वयं को मानते हो। यदि तुम खुद को कम आंकोगे, दुनिया सस्ता खरीदेगी। यदि तुम स्वयं का सम्मान करोगे, दुनिया सीख जाएगी कि तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करना है। इसलिए आत्म सम्मान अहंकार नहीं, दिशा है। आज से यह प्रण लो मैं जहां प्रेम नहीं वहां भीख नहीं मांगूंगा। जहां सम्मान नहीं वहां ठहरूंगा नहीं। जहां विकास नहीं वहां रुकूंगा नहीं। जहां शांति नहीं वहां लौटूंगा नहीं। मैं अपने जीवन को हल्का, ऊंचा और सच्चा बनाऊंगा। और जैसे-जैसे तुम ये निर्णय निभाते जाओगे, जीवन तुम्हारे सामने नए द्वार खोलता जाएगा। सही मित्र आएंगे, सही अवसर आएंगे, सही सोच आएगी, सही समय आएगा। क्योंकि जब तुम गलत चीजों को छोड़ते हो, तभी सही चीजों के लिए स्थान बनता है। इसलिए अभी जो खालीपन दिख रहा है, उससे घबराओ मत। खाली पात्र ही भरा जा सकता है। खाली खेत में ही नई फसल उगती है। खाली आसमान में ही नया सूरज उगता है। और खाली हुए हृदय में ही नया जीवन उतरता है। इसलिए जो स्थान आज सूना लग रहा है, वही कल शक्ति का मंदिर बन सकता है। जो खालीपन आज तुम्हें डराता है, वही कल तुम्हें तुम्हारी असली आवाज सुनाएगा। मनुष्य जब सब सहारों से थोड़ा दूर होता है, तभी उसे पता चलता है कि सबसे बड़ा सहारा उसके भीतर छिपा था। बाहर का शोर कम होता है, तब भीतर की दिशा साफ सुनाई देती है।

चुपचाप सबको छोड़ दो | Deep MotivationalSpeech | Osho Style
Sadhana
24m 3s3,861 words~20 min read
Auto-Generated
Watch on YouTube
Share
MORE TRANSCRIPTS


