[0:00]दोस्तों बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गांव में एक 15 वर्षीय लड़का रवि अपनी माता के साथ रहता था। उनका जीवन अत्यंत कठिनाइयों से घिरा हुआ था। ना कोई बड़ा मकान ना कोई खेत खलियान। बस एक टूटी-फूटी झोपड़ी में जैसे-तैसे जीवन बीत रहा था। उनके पास खाने को भरपेट भोजन भी नहीं होता था। गांव के किनारे कच्ची मिट्टी के रास्ते के पास स्थित उस झोपड़ी में बरसात का पानी छत से टपकता रहता था। रवि की मां लोगों के यहां काम करती थी। रवि लोगों के खेतों में मजदूरी करके अपना गुजारा करता था। कभी किसी किसान के खेत में फसल काटते तो कभी बैलों को हाकते या पानी सिंचाई का काम करते। उसके पास अपनी कोई जमीन नहीं थी। दरअसल जो जमीन थी भी वो कर्ज चुकाने में चली गई थी। रवि पर कर्जदारों का पुराना कर्ज था। पैसे ना चुका पाने की वजह से उन कर्जदारों ने उनकी जमीन ही अपने नाम करवा ली थी। जमीन हाथ से जाते ही उनके पास मजदूरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। इसी गम में वह और ज्यादा चुप और उदास रहने लगा था। रवि की मां जानती थी कि यह जीवन कितना कठिन है। पर वो अपने बेटे को हमेशा यही सिखाती। बेटा मेहनत करने से कभी मत डरना। चाहे हालात कितने भी बुरे क्यों ना हो मेहनत करने वाला कभी भूखा नहीं मरता। रवि यह बात समझता था लेकिन भूख की पीड़ा वह हर दिन महसूस करता। कई बार ऐसा हुआ कि दिन भर खेतों में पसीना बहाने के बावजूद भी रात को पेट खाली रह जाता। एक दिन अचानक रवि की माता की तबीयत बिगड़ गई। वो लंबे समय से कमजोर थी। लेकिन इस बार बीमारी ने उन्हें बिस्तर से उठने ही नहीं दिया। इलाज के लिए ना पैसे थे और ना कोई मदद करने वाला। गांव के लोग करुणा दिखाने के बजाय दूरी बनाने लगे। वे सोचते कि अगर यह बच्चा यतीम हो गया तो हम क्यों बोझ उठाएं। कुछ ही दिनों में रवि ने अपनी मां को सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया। डॉक्टर ने बोला कि इलाज में बहुत पैसा लगेगा। उनको किसी अच्छे अस्पताल में ले जाना होगा। रवि अब टूट चुका था। उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो अपनी मां का किसी अच्छे अस्पताल में इलाज करा सके। उसने डॉक्टर को बोला आप मेरी मां को यहीं पर रखें और उनका इलाज करें। वो तब तक पैसों का इंतजाम करेगा। वह इस दुनिया में बिल्कुल अकेला रह गया। उसके पास ना परिवार था ना कोई सहारा। मां अस्पताल में है। गांव वालों ने भी मदद नहीं की। उसके बाद सबने जैसे उससे मुंह फेर लिया। रवि का मन टूट चुका था। लोग उसे काम नहीं देते थे। कहते अरे ये तो बच्चा है इससे क्या काम कराएंगे। कोई उस पर दया नहीं करता। भूखे पेट वह अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा रहता। मन में एक ही सवाल था अब मैं क्या करूं। एक रात जब भूख ने उसकी आंखों से नींद छीन ली थी तभी रवि ने निश्चय कर लिया। गांव में अब मेरा कोई नहीं है। यहां रहकर मैं बस भूखा मर जाऊंगा। मुझे कहीं और जाना होगा। उसने एक पुरानी सी पोटली उठाई। पोटली में बस दो-तीन फटे कपड़े थे। शरीर पर भी फटे और मैले कपड़े ही थे। वह बिना किसी को बताए गांव छोड़कर निकल पड़ा। मिट्टी की सुनसान सड़क पर वह पैदल चल रहा था। दिन ढल चुका था भूख और थकान ने उसे कमजोर कर दिया था। तभी उसने देखा कि सड़क किनारे एक बैलगाड़ी का पहिया निकल गया है और गाड़ी का मालिक परेशान खड़ा है। किसान ने रवि को देखते ही आवाज दी। अरे बेटा इधर आओ जरा मेरी मदद कर दो। यह पहिया लगवाने में हाथ बटा दो। रवि बिना सोचे समझे उसकी ओर बढ़ा और पूरी ताकत लगाकर पहिया गाड़ी में चढ़ाने में मदद की। किसान ने राहत की सांस ली धन्यवाद बेटा तुम्हारी मदद के बिना यह मुश्किल हो जाता पर तुम ये पोटली लिए कहां जा रहे हो? रवि ने धीमी आवाज में जवाब दिया। पता नहीं बस जा रहा हूं कहीं गांव छोड़ दिया है। किसान ने हैरानी से पूछा ऐसा क्या हुआ जो गांव छोड़ना पड़ा। रवि ने रोते-रोते उसे अपनी पूरी कहानी बता दी। मां अस्पताल में है। कर्जदारों द्वारा जमीन छीनना, भूखे सोने की मजबूरी और गांव वालों का बेरुखापन। किसान कुछ देर चुप रहा फिर बोला बेटा मैं कोई बहुत अमीर नहीं हूं। बस बैलगाड़ी से शहर जाता हूं। वहां से कुछ सामान लाकर गांव में बेच देता हूं पर तुम चाहो तो मैं तुम्हें शहर तक छोड़ सकता हूं। वहां काम मिलेगा गांव से बेहतर जिंदगी मिलेगी। रवि ने किसान की आंखों में आशा देखी। वो बोला। ठीक है चाचा मुझे शहर ही छोड़ दीजिए। किसान ने अपनी बैलगाड़ी में बैठा लिया। रास्ता लंबा था। किसान ने रवि को समझाया। देखो बेटा यह दुनिया बड़ी कठोर है। यहां कोई बिना मतलब के किसी का साथ नहीं देता। तुम्हें खुद पर भरोसा रखना होगा। मेहनत से कभी मत डरना। और मेहनत करने में शर्म मत करना। यही तुम्हारा सहारा है। किसान की यह बातें रवि के दिल में उतर गई। उसकी आंखें भर आई। वो हाथ जोड़कर बोला। चाचा आप मेरे लिए देवता जैसे हैं। किसान ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा बेटा जिंदगी में कभी आंखों को नम मत करना। अब तुम्हें अपने अंदर के बच्चे को खत्म करना होगा और मर्द बनना होगा। यह बात रवि के दिल को छू गई। वह चुपचाप किसान की ओर देखने लगा। कुछ घंटों के सफर के बाद वे एक छोटे से शहर में पहुंच गए। यह कोई बड़ा शहर नहीं था पर गांव से कहीं बेहतर था। वहां बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन थे। कुछ दुकानें थोड़ी भीड़भाड़ और जिंदगी में भागदौड़ का एहसास। किसान ने रवि को बस स्टैंड पर उतारा और बोला बेटा यही तुम्हें काम मिल जाएगा। मैं अब चलता हूं। मेहनत करना हिम्मत मत हारना। उसने रवि को कुछ रुपए भी दिए ताकि वह रात का खाना खा सके। रवि का दिल भर आया। उसने किसान के पैर छुए और कहा चाचा आपका यह उपकार मैं कभी नहीं भूलूंगा। किसान मुस्कुराते हुए बोला उपकार कुछ नहीं बेटा यह दुनिया तुम्हें बहुत सिखाएगी बस दिल मजबूत रखना और वह अपनी बैलगाड़ी लेकर लौट गया। शाम हो चुकी थी रवि अकेला बस स्टैंड के बाहर खड़ा था। सामने दो दुकानें दिख रही थी और कुछ दुकानें बस स्टैंड के पास थी। बाहर घोड़ा गाड़ी वाले यात्री का इंतजार कर रहे थे। वो सोच में पड़ गया कि अब क्या करें। उसके पास पैसे बहुत कम थे और कोई काम भी नहीं था। तभी आसमान में बादल गरजने लगे और तेज बारिश शुरू हो गई। रवि जल्दी से बस स्टैंड के अंदर चला गया। बारिश की वजह से दुकानदारों ने जल्दी-जल्दी शटर बंद कर दिए। बस स्टैंड पर भीड़ कम हो गई। वह एक बेंच पर बैठा सोचता रहा अब कहां जाऊंगा। कहां सोऊंगा किससे मदद मांगू। वह उसी समय रास्ते पर चलता गया और वह एक रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया। उसी समय रेलवे स्टेशन पर एक ट्रेन आई। यह कोयले वाले इंजन से चलने वाली पुरानी सवारी गाड़ी थी। रवि ने जीवन में पहली बार ट्रेन देखी थी। उसका मन थोड़ी देर के लिए अच्छा हो गया। वह देखता रहा कि यात्री उतर रहे हैं। कुछ चाय पी रहे हैं। कोई जल्दी में ट्रेन में चढ़ रहा है। फिर ट्रेन चली गई और स्टेशन लगभग सुनसान हो गया। भूख से उसका पेट मरोड़ रहा था पर उसके पास इतना ही पैसा था। वह सोच समझकर खर्च करना चाहता था। वह उसी बेंच पर बैठा-बैठा सो गया। सुबह शोरगुल से उसकी आंख खुल गई। स्टेशन पर चाय वाले चाय-चाय की आवाज लगा रहे थे। कोई ब्रेड पकोड़े बेच रहा था। बाहर देखा तो कल शाम से ज्यादा भीड़ थी। स्टेशन के बाहर फलों की ठेलियां लग चुकी थी। कोई कपड़ों की दुकान सजा रहा था कोई पकोड़े तल रहा था। रवि ने निश्चय किया कि वह काम की तलाश करेगा। वह एकक करके दुकानों पर गया और पूछा क्या मुझे काम देंगे। लेकिन हर जगह से उसे नहीं का जवाब मिला। किसी ने कहा बच्चे तुमसे क्या काम होगा तो किसी ने कहा हमारे पास पहले ही लोग हैं। भूख और बढ़ गई। वह एक फल वाले के ठेले के पास पहुंचा। चाचा दो केले कितने के हैं। उसने पूछा। ₹2 के बेटा फल वाले ने कहा रवि ने किसान द्वारा दिए गए पैसों में से ₹2 निकाले और केले खरीदे। वो ठेले के पास खड़े होकर खाने लगा। फल वाले चाचा ने उसे गौर से देखा। कपड़े फटे पुराने थे और चेहरा मासूम पर थका हुआ। उन्होंने पूछा बेटा तुम नए लग रहे हो यहां गांव से आए हो क्या? रवि ने सिर झुका कर कहा जी चाचा काम करने आया हूं। काम मिला चाचा ने पूछा। नहीं चाचा सबने मना कर दिया। रवि बोला फल वाले चाचा ने थोड़ा सोच कर कहा। फिर अब क्या करोगे? रवि ने सीधा उत्तर दिया। पता नहीं चाचा भगवान पर भरोसा है वह कुछ ना कुछ करेंगे। चाचा यह सुनकर दंग रह गए। इतनी छोटी उम्र में इतनी गहरी बात सुनकर उनके दिल को छू गई। उन्होंने पूछा घर में कोई है? रवि ने आंसू रोकते हुए कहा। नहीं चाचा मां है लेकिन अस्पताल में है। उनके इलाज के लिए मुझे पैसों का इंतजाम करना है इसलिए यहां आ गया हूं। फल वाले चाचा ने कुछ देर सोचा और फिर बोले बेटा ऐसा करो मेरे पास काम कर लो। रवि ने उत्सुकता से पूछा। चाचा आपकी ठेली पर मैं क्या काम कर सकता हूं। तुम यात्रियों को आवाज लगाओगे आओ साहब मीठे फल हैं ताजे फल हैं मेरी उम्र हो चली है अब मुझसे ऊंची आवाज नहीं लगती। बदले में तुम्हें दिन में दो वक्त का खाना और कुछ पैसे दूंगा चाचा ने कहा। रवि का चेहरा खुशी से खिल गया। उसने तुरंत हामी भर दी। उस दिन से रवि ने पूरी लगन के साथ ठेले पर काम करना शुरू कर दिया। जैसे ही कोई यात्री स्टेशन के बाहर आता वह ऊंची आवाज में पुकारता आओ साहब मीठे फल है ताजे फल है। पहले दिन ही उसने पांच यात्रियों को फल बेचने में मदद की। चाचा बहुत खुश हुए। रात को ठेला समेटने के बाद चाचा ने पूछा बेटा तुम सोओगे कहां रवि ने कहा मैं रेलवे स्टेशन पर ही सो जाऊंगा चाचा। चाचा ने अफसोस जताते हुए कहा बेटा मेरे पास भी एक ही कमरा है जिसमें मेरा परिवार रहता है वरना तुम्हें अपने साथ ले जाता। रवि मुस्कुरा कर बोला कोई बात नहीं चाचा मुझे आदत है अकेले रहने की रात फिर वही बेंच उसका बिस्तर बनी। रवि अब हर दिन फल वाले चाचा के साथ काम करता था। सुबह-सुबह ठेला लग जाता और दिन भर यात्रियों को पुकारता रहता। आओ साहब मीठे फल हैं ताजे फल है। उसकी आवाज में एक मासूमियत और आत्मविश्वास था। लोग उसकी तरफ आकर्षित होते। जो यात्री पहले सीधे निकल जाते थे वे अब ठहर कर फल खरीदने लगे। फल वाले चाचा भी खुश थे। उन्होंने कहा बेटा तुम्हारे आने से मेरा काम बढ़ गया है। पहले जितना बिकता था अब उससे ज्यादा फल बिक रहे हैं। रवि को यह सुनकर गर्व हुआ। उसने चाचा से पूछा चाचा मैं अच्छा कर रहा हूं ना चाचा ने मुस्कुरा कर कहा। बहुत अच्छा कर रही हो बेटा तुम मेहनती हो इसी से आगे बढ़ोगे। दिन में दो वक्त का खाना चाचा देते थे और साथ में कुछ पैसे भी लेकिन रहने का ठिकाना अब भी वही रेलवे स्टेशन था। रात को वो बेंच पर सो जाता और स्टेशन की आवाजें उसका साथी बन जाती। एक रात जब रवि रेलवे स्टेशन की बेंच पर बैठा था तब स्टेशन मास्टर उधर से गुजरे। वे रोज उसे देखते थे लेकिन वह हमेशा सो रहा होता था। आज वह जाग रहा था। स्टेशन मास्टर ने पूछा बेटा नींद नहीं आ रही आज रवि ने सिर झुका कर कहा। नहीं साहब बस बैठा था स्टेशन मास्टर उसके पास बैठ गए। मैं तुम्हें रोज यहां देखता हूं तुम बेंच पर क्यों सोते हो घर से भाग कर आए हो क्या? रवि ने धीरे से जवाब दिया। नहीं साहब मेरा कोई घर नहीं है। मेरी मां अस्पताल में है। मैं उनके इलाज के लिए पैसे का कमाने आया हूं। और कोई सहारा नहीं था अब इसलिए यहां आ गया। उसने पूरी कहानी सुनाई। गांव के हालात मां की बीमारी भूख और शहर आने की घटना। स्टेशन मास्टर उसकी बातें ध्यान से सुनते रहे। थोड़ी देर चुप रहकर उन्होंने कहा बेटा तुम अब फल वाले चाचा के साथ काम करते हो ना। जी साहब रवि बोला। मैं उनके ठेरे पर यात्रियों को आवाज लगाता हूं। बदले में वे खाना और कुछ पैसे देते हैं। स्टेशन मास्टर ने गंभीरता से कहा। अच्छा है पर कब तक दूसरों के फल बेचकर जिंदगी गुजारोगे क्यों ना खुद का काम करो। रवि ने हैरानी से उनकी तरफ देखा। साहब मैं खुद कैसे कर सकता हूं। मुझे नहीं पता फल कहां से आते हैं। पैसे भी ज्यादा नहीं है। स्टेशन मास्टर ने समझाया। देखो बेटा तुम्हें बेचना आता है। यही सबसे बड़ी बात है। अगर तुम खुद के फल बेचो तो ज्यादा फायदा होगा। मैं तुम्हें ट्रेन के अंदर जाने का पास बना दूंगा। फिर तुम ट्रेन में बैठे यात्रियों को फल बेच सकते हो। रवि थोड़ा डर गया। साहब लेकिन चाचा ने मुझे काम दिया है। मैं उन्हें कैसे छोड़ दूं। स्टेशन मास्टर ने गहरी बात कही। बेटा चाचा ने तुम्हें कान दिया पर ये उनका कोई बड़ा उपकार नहीं है। उन्होंने अपना फायदा देखा इस दुनिया में सब ऐसा ही करते हैं। तुम उनसे साफ-साफ कह देना कि अब खुद का काम करना चाहते हो। उनसे फल खरीद सकते हो या पूछ सकते हो कि फल कहां से लाएं। इसमें उनका भी भला होगा। रवि चुप हो गया। यह सच था कि वह चाचा के भरोसे कब तक जीता। स्टेशन मास्टर ने एक और बात समझाई। धंधे में भावनाओं को काबू में रखना पड़ता है। अगर तुम खुद का काम करना चाहते हो तो आत्मनिर्भर बनो। मेहनत तो तुम करोगे ही। लेकिन अब फायदा भी तुम्हारा होना चाहिए। रवि ने उनकी बातें ध्यान से सुनी। यह सब उसके दिल को छू गया। अगले दिन सुबह रवि ने पहले की तरह पूरे उत्साह से काम किया। यात्रियों को आवाज लगाई फल बेचे। शाम को वह चाचा के पास गया। चाचा मुझे आपसे एक बात करनी है उसने कहा। हां बेटा बोलो चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा। रवि ने हिम्मत जुटाई और बोला। चाचा जो पैसे आप मुझे देते थे उनमें से मैंने कुछ बचाए हैं। क्या आप मुझे कुछ फल दे सकते हैं मैं ट्रेन के अंदर बेचूंगा। अब मैं खुद का काम करना चाहता हूं। चाचा उसकी बात सुनकर थोड़ा चौंके पहले तो उन्हें लगा कि रवि अब उनके पास काम नहीं करेगा। लेकिन फिर उन्होंने उसकी आंखों में आत्मविश्वास देखा। अच्छी बात है बेटा चाचा बोले। लेकिन ट्रेन में कैसे बेच पाओगे अंदर तो आसानी से जाने नहीं देंगे। रवि ने कहा चाचा ये मुझ पर छोड़ दीजिए। मैं खुद संभाल लूंगा। चाचा मुस्कुरा दिए। ठीक है बेटा तुम में हिम्मत है। मैं तुम्हें फल दूंगा और हां अगर फल खत्म हो जाए तो मुझसे ही ले लेना। रवि ने झुक कर कहा धन्यवाद चाचा आपके बिना मैं कुछ ना कर पाता। उस रात वह रेलवे स्टेशन की बेंच पर लेटा लेकिन नींद नहीं आई। मन में कई तरह के विचार आ रहे थे। यह एक नई शुरुआत थी। सुबह वह जल्दी उठा चाचा से एक टोकर फल लिया। स्टेशन मास्टर ने वादा निभाया और उसका पास बनवा दिया जिससे वह स्टेशन और ट्रेन में आ जा सके। रवि ट्रेन के डिब्बों में चढ़कर यात्रियों को आवाज लगाने लगा। आओ साहब मीठे फल हैं ताजे फल है। ताजे फल है सिर्फ ₹2 उसकी मासूम आवाज और उत्साह देखकर यात्री खुश होकर फल खरीदते। कई लोग तो उससे बातें भी करते। बेटा कहां से आए हो पढ़ाई नहीं करते। रवि बस मुस्कुरा कर कहता। अभी तो काम कर रहा हूं साहब। पहला दिन बहुत अच्छा रहा। शाम तक उसका सारा माल बिक गया। उसने खुश होकर पैसे गिने। यह ठेले पर काम करने से ज्यादा था। रात में स्टेशन मास्टर पास से गुजरे तो उन्होंने पूछा बेटा कैसा रहा दिन। रवि खुशी से बोला। बहुत अच्छा रहा साहब यह सब आपकी वजह से हुआ। स्टेशन मास्टर ने कहा नहीं बेटा मेहनत तुम्हारी है। बस दिल लगाकर काम करना। और याद रखना इस दुनिया में सिर्फ उसी पर भरोसा करना जो तुम्हारी मदद निस्वार्थ भाव से करे। रवि ने यह बात दिल में बैठा ली। अब हर दिन रवि सुबह-सुबह चाचा से फल खरीदता और ट्रेन में बेचता। धीरे-धीरे उसने यात्रियों से अच्छा रिश्ता बना लिया। लोग उसे पहचानने लगे। उसकी मीठी बोली और सच्चाई ने सबका मन जीत लिया। छ महीने इसी तरह बीत गए। उसने काफी पैसे जोड़ लिए। अब वह साधारण कपड़े पहनने की बजाय साफ-सुथरे कपड़े पहनता। उसने अपनी मां को शहर के एक अस्पताल में भर्ती करवा दिया जहां उसका अच्छे से इलाज हो सके। स्टेशन के लोग भी उसे सम्मान से देखने लगे। एक रात स्टेशन की बेंच पर बैठकर वह पैसे गिन रहा था। तभी स्टेशन मास्टर वहां आए। बेटा पैसे कितने हो गए उन्होंने पूछा। रवि बोला। साहब इतने पैसे हैं कि जेब में रखना मुश्किल लगता है। स्टेशन मास्टर ने कहा तो अब बैंक में खाता खुलवाओ। कल सुबह चलो मैं तुम्हारा खाता खुलवा दूंगा। वहां पैसे जमा करोगे तो सुरक्षित रहेंगे। अगले दिन स्टेशन मास्टर उसे बैंक ले गए। यह एक पुराना सा बैंक था। लकड़ी की टेबलें और कतार में खड़े लोग। रवि ने पहली बार बैंक देखा। स्टेशन मास्टर की मदद से उसका खाता खुल गया। अब जब भी पैसे ज्यादा हो जाते वह बैंक में जमा कर देता। समय बीतने के साथ रवि में आत्मविश्वास और बढ़ता गया। वह जानता था कि यह जीवन सिर्फ ट्रेन में फल बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसने सोचा अगर रेलवे स्टेशन पर मेरी भी एक छोटी सी दुकान हो जाए तो अच्छा होगा। जैसे बाकी लोगों की होती है। एक दिन उसने स्टेशन मास्टर से अपनी इच्छा बताई। साहब अगर मैं स्टेशन पर छोटी सी दुकान खोल लूं तो मुझे और स्थाई काम मिलेगा। स्टेशन मास्टर ने पूछा क्या तुम्हारे पास पैसे हैं। दुकान के लिए खर्चा करना होगा और हर महीने किराया भी देना होगा। रवि बोला साहब जो मैंने बैंक में जमा किया है उसी से काम चला लूंगा। बस आप मुझे अनुमति दिला दीजिए। स्टेशन मास्टर ने उसकी आंखों में चमक देखी। ठीक है बेटा मैं तुम्हारी मदद करूंगा। तुम्हें अनुमति भी दिलवा दूंगा। रवि अब 17 साल का हो चुका था। उसके पास अनुभव था। आत्मविश्वास था और अब सपना भी। स्टेशन मास्टर की मदद से अनुमति मिल गई। रवि ने अपनी बचत से स्टेशन पर ही एक छोटी सी फ्रूट और जूस की दुकान खोल ली। दुकान फलों से भरी थी। यात्रियों के बैठने के लिए भी जगह बनाई गई। दुकान के उद्घाटन के दिन रवि ने स्टेशन मास्टर को धन्यवाद दिया। साहब यह सब आपके कारण हुआ है। आप ना होते तो मैं आज यहां तक नहीं पहुंच पाता। स्टेशन मास्टर ने कहा नहीं बेटा मेहनत तुम्हारी है। तुमने हालात से हार नहीं मानी इसलिए तुम आज यहां हो। याद रखना भगवान मेहनत करने वालों का साथ देता है। रवि भावुक हो गया। उसकी आंखों में आंसू आ गए। अब उसकी मां की हालत में सुधार हो गया था। वो भी अपने बेटे की दुकान पर आई थी। उसे अपने बेटे पर बहुत गर्व हो रहा था। उसने रवि से शांत स्वर में कहा बेटे 2 साल पहले हमारे हालात कैसे थे। लेकिन आज तूने सब कुछ बदल दिया। रवि ने शांत स्वर में कहा मां ये सब आपके आशीर्वाद का नतीजा है। लेकिन उसने किसान चाचा की बात याद की। जिंदगी में आंखें नम मत करना। रेलवे स्टेशन पर लगी रवि की फ्रूट और जूस की दुकान अब उसकी नई पहचान बन चुकी थी। यह वही स्टेशन था जहां कभी वह भूखा प्यासा रातें बिताता था। अब वहीं पर उसकी अपनी एक दुकान थी। दुकान छोटी जरूर थी लेकिन बेहद साफ-सुथरी और व्यवस्थित ताजे फलों की खुशबू चारों ओर फैलती थी। जूस के लिए छोटे-छोटे गिलास सजा के रखे जाते। यात्रियों को दुकान आकर्षक लगती। रवि सुबह-सुबह दुकान खोलता और पूरे उत्साह के साथ ग्राहकों का स्वागत करता। आइए साहब ताजे फल ठंडा जूस सब मिलेगा। लोग उसकी मुस्कान और विनम्रता से प्रभावित होते। यात्रियों को समय पर सही सामान देना साफ-सफाई का ध्यान रखना। यह सब वो बड़ी मेहनत से करता। कुछ ही महीनों में उसकी दुकान रेलवे स्टेशन पर चर्चा का विषय बन गई। बाकी दुकानदार भी उसकी तारीफ करने लगे। देखो यह वही लड़का है जो कभी स्टेशन की बेंच पर सोता था। आज अपनी दुकान चला रहा है। रवि के लिए यह गर्व का पल था। लेकिन उसने कभी घमंड नहीं किया। वह जानता था कि यह सब उसकी मेहनत और स्टेशन मास्टर के मार्गदर्शन से संभव हुआ है। स्टेशन मास्टर भी जब दुकान पर आते तो मुस्कुराते हुए कहते बेटा तुमने यह सब अपने जज्बे से किया है। याद है तुमने पहली रात यहीं बेंच पर भूखे पेट गुजारी थी। रवि की आंखें नम हो जाती। पर वह खुद को संभालता। साहब उस रात ने ही मुझे मजबूत बना दिया था। अगर मैं हार मान लेता तो शायद आज यहां नहीं होता। दुकान अच्छी चल रही थी। यात्रियों की भीड़ में अक्सर ऐसा होता कि रवि अकेले सभी को संभाल नहीं पाता। इसीलिए उसने तय किया कि वह किसी की मदद लेगा। वो दो छोटे लड़कों को काम पर रखने लगा। दोनों वैसे ही गरीब थे जैसे वह कभी था। उसने उन्हें सिखाया कि ग्राहकों से कैसे बात करनी है सामान कैसे संभालना है। अब दुकान पर काम और तेजी से होने लगा। यात्रियों को जूस भी पसंद आने लगा। गर्मियों में लोग जूस पीकर राहत महसूस करते। रवि ने धीरे-धीरे दुकान में और चीजें जोड़ना शुरू कर दिया। पानी की बोतलें, बिस्कुट और कुछ हल्के नाश्ते के पैकेट दुकान का नाम भी उसने रखा रवि फ्रूट्स एंड जूस। यह नाम रेलवे स्टेशन पर सबकी जुबान पर चढ़ने लगा। एक दिन रवि ने स्टेशन मास्टर से कहा। साहब आप ना होते तो मैं आज यहां नहीं होता आपने जो मेरे लिए किया है उसे मैं कभी नहीं भूल सकता। स्टेशन मास्टर ने कहा बस बेटा अब तुम भी दूसरों के लिए वही बनो जो मैं तुम्हारे लिए बना। यही जीवन का असली फल है। रवि अब रेलवे कॉलोनी के पास बने अपने घर में रहता था। घर छोटा जरूर था लेकिन बहुत ही सुंदर और सुकून भरा। उसके जीवन में स्थिरता आ चुकी थी। कभी वह भूखा पेट रेलवे स्टेशन की बेंच पर सोया था। आज उसी स्टेशन पर उसकी दुकानें थी। कभी उसके पास पहनने को सही कपड़े नहीं थे। आज लोग उसे सम्मान से बुलाते थे। रवि ने अपने जीवन की कठिनाइयों को ताकत बना लिया था। उसने सीख लिया था कि मेहनत, आत्मविश्वास और सही मार्गदर्शन से इंसान सच में जमीन से आसमान तक पहुंच सकता है। यह थी उस छोटे से बच्चे रवि की कहानी जिसने गांव की गरीबी से निकलकर शहर में अपनी पहचान बनाई। स्टेशन मास्टर की वह बात रवि के जीवन का मंत्र बन गई थी। जिस इंसान की मदद निस्वार्थ हो उसी पर भरोसा करना और मेहनत से कभी मत डरना। रवि अब उसी सोच के साथ जीवन जीता था। दोस्तों इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों ना हो। मेहनत, आत्मविश्वास और सही मार्गदर्शन से इंसान किसी भी मुश्किल को पार कर सकता है। रवि ने गरीबी और भूख जैसी परिस्थितियों का सामना किया लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी। उसने यह भी समझा कि जो लोगों की मदद निस्वार्थ भाव से करते हैं वही सच्चे सहायक होते हैं। जैसे स्टेशन मास्टर और किसान चाचा ने रवि की मदद की वैसे ही हमें भी दूसरों की मदद करने का अवसर मिलते ही करना चाहिए। दूसरों को अवसर देना ही असली इंसानियत है। यही सोच इंसान को जमीन से आसमान तक पहुंचा सकती है।
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