[0:00]मतलब मैंने ना उसको जब आखिरी बार जाते हुए देखा ना और भाई वह बहुत कोइंसिडेंस था कि लेजिट कोइंसिडेंस कि मैं मेरी हॉस्टल की खिड़की पे खड़ा हूं स्टाफ क्वार्टर्स के नीचे एक टेंपो लोड हो रही है वह वहां पे खड़ी है और मेरे को पता नहीं क्या इंस्टिंक्ट में बैठा कि शायद यह आज इसको मैं आखिरी बार देख रहा हूं।
[0:15]तो मैंने उससे पूछा कि क्या तुम जानना चाहते हो तुम्हारे बिना मैं कैसा हूं तो सोचो हिमालय से शिव रूठ जाए तो क्या होगा सोचो गणेश जी से मोदक रूठ जाए तो क्या होगा
[0:25]तुम्हारे सपने का आईना तुम्हारे सपने में टूट जाए तो क्या होगा जैसे शब्द अधूरे हैं मात्रा के बिना जैसे कक्षा अधूरी है छात्रा के बिना जैसे दुर्गा बिना आरती के आज शिव खड़े बिना पार्वती के और यह सब सुनकर कैलाश पर्वत
[0:42]रूठ गए शिव जी से शिव जी को कहते हैं कि मुझे भी पानी सा पिघलना है तो शिव जी कहते हैं अरे यार तुम पर्वत हो खड़े रहो स्थिर तो कहता है कि नहीं जिस दिन दिखी मोहब्बत शिव पार्वती सी उस दिन मैं पिघल जाऊंगा उस दिन मैं निकल जाऊंगा उसी के शहर जहां वह मोहब्बत बस्ती है
[0:56]तो आज सवेरे जब मैं उठा और मैं नदी को छुआ तो हाथों में मेरे कंकड़ आए वह कंकड़ जब मेरी आंख में लगे तो आंसू बनकर शंकर आए कि मैं कंकड़ बन के आऊंगा तुम शंकर बन के आना पेट काटकर रोटी मेहनत की घर लाना भूख मिटे तन मन की ऐसे सच कर आना मैं कंकड़ बन के आऊंगा तुम शंकर बन के आओ



