[0:00]देर से शुरू करते हैं। तो उसका है सिर्फ एक सिचुएशनल पोएट्री है और आपको लगेगा आपके साथ रिलेट करती है। कि बचपन में हम पैदल स्कूल जाते थे। वहीं कुछ दोस्त साइकिल पर आते थे। उन्हें देख एक कसक हर पल होती थी। काश अपने पास भी साइकिल होती। मन मचल मचल कर अधूरी इच्छा की माला जपता रहा, बचपन साइकिल की आस लिए इन दो पैरों से नपता रहा। और एक दिन बचपन विदा होते-होते कह ही गया, बेटा पैदल और साइकिल का अंतर नहीं कहा। और आखिर एक दिन मन की बगिया खिली दसवीं पास करने पर साइकिल मिली। अब हम थसक से साइकिल पर कॉलेज जाने लगे। तो देखा वही दोस्त अब बाइक पर आने लगे। अब हम थसक से साइकिल पर कॉलेज जाने लगे तो देखा वही दोस्त अब बाइक पर आने लगे। अब वो अपनी बाइक के साथ घर घड़ाते और हम अपनी साइकिल के साथ शर्माते। कॉलेज के साल पर साल जाते रहे हम हसरत से बाइक को देख साइकिल चलाते रहे। डिग्री हाथ में रखते हुए कॉलेज कह ही गया, बेटा साइकिल और बाइक का अंतर नहीं कहा। और आखिर एक दिन मन की बगिया खिली ग्रेजुएशन करने के बाद बाइक मिली। जैसे सूखे को हरियाली मिल गई, जैसे भूखे को थाली मिल गई। जैसे Mercedes मिल जाए ऑटो की सवारी को, जैसे विश्व सुंदरी मिल जाए आजीवन ब्रह्मचारी को। पर अचानक लगा पूरा जीवन अंधकार में है जब देखा वही दोस्त अब कार में है।
[1:25]पर अचानक लगा पूरा जीवन अंधकार में है जब देखा वही दोस्त अब कार में है। अब तो यह अंतर खलने लगा। कार के बिना जीवन बेकार लगने लगा और दो पंक्तियां सर आपके लायक। कि कॉलेज की विदाई के बाद जिंदगी यूं रूबरू हुई, अब परीक्षा की जिंदगी खत्म और जिंदगी की परीक्षा शुरू हुई। कॉलेज के बाद जीवन की असली दौड़ शुरू हुई। एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ शुरू हुई। ख्वाहिशों जरूरतों के बीच रस्साकस्सी चलती रही। एक कार की आस में जिंदगी गुजरती रही और आखिरकार जीवन की आपाधापी से फुर्सत निकालकर सारी जमा पूंजी जोड़-जाड़ कर जब कार खरीदने की हैसियत हो गई तब तक हाई सोसाइटी हेल्थ कॉन्शियस हो गई। स्लिम फिट बॉडी, स्लिम फिट बॉडी की ऐसी सनक चढ़ी कि अपने अंदर की चर्बी से ही लड़ पड़ी। डायटिशियन को देने लगी आधी सैलरी टू बर्न देयर एक्स्ट्रा कैलोरी। भले काबू में ना हो सांस पर फैशन में आ गया जुम्बा डांस। जब हम शोरूम से नई कार खरीद कर घर ला रहे थे तो देखा हमारे वही दोस्त साइकिल से जिम जा रहे हैं।



