[0:00]जय माता दी दोस्तों, यह कहानी बांधवगढ़ साम्राज्य की है। जहां पर राजा भानु प्रताप का राज्य हुआ करता था। राजा भानु प्रताप बहुत ही दयालु और न्यायप्रिय राजा थे। उनके राज्य की सारी प्रजा बहुत ही सुखी थी। राजा भानु प्रताप की दो रानियां थी। रानी प्रांजल और रानी प्रमिला, महारानी प्रमिला राजा की बड़ी रानी थी।
[0:26]और राजा का पहला विवाह रानी प्रमिला के साथ ही हुआ था। उसके चार साल के बाद, राजा का विवाह रानी प्रांजल के साथ हुआ। रानी प्रमिला का एक पुत्र था, राजकुमार नीलकमल और दूसरी रानी प्रांजल का एक बेटा था, राजकुमार वतन। राजकुमार नीलकमल राजकुमार वतन से बड़ा था। इसलिए राजकुमार नीलकमल इस साम्राज्य का होने वाला भावी राजा था। रानी प्रांजल इस बात से बिल्कुल भी प्रसन्न नहीं थी। वह हमेशा ही रानी प्रमिला से बहुत ज्यादा नफरत करती थी। जिसका कारण था कि रानी प्रमिला विवाह से पहले छोटे से राज्य की राजकुमारी थी। जबकि रानी प्रांजल विवाह से पहले बहुत ही बड़े राज्य की राजकुमारी थी। लेकिन असल बात यह थी कि रानी प्रमिला एक बहुत ही समझदार और अक्लमंद औरत थी। यहां तक कि महाराजा भानु प्रताप भी रानी प्रमिला की सलाह अपने राजकाज के कार्यों में लिया करते थे। साथ ही महल की सारी जिम्मेदारियां भी रानी प्रमिला ने ही संभाल रखी थी। दूसरी तरफ महारानी प्रांजल को यह बात बिल्कुल भी पसंद नहीं थी। कि एक छोटे से राज्य से आई हुई राजकुमारी इतने विशाल साम्राज्य की महारानी बने और महल के हर काम काज को संभाले। रानी प्रांजल को यह भी लगता था कि प्रमिला का बेटा नील कमल महाराज का उत्तराधिकारी है और आगे चलकर के वही इस विशाल साम्राज्य का राजा बनेगा। इन्हीं सभी कारणों से रानी प्रांजल बड़ी रानी जो प्रमिला थी उनसे नफरत करती थी। रानी प्रांजल हमेशा कुछ ना कुछ कारणों से महारानी प्रमिला पर झूठे आरोप लगाती रहती थी। इन सब स्थितियों के बावजूद भी राजा भानु प्रताप के अपनी दोनों रानियों को बराबर सम्मान देते थे। वह दोनों रानियों से एक जैसा बर्ताव करते थे। जब रानी प्रांजल की कोई छोटी-मोटी चालबाजिया नाकामयाब होती थी। तो उसने एक ऐसी योजना बनाई जिससे वह बड़ी रानी प्रमिला को अपने रास्ते से हटा सके। अपनी योजना को पूरा करने के लिए रानी प्रांजल ने एक बहुरूपी को महल में बुलवाया और एकांत कमरे में ले जाकर के उसे अपना षड्यंत्र समझाने लगी। जिसके अनुसार उस बहुरूपी को एक नकली साधु का भेष बनाकर के महाराज भानु प्रताप के सामने जाना था और राजा भानु प्रताप के सामने सी रानी प्रमिला और उसके बेटे के बारे में एक झूठी भविष्यवाणी करनी थी। रानी प्रांजल ने उस बहुरूपी को महाराज भानु प्रताप की सारी खास बातें बता दी थी। ताकि वह उन सभी बातों को राजा के सामने बता करके उन्हें प्रभावित कर सके और राजा को उस बहुरूपी पर पूरा विश्वास भी हो जाए। अगले दिन वह बहुरूपिया एक साधु का भेष बनाकर के राजा के दरबार में जाकर पहुंच गया और जितनी भी बातें रानी प्रांजल ने उस साधु महाराज के बारे में बताई थी। वह सभी बातें वह नकली साधु ने महाराज के सामने बता दी। वह सभी बातें सुनकर के राजा भानु प्रताप बहुत हैरान हुए और वह साधु से बहुत प्रभावित हुए। वह विचार करने लगे कि यह साधु तो सचमुच एक बहुत पहुंचा हुआ महात्मा है। यह तो कोई अंतर्यामी मालूम पड़ता है। इसीलिए राजा उस नकली साधु की सारी बातों पर विश्वास करने लगे और फिर साधु कहने लगा कि महाराज अब जो बात आपको बताने जा रहा हूं शायद वह बात आपको बहुत ही ज्यादा अजीब लगे। और यह भी हो सकता है कि वह बात आपको बिल्कुल भी पसंद ना आए। यह सुनकर के राजा भानु प्रताप कहने लगे कि नहीं साधु महाराज जो भी बात हो आप हमें बिना किसी संकोच के कहिए। राजा के द्वारा भरोसा दिए जाने पर जो नकली साधु था कहने लगा कि महाराज आपके बड़े पुत्र नील कमल भविष्य में एक अच्छे राजा साबित नहीं होंगे। वह आपका भी अच्छे से ख्याल नहीं रखेंगे। यह कहते-कहते साधु एकदम से शांत हो गया। राजा ने पूछा कि महाराज आप रुक क्यों गए? आगे कहिए आप क्या कहना चाहते हैं? तब साधु कहने लगा कि महाराज राजकुमार नीलकमल बड़े होने के बाद आपको जान से मार डालेंगे। यह बात सुनकर के राजा को इस बात पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हो रहा था। महाराज की नजरों में राजकुमार नीलकमल एक बहुत ही नेक दिल राजकुमार था। और वह हमेशा अपने पिता का बहुत ही ज्यादा सम्मान भी करता था। राजा कहने लगा कि साधु महाराज आपने जो बात कही क्या वह सत प्रतिशत सही है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि आपसे कोई भूल हो रही हो। बहुरूपी कहने लगा कि नहीं महाराज मुझसे कोई भूल नहीं हो रही है। इसके बाद साधु ने कहा कि महाराज मेरी सलाह तो यही है कि आप अगर अपना जीवन बचाना चाहते हैं तो आपको राजकुमार नीलकमल को इस महल के बाहर निकाल देना चाहिए। अपनी जान बचाने का आपके पास केवल एक यही रास्ता है। यह सब कहने के बाद वह नकली साधु वहां से चला गया। यह सारी बातें सुनने के बाद महाराज भानु प्रताप बहुत ही दुखी हुआ। भविष्य में उनका चहेता बेटा उनके प्राण ले लेगा। उस रात राजा को बिल्कुल भी नींद नहीं आई। वह सारी रात बिस्तर पर करवट बदलते रहे और उसी रात राजा ने यह फैसला ले लिया कि वह राजकुमार नीलकमल को अपने राज्य से बाहर निकलवा देंगे। और अगले ही दिन महाराज भानु प्रताप ने राजकुमार नील कमल को अपने राज्य से बाहर निकालने का आदेश दे दिया। जिस समय यह घटना घटित हुई उस समय राजकुमार बहुत ही छोटे थे। जब रानी प्रमिला को इस आदेश का पता चला तो मानो उन पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। रोती बिलखती हुई वह महाराज के पास पहुंची और उनसे ऐसा ना करने की प्रार्थना करने लगी। परंतु महाराज भानु प्रताप पर इसका कोई असर नहीं हुआ। रानी प्रमिला ने उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की परंतु जब उन्होंने देखा कि राजा अपने फैसले पर बिल्कुल अटल है तो वह कहने लगी कि ठीक है महाराज जैसी आपकी आज्ञा। अगर आप मेरे पुत्र को इस महल से निकालना ही चाहते हैं तो मेरा भी फैसला सुन लीजिए। मैं अपने पुत्र को कहीं पर भी अकेला नहीं जाने दूंगी। इसीलिए मैं भी अपने पुत्र के साथ इस राज्य को छोड़ दूंगी। बड़ी रानी प्रमिला के ऐसा कहने पर भी राजा भानु प्रताप अपने फैसले से टस से मस नहीं हुए। इसके बाद रानी प्रमिला अपने पुत्र नीलकमल को लेकर के महल से और फिर उस राज्य से दूर चली गई। कुछ दिनों के सफर के बाद दोनों मां बेटे एक दूसरे राज्य जिसका नाम था मीरपुर वहां जाकर के पहुंच गए और वही पर रहने लगे। रानी प्रमिला एक बहुत ही समझदार औरत थी। वह मिट्टी के गद्धा बनाकर के और उन्हें बेच करके अपने घर का गुजारा करती थी। अब वह दोनों एक साधारण सा जीवन व्यतीत कर रहे थे। राजकुमार नीलकमल अपनी मां की सहायता किया करता था। इस तरह से रानी प्रमिला और राजकुमार नीलकमल का जीवन रातों रात पूरी तरह से बदल गया। वह दोनों एक महल से एक झोपड़ी में पहुंच चुके थे। समय अपनी गति से बीत रहा था। अब राजकुमार नीलकमल बड़ा हो चुका था। दूसरी तरफ बांधवगढ़ में राजकुमार वतन भी बड़ा हो चुका था। वह बहुत ही ज्यादा घमंडी और नाकारा किस्म का राजकुमार था। वह कभी भी अपने पिता से तमीज से बात नहीं करता था। उसका व्यवहार एक अच्छे राजकुमार के जैसा नहीं था। राजा भानु प्रताप हर समय वतन को समझाने का प्रयास करते थे कि तुम इस विशाल साम्राज्य के राजकुमार हो और कल को तुम्हें ही साम्राज्य का राजा बनना है। इसीलिए तुम्हें हर कला में निपुण होना चाहिए। तुम्हें विद्या अध्ययन के साथ-साथ युद्ध का भी अभ्यास करना चाहिए ताकि तुम अपनी प्रजा की रक्षा कर सको। परंतु असल बात तो यह थी कि राजकुमार वतन एक बहुत ही आलसी व्यक्ति था। उसे ना तो विद्या ग्रहण करना अच्छा लगता था और ना ही युद्ध कला का अभ्यास करना। वह सारा दिन केवल अपनी मनमानी करता और दूसरों का मजाक उड़ाता और हर किसी को नीचा दिखाने की हमेशा कोशिश किया करता था। वह किसी की इज्जत नहीं करता था किसी का मान नहीं रखता था। जब भी राजा भानु प्रताप वतन को कोई बात समझाने लगते तो उल्टा उन्हें जवाब दे देता था। इन सभी परिस्थितियों को देखकर के जब महाराज भानु प्रताप को लगने लगा कि राजकुमार वतन इस विशाल साम्राज्य का राजा बनने के योग्य नहीं है। और ना ही उसमें वह सारे गुण हैं जो एक राजा में होने चाहिए। तब राजा ने यह फैसला किया कि वह किसी भी हालत में वतन को इस विशाल साम्राज्य का राजा नहीं बनने देगा। क्योंकि अगर वतन भविष्य में राजा बन जाएगा तो वह प्रजा का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखेगा। जब राजकुमार वतन को इस बारे में पता चला कि उसके पिता महाराज भानु प्रताप उसे भविष्य का राजा नहीं बनाना चाहते। तो उसने सेनापति के साथ मिलकर के एक षड्यंत्र रचा और महाराज भानु प्रताप के कुछ खास मंत्रियों को खाने में विष देकर के उन्हें मरवा दिया। उसके बाद सेनापति और राजकुमार ने मिलकर के भानु प्रताप से उसकी राजगद्दी छीन ली। उनका मुकुट और आभूषण भी ले लिया। यहां तक कि उनके राजसी वस्त्र उतार करके उन्हें साधारण से वस्त्र पहना दिए और फिर महल से धक्के देखकर के बाहर निकाल दिया। छोटी रानी प्रांजल यह सब कुछ देखती रही और उसने इसका कोई भी विरोध नहीं किया। इन सभी घटनाओं का राजा पर बहुत गहरा आघात पड़ा। वह कई दिनों तक नगर-नगर गांव-गांव भटकता रहा। भटकते भटकते वह एक दिन मीरपुर नगर में जाकर के पहुंच गए जहां राजकुमारी प्रमिला और उनका बेटा नीलकमल क्या रहते थे? उस दिन राजकुमार नीलकमल घर के लिए कुछ सामान खरीदने के लिए नगर के बाजार से जा रहा था तो उसने देखा कि उसके पिता महाराज भानु प्रताप एक पेड़ के नीचे बड़े ही उदास बैठे हुए थे। उसके पिता की हालत बहुत ही खराब दिखाई दे रही थी। अपने पिता की ऐसी दुर्दशा देख कर के राजकुमार नीलकमल को बहुत बुरा लगा। वह अपने पिता के पास गया और कहने लगा कि पिताजी महाराज आप मीरपुर नगर में क्या कर रहे हैं? आपकी ऐसी हालत किसने की है? महाराज भानु प्रताप अपने पुत्र को पहचान ना सके और कहने लगे कि बेटा तुम कौन हो? तब नीलकमल ने बताया कि मैं आपका बेटा नीलकमल हूं। महाराज ने जब अपने पुत्र को देखा तो उनकी आंखें नम हो गई और उन्होंने अपने बेटे को गले से लगा लिया। राजकुमार नीलकमल कहने लगा कि पिताजी महाराज आपकी हालत बिल्कुल भी ठीक नहीं है। आप मेरे साथ चलिए। उसके बाद राजकुमार नीलकमल भानु प्रताप को अपनी झोपड़ी में लेकर के आ गया। घर पहुंचते हुए जब रानी प्रमिला ने महाराज की ऐसी हालत देखी तो उसे बड़ा धक्का लगा। उसने अपने पति के चरण छुए। इसके बाद रानी प्रमिला और राजकुमार नीलकमल ने उनकी ऐसी हालत का कारण पूछा तब महाराज भानु प्रताप ने उन्हें सारी बात बता दी कि आज तक राजकुमार वतन ने उसके साथ कैसा बर्ताव किया है और वह राज गद्दी हड़पने के लालच में उसने महाराज सभी मंत्रियों को मरवा दिया है। और सेनापति के साथ मिलकर के मुझे इस महल से बाहर निकलवा दिया है। सारी सच्चाई जानने के बाद भानु प्रताप ने अपनी छोटी रानी प्रांजल और राजकुमार वतन को देश निकाला की सजा दे दी। वह अपनी बड़ी रानी प्रमिला और अपने बेटे नीलकमल के साथ महल में आराम से रहने लगा। कुछ समय के बाद राजकुमार नीलकमल को राजगढ़ का राजा बना दिया गया और उसका राजतिलक करने के बाद राजा भानु प्रताप अपना बाकी जीवन भगवान के भजन में बिताने लगे। और उनके जो राजा था राजकुमार नीलकमल उसकी शादी उस राजकुमारी से ही करवा दी गई।



