[0:00]आज से लगभग 5000 साल पहले इसी धरती पर एक ऐसी सभ्यता थी जो आज के मॉडर्न शहरों को भी टक्कर दे सकती थी। एक ऐसी सभ्यता जिसने अपने समय से कहीं आगे निकलकर ऐसे शहर बसाए जिनकी प्लानिंग और इंजीनियरिंग आज के बड़े-बड़े आर्किटेक्ट को भी सोचने पर मजबूर कर देती है। सिंधु और सरस्वती नदियों के किनारे यह शानदार शहर बसे थे। सीधी सड़कें, दो-तीन मंजिला घर और एक ऐसी शानदार ड्रेनेज सिस्टम जिसे बनाने के लिए हम आज भी संघर्ष करते हैं। यहां गंदे पानी को बाहर निकालने के लिए ढकी हुई नालियों का एक ऐसा नेटवर्क बिछा था जो आज भी कई मॉडर्न शहरों के लिए एक सपना है। यह लोग कौन थे? कैसे रहते थे? उन्होंने यह सब कैसे कर दिखाया? उनके शहर किसी मेट्रोपॉलिटन सिटी जैसे थे। उनका व्यापार दूर मेसोपोटामिया तक फैला था और उनका समाज बेहद ऑर्गेनाइज्ड और शांतिप्रिय लगता था। लेकिन फिर अचानक सब कुछ शांत हो गया। एक विशाल सभ्यता जो मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं को मिलाकर भी उनसे बड़े इलाके में फैली थी, अपने शिखर पर पहुंचकर बस गायब हो गई। ना युद्ध के कोई बड़े निशान, ना राजा महाराजाओं के आलीशान महल या मकबरे और ना ही कोई ऐसी किताब जो उनकी कहानी बता सके। बस एक रहस्यमय खामोशी जो हजारों सालों से इतिहासकारों और पुरातत्वविदों को परेशान कर रही है। क्या हुआ था उन लाखों लोगों का? वो कहां चले गए? क्या यह किसी भयानक बाढ़ या सूखे का नतीजा था? किसी महामारी का कहर था या फिर कोई ऐसा गहरा राज है जो आज तक दुनिया से छिपा हुआ है? आज हम इतिहास के उन्हीं धूल भरे पन्नों को पलटेंगे और आपको ले चलेंगे समय में पीछे एक ऐसे सफर पर जहां हम उजागर करेंगे हड़प्पा सभ्यता की पूरी कहानी। उनके शानदार उदय से लेकर उनके रहस्यमई और अचानक हुए पतन तक। अगर आप रहस्यों के शौकीन हैं और भारत के गौरवशाली अतीत की इस सबसे बड़ी पहेली को सुलझाना चाहते हैं तो हमारे साथ बने रहिए क्योंकि सच्चाई आपके होश उड़ा देगी। आगे बढ़ने से पहले आपसे एक छोटी सी अपील है। वीडियो को अंत तक जरूर देखिए क्योंकि आज हम अपने इतिहास के एक अनोखे सफर पर निकलने वाले हैं। ऐसी वीडियो के लिए हमें घंटों रिसर्च करनी पड़ती है। पसंद आए तो लाइक कीजिए और चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए। यह कहानी शुरू होती है आज से करीब 200 साल पहले 19वीं सदी के ब्रिटिश भारत में। उस समय अंग्रेज अफसर और खोजी भारत के कोने-कोने की छानबीन कर रहे थे। साल 1826 के आसपास एक ब्रिटिश खोजी चार्ल्स मेसन पंजाब के साहिवाल जिले के पास से गुजर रहे थे। उनकी नजर एक वीरान जगह पर बने ऊंचे टीले पर पड़ी जिसके चारों ओर अजीब तरह की पक्की हुई ईंटें बिखरी थीं। गांव वाले उन ईंटों को भगवान का दिया तोहफा मानकर अपने घर बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। मेसन ने अपनी किताब में इसका जिक्र तो किया लेकिन उनकी बातों पर किसी ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। कई दशक बीत गए। साल 1856 में ब्रिटिश इंजीनियर जॉन और विलियम बर्टन कराची से लाहौर तक रेलवे लाइन बिछा रहे थे। ट्रैक के लिए उन्हें पत्थरों की जरूरत पड़ी। तभी किसी ने उन्हें पास के गांव हड़प्पा के खंडहरों के बारे में बताया। जहां हजारों की संख्या में बेहतरीन पक्की हुई ईंटें मौजूद थीं। बर्टन बंधुओं के लिए तो यह जैसे खजाना था। उन्होंने बिना सोचे समझे उन प्राचीन ईंटों को उखाड़कर रेलवे ट्रैक के नीचे बिछाना शुरू कर दिया। वह इस बात से पूरी तरह अंजान थे कि वे दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे एडवांस सभ्यताओं में से एक के सबूतों को हमेशा के लिए मिटा रहे थे। इस घटना के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर जनरल अलेक्जेंडर टनिंगहम ने 1850 और 1870 के दशक में कई बार इस जगह का दौरा किया। उन्हें वहां से कुछ अनोखी मोहरें मिलीं जिन पर एक अनजान लिपि में कुछ लिखा था और एक बैल की तस्वीर बनी थी। कनिंघम इन चीजों की अहमियत तो समझ गए थे लेकिन वह भी इसकी विशालता और प्राचीनता का सही अंदाजा नहीं लगा पाए। असली तूफान तो 20वीं सदी में आया। साल 1921 में भारतीय पुरातत्ववेता दयाराम साहनी ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के डायरेक्टर जनरल सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में हड़प्पा में एक व्यवस्थित खुदाई शुरू की। जैसे-जैसे जमीन की परतें हटी एक पूरे के पूरे शहर का नक्शा उभरने लगा। सुनियोजित सड़कें, घरों की लाइनें, नालियां। यह कोई मामूली गांव नहीं था लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अगले ही साल 1922 में हड़प्पा से लगभग 590 किलोमीटर दूर सिंध प्रांत के लड़काना जिले में एक और पुरातत्ववेता राखालदास बनर्जी एक बौद्ध स्तूप की खोज कर रहे थे। खुदाई के दौरान उन्हें स्तूप के नीचे वैसी ही मोहरें और ईंटें मिलीं जैसी हड़प्पा में मिली थीं। उन्होंने तुरंत इसकी सूचना जॉन मार्शल को दी। जब मार्शल ने दोनों जगहों से मिली चीजों का मिलान किया तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने ऐलान किया, यह कोई अलग-थलग शहर नहीं है। यह एक ही महान और प्राचीन सभ्यता का हिस्सा है। उस दूसरे शहर का नाम था मोहनजोदड़ो जिसका सिंधी भाषा में मतलब है मुर्दों का टीला। यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वहां एक टीले पर बड़ी संख्या में इंसानी कंकाल मिले थे। इस खोज ने भारतीय इतिहास को हजारों साल पीछे धकेल दिया। दुनिया को पता चला कि जिस समय मिस्र और मेसोपोटामिया में महान सभ्यताएं पनप रही थीं, ठीक उसी समय भारत में भी एक कांस्य युगीन शहरी सभ्यता अपने शिखर पर थी। इसके बाद तो जैसे खोजों की झड़ी लग गई। एक के बाद एक शहर मिलने लगे। गुजरात में लोथल और धोलावीरा, राजस्थान में कालीबंगा, हरियाणा में राखीगढ़ी और पाकिस्तान में चहुंदड़ो। आज तक इस सभ्यता के 1500 से ज्यादा ठिकाने खोजे जा चुके हैं जिनमें से 900 से ज्यादा भारत में हैं। लेकिन सवाल यह था यह लोग कौन थे? यह सभ्यता आई कहां से? क्या यह अचानक ही पैदा हो गई थी? इस सवाल का जवाब हमें और भी पीछे ले जाता है। एक ऐसी जगह पर जहां इस महान सभ्यता के बीज बोए गए थे। हड़प्पा सभ्यता किसी शून्य से पैदा नहीं हुई थी। इसकी जड़ें हजारों साल पुरानी हैं जो हमें नवपाषाण काल तक ले जाती हैं। कहानी शुरू होती है आज के पाकिस्तान के बलूचिस्तान में बसे मेहरगढ़ नाम की एक जगह से। यह बोलन नदी के पास एक उपजाऊ मैदान में बसा एक प्राचीन स्थल है जिसे हड़प्पा सभ्यता का अग्रदूत या बीज माना जाता है। आज से लगभग 9000 साल पहले यानी 7000 ईसा पूर्व के आसपास मेहरगढ़ में दक्षिण एशिया के कुछ शुरुआती किसानों और पशुपालकों ने बसना शुरू किया। यह लोग शिकारी जीवन छोड़कर एक स्थाई जीवन की ओर बढ़ रहे थे। उन्होंने दुनिया में पहली बार गेहूं और जौ जैसी फसलें उगाई और भेड़ बकरियां और मवेशी पालना शुरू किया। शुरुआत में वे मिट्टी की कच्ची ईंटों से बने साधारण घरों में रहते थे। हजारों सालों तक मेहरगढ़ धीरे-धीरे विकसित होता रहा। उन्होंने मिट्टी के बर्तन बनाना सीखा। औजार बनाने में महारत हासिल की और यहां तक कि कुछ कब्रों में मृतकों के साथ औजार, गहने और बलि दी गई बकरियों को भी दफनाया गया है जो दिखाता है कि वे शायद मौत के बाद की जिंदगी में यकीन रखते थे। मेहरगढ़ कोई अकेला चमकता सितारा नहीं था। धीरे-धीरे इन संस्कृतियों का ज्ञान और तकनीक सिंधु और उसकी सहायक नदियों के विशाल और उपजाऊ मैदानों की ओर फैलने लगी। लगभग 3300 ईसा पूर्व तक हम एक नए दौर में आते हैं जिसे प्रारंभिक हड़प्पा चरण यानी अर्ली हड़प्पा फेज कहा जाता है। इस दौरान छोटे-छोटे गांव बड़े कस्बों में बदलने लगे। इन लोगों ने वह कई जरूरी चीजें सीखीं जो आगे चलकर हड़प्पा सभ्यता की पहचान बनी। उन्होंने पक्की हुई ईंटों का इस्तेमाल शुरू किया जो बाढ़ और मौसम की मार झेलने में ज्यादा मजबूत थी। उनके मिट्टी के बर्तनों पर खूबसूरत डिजाइन बनने लगे और उन्होंने तांबे और कांसे जैसी धातुओं का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। एक तरह का ट्रेड नेटवर्क भी बनने लगा था जिससे कीमती पत्थर जैसे लाजवर्ध यानी लैपिस लाजुली अफगानिस्तान से और दूसरा कच्चा माल दूरदराज के इलाकों से यहां पहुंचने लगा। इस दौर की एक और खासियत थी सुरक्षा पर बढ़ता जोर। कई बस्तियों के चारों ओर दीवारें बनाई जाने लगीं जो शायद बाहरी हमलों या जानवरों से बचाव के लिए थी। यह शुरुआती दौर लगभग 700 सालों तक चला। यह एक तरह से तैयारी का समय था। लोगों ने नई तकनीकें सीखीं, समाज बनाया और व्यापार करना सीखा। उन्होंने वह नींव तैयार की जिस पर एक शानदार शहरी सभ्यता की इमारत खड़ी होने वाली थी। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ जिसने इस विकास की रफ्तार को अचानक तेज कर दिया। एक ऐसी क्रांति हुई जिसने इन छोटे-छोटे कस्बों को दुनिया के सबसे सुनियोजित महानगरों में बदल दिया। आखिर वह क्या था? यह हमें हड़प्पा सभ्यता के सबसे शानदार दौर में ले जाता है जिसे हम परिपक्व हड़प्पा चरण कहते हैं। लगभग 2600 ईसा पूर्व सिंधु घाटी में एक असाधारण शहरीकरण का विस्फोट हुआ। यही वह समय है जब यह सभ्यता अपने शिखर पर पहुंची और एक विशाल इलाके में फैल गई। इसका विस्तार लगभग 13 लाख वर्ग किलोमीटर में था। उत्तर में जम्मू कश्मीर से लेकर दक्षिण में महाराष्ट्र तक और पूर्व में उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम में ईरान सीमा तक। यह उस समय की मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के कुल क्षेत्रफल से भी कहीं ज्यादा बड़ा था। इस विशाल साम्राज्य में हजारों बस्तियां थीं जिनमें गांव, कस्बे और विशाल महानगर शामिल थे। लेकिन इन महानगरों के अंदर की जिंदगी कैसी थी? कैसे उन्होंने बिना किसी आधुनिक तकनीक के इतने सटीक शहर बना लिए? और क्या वाकई उनके पास कोई ऐसी शक्ति थी जो आज के वैज्ञानिकों के लिए भी एक पहेली है? हड़प्पा सभ्यता का वैभव सिर्फ उसकी ईंटों में नहीं बल्कि उन लोगों की सोच में था जो आज से 4500 साल पहले मोहनजोदड़ो की गलियों में चलते थे। पिछले भाग में हमने उनके उदय को देखा। लेकिन अब हम उनके उस दौर की बात करेंगे जब यह सभ्यता अपने स्वर्ण युग में थी। कल्पना कीजिए कि आप मोहनजोदड़ो के लोअर टाउन की एक सीधी सड़क पर खड़े हैं। आपके दोनों ओर पक्की हुई ईंटों से बने दो-तीन मंजिला घर हैं। यहां की हर ईंट एक तय अनुपात में है। चाहे आप शहर के इस कोने में हों या हजारों मील दूर किसी और शहर में। जैसे ही आप एक घर के अंदर झांकते हैं, आप देखते हैं कि घर एक बीच के आंगन के चारों ओर बना है। हर घर की अपनी रसोई है, अपना बाथरूम है और सबसे हैरान करने वाली बात। हर घर का अपना निजी कुआं और एक एडवांस टॉयलेट सिस्टम है। यह आज से 4500 साल पहले की बात है। जब दुनिया के बाकी हिस्सों में लोग शायद स्वच्छता का मतलब भी नहीं जानते थे। यहां की नालियां ढकी हुई हैं और हर थोड़ी दूरी पर मेनहोल बने हैं ताकि सफाई की जा सके। यह इंजीनियरिंग का वह चमत्कार है जिसे आज के मॉडर्न शहर भी अपनाने के लिए संघर्ष करते हैं। लेकिन इन लोगों की अमीरी का राज क्या था? उनका असली खजाना छिपा था उनके व्यापार और उनकी कलाकारी में। हड़प्पा के लोग दुनिया के पहले ऐसे लोग थे जिन्होंने कपास उगाया और उसे कपड़ा बनाना सीखा। वे सिर्फ किसान नहीं थे, वे कमाल के जौहरी और इंजीनियर भी थे। गुजरात के लोथल में हमें दुनिया का सबसे पुराना डॉकयार्ड यानी बंदरगाह मिला है। यहां से इनके जहाज साबरमती नदी के रास्ते अरब सागर में उतरते थे और महीनों का सफर तय करके मेसोपोटामिया तक जाते थे। मेसोपोटामिया की पुरानी किताबों में मेलुहा नाम की एक जगह का जिक्र मिलता है जो दरअसल हमारी इसी सिंधु घाटी सभ्यता का नाम था। वहां के राजा यहां से हाथी दांत, सोना, तांबा और कीमती पत्थर जैसे लैपिस लाजुली मंगवाते थे। व्यापार में ईमानदारी बनाए रखने के लिए इन लोगों ने पत्थर के बाट बनाए थे जो 16 के गुणकों में थे। यह सिस्टम इतना सटीक था कि हजारों किलोमीटर दूर भी वजन का माप एक जैसा रहता था। सिर्फ व्यापार ही नहीं, उनकी कलाकारी भी आज हमें दंग कर देती है। चनहुदड़ो और लोथल जैसे शहरों में मनके बनाने की बड़ी-बड़ी फैक्टरियां थीं जहां वे कीमती पत्थरों को तराश कर ऐसे गहने बनाते थे जो आज के किसी लग्जरी ब्रांड को भी मात दे दें। मोहनजोदड़ो से मिली डांसिंग गर्ल की वह कांसे की मूर्ति दिखाती है कि वे धातु को पिघलाकर सांचे में ढालने की कला में कितने माहिर थे। और उनकी सबसे बड़ी पहेली उनकी मोहरें। मिट्टी और पत्थर से बनी इन हजारों मोहरों पर एक सींग वाले बैल, हाथी और बाघ की तस्वीरें हैं और उनके ऊपर एक ऐसी रहस्यमई लिपि लिखी है जिसे आज तक दुनिया का कोई भी बड़ा विद्वान पढ़ नहीं पाया है। जिस दिन यह लिपि पढ़ी जाएगी उस दिन हमें पता चलेगा कि वे लोग आपस में क्या बातें करते थे। उनके राजा कौन थे और वे अपनी दुनिया को कैसे देखते थे। धार्मिक तौर पर भी वे बहुत एडवांस थे। हालांकि हमें कोई बड़ा मंदिर नहीं मिला लेकिन पशुपति शिव की मोहर और मातृ देवी की मूर्तियां दिखाती हैं कि वे प्रकृति और योग में विश्वास रखते थे। पीपल के पेड़ की पूजा और स्वास्तिक का चिन्ह हमें उन्हीं की विरासत से मिला है। वे शांतिप्रिय लोग थे क्योंकि खुदाई में युद्ध के हथियार ना के बराबर मिले हैं। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि यह हंसती खेलती और अमीर सभ्यता अचानक इतिहास के पन्नों से ओझल हो गई। 1900 ईसा पूर्व के आसपास इन शानदार शहरों में पतन के निशान दिखने लगे। सड़कें टूटने लगीं, नालियां जाम होने लगीं और लोग शहरों को छोड़कर जाने लगे। पहले कहा गया कि आर्यों ने हमला करके इन्हें खत्म कर दिया लेकिन आधुनिक विज्ञान ने इस थ्योरी को गलत साबित कर दिया है। असली विलेन था जलवायु परिवर्तन। नदियां जो इनकी जीवन रेखा थी उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया। सरस्वती जैसी महान नदी सूखने लगी और सिंधु नदी में विनाशकारी बाढ़ आने लगी। बारिश कम होने से खेत बंजर हो गए और व्यापार ठप हो गया। यह एक धीमी और दर्दनाक मौत थी। लोग भूख और प्यास से मजबूर होकर पूरब और दक्षिण की ओर चले गए। वे गायब नहीं हुए बल्कि उन्होंने अपनी शहरी पहचान खो दी और छोटे गांवों में बस गए। हड़प्पा की यह कहानी सिर्फ एक अंत नहीं है बल्कि एक चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि चाहे हम कितने भी आधुनिक क्यों ना हो जाएं, प्रकृति के सामने हम हमेशा नाजुक हैं। उन्होंने क्लाइमेट चेंज का सामना किया और हार गए। आज जब हम फिर से उसी ग्लोबल वार्मिंग और सूखती नदियों के संकट से जूझ रहे हैं, तो हड़प्पा के खंडहर हमें चुपचाप आगाह कर रहे हैं। क्या हम उनकी इस चेतावनी को सुन पाएंगे? दोस्तों अगर आपको भारत के इस गौरवशाली और रहस्यमई अतीत का यह सफर पसंद आया हो तो इस वीडियो को लाइक और शेयर जरूर करें। आपकी मिट्टी का इतिहास ही आपकी असली पहचान है। हमारे साथ बने रहने के लिए धन्यवाद।

हड़प्पा सभ्यता इतनी उन्नत थी फिर कैसे खत्म हो गई ? | Complete History Of INDUS VALLEY CIVILIZATION
Itihaas Ki Kahani 100
17m 26s2,489 words~13 min read
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