Thumbnail for खूब नाम है, पैसा है, खुशी दिखा तो रही हूँ पर खुश क्यों नहीं हूँ ? Bhajan Marg by Bhajan Marg

खूब नाम है, पैसा है, खुशी दिखा तो रही हूँ पर खुश क्यों नहीं हूँ ? Bhajan Marg

Bhajan Marg

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[0:00]तनया जी ग्वालियर से राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी आज खूब नाम है धन है सारे सुख है पर कठिनाइयों को पार करते करते मुझे पता ही नहीं चला कि मैं खुद को खो बैठी मैं दिखा तो रही हूं पर मैं खुश क्यों नहीं हूं महाराज जी अभी पहले बैच में यहीं बैठ के एक व्यक्ति ने पूछा था कि मैं खुश होना चाहता हूं मैं शांत प्रसन्न होना चाहता हूं और वो जगत के किसी भी भोग में नहीं है किसी भी वस्तु में नहीं है किसी भी व्यक्ति में नहीं है कि अमुक व्यक्ति मिल जाए तो मैं खुश हो जाऊं असंभव वो अगर मिल भी जाता है तो उसके बाद फिर दूसरी मांग हो जाएगी कुछ दिन बाद वो हमारे मन का एक स्वभाव है नवम नवम मन की एक मांग है नवम नवम कुछ भी हो कुछ दिन बाद वो उससे हट जाता है और एक नई खोज करता है जब तक उसे परम नहीं सुख मिल जाएगा तब तक वो रुकेगा नहीं पक्का समझ लो आप रोक के दिखा दो परम सुख भगवान के नाम में भगवान के चरणों में है एक फिर हम समझाने के लिए कथा सुनाते हैं चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरथरी जी चक्रवर्ती सम्राट कहते हैं जहां से सूर्योदय होता है जहां अस्त होता है एक छत सप्त द्वीप में ही मंडल का सम्राट उसने विचार किया भरथरी जी ने कि सुख कहां है दिमाग बहुत बड़े विद्वान महापुरुष थे उन्होंने कहा खाने में भी सुख एक सीमा तक है रुपया पैसा खजाना इसलिए प्रिय क्योंकि इससे भोग सामग्री मिलती है पैसे की मात्रा क्या है भोग सामग्री मिलती है अगर पैसे से भोग सामग्री नहीं मिले तो हम कह रहे हैं तुम्हारे को नाम जो है एक ट्रक ₹2000 आप कर दिया जाए ₹2000 का नोट आपके किसी काम आएगा क्या आपको बेकार आग लगा दूं ₹500 क्योंकि उससे सामान मिलती है रूपए का महत्व है वस्तु वस्तु भोगने के काम में जो आती है पहनना ओढ़ना सब इसके बाद एक आंतरिक सुख की मांग होती है काम इसको बहुत समझ के देखना केवल अंतिम सुई जा के रुकती काम में शरीर भोग स्पष्ट वर्णन है सब सुख एक तरफ और मन की एक मांग होती है शरीर भोग वो भी नवम नवम नवम नवम भरतरी जी ने पूरे विश्व में ऐलान कर दिया मैं उसे पटरानी बनाऊंगा जो मुझे पसंद आ जाए सब सुंदरियां देश में अभी मतलब सत्यदीप में ही मंडल का मतलब विदेश सब तो एक पिंगला नाम की सुंदरी जिसके आगे सब सुंदरियां फैल थी भरतरी जी को उसने पसंद किया भरतरी जी ने उसे पसंद किया अब वो तो कोई साधारण पुरुष तो थे नहीं तो उन्होंने कहा कुछ वर्ष मैं राज काज बिल्कुल नहीं करूंगा विक्रमादित्य उनके भाई थे बहुत बड़े प्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट वही बने जा के आगे विक्रमादित्य महान बलशाली राजा थे उनके छोटे भाई थे उनको राजपद दे दिया और कहा मैं केवल देखूंगा भोग में है कितना सुख वैज्ञानिक दृष्टि उनकी अब रात दिन अच्छे-अच्छे पदार्थ खाना चक्रवर्ती सम्राट थे और पिंगला के साथ रहना पिंगला ने एक दिन खिड़की से झांक के देखा तो बलशाली अश्वों की सेवा कराने वाला अश्वपाल वो समझा रहा था अपने सेवकों को ऐसे रानी ने देखा और आकर्षित हो गई और हुकुम किया दासी को अश्वपाल से बोलो अमुक जगह मिले तो दिन में महाराज सैन करते थे तो दिन में जब सोते होते तब वह अश्वपाल से मिलने लगी अश्वपाल से उसका शारीरिक संबंध हो गया विक्रमादित्य ने को जब सूचना मिली तो उन्होंने कहा कि मैं महाराज से मिलना चाहता हूं सेवक से कहो बहुत प्रवीन थी पिंगला उसको भनक लग गई दासी के द्वारा कि विक्रमादित्य आपकी चाल को जान गया है भरतरी जी से उन्होंने कहा कि आप अपने भाई को क्या बहुत अच्छा समझते हो मेरे ऊपर वह गंदी नजर रखता है प्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम देवो न जानामि कुतः मनुष्या जो कपट छल करने वाले स्वभाव वाले होते उनका अलग अब विक्रमादित्य ने कहा मैं भ्राता श्री से मिलना चाहता हूं और उसने पहले ही क्लियर कर दिया तो विक्रमादित्य के पास क्रोधित हो के आया उनका मैं कभी नहीं समझता था तो ऐसी दृष्टि तो उनका भैया हम जो बात बताना चाह रहे हैं वो मैं समझ रहा हूं कि तू यही तो कहना चाहता है ना पिंगला गलत है तो उनका हां भाई गलत है हमारे पास बोले तुम कितने सही हो निकालो इसको मंत्री से आदेश किया इसको देश निकाला दे दो बेमतलब अब विक्रमादित्य ने मंत्रियों से कहा भाई इस समय हमारे उसके शासन में है जीवन इनका बहुत खतरे में है संभालना राज्य और मैं अमुक जगह जंगल में रहूंगा जरा भी खतरा हो तो मुझे बता देना पर भाई की आज्ञा का पालन करने के लिए जो अश्वपाल था वह महाराज की नृत्यांगना थी दरबार में उससे उसकी मित्रता थी अब वहां एक नगर में ब्राह्मण गरीब था उसने तपस्या की देवराज इंद्र को प्रसन्न करने के लिए देवराज इंद्र प्रसन्न हुए और एक फल दे दिया कहा इसको खाओगे तुम अमर हो जाओगे और अंतर्ध्यान हो गए उसने कहा मैं गरीब आदमी धन चाहता था अमर हो के क्या करूंगा तब विचार आया कि धर्मात्मा चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरतरी को दें तो वह हमें धन दे देंगे ऐसा ही किया महाराज की जय जयकार हो आज तक दरबार में नहीं आए थे लेकिन ब्रह्म ऋषियों को जाने का आदेश था वो गए महाराज की जय जयकार हो महाराज मैंने तपस्या के द्वारा अमर फल प्राप्त किया है मुझे धन दिया जाए तो उन्होंने खजाने में कह दिया जितना मांगे धन दे दो वो अमर फल लिया और विचार किया मैं अमर हो के क्या करूंगा अगर पिंगला अमर रहेगी तो पिंगला को दिया खा लो पिंगला ने तुरंत विचार किया मैं अमर होकर क्या करूंगी अगर अश्वपाल जीवित रहेगा तो अश्वपाल को दे दिया अश्वपाल ने सोचा मैं अमर हो के क्या करूंगा जो हमारी नृत्यांगना महाराज की है वो अमर हो जाए तो जब तक जीवित रहूंगा नृत्यांगना नृत्यांगना ने सोचा मैं अमर हो के क्या करूंगी महाराज को समझ रहे ना देखो जब पोल खुली होती है तो मैं अब वो जो नृत्यांगना थी उसने मंत्री से प्रार्थना की कि महाराज से मैं मिलना चाहती हूं आदेश हुआ आ जाओ तो उसने कहा महाराज ये अमर फल है आप इसे पा लीजिए आप जैसा धर्मात्मा राजा अमर होना उनका ये सच्ची बता तुझे अमर फल कहां से मिला क्योंकि तपस्या से ब्राह्मण ने प्राप्त किया तू वैश्या तुझे कहां से प्राप्त बोले महाराज ये प्राण क्षमा किए जाएं हमारी दोस्ती है अश्वपाल से अश्वपाल जो महल के नीचे ही तो उनका जाओ किसी से कहना मत अश्वपाल को बुलाया बोला जानते हो हम तुम्हें क्या कर सकते हैं तो वो कांप रहा था पहले से बीच सभा में आरे से चिरवाएंगे अभी तुझे और अगर तू सत्य बोल देगा तो तुझे क्षमा कर देंगे बिल्कुल कोई दंड बोले महाराज पिंगला जी ने दे दिया क्यों पिंगला से तुम्हारा क्या संबंध बोले विक्रमादित्य ठीक कह रहे थे हमारा पिंगला से शारीरिक संबंध है महाराज भरथरी के होश उड़ गए मुच्छ चक्रवर्ती सम्राट से वो खुश नहीं पिंगला को बुलाया सभा में आज सभा में उतर के गए पूरी सभा लगी हुई थी उनका देखो ब्राह्मण ने अमर फल दिया था पिंगला ने खाया और मैं तलवार से इसे काटूंगा ये मरेगी नहीं जीवित अरे महाराज तो उनका सत्य बोल दे तो तुझे छोड़ दूंगा नहीं तो अभी सूली पे चढ़वा दूंगा तो उनका महाराज ऐसी गलती हमसे हो गई कि हमने वो फल नहीं खाया अश्वपाल को दे दिया तो मुकुट उतारा और कहा धिक्कार है संसार के सुख को कि मुझ सर्वांग सुंदर पुष्ट चक्रवर्ती सम्राट से ये तृप्त नहीं है और महारानी से वो अश्वपाल तृप्त नहीं है अश्वपाल वैश्या से प्यार ये क्षुद्र काम किसे और महान बैरागी हुए जिनके सूत्रों को वैरागी जन पढ़ते हैं भरतरी शतक है उनका तो संसार में अगर कोई तृप्त होता है तो वो भगवान की भक्ति से होता है नहीं तो भोगों से तो हो ही नहीं सकता है आज तुम्हें प्यार कोई कर रहा है और तुमसे सुंदर मिल जाएगा कल वो उससे प्यार करने लगेगा परसों तीसरे से करने आज तक किसी की तृप्ति हुई हो तो हमें बताओ भोगों में कहीं तृप्ति नहीं हो सकती कहीं सुख में बढ़िया बहुत सुंदर बुद्धि आपकी है जो आपको अनुभव करा रही कि सब कुछ होते हुए भी एक ऐसा स्थान खाली है जहां लगता है वो नहीं है जो मैं चाह रही हूं वह श्री कृष्ण है वो प्रभु है यदि उनसे चित्त जोड़ लोगे तो निहाल हो जाओगे जैसे मीरा जी कहते हैं मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों ना कोई निहाल हो जाओगी अभी थोड़ा बुद्धि पवित्र है जो आपको यह अनुभव करा रही कि वास्तविक मुझे जो चाहिए वह नहीं है वो है परमात्मा वो है प्रभु हम कह रहे हैं यहां तक सोने से लाद दिए जाओ केवल मान्यता ही तो है ना मान्यता का सुख है ये नहीं बताओ मीठा लगता है कि खट्टा लगता है क्या सोने में है केवल वो महंगा है और उसकी मान्यता है इसलिए इसलिए हमको लगता है नहीं 4 लाख योजन का सोने का पहाड़ है एक जिसका नाम सुमेरु है भगवान की माया में रत्न गर्भा पृथ्वी को कहा गया है जैसे गेरू निकलती है ना जैसे खड़िया निकलती है चूना निकलता है ऐसे यहां सोने चांदी की धातुओं की यहां खजाना है पृथ्वी में अब वह तो भगवान जब अवतरित हुए थे तो अपने आप सब भूमि से प्रकाशित हो गया हम लोग इन सुखों से कभी तृप्त नहीं हो सकते क्योंकि हम सच्चिदानंद के अंश है हमारी मांग सच्चिदानंद है नहीं आप मान लो इतने बड़े बड़े धन लेकिन वो भी अशांत है आप ये मत समझना अशांत है क्योंकि जब तक भगवान नहीं मिलेंगे तब तक हमें शांति नहीं मिलने वाली कुछ भी भोग लो कुछ भी कर लो और देखो शांति कैसी और तृप्ति कैसी जब केवट कठौता में भगवान के सामने जला के और उनके चरण पखार रहा है तो भगवान सिया जी की मुंदरी दे रहे हैं सिया जी की मुंदरी लेकिन वो क्या कह रहा है अब कछु नाथ न चाही मोरे दीन दयाल अनुग्रह तोरे क्यों अति आनंद उमगी अनुरागा चरण सरोज पखारे ला भगवान के चरण से जो आनंद मिला केवट कहने लगा अब कुछ नाथ ना चाहिए मोरे भगवान के बिना मिले ये शब्द नहीं निकल सकता कि अब मैं सुखी हो गया

[11:06]आज के बाद मुझे कुछ नहीं चाहिए मैं जो चाहा वह मुझे मिल गया जो चाहा मिला चार चाहे और खड़ी हो गई चार समस्याएं और खड़ी हो गई इसलिए सखी भगवान ही एक है जिनके मिलने से तृप्ति हो सकती है दूसरा कोई नहीं है यहां दूसरा चार दिन का शरीर है आज जवान है कल बूढ़ा हो जाएगा भरोसा एकमात्र श्री भगवान में चित्त भगवान में अभी परमानंद है अभी इसी क्षण आनंद है वो भाई भी कह रहे थे कि सब कुछ बस मैं खुशी चाहता हूं तो खुशी किससे मिल जाएगी घर मिल जाए गाड़ी मिल जाए यह सब किसी के पास है वो खुश नहीं है जो तुम सोच रहे हो किसी के पास है इस सृष्टि में ये भाई महाराज ययाति का नाम सुना है शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी जो देवता भी मोहित हो जाए इतनी सुंदरी थी वृषपरवा की पुत्री शर्मिष्ठा जो दैत्यराज वृषपरवा दो पत्नियां और जब भोग से तृप्ति नहीं हुई तो अपने पुत्र की 1000 वर्ष की जवानी लेकर भोगा फिर इसके बाद घृणित घृणा आई कि धिक्कार है मुझे अपने पुत्र की जवानी भोग डाली फिर भी कोई सुख नहीं वही भोग वासना तब उन्होंने लिखा एक पुरुष को जो भगवान से विमुख है सृष्टि के सारे सुख मिल जाएं तो भी वो तृप्त नहीं हो सकता इसका मतलब है कि हम जैसे भी हैं अगर भगवान से जुड़कर संतोष कर ले तो आज सुखी है आज आनंद है और अगर भगवान से ना जुड़े तो आनंद की अनुभू

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