[0:00]A very good afternoon to all the esteemed guests present here. Lucky are we to perform today before you. Education is the passport to the future. Tomorrow belongs to those who prepare for it today. From the Guru to the contemporary education system. There have been several changes, but we have not been able to develop a perfect education system catering to the needs of all the students. स्वामी विवेकानंद का कहना था, हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके। केवल मेरिट व अंको की होड़ में ही शिक्षा प्रदान एवं प्राप्त करना उचित नहीं। हमें ऐसी प्रणाली अपनानी होगी, जिससे विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास संभव हो। तो आज इसी शिक्षा प्रणाली के बारे में अपने विचार प्रस्तुत करने आए हैं, हम आइकॉन इंटरनेशनल स्कूल के कुछ स्टूडेंट्स जो एक नुक्कड़ नाटक द्वारा आप सभी के साथ शेयर करेंगे कुछ अनुभव, कुछ सुझाव और कुछ आशाएं जो हम आपसे रखते हैं। हमारा यह प्रयास व्यवस्था पर कटाक्ष नहीं है, बल्कि यथार्थ को प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास है। हमारा विश्वास है कि आप सभी को हमारी प्रस्तुति पसंद आएगी और कहीं ना कहीं आप सब को यह सोचने पर मजबूर कर देगी कि हम ऐसा और क्या कर सकते हैं? That we can proudly say, no, we are not superheroes. We are something even more powerful. We are educators. We don't need a cape because we are lifted by the amazing and inspiring kids who we teach. Thank you.
[2:06]आओ आओ नाटक देखो, आओ आओ नाटक देखो, पीछे वाले आगे आओ, आगे वाले बैठ जाओ, क्योंकि नायक जी के प्यारे कोई, नायक जी के प्यारे कोई, नायक जी के प्यारे कोई अच्छा! तो आज यहां पर नाटक होगा। एंड लेट मी गेस, इस नाटक का टॉपिक करप्शन होगा? अरे! नहीं नहीं। तो इस नाटक का टॉपिक इलेक्शन होगा? अरे! ये भी नहीं। फिर तो पक्का इस नाटक का टॉपिक महंगाई यानि इन्फ्लेशन होगा? नहीं बाबा! नहीं। ना करप्शन, ना इलेक्शन, ना इन्फ्लेशन, बल्कि आज हमारा टॉपिक होगा, आर सिस्टम ऑफ़ एजुकेशन। एजुकेशन! यानि शिक्षा। लो! कर लो बात। शिक्षा में तो हमारे स्कूल में राइटिंग कंपटीशन हुआ था और हम, हम उसमें अव्वल आए थे। अव्वल? अव्वल यानि? अव्वल नहीं जानते हो? अरे! मेरे हिंदुस्तानी शेक्सपियर! अव्वल यानि फर्स्ट! अंग्रेजी मीडियम में पढ़ते हो लगता है? यस, आई एम अ प्राउड प्रोडक्ट ऑफ़ द अल्ट्रा प्रेस्टीजियस इंग्लिश मीडियम स्कूल। हां हां! यही है फैक्टर्स बेबी। वा रे मेरे भगवान! वा। कहने को तो हिंदी हमारी मातृभाषा कहलाती है। पर जरा आलम तो देखिए, यही ठीक से समझ ही नहीं आती है। मुझको अंग्रेजी मीडियम को ऊपर और हिंदी मीडियम को नीचे लाना नहीं है। एक मां अपने ही घर में जन्में बच्चों की बोली ना समझ पाए ये एग्जांपल कुछ ऐसा नहीं है? तो भई पहले हमने सोचा कि अपना नाटक 100% शुद्ध हिंदी में करेंगे, कोई कुछ भी सोच ले, हम उसकी सोच से नहीं डरेंगे। पर फिर मुद्दा तो संदेश पहुंचाने का है। हिंदी, इंग्लिश या इंग्लिश हो इसे किसी का क्या जाना है? तो चलिए साहिबान, मेहरबान, कदरदान! हमारे प्ले का मजा लीजिए। और जो कभी चंद लाइनें पसंद आ जाएं तो हमारी हौसला अफजाई के लिए तालियां जरूर बजा देना। जी हां! तो हम बात कर रहे थे, आवर सिस्टम ऑफ एजुकेशन की। और यही समझाने के लिए अब हम आपको दिखाते हैं एक कहानी। कहानी! जी हां! तो चलिए, लाइट्स, कैमरा, एक्शन! अरे! बधाई हो बधाई हो! बेटा हुआ है। सच? जरा देखूं तो, अरे वा! इसकी ना तो बिल्कुल पापा पर गई है। अरे! जरा ध्यान से देखो, इसकी आंखें तो बिल्कुल अपनी मम्मी जैसी हैं। अरे! चेहरे से तो हीरो लगता है। लगता है बड़े होकर हीरो बनेगा। अरे! चुप करो। हीरो बनेगा! अरे! इंजीनियर का बेटा है इंजीनियर ही बनेगा। तू ही हीरो बनेगा, तू ही कुछ और बनेगा। इंजीनियर की औलाद है इंजीनियर बनेगा। अरे! आगे क्या हुआ वो बताओ? आगे खुद ही देख लो। लो पंडित जी भी आ गए। नमस्कार पंडित जी। आपने ये देखा था ना मुन्ने का हाथ। कुछ बताइए ना बड़ा होकर क्या बनेगा? जी हां! हाथ देखकर आया हूं। रेखाएं बताती हैं बड़ा होकर खेल कूद में तरक्की करेगा। खेल कूद में? ये आप क्या कह रहे पंडित जी? जरा गौर से देखिए, ये तो मेरी तरह सक्सेसफुल इंजीनियर ही बना होगा। खेल कूद में क्या रखा है? सुना नहीं आपने, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे हो जाओगे खराब। पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे हो जाओगे खराब। खेलोगे कूदोगे हो जाओगे खराब! अरे भाई मैं तो कहती हूं खेलने दो बच्चों को। वैसे भी सोशल मीडिया के जमाने में बच्चे घरों के अंदर ही चिपक के रह गए हैं। अरे! ये सब छोड़ो आगे क्या हुआ वो बताओ। आगे? आगे क्या? मुन्ने का हो गया स्कूल में एडमिशन और पूरी कायनात लग गई पूरा करने उसका इंजीनियरिंग मिशन, इंजीनियरिंग मिशन। लेकिन उसके मन में तो कुछ और ही रहा दबा ना? देखे जरा क्या हुआ जब उसके पिताजी को लगे ताना। पापा पापा! देखे ना मैं म्यूजिक कंपटीशन में फर्स्ट आया पापा। अरे वा! बेटे, बता तुम्हें क्या चाहिए। कोई इनसाइक्लोपीडिया, साइंस फिक्शन की कोई किताब या बच्चों का कोई टूल बॉक्स? अरे पापा! मुझे ये सब नहीं चाहिए। आप ऐसा कीजिए, मेरे लिए एक म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट ला दीजिए। म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट चाहिए अब साहिबजादे को। घर घर ना रहेगा स्टूडियो बन जाएगा। ये मामूली स्कूल है मेरी ट्रॉफी है कोई, ए आर रहमान का ऑस्कर नहीं। अगली बार दिमाग में ऐसा ख्याल भी आए ना, तो हम इतनी मार पड़ेगी कि शरीर का पुर्जा पुर्जा इंस्ट्रूमेंट की तरह बज उठेगा। ज्यादा से ज्यादा पढ़ाई करो। क्यों हो रही है मेरे साथ ये नाइंसाफी? क्यों नहीं सक्सेस के लिए म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट ही काफी? लो जी! बड़े आए थे म्यूजिक कंपटीशन में फर्स्ट। भूल गए थे, साम दाम दंड भेद, कैसे भी करके इंजीनियर बनना है इनके लिए मस्त। आगे क्या हुआ बबुआ? आगे? आगे क्या? धीरे धीरे मुन्ना अपने आप में ही सिमट के रह गया। उसका आत्मविश्वास जाने कहां बह गया, जाने कहां बह गया। छोटी सी उम्र में उस पर लग गई हजार पाबंदिया। दूसरों के लक्ष्य को पूरा करने के लिए ले ली गई उससे रजामंदिया। ओ हो! फिर ऐसे में तो उसके दिमाग में बस एक ही गाना चलता होगा। चलो सब साथ मिलके गाते हैं। 1 2 3! छन से जो टूटे कोई सपना, जग सूना सूना लागे जग सूना सूना लागे, कोई ना रहे ना जब अपना, जग सूना सूना लागे जग सूना सूना लागे।
[7:57]ओ हो! फिर अनमने मन से पढ़ने पर उसके मार्क्स भी कमाते होंगे? बिल्कुल! घर पर डांट भी पड़ती होगी? बिल्कुल! रिजल्ट वाले दिन डर भी बहुत लगता होगा? बिल्कुल! पीटीएम वाले दिन पेरेंट्स और टीचर्स आपस में बातें भी करते होंगे? बिल्कुल! तो चलो चलकर देखें क्या बातें हो रही है?
[8:20]ये क्या मैम! हमारा बच्चा तो कुछ खास मार्क्स नहीं लाया। हमने तो अच्छा ही पढ़ाया था। रिवीडेड क्लासेस भी ली थी। बट मैम, टीचर तो आप है ना? एक बार जो बच्चा स्कूल आ जाए तो हर बात की जिम्मेदारी आपकी बनती है ना? कमाल है! आप पेरेंट्स है जब आपको पता है आपका बच्चा स्टडी में इतना वीक है, तो आपको चाहिए ना इसकी ट्यूशन भी लगा देनी? पता था सिर्फ स्कूल से कुछ नहीं होने वाला, इसलिए स्कूल के बाद 3 घंटे की कोचिंग क्लासेस भी जाता है। हमने तो अच्छा ही पढ़ाया था। ये सब इसकी कोचिंग सेंटर का कमाल है जो स्कूल का करीकुलम छोड़कर इंजीनियरिंग की प्रिपरेशन करा रहे थे। लीजिए जहां कुछ बच्चे रिजल्ट आने वाले दिन पार्टी कर रहे थे।
[9:04]यहां कुछ इनके जैसे बच्चे शायद घर जा कर ये वाला सॉन्ग गा रहे थे। ये क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ। वो छोड़ो ये ना सोचो, ये क्या हुआ। अरे! देखो देखो कौन आ रहा है! अरे सब इसको मिलकर चिढ़ाते हैं। हाथी पहला बहुत बड़े, चूहा लेकर कहां चले, आओ बैठो कुर्सी पर, कुर्सी बोले चल हट हट। बस करो! जांच करो! क्या हुआ? कुछ नहीं। इनका तो रोज का है, पता नहीं मुझको बुली करके इनको क्या मिलता है। ओ हो! बुली करते हैं। तो तुम टीचर से कंप्लेन क्यों नहीं करते? नहीं जी। जो स्टूडेंट सस्पेंड भी हो गए थे लेकिन फिर क्या? सब ने मुझसे बात करना ही बंद कर दिया। अब ऐसे बार बार दोस्ती तोड़ना मुझे तो अच्छा नहीं लगता। लीजिए ये जनाब है हाई एक्सपेक्टेशंस के शिकार और इन्हें लोग अलग अलग तरीकों से चिढ़ाकर करते हैं इनका सत्कार। इसका मतलब स्टूडेंट्स की लाइफ में सिर्फ एक ही मुद्दा नहीं है पढ़ाई बल्कि कई इश्यूज से लड़ रहे हैं ये अपनी अपनी जंग अपनी अपनी लड़ाई। हां तो! और भी मुद्दों के बारे में बताइए ना प्लीज। लीजिए! तो देर ना करें, हमारे पीछे पीछे आईये ना।
[10:32]गुड मॉर्निंग क्लास। गुड मॉर्निंग मैम। टेक आउट योर टेक्स्टबुक्स।
[10:39]कलर व्हाट इज दिस? कम हियर। नथिंग मैम। व्हाट आर यू हाइडिंग फ्रॉम मी? नथिंग मैम।
[10:47]ओ हो! मोबाइल! मोबाइल, मोबाइल, मोबाइल! मैम मेरी नहीं है। अरे! तुम्हारे पॉकेट से निकाला है तो तुम्हारा ही होगा ना? सही बात है। एंड डोंट यू नो मोबाइल फोन्स आर नॉट अलाउड इन स्कूल? देन व्हाई डिड यू ब्रिंग इट? एंड देन यू हैव द ओडासिटी टू टेक इट आउट फ्रॉम योर पॉकेट जस्ट टू फ्लॉन्ट इट इन फ्रंट ऑफ़ अदर फ्रेंड्स? मैम, लिसन टू मी फर्स्ट। मैम एक्चुअली आई हैव मेड अ प्रेजेंटेशन यूजिंग सम लेटेस्ट एप्स। एंड आई वास जस्ट शेयरिंग इट विद माय फ्रेंड्स। इन फैक्ट, यू कैन आल्सो टीच अस लेसन्स बाय मेकिंग दीज़ काइंड ऑफ प्रेजेंटेशंस। द क्लास वुड बी रियली इंटरेस्टिंग। सही बात है। अच्छा! तो अब तुम स्टूडेंट्स अब टीचर्स को बताओगे कि हमें कैसे पढ़ाना है। यू थिंक यू स्टूडेंट्स आर स्मार्टर देन वी आर? यू स्टूडेंट्स आर मोर टेक सैवी देन वी आर। यू स्टूडेंट्स आर मोर इनोवेटिव देन वी आर। देन वी आर ऑल। लेट मी टेल यू, लेट मी टेल यू दैट इट्स अ हार्डकोर ट्रुथ दैट टुडेज़ जेनरेशन इज मच मोर स्मार्टर देन वी आर। इन फैक्ट दे इज नथिंग रॉन्ग इन नोइंग अबाउट द लेटेस्ट टेक्नोलॉजीज फ्रॉम देम। सच कहा है आपने। आज का स्टूडेंट एक 21st सेंचुरी लर्नर है। डिजिटल लर्नर! डिजिटल लर्नर! हमसे यूं ही चुप नहीं करा सकते, मात्र बुक्स के सहारे नहीं पढ़ा सकते, नहीं पढ़ा सकते। उन्हें पढ़ाने के नए नए तरीकों का करना पड़ेगा आविष्कार। वो क्या चाहते हैं? करना पड़ेगा इसपे भी थोड़ा विचार। आज का स्टूडेंट क्या चाहता है? जानने के लिए चलते हैं उन्हीं के पास और जानते हैं स्टूडेंट्स के मन की बात। आई वांट माय टीचर्स टू अंडरस्टैंड दैट ईच चाइल्ड इज डिफरेंट, जस्ट लाइक दीज फिंगर्स एंड सो आर दीयर कैपेबिलिटीज। ऑफ कोर्स, सम ऑफ देम आर स्लो लर्नर्स। प्लीज डोंट टैग देम एज़ डंब। आई वांट अ क्लास व्हेयर आई कैन ब्रिंग माय ओन लैपटॉप्स एंड स्टडी विद इट हेल्प। ब्रिंगिंग गैजेट्स कैन बी यूज़फुल टू। प्लीज डोंट टैग एवरीबॉडी यूजिंग गैजेट्स एज़ स्पॉइल्ड ब्रैन्ड्स। आई विश आई कुड डिजाइन माय ओन होमवर्क यूजिंग एनी रिसोर्स दैट आई विश टू। प्लीज डोंट क्लिप आवर इमैजिनेशन। आई विश सब स्कूल्स में लाइफ स्किल्स को सीरियसली लिया जाता। करिकुलम में एनसीसी एंड सेल्फ डिफेंस कंपल्सरी हो जाता। प्लीज डोंट ओनली गिव वेटेज टू द सो कॉल्ड मेन सब्जेक्ट्स। आई विश उस दिन मेरे सो कॉल्ड सिली क्वेश्चंस पूछे जाने पर टीचर ने मुझे सब के सामने ये कह कर डांटा ना होता। मैम मैम इसका आंसर बताइये ना प्लीज। सवाल बहुत करते हो तुम। कहने को तो इतने बड़े हो गए लेकिन दिमाग देने का भी नहीं। और इतना ही क्वेश्चन भी आता। तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। कुछ नहीं हो सकता, कुछ नहीं हो सकता। यू आर अ डंब किड्स। सॉरी मैम! आई वोंट आस्क एनी क्वेश्चंस फ्रॉम नाउ ऑन। प्लीज! डोंट किल द क्यूरिओसिटी ऑफ़ द चाइल्ड। आई विश कि मुझे हर गर्मियों की छुट्टियों में वर्किंग और नॉन वर्किंग मॉडल्स ना बनाने पड़ते। मेरे मम्मी पापा को हर साल इन मॉडल्स के लिए हजार या ₹2000 शॉप वालों को देने पड़ते हैं। मुझे तो लगता है कि ये शॉप वाले उन बच्चों की छुट्टियों में अपने पूरे साल का खर्चा निकाल लेते होंगे। व्हाट आई मीन टू से इज दैट एवरीवन इज नॉट हैविंग द कैपेबिलिटी ऑफ मेकिंग सच वर्किंग एंड नॉन वर्किंग मॉडल्स। आई विश हमारा एजुकेशन सिस्टम ऐसा होता कि स्टूडेंट में जो टैलेंट है, उसको स्कूल में ही पहचान कर बढ़ावा दिया जाता। ताकि 12वीं के बाद वो सिर्फ ग्रेजुएशन नाम की डिग्री लेने के लिए 50 कॉलेजेस के फॉर्म ना भरता बल्कि सीधे ऐसी जगह जाता जहां उसके टैलेंट को निखारा जाता ताकि आगे जाकर वो अपनी पसंद की नौकरी कर सके। नौकरी मिलने पर उसे इतनी खुशी हो, इतनी खुशी कि वो गा उठे। आई मन भटका ओझल हो जाए, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन, नौकरी करके कोई ललचाए, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन। बट ये बबल बर्स्ट करने के लिए हमें लाना होगा एक टीचिंग रिवॉल्यूशन! और इस टीचिंग रिवॉल्यूशन के लिए चाहिए इनोवेटिव आइडियाज। और इन इनोवेटिव आइडियाज के लिए वी नीड गुड टीचर्स। चाहिए चाहिए, हमें अच्छे टीचर चाहिए। अच्छे टीचर चाहिए, हमें अच्छे टीचर चाहिए। फ्यूचर की जरूरत है हमें, अच्छे टीचर चाहिए। अरे! भई एजुकेशन सिस्टम के बारे में बता रहे हो या बता बता के डरा रहे हो? तुम सब कहना क्या चाहते हो? ये सब जो हो रहा है गलत हो रहा है? हमारा एजुकेशन सिस्टम ही गलत है? तो ये जेनरेशन गैप की लड़ाई कभी खत्म नहीं होने वाली। अरे हम ये नहीं कहते कि हमारा एजुकेशन सिस्टम गलत है। बल्कि हम तो ये कहते हैं कि सही समय आगे सिस्टम में चेंज लाने का है। यूं तो हम बहुत कहा करते है, बी द चेंज यू विश टू सी। फिर हम खुद ही बदलाव लाने से क्यों डरते हैं? लो कर लो बात, ये लाएंगे बदलाव। बताइए क्या चाहते हैं आप? कैसे लाएंगे आप बदलाव? हम क्या चाहते हैं? कविता के रूप में बताते हैं। चलिए आज ये सीख नए तरीका अपनाते हैं। तो कविता का शीर्षक है, काश कि ऐसा होता। काश कि ऐसा होता, कि हर बच्चा स्कूल जा पाता, वो दर दर की ठोकरें ना खाता। सर्व शिक्षा अभियान का परचम सिर्फ कागजों पर नहीं, हकीकत में भी हो पाता, हकीकत में भी हमारा। काश कि ऐसा होता, मेरी नौकरानी की बेटी कोई मिलता पढ़ने का मौका। कुछ स्कूलों ने ईडब्ल्यूएस के नाम पर उसे ना दिया होता धोखा। काश कि ऐसा होता, कि आज के बच्चे भी दे पाते अपने गुरुजनों को उचित सम्मान। ना पढ़नी पड़ती अखबारों की वो सुर्खियां जिसमें लिखी होती खबरें रिलेटेड टू गुरुजनों का अपमान, गुरुजनों का अपमान। काश कि ऐसा होता, कि सभी टीचर्स बच्चों के लिए इंस्पिरेशन बन पाते। उनके रास्ते में आए हर पत्थर को अपने शिक्षा रूपी शस्त्र से हटा पाते, हटा पाते। काश कि ऐसा होता, कि हमारे देश में ही मिल पाते हमको नौकरी के सुनहरे अवसर। ताकि बेस्ट एजुकेशन लेकर लोग दूसरे देशों में जाके ना भरते अवसर, ना भरते अवसर। काश कि ऐसा होता कि मैं डीजे या आरजे बनना चाहता हूं। ये सुनकर मेरा मजाक ना उड़ाया जाता। बल्कि इस तरह के अनकॉमन प्रोफेशंस के बारे में स्कूल या कॉलेज लेवल में भी बताया जाता, बताया जाता। इच्छाएं तो बहुत हैं, चेंज बहुत लाना है। आज के लिए इतना ही काफी है कॉन्सेप्ट को आगे भी तो बढ़ाना है। हां हां! तो हम कौन सा एकता कपूर के सीरियल्स की तरह हजार एपिसोड करने आएं है। यूं यही तो कहते हैं, कि हम इस देश का भविष्य हैं। तो जरा आपसी बातचीत करके कुछ दरख्वास्त करना चाहते हैं। दरख्वास्त ये है कि हमारा एजुकेशन सिस्टम बना दो कुछ ऐसा। कि इंडियन टैलेंट इतना निखर आ जाए कि मन की तसल्ली डस नॉट गेट ओवररूल्ड बाय पैसा। स्कूल एंड कॉलेजेस जैसे इंस्टीट्यूशंस से लेकर निकले अब ऐसा ज्ञान कि मात्र नॉलेजेबल मशीनस ना कहला कर हम कहलाए सर्वगुण संपन्न इंसान। सर्वगुण संपन्न इंसान, सर्वगुण संपन्न इंसान। धन्यवाद।



