[0:00]कुछ थोड़े से सूत्र आपको बताता हूं। अगर उन्हें थोड़ा ध्यान में रखें तो ब्रह्मचर्य की ओर जाने का रास्ता बहुत आसान हो जाएगा। संभोग करते समय जितनी तेज सांस होगी संभोग का समय उतना ही छोटा होगा। सांस जितनी शांत और ढीली होगी उतना ही संभोग का समय लंबा हो जाएगा। अगर सांस को बिल्कुल ढीला करने का थोड़ा अभ्यास किया जाए तो संभोग के क्षणों को बहुत लंबा किया जा सकता है। और जब संभोग के क्षण लंबे होंगे तभी उसके भीतर से समाधि का वो अनुभव शुरू होगा। जिसका सूत्र मैंने बताया निरहंकार भाव, इगोलेसनेस और टाइमलेसनेस का अनुभव। इसलिए सांस बहुत ढीली होनी चाहिए। सांस के ढीली होते ही संभोग की गहराई खुलने लगती है, उसके राज प्रकट होने लगते हैं। और दूसरी बात संभोग के क्षण में ध्यान दोनों आंखों के बीच जहां योग आज्ञा चक्र बताता है वहां हो। अगर ध्यान वहां हो तो संभोग की सीमा और समय 3 घंटे तक बढ़ सकता है। और एक गहरा संभोग आदमी को हमेशा के लिए ब्रह्मचर्य में स्थापित कर सकता है। सिर्फ इस जन्म के लिए ही नहीं बल्कि अगले जन्मों के लिए भी। किसी बहन ने मुझे पत्र लिखा है और पूछा है विनोबा तो बाल ब्रह्मचारी हैं। क्या उन्हें समाधि का अनुभव नहीं हुआ होगा? मेरे बारे में भी पूछा कि मैंने तो विवाह नहीं किया। मैं भी बाल ब्रह्मचारी हूं तो क्या मुझे समाधि का अनुभव नहीं हुआ होगा? उस बहन से अगर वे यहां मौजूद हों मैं कहना चाहता हूं विनोबा को। मुझे या किसी को भी बिना अनुभव के ब्रह्मचर्य हासिल नहीं होता। वो अनुभव चाहे इस जन्म का हो या पिछले जन्म का। जो भी इस जन्म में ब्रह्मचर्य को पाता है वह पिछले जन्म के गहरे संभोग अनुभव के आधार पर ही पाता है। कोई और रास्ता नहीं है। अगर किसी को पिछले जन्म में गहरे संभोग का अनुभव हुआ हो तो इस जन्म के साथ ही वह सेक्स से मुक्त पैदा होगा। उसके मन में कभी सेक्स खड़ा नहीं होगा। और उसे हैरानी होगी यह देखकर कि लोग क्यों पागल हैं, क्यों दीवाने हैं। उसे यह भी मुश्किल होगी कि कौन स्त्री है कौन पुरुष है यह पहचानने में और दूरी बनाए रखने में। लेकिन अगर कोई सोचता है कि बिना गहरे अनुभव के कोई बाल ब्रह्मचारी हो सकता है, तो वह ब्रह्मचारी नहीं होगा सिर्फ पागल हो जाएगा। जो लोग जबरदस्ती ब्रह्मचर्य थोपते हैं वे विक्षिप्त हो जाते हैं और कहीं भी नहीं पहुंच पाते। ब्रह्मचर्य थोपने से नहीं आता। वह अनुभव का नतीजा है। वह गहरे अनुभव का फल है। और वह अनुभव संभोग का ही अनुभव है। अगर वह अनुभव एक बार भी हो जाए तो अनंत जीवन की यात्रा के लिए सेक्स से मुक्ति मिल जाती है। तो मैंने दो बातें कहीं। पहली सांस इतनी ढीली हो कि जैसे चल ही नहीं रही। दूसरी सारा ध्यान आज्ञा चक्र पर यानी दोनों आंखों के बीच के बिंदु पर। जितना ध्यान मस्तिष्क के पास होगा उतनी ही संभोग की गहराई अपने आप बढ़ेगी। और सांस जितनी ढीली होगी उतनी ही लंबाई बढ़ेगी। और आपको पहली बार अनुभव होगा कि मनुष्य के मन में संभोग का आकर्षण नहीं है। असल में तो मनुष्य के मन में समाधि का आकर्षण है। एक बार उसकी झलक मिल जाए जैसे अचानक अंधेरे में बिजली चमक जाए और हमें रास्ता दिख जाए फिर हम आगे बढ़ सकते हैं। जैसे एक आदमी गंदे घर में बैठा है। दीवारें अंधेरी हैं और धुएं से काली पड़ी हैं। घर बदबू से भरा है। लेकिन खिड़की खोल सकता है। उस खिड़की से वह देख सकता है दूर का आकाश, तारे, सूरज, उड़ते पक्षी। और तब उसके लिए उस घर से बाहर निकलना मुश्किल नहीं रहेगा। जिस दिन आदमी को संभोग के भीतर समाधि की थोड़ी सी भी अनुभूति हो जाती है उसी दिन सेक्स का गंदा मकान, अंधेरी दीवारें बेकार हो जाती हैं और आदमी बाहर निकल जाता है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि आमतौर पर हम उसी मकान में पैदा होते हैं जिसकी दीवारें बंद होती हैं। जो अंधेरे और बदबू से भरा होता है। और इसी मकान के भीतर पहली बार बाहर का अनुभव करना जरूरी है। तभी हम बाहर निकल सकते हैं। जिस आदमी ने खिड़की ही नहीं खोली और उसी मकान के कोने में आंख बंद करके बैठ गया कि मैं इस गंदे मकान को नहीं देखूंगा वह चाहे देखे या ना देखे। रहेगा तो उसी मकान के भीतर ही जिसे हम ब्रह्मचारी कहते हैं। वे तथाकथित जबरदस्ती के ब्रह्मचारी असल में वे भी उसी सेक्स वाले मकान के भीतर हैं जितना कोई साधारण आदमी है। फर्क सिर्फ इतना है कि आप आंख खोलकर कर रहे हैं। वह आंख बंद करके मन में कर रहे हैं। जो आप शरीर से करते हैं वही वे मन से करते हैं। असल में फर्क कोई नहीं है। इसलिए मैं कहता हूं संभोग के प्रति दुर्भाव छोड़ दो। समझने और प्रयोग करने की कोशिश करो और संभोग को एक पवित्र स्थिति दो। मैंने दो सूत्र कहे। अब तीसरी एक बात है संभोग के पास जाते समय भाव वैसा होना चाहिए जैसे कोई मंदिर में जा रहा हो। क्योंकि संभोग के क्षण में हम परमात्मा के सबसे करीब होते हैं। इसीलिए तो संभोग में परमात्मा सृजन का काम करता है और नए जीवन को जन्म देता है। हम क्रिएटर के सबसे पास होते हैं। संभोग की अनुभूति में हम श्रष्टा के सबसे नजदीक होते हैं। इसलिए हम माध्यम बन जाते हैं और एक नया जीवन हमारे जरिए उतरता है। हम जन्मदाता बन जाते हैं। क्यों? क्योंकि श्रष्टा के निकटतम वही स्थिति है। अगर हम पवित्रता और प्रार्थना से सेक्स के पास जाएं तो हम परमात्मा की झलक पा सकते हैं। लेकिन हम तो सेक्स के पास नफरत, दुर्भाव और कंडैमनेशन के साथ जाते हैं। इसलिए दीवार खड़ी हो जाती है और परमात्मा का अनुभव नहीं हो पाता। सेक्स के पास ऐसे जाएं जैसे मंदिर के पास जा रहे हो। पत्नी को ऐसे देखें जैसे वह प्रभु है पति को ऐसे देखें जैसे वह परमात्मा है। और कभी भी गुस्से, नफरत, ईर्ष्या, जलन, चिंता या तनाव के क्षणों में सेक्स के पास ना जाएं। लेकिन आमतौर पर उल्टा होता है आदमी जितना चिंतित, परेशान, गुस्से में, घबराया हुआ या एंग्विश में होता है उतना ही ज्यादा सेक्स की ओर जाता है। तुम प्रेम की बात करते हो। तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें प्रेम समझाऊं मगर मैं तुम्हें प्रेम कैसे समझाऊं जब तुम प्रेम के नाम पर एक भयंकर बीमारी को ढो रहे हो। तुम्हें जिस चीज से प्रेम है वो प्रेम नहीं है। वह केवल एक जरूरत है एक भिखारीपन एक गहरी असुरक्षा जो तुम्हारे भीतर बैठी है। तुम अकेले हो। भीतर गहरे शून्य से डरते हो। जब तुम रात को अकेले होते हो तो तुम्हें लगता है कि तुम बस नहीं हो। यह अकेलापन इतना काटता है इतना चुभता है कि तुम किसी भी कीमत पर इससे भागना चाहते हो। और भागने का सबसे आसान सबसे सामाजिक रूप से स्वीकृत तरिया है प्रेम। तुम एक स्त्री या एक पुरुष को खोजते हो और सोचते हो कि यह व्यक्ति आकर तुम्हारे उस खालीपन को भर देगा। तुम दूसरे के कंधे पर अपनी सारी जिम्मेदारियां डाल देते हो अपने सारे दुख अपनी सारी चिंताएं और तुम इसे प्रेम कहते हो। जरा सोचो क्या यह प्रेम हो सकता है? यह तो एक तरह का शोषण है। तुम दूसरे का उपयोग एक दवा की तरह कर रहे हो ताकि तुम अपने भीतर के खालीपन को भूल सको। जैसे शराबी शराब पीकर अपनी समस्याओं को भूल जाता है तुम प्रेम का नशा करते हो। जब तुम किसी से कहते हो मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता तो यह प्रेम नहीं है यह आतंकवाद है। तुम दूसरे पर एक भयंकर बोझ डाल रहे हो। तुम कह रहे हो कि मेरी जिंदगी अब तुम्हारे हाथ में है। अगर वह चला गया तो तुम मर जाओगे। यह तो एक तरह की ब्लैकमेलिंग है और ब्लैकमेलिंग के आधार पर प्रेम कैसे खड़ा हो सकता है? तुम्हारा प्रेम एक सौदेबाजी है। तुम हमेशा हिसाब लगाते हो। मैंने तुम्हारे लिए यह किया अब तुम मेरे लिए क्या करोगे? यह कोई हृदय का भाव नहीं है यह तो बाजार का हिसाब किताब है जहां लेनदेन होता है। जहां हां ना नुकसान देखा जाता है। तुम देते इसलिए हो ताकि तुम्हें वापस मिले और जिस दिन तुम्हें लगता है कि वापस नहीं मिल रहा है तुम्हारा सारा प्रेम पल भर में घृणा में बदल जाता है। अगर तुम्हारा प्रेम ईर्ष्या पैदा करता है तो यह प्रेम नहीं। अगर तुम्हारा प्रेम मालकियत पैदा करता है तो यह प्रेम नहीं। अगर तुम्हारा प्रेम बंधन पैदा करता है तो यह प्रेम नहीं। यह केवल अहंकार है जिसने प्रेम का खूबसूरत मुखौटा पहन रखा है। तुम्हारा अहंकार दूसरे को ऐद करना चाहता है ताकि तुम सुरक्षित महसूस कर सको। यह पिंजरा बहुत सुंदर हो सकता है सोने का हो सकता है मगर यह है तो पिंजरा ही। और पिंजरे में कोई जुश नहीं रह सकता। तुम खुद को देखो जब तुम प्रेम में होते हो तुम हर पल डरे हुए होते हो कि कहीं वह व्यक्ति चला ना जाए। यह डर कैसा? यह डर बताता है कि तुम्हारा प्रेम दूसरे पर आधारित है। तुम दूध पर आधारित नहीं हो। तुम दूसरे को अपनी खुशी की कुंजी बनाकर उसके हाथ में सौंप देते हो। यह तुम्हारी सबसे बड़ी दलदल है। और यह दलदल तुम्हें कभी प्रेम तक नहीं पहुंचने देगी। क्योंकि प्रेम हमेशा निर्भय होता है। प्रेम हमेशा स्वतंत्रता देता है और तुम्हारा तथाकथित प्रेम हमेशा डर और बंधन पैदा करता है। अब इस बात को गांठ बांध लो जिसे तुम प्रेम कहते हो वो प्रेम नहीं है। वह तुम्हारे भीतर के खालीपन से पैदा हुआ एक रासायनिक लोचा है। एक उन्माद है जो थोड़े समय बाद उतर जाएगा और पीछे छोड़ जाएगा निराशा, ऊब और नया खालीपन। और तब तुम फिर से नया नशा खोजने निकल पड़ोगे। यहीं से तुम्हारी यात्रा शुरू होती है इस भ्रम को तोड़ने से। जब तक तुम यह नहीं देखोगे कि तुम्हारा वर्तमान प्रेम एक भयंकर बीमारी है तब तक तुम असली प्रेम की तरह एक कदम भी नहीं बढ़ा पाओगे। यह देखना ही पहला ध्यान है असली प्रेम शुरू होता है अकेलेपन से। मगर उस अकेलेपन से नहीं जिससे तुम डरते हो मैं बात कर रहा हूं स्वयं में होने के अकेलेपन की। तुम डरते क्यों हो अकेलेपन से? क्योंकि जब तुम अकेले होते हो तो तुम्हें एहसास होता है कि तुम भीतर से कितने खाली हो। तुम्हारे भीतर कितना शोर है कितना दुख है कितनी अधूरी कामनाएं हैं। यह सब तुम्हें बेचैन कर देता है और तुम भागना चाहते हो। मगर अगर तुम इस अकेलेपन में भागो नहीं बल्कि ठहर जाओ आंखें बंद करो और बस देखो यह बेचैनी कहां से आ रही है। यह खालीपन कहां है? जब तुम इसे बिना किसी निर्णय के बिना किसी विरोध के देखते हो तो एक चमत्कार होता है। वह खालीपन धीरे-धीरे एक विशालता में बदल जाता है। वह शून्य जो तुम्हें डरा रहा था वह अचानक एक स्वर्ग बन जाता है। यह है पहला सत्य प्रेम दूसरे को खोजने से पहले खुद को खोजने की यात्रा है। जब तुम अपने भीतर इस केंद्र को पा लेते हो जहां तुम पूर्ण हो जहां तुम्हें किसी दूसरे की आवश्यकता नहीं रही। उसी क्षण तुम्हारे भीतर प्रेम का बीज बोया जाता है। आवश्यकता हमेशा गुलामी पैदा करती है प्रेम हमेशा स्वतंत्रता पैदा करता है। जब तुम किसी से कहते हो मुझे तुम्हारी जरूरत है तो तुम उसे खरीद रहे हो तुम उसे अपनी गुलामी में ले रहे हो। मगर जब तुम भीतर से इतने भरे हुए होते हो कि अब तुम्हें किसी की जरूरत नहीं रही। तुम परिपूर्ण हो। तब भी अगर कोई व्यक्ति तुम्हारे जीवन में आता है तो वह जरूरत बनकर नहीं आता है। वह एक आनंद बनकर आता है एक उपहार बनकर आता है। तुम उसे कहते हो मैं तुम्हारे साथ होना चाहता हूं इसलिए नहीं कि मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूं बल्कि इसलिए कि मैं इतना भरा हुआ हूं कि मैं तुम्हारे साथ इस आनंद को बांटना चाहता हूं। यह है प्रेम की सही शुरुआत। प्रेम मांग नहीं है प्रेम बांटना है मांग भिखारी करता है बांटता सम्राट है। तुम जब तक भीतर से भिखारी हो तब तक तुम प्रेम नहीं कर सकते। तुम सिर्फ भीख मांगोगे। तुम दोगे भी तो इस उम्मीद से कि तुम्हें चार गुना वापस मिले। यह फिर भीख ही हुई। तुम्हें खुद को भीतर से सम्राट बनाना होगा और सम्राट बनने के लिए किसी राज्य की किसी संपत्ति की जरूरत नहीं है। तुम्हें सिर्फ अपने भीतर के स्व को जानने की जरूरत है। जब तुम अपने भीतर के होश को जान लेते हो जो तुम्हारी असली प्रकृति है जो शुद्ध बुद्ध है तब तुम पहली बार पाते हो कि तुम्हारे पास वह सब है जो तुम बाहर खोज रहे थे। तुम्हारे भीतर आनंद है तुम्हारे भीतर शांति है तुम्हारे भीतर प्रकाश है। जब यह प्रकाश तुम्हारे भीतर से फूटता है तब यह अपने आप चारों ओर बिखरता है। यह बिखरना ही प्रेम है। यह प्रेम कोई कर्म नहीं है कि तुमने किया। यह प्रेम तुम्हारा स्वभाव है कि तुम हो। सूरज को रोशनी देने के लिए प्रयास नहीं करना पता। जब सूरज होता है तो रोशनी अपने आप बिखरती है। तुम अपने भीतर के उस सूरज बनो। तुम्हें किसी लड़की को खुश रखने की टेक्निक नहीं सीखनी है तुम्हें बस खुद खुश होना सीखना है। जब तुम भीतर से आनंदित होते हो तो तुम्हारे चारों ओर एक ऊर्जा क्षेत्र बन जाता है जो भी इस क्षेत्र में आता है। वह अपने आप आनंदित और आकर्षित हो जाता है। यह आकर्षण किसी शारीरिक सुंदरता या धन का नहीं होता। यह आकर्षण तुम्हारी होने की शक्ति का होता है। यह है असली सोर्स है इसका मसाला खुद शुद्ध बनो बाकी सब अपने आप हो जाएगा। जब तुम्हारे भीतर प्रेम का यह स्रोत फूटता है तब तुम किसी दूसरे व्यक्ति के साथ एक संबंध में नहीं पाते बल्कि तुम एक नदी बन जाते हो जो दूसरे नदी के साथ बहना शुरू कर देती है। तुम जिस संबंध को जानते हो। वह एक ठहरा हुआ बंधा हुआ सजा हुआ तालाब होता है। तुम एक दूसरे के चारों ओर दीवारें खड़ी कर देते हो। यह मेरा पति है यह मेरी पत्नी है यह मेरा प्रेमी है। तुम तुरंत उस पर एक लेबल लगा देते हो। एक कानूनी बाग कर लेते हो और बाग होते ही जीवन प्रवाह रस सब बात भूल जाता है। तुमने कभी देखा है? जैसे ही तुम किसी रिश्ते को नाम देते हो उसी दिन से उसमें ऊब शुरू हो जाती है। तुम शादी करते हो और सोचते हो कि अब सब हो गया अब कोई रोमांच नहीं कोई खोज नहीं अब तो बस कर्तव्य है। अब तो बस जिम्मेदारी है। यह संबंध प्रेम को मार देता है। प्रेम हमेशा बहता है। प्रेम रिलेशनशिप नहीं है प्रेम एक रिलेटिंग है। रिलेशनशिप का अर्थ होता है एक बंधा हुआ निश्चित अथुम हो चुका अध्याय है। रिलेटिंग का अर्थ होता है हर पल एक नया मिलन हर पल एक नई खोज हर पल एक नई शुरुआत। जब तुम किसी से प्रेम करते हो तो तुम हर सुबह यह मत सोचो कि तुम उससे शादीशुदा हो या प्रेमी हो। तुम हर सुबह उसे एक अपरिचित की तरह देखो एक नया व्यक्ति जिसे तुम आज पहली बार देख रहे हो। अगर तुम उसे आज भी प्रेम कर सकते हो अगर आज भी उसके भीतर तुम्हें कुछ नया अनूठा दिखता है तो ही तुम्हारा प्रेम जीवित है। तुम्हारा प्रेम याददाश्त पर नहीं टिका होना चाहिए। तुम कहते हो मैंने इससे 5 साल पहले प्रेम किया था। इसलिए आज भी मैं इससे प्रेम करता हूं। यह मूर्खता है। अगर तुम्हारा प्रेम 5 साल पहले की याददाश्त पर टिका है तो तुम्हारा प्रेम मर चुका है। तुम केवल एक मरे हुए फूल को ढो रहे हो। असली प्रेम को हर पल नया होना होता है। तुम जरा देखो तुम अपने प्रेमी के साथ बैठकर भी कहीं और होते हो। तुम मोबाइल में हो या अपने विचारों में हो या अपनी पिछली लड़ाई को याद कर रहे हो तुम उस पल में उपस्थित नहीं हो। और जब तुम उपस्थित नहीं हो तो संबंध कैसे बनेगा? प्रेम का अर्थ है पूरी तरह से उपस्थित होना। जब तुम दूसरे के साथ हो तो तुम वहीं हो तुम्हारा मन कहीं भटक नहीं रहा तुम उसे सुनते हो सिर्फ शब्दों को नहीं बल्कि उसके मौन को भी। तुम उसे देखते हो सिर्फ शरीर को नहीं बल्कि उसके भीतर की आत्मा को भी। जब तुम इतने गहरे से उपस्थित होते हो तब दो आत्माओं का मिलन होता है यह मिलन ही असली प्रेम है और यह मिलन रोज होता है हर पल होता है। यह कोई एक बार का समझौता नहीं है जो सात फेरों से बंध गया। इसलिए प्रेम को किसी कानूनी बंधन की जरूरत नहीं।

The Secret Art of Prolonging Intimacy | Osho's Teachings on Deep Connection #osho #oshoteachings
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